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Monday, May 05, 2025

मायानगरी में मस्त, एकदम मस्त

 #Mumbai में कल यह साहब मुझे बीकेसी से जुहू ले जाने के लिए आए। उबर से टैक्सी बुक की थी। चमचमाती कार, अभी तक सीट की पन्नी भी नहीं उतरी थी। उन्होंने बताया कि, कवर लगवा लेंगे, तब उतारेंगे। मैंने कहा- लगवा लो भाई, गर्मी है और सीट पर पन्नी से पृष्ठ भाग पसीने से तरबतर हो रहा है। यह दूसरी गाड़ी इन साहब ने खरीदी है। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात एक सहकारी बैंक में अनुकंपा नियुक्ति से क्लर्क बने। कहते हैं, उतने से काम नहीं चलता, इसलिए टैक्सी भी चलाते हैं। यह सब सहज भाव में बताते जा रहे थे, रंचमात्र भी तनाव नहीं। जब छुट्टी होती है तो चलाते हैं और उनके ऑफिस में भी लोग जानते हैं तो उनकी टैक्सी मँगाते हैं। एकदम मस्त दिख रहे थे। बढ़िया चश्मा, टी-शर्ट में जम रहे थे। यही मुम्बईकर स्पिरिट है। मुम्बई मायानगरी है। अब माया के चक्कर में हर कोई फँसा है, लेकिन मायानगरी में रहकर भी मस्त एकदम मस्त रहने का है, विनायक साहब ने समझाया। #MumbaiDiaries



Monday, June 26, 2017

नौकरी में भागते रहने का सुख !

मेरी पहली नौकरी प्रयाग महाकुम्भ में वेबदुनिया के साथ
ये सलाह अनुभव से उपजी है और सभी के लिए है। लेकिन ख़ासकर पत्रकारों के लिए। ये सही है कि हम पत्रकार या तो दिल्ली, मुम्बई जैसी बड़ी जगह या फिर अपने राज्य की राजधानी या फिर अपने जिले के ही धाँसू पत्रकार बनना चाहते हैं। इसमें से किसी भी एक मोह से उबर पाना बेहद कठिन होता है। मैं मूलत: प्रतापगढ़ से हूँ। पैदाइश के बाद हमारी पूरी बनावट इलाहाबाद की देन है। सबसे कठिन फैसला था, इलाहाबाद छोड़ना। बहुत कड़ा मन करके ये फैसला लिया था। आज उस फैसले पर मुग्ध होने जैसा भाव रहता है। फिर कानपुर, देहरादून, मुम्बई होते अभी दिल्ली टिका हूँ। हालाँकि, मैं ठहरना दिल्ली ही चाहता था। पहली बार ११ जुलाई २००१ को दिल्ली आकर गिरा था। लेकिन, दिल्ली निरन्तर भगाती रही। उसी भागने में ऊपर लिखे शहरों में रहना हुआ। आत्मीय सम्बन्ध बने। कानपुर और मुम्बई दोनों ही शहरों को लेकर मन में अच्छा भाव नहीं था। लेकिन, कानपुर में ग़ज़ब के आत्मीय सम्बन्ध बने और समझ भी बेहतर हुई। ईमानदार विश्लेषण ये कि  हर शहर ने मुझे बेहतर होने में मदद की और सबसे बड़ी बात कि समझ का दायरा बहुत बड़ा कर दिया।
हिन्दुस्तान इतनी विविधता वाला देश है कि यहां आप एक छोटी सी 2-4 दिन की यात्रा में एक पर्यटक की तरह कहीं घूम-टहलकर तो आ जाते हैं। अपने फेसबुक पन्ने के लिए कुछ अच्छी तस्वीरें जुटा लेते हैं। लेकिन, उस जगह से जुड़ाव बहुत कम हो पाता है। हिन्दुस्तान को समझने, पक्का हिन्दुस्तानी बनने के लिए जरूरी है कि हर कोई, हर किसी की भावना को समझे। कानपुर, मुम्बई और देहरादून ने मुझे ये समझने में मदद की। मुम्बई मुझे बहुत परेशान करता था। यहां तक कि 4 साल रहने के बाद लगभग विद्रोही अन्दाज में मैंने मुम्बई छोड़ा था। लेकिन, ये भी सच है कि उन 4 सालों में मिली, सहेजी अच्छी यादों की वजह से आज भी मुम्बई जाने का मन होता है। यही हाल देहरादून और कानपुर को लेकर भी है। इस लिहाज से ज्यादा जगहों पर रहना नहीं हो सका। इसीलिए नए पत्रकारों को मेरी ये सलाह है कि पढ़ाई पूरी होते ही पहला मौका मिलते ही बैगपैक करके अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी से जितना दूर जा सकते हैं, चले जाइए। इससे देश के और नजदीक पहुंचेंगे। लिखने, पढ़ने, समाज को समझने के लिहाज से अद्भुत, सकारात्मक बदलाव होगा।
कम से कम, जीवनसाथी पक्का कर लेने और बच्चों के जिन्दगी में आने तक तो ये प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरा कर सकते हों, तो करिए। सच बता रहा हूं, उस भगान लेने के दौरान के अनुभव जिन्दगी में कमाल की समझ, मिठास विकसित करते हैं। और पत्रकार के लिए तो ये जरूरी है कि वो देश के हर हिस्से के लोगों की समझ को थोड़ा बहुत तो समझ सके। वरना अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी के लिहाज से पूरी समझ बनाएगा। फिर मुश्किल आजीवन रहेगी। दूसरे काम करने वालों के लिए भी ये बहुत सुखद अनुभव देने वाला हो सकता है। लेकिन, पत्रकार के लिए ये सबसे जरूरी सबक के जैसा है। ये किताबी ज्ञान तो है नहीं, अपने निजी अनुभव से सीखा है, इसलिए सकारात्मक परिणाम का दावा भी पक्का है।


Monday, June 19, 2017

मुम्बई की बारिश और पानी की कमी

टेलीविजन के जरिए मुम्बई को देखते लोगों को लग रहा होगा कि मुम्बई पूरा बारिश में भीगा/डूबा हुआ है। लेकिन, ऐसा है नहीं। बारिश हो रही है, लगभग रोज ही। लेकिन, ऐसी भी झमाझम वाली नहीं हो रही है। हां, इतनी बारिश जरूर हो रही है कि मुम्बई के लिए रेल या सड़क, किसी भी रास्ते से जाते चारों तरफ नदियां, जलाशय लबालब भरे मिलेंगे। इतना पानी बरस चुका है। प्रकृति ने साल भर के लिए पानी का इन्तज़ाम कर दिया है। इसे सम्भालने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है मुम्बईकरों। लबालब भरे पानी के समय जल संरक्षण की सोचना/करना चाहिए। वरना मार्च आते फिर पानी पानी चिल्लाओगे। ये मसला कितना गम्भीर है, इसका अन्दाजा इससे लगाकि 3 दिन ठाणे में रहते 2 दिन पानी समय से नहीं आया। 

Sunday, June 18, 2017

समन्दर किनारे की ताजगी और गन्दगी

वर्सोवा में सफ़ाई का कमाल देखने चला गया। समन्दर किनारे तो अच्छा ही लगता है। लेकिन जो वर्सोवा बीच सफ़ाई की मिसाल बताया जा रहा है, उसकी ये तस्वीरें दिखीं। मन दुखी हो गया। पढ़ा था कि किसी एक व्यक्ति की कोशिश से वर्सोवा बीच गजब का साफ हो गया है। लेकिन, वो लगता है कि मामला अस्थाई टाइप का ही था। साफ समन्दर किनारे कुछ पल भी बिताना ताजगी का अहसास देता है। ऐसी गन्दगी में ताजगी का अहसास भी गन्दा हो जाता है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...