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Saturday, July 01, 2017

फिलहाल घरेलू झगड़े में टूटी जमीन भरने में लगे हैं अखिलेश यादव

विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि प्रचण्ड बहुमत से आई सरकार के सामने निराश समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल कैसे बढ़ाया जाए। ये सवाल इसलिए भी और बड़ा हो गया है क्योंकि, चाचा शिवपाल यादव नई पार्टी बनाने के लिए ताल ठोंक रहे थे और पिता मुलायम सिंह यादव हमेशा की तरह हर बीतते पल के साथ रंग बदल रहे हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी पर कब्जा कर लेने के आरोप के साथ नई समाजवादी पार्टी की शुरुआत करने की बड़ी जिम्मेदारी अखिलेश के कंधों पर आ गई है। 44 साल की उम्र में अखिलेश के सामने ये बड़ी चुनौती है कि वो कैसे समाजवादी पार्टी का आधार सुरक्षित रखते हुए नए लोगों को समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ पाते हैं। कमाल की बात ये है कि 44 साल के अखिलेश के 17 साल सत्ता के साथ बीते हैं। पिछले 5 साल से अखिलेश राज्य के मुख्यमंत्री थे, उसके पहले 10 साल तक सांसद। लेकिन, उस सत्रह साल की राजनीतिक मजबूती को चाचा शिवपाल यादव कृपा से मिली सफलता बताते हैं। इसीलिए जब आज 1 जुलाई को अखिलेश अधिकारिक तौर पर 44 साल के हो गए हैं, तो ये सवाल उठता है कि अखिलेश वाली नई समाजवादी पार्टी कैसे खड़ी हो पाएगी।
बुरी तरह चुनाव हारने के बाद मायावती ने पूरी तरह से ईवीएम मशीनों पर ठीकरा फोड़ दिया। हालांकि, अखिलेश ने इसे पहले जनता का आदेश कहा। बाद में लगा कि ईवीएम की राजनीति चल सकती है, तो उन्होंने भी ईवीएम मशीनों की जांच कराने की मांग कर दी। लेकिन, जल्दी ही उन्हें यह अहसास हो गया कि फिलहाल ये मुद्दा है नहीं। इसीलिए 25 मार्च को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद समाजवादी पार्टी का सदस्यता अभियान नए सिरे से शुरू करने का फैसला लिया गया। 25 मार्च के बाद लगभग हर तीसरा ट्वीट अखिलेश यादव ने या तो समाजवादी पार्टी के सदस्यता अभियान का किया है या फिर पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात करते हुए। दरअसल, मुख्यमंत्री रहने के दौरान अखिलेश यादव पर एक बड़ा आरोप लगा कि वो कुछ खास लोगों से ही घिरे रहते हैं। और समाजवादी पार्टी के असली कार्यकर्ता मुलायम सिंह यादव वाली समाजवादी पार्टी के हैं। समाजवादी पार्टी के एमएलसी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य संजय लाठर कहते हैं कि ये भ्रम है कि समाजवादी पार्टी में शिवपाल यादव की असली ताकत है। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए समाजवादी पार्टी ने 15 अप्रैल से 15 जून तक सदस्यता अभियान चलाया। जिसे बाद में बढ़ाकर 30 जून तक कर दिया गया। ये सदस्यता अभियान सबके लिए खुली थी। अब इसी आधार पर जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक का चुनाव होगा। संयोग देखिए कि 30 जून को सदस्यता अभियान खत्म होने के अगले ही दिन अधिकारिक तौर पर अखिलेश का जन्मदिन होता है। सदस्यता पूरी हो गई है अब पार्टी को भी आकार लेना है।
समाजवादी पार्टी को फिर से खड़ा करने के अखिलेश यादव के तीन सूत्र बिल्कुल साफ है। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण- नई सदस्यता के बाद जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के चुनाव कराकर ये साबित कर देना कि अब समाजवादी पार्टी का मतलब सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव है।
दूसरा- प्रदेश की जनता के सामने अपनी साफ-सुथरी वाली छवि को और दुरुस्त करना। इसीलिए अखिलेश यादव ने 6 महीने तक योगी सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन न करने का फैसला लिया है।
तीसरा- प्रदेश की जनता को ये लगातार बताते रहना कि उनकी सरकार ने क्या किया। फिर चाहे वो आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का काम हो, नोएडा एलिवेटेड रोड का काम हो या फिर डायल 100। इसका अन्दाजा 24 जून को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक ट्वीट से ठीक से समझ आता है।
राम राम जपना, पराया काम अपना।
अखिलेश यादव के इस ट्वीट को करीब साढ़े आठ हजार लोगों ने पसन्द किया। 2200 से ज्यादा लोगों ने इसे रिट्वीट किया है। उत्तर प्रदेश चुनाव नतीजों के बाद अखिलेश यादव के किए गए ट्वीट में से सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया इसी ट्वीट को मिली है।
इसी से उत्साहित होकर कहें या कि अपनी रणनीति के तीसरे सूत्र के तहत अखिलेश ने लगातार लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे, इटावा लायन सफारी की तस्वीरें डाली हैं। डायल 100 की सफलता की कहानी को अखिलेश प्रचारित कर रहे हैं। और सबसे बड़ी 29 जून को रामगोपाल यादव का सैफई में जन्मदिन था। 30 जून को उन्हें विदेश जाना था। लेकिन, अखिलेश विदेश जाने से पहले नोएडा आ गए। और नोएडा में एलिवेटेड रोड पर भी कार्यकर्ताओं के साथ काफी देर तक रहे। एलिवेटेड रोड अखिलेश के ही कार्यकाल में लगभग पूरी हो गई थी। जिसका लोकार्पण योगी सरकार के मंत्री सतीश महाना ने किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नहीं आए। शायद उसके पीछे, नोएडा आने से सत्ता जाने वाला डर हावी रहा हो। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश ने नोएडा आकर अपशकुन दूर करने के साथ अपने काम को लोगों को बताने की भी कोशिश की।
अखिलेश यादव जब अपना जन्मदिन मनाकर विदेश से लौटेंगे, तो ताजा-ताजा समाजवादी पार्टी के सदस्य बने करीब 1 करोड़ कार्यकर्ता उनके निर्देश का इन्तजार कर रहे होंगे। पहली बार मिस्ड कॉल और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के जरिए भी समाजवादी पार्टी की सदस्यता हुई है। समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता जूही सिंह कहती है कि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की छवि बदली है। महिला विरोधी, गुन्डा पार्टी की छवि किसी न किसी वजह से बन गई थी। सितम्बर के पहले या दूसरे हफ्ते में समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय अधिवेशन करने की तैयारी में है। उस समय तक योगी सरकार के 6 महीने भी पूरे हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में सितम्बर में फिर से बड़ी हलचल देखी जा सकती है। वो वक्त नगर निकाय चुनावों का भी होगा और अखिलेश यादव वाली नई समाजवादी पार्टी की परीक्षा का भी।
(ये लेख FirstPostHindi पर छपा है)

Wednesday, March 01, 2017

समाजवादी पार्टी के पुरबिया किले में दरार का जिम्मेदार कौन होगा ?

28 फरवरी को अखिलेश ने आजमगढ़ की 7 विधानसभाओं में सभा की
गांधीनगर से बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी सांसद हैं। लेकिन, गांधीनगर क्या पूरे गुजरात में चुनावी हार-जीत का जिम्मा लम्बे समय से नरेंद्र मोदी के ही ऊपर है। अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने और अमित शाह के बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात की हर जीत इस जोड़ी को ताकतवर करती है और हर हार के बाद लोगों के निशाने पर यही दोनों होते हैं। 2017 के पहले तक उत्तर प्रदेश में होने वाली हर जीत-हार की जिम्मा मुलायम सिंह यादव पर ही रहता है। हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने बेटे से लड़ाई में कई बार ये बोला कि अखिलेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहते समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में 5 सीटों पर सिमट गई। वो भी भला हो मुलायम सिंह का कि उन्होंने आजमगढ़ जाकर एक सीट बीजेपी के मुंह से अपने खाते में खींच ली। अब सवाल ये है कि 2014 में मुलायम सिंह यादव को जिताने वाला आजमगढ़ 2017 में कैसे वोट करने जा रहा है। 4 मार्च को छठवें चरण में आजमगढ़ में मतदान होना है। आजमगढ़ को लेकर अखिलेश यादव कितने दबाव में हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 28 फरवरी को 7 विधानसभा क्षेत्रों में अखिलेश यादव ने सभा की। आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में 10 से 9 विधानसभा सीटें सपा ने जीत ली थीं। समाजवादी पार्टी के पारम्परिक मतदाता आधार- यादव+मुसलमान- के आधार पर आजमगढ़ को पूरब का इटावा कहा जा सकता है। आजमगढ़ में लम्बे समय तक रमाकांत यादव ने मुलायम की मशाल जलाए रखी। 1999 में पहली बार रमाकांत यादव समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनकर लोकसभा पहुंचे फिर, फिर वो बसपा के रास्ते भाजपा में पहुंच गए। और 2009 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ में कमल खिला दिया। आजमगढ़ में कमल का खिलना महत्वपूर्ण इसलिए भी रहा क्योंकि, ये जिला प्रदेश के सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले जिलों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुसलमान इसी जिले में हैं। इसीलिए 2009 में भले ही रमाकांत यादव लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हुए। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 10 में से 9 सीटें झटक ले गई और 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम यहां से सांसद हो गए। इस लिहाज से आजमगढ़ सपा का एक मजबूत किया है। सपा का सीधा मुकाबला बसपा से ही रहता है। लेकिन, 2017 में इस किले में दरार साफ दिखने लगी है। बूढ़नपुर तहसील अदालत में एडवोकेट और ग्राम प्रधान प्रवीण सिंह कहते हैं ये भाजपा का स्वर्णिमकाल है। 1991 में दोनों सुरक्षित विधानसभा सीटें बीजेपी ने जीती थी। लालगंज 1996 में जीती थी। संयोग देखिए कि 91 और 96 में बीजेपी की सरकार भी बनी।
लालगंज सुरक्षित से बीजेपी ने दरोगा सरोज को टिकट दिया है। पुराने सपाई हैं। उन्हें अपनी जाति का मत मिल सकता है। सवर्ण मतदाता पूरे प्रदेश में लगभग बीजेपी के साथ दिख रहे हैं। सुरक्षित सीट होने से यहां सवर्ण मतदाताओं के पास कोई विकल्प भी नहीं है। बीजेपी की स्थिति अच्छी दिख रही है। हालांकि, लालगंज बसपा की मजबूत सीट है। सुखदेव राजभर लगातार 1991 से यहां से चुनकर विधानसभा पहुंचते रहे। सिर्फ 1996 में बीजेपी से नरेंद्र सिंह जीते थे और 2012 में ये विधानसभा सुरक्षित हो गई। समाजवादी पार्टी के बेचई सरोज ने 2012 में ये सीट जीती। वो फिर से किस्मत आजमा रहे हैं। बीएसपी ने यहां से आजाद अरिमर्दन को टिकट दिया है। मेहनगर सुरक्षित सीट से समाजवादी पार्टी ने विधायक बृजलाल सोनकर की जगह कल्पनाथ सरोज को टिकट दिया है। बीएसपी ने यहां से फिर से विद्या चौधरी को टिकट दिया है। भारतीय समाज पार्टी से अरविंद कनौजिया की पत्नी चुनाव लड़ रही हैं। बीजेपी ने समझौते में ये सीट भारतीय समाज पार्टी को दी है। इस विधानसभा में सबसे ज्यादा ठाकुर मत हैं। करीब 70000 ठाकुर वोट बीजेपी गठजोड़ को मिल सकता है।
दीदारगंज सीट पर समाजवादी पार्टी ने वर्तमान विधायक आदिल शेख पर फिर से दांव लगाया है। शेख अबू आजमी के नजदीकी माने जाते हैं। बसपा ने फिर से सुखदेव राजभर को टिकट दिया है। बीजेपी ने यहां से कृष्ण मुरारी विश्वकर्मा को टिकट देकर मुकाबला रोचक बना दिया है। विश्वकर्मा को बसपा सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा मिला था। फूलपुर सीट से रमाकांत यादव का लड़का अरुणकांत यादव कमल निशान पर फिर से किस्मत आजमा रहा है। 2012 में इस सीट से विधायक श्याम बहादुर यादव फिर से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हैं और बसपा से अबू कैश फिर से लड़ रहे हैं। फूलपुर में सबसे ज्यादा यादव मतदाता, दलित मुसलमान भी अच्छी संख्या में हैं।
अतरौलिया विधानसभा में बीजेपी ने कन्हैयालाल निषाद को प्रत्याशी बनाया है। अतरौलिया से समाजवादी पार्टी से विधायक संग्राम यादव को फिर से टिकट मिला है। बीएसपी ने यहां अखंड प्रताप सिंह को टिकट दिया है। यहां भी मुकाबला सपा-बसपा के बीच ही रहता है। लेकिन, कन्हैयालाल निषाद ने मुकाबला रोचक बना दिया है। यहां 40000 निषाद मतदाता हैं। क्षत्रिय ब्राह्मण मत मिलाकर करीब 60000 हैं। इससे कन्हैयालाल का पलड़ा भारी होता दिख रहा है। कन्हैयालाल का भाई इसी विधानसभा में ग्राम प्रधान है और कन्हैयालाल मुंबई के कारोबारी हैं। गोपालपुर सीट से समाजवादी पार्टी से वसीम अहमद विधायक हैं। वसीम 1996 और 2002 में भी यहां से विधायक रह चुके हैं। फिर भी समाजवादी पार्टी ने वसीम का टिकट काटकर नफीज अहमद को टिकट दे दिया है। बीएसपी ने यहां से कमला प्रसाद यादव को टिकट दिया है। इस विधानसभा सीट पर यादव दलित मुसलमान की अच्छी खासी संख्या है। अन्य पिछड़ा मतदाता भी यहां अच्छी संख्या में हैं। गोपालपुर से बीजेपी से किरण पाल मैदान में हैं। संघ पृष्ठभूमि से आने वाले किरण पाल को अन्य पिछड़े मतों के साथ सवर्ण मतों के साथ आने का फायदा मिल सकता है।
सगड़ी सीट बीएसपी मजबूत दिख रही है। बसपा से सर्वेश सिंह सीपू की पत्नी वंदना सिंह चुनाव लड़ रही हैं। सर्वेश सिंह सपा से 2007 में विधायक चुने गए थे। पति की हत्या के बाद सहानुभूति लहर वंदना सिंह के पक्ष में है। यहां बीजेपी से देवेंद्र सिंह और सपा से विधायक अभय नारायण सिंह मैदान में हैं। आजमगढ़ की सदर सीट से सपा के पूर्व मंत्री दुर्गा यादव मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके सामने बसपा से भूपिंदर सिंह मुन्ना और भाजपा से अखिलेश मिश्रा हैं। त्रिकोणीय मुकाबला बन रहा है। मुबारकपुर से शाम आलम गुड्डू जमाली अकेले बसपा विधायक हैं। उनके सामने सपा के अखिलेश यादव और बीजेपी से भाजपा से लक्ष्मण मौर्य मुकाबले में हैं। बसपा सरकार में कोऑपरेटिव चेयरमैन रहे लक्ष्मण मौर्य को टिकट देकर बीजेपी ने मुकाबला रोचक कर दिया है। निजामाबाद से सपा ने वर्तमान विधायक आलम बदी पर फिर से भरोसा किया है। लेकिन, बसपा ने मुसलमान की बजाय इस बार चंद्रदेवराम यादव को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी ने अपने पूर्व जिलाध्यक्ष विनोद राय को टिकट दिया है।

अभी तक आजमगढ़ में सुरक्षित सीट को छोड़कर ज्यादातर सपा-बसपा के बीच ही मुकाबला रहता था और उसमें सपा का पलड़ा भारी होता था। लेकिन, इस बार बीजेपी अन्य पिछड़ा और अति पिछड़ा प्रत्याशी उतारकर समाजवादी पार्टी के इस पूर्वी किले में तगड़ी सेंध मारने का इंतजाम कर रखा है। राजभरों की पार्टी से समझौते की वजह से आजमगढ़ जिले में राजभर मतदाता पूरी तरह से बीजेपी के ही साथ आ गया है। इसलिए आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी के इस मजबूत किले पर अगर विरोधी पार्टियां कब्जा करने में कामयाब होती हैं, तो मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ये कहकर बच सकते हैं कि हम दोनों भाइयों में से कोई भी पार्टी पदाधिकारी नहीं है। इसका सारा जिम्मा अखिलेश यादव को ही लेना होगा। 

Wednesday, February 15, 2017

खिसकती दिख रही समाजवादी पार्टी की “बुनियादी ईंट”

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के राज में इटावा अति महत्वपूर्ण जिले में गिना जाता रहा है। अखिलेश यादव के राज में भी इटावा का ये रुतबा कायम रहा। ऐसा सुख शायद ही देश में किसी जिले को हासिल हो। मुलायम राज में इटावा के लोग खुद को सबसे ऊपर समझते रहे हैं। और इसी वीआईपी होने की चाहत में इटावा के लोगों ने आंख मूंदकर मुलायम सिंह यादव का समर्थन किया है। इसी जिले की जसवंतनगर सीट से मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और उसके बाद ये शिवपाल की सीट हो गई। मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर में भाई शिवपाल यादव के समर्थन में कहाकि अखिलेश जिद्दी है। कई बार वो बात सुन लेता है, कई बार नहीं सुनता। ऐसा कहते मुलायम भावुक हो गए। उन्होंने कहाकि शिवपाल को वही सम्मान दीजिए, जो आप मुझे देते रहे हैं। दरअसल जसवंतनगर एक ऐसी सीट है जिस पर पिछले 4 दशक से ज्यादा में 2 बार छोड़कर मुलायम सिंह यादव का कब्जा पक्का होता रहा है। 1967 में पहली बार मुलायम यहां से चुनकर विधानसभा में पहुंचे। उसके तुरंत बाद 1969 में हुए चुनाव में उन्हें बिशंभर सिंह यादव ने हरा दिया और एक बार 1980 में बलराम सिंह यादव ने हराया। इसके अलावा 67 से 93 तक ये सीट मुलायम सिंह को विधायक बनाती रही। 1996 से अभी तक यहां से शिवपाल सिंह यादव विधायक चुने जा रहे हैं। इस बार के चुनाव में भाजपा ने बसपा से पिछला चुनाव लड़े मनीष यादव पर भरोसा जताया है। बसपा से दरवेश कुमार शाक्य, और राष्ट्रीय लोकदल से जगपाल सिंह यादव लड़ रहे हैं। सीधे तौर पर शिवपाल को यहां खास चुनौती नहीं दिखती है। लेकिन, अंदरखाने अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल को चुनाव हराने की कोशिश में लगे हैं। ये बात जसवंतनगर की सड़कों पर कोई आम आदमी भी बता देगा।
जसवंतनगर सीट पर भले ही चाचा का टिकट काटने का साहस जसवंतनगर में अखिलेश भले न कर पाए। क्योंकि, चाचा शिवपाल को यहां हराना असम्भव न सही लेकिन, बहुत मुश्किल जरूर है। लेकिन, बगल की इटावा की सीट पर अखिलेश वाली समजावादी पार्टी ने मुलायम के खासमखास मौजूदा विधायक रघुराज शाक्य का टिकट काट दिया है। 2012 में रघुराज सिंह शाक्य ने बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत को हराया था। हालांकि, राजपूत भी पुराने सपाई रहे। 2002 और 2007 के चुनाव में साइकिल की सवारी करके ही विधानसभा पहुंचे थे। शाक्य का टिकट काटकर रामगोपाल के नजदीकी कुलदीप गुप्ता को लड़ाया जा रहा है। कुलदीप गुप्ता इटावा नगर पालिका चेयरमैन हैं। भाजपा ने यहां से सरिता भदौरिया और बसपा ने नरेंद्र चतुर्वेदी को प्रत्याशी बनाया है। यादव, मुसलमान और शाक्य के मजबूत आधार मतों पर यहां समजावादी पार्टी का किला बहुत मजबूत रहा है। इस सीट पर 40 हजार मुसलमान मत हैं। और नगरपालिका के चुनाव में कुलदीप गुप्ता ने नफीसुल आलम को हराया था। कमाल की बात ये कि कुलदीप ने हिन्दू ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में करके पालिका चेयरमैन की कुर्सी हथियाई। मुसलमानों का मानना है कि नफीसुल आलम को हराने में रामगोपाल यादव की बड़ी भूमिका रही है। नफीसुल को मुलायम-शिवपाल का नजदीकी माना जाता है। सवाल ये है कि क्या नगर पालिका की हार का बदला लेने के लिए इटावा के मुसलमान समाजवादी पार्टी के खिलाफ मत डाल सकते हैं। वैसे भी ये सीट तय करेगी कि इटावा में शिवपाल का अधिकार कुछ बचा हुआ है या रामगोपाल ने उसे लगभग खत्म कर दिया है। हालांकि, रामगोपाल यादव ने नफीसुल अंसारी को नगर पालिका चेयरमैन फिर से बनाने का वादा करके उन्हें कुलदीप के साथ लगा दिया है। साथ ही मुसलमान इलाकों में अवैध बिजली बड़ा मुद्दा है। मुसलमानों को लगता है कि बसपा की सरकार आई तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

इटावा और जसवंतनगर के अलावा समाजवादी पार्टी की तीसरी बुनियादी आधार सीट है भरथना। 1989 में जनता दल और उसके बाद 1991 में जनता पार्टी। फिर जब मुलायम सिंह यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी 1992 में बना ली तो उसके बाद से ये सीट समाजवादी पार्टी की परम्परागत सीट हो गई। 2007 मे मुलायम सिंह यादव खुद इस सीट से चुने गए। और, जब 2009 में मुलायम लोकसभा के लिए चुन लिए गए तो, बीएसपी के शिव प्रसाद यादव ने उपचुनाव में इस सीट पर कब्जा जमाया। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में फिर से ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में आ गई। यहां से समाजवादी पार्टी ने कमलेश कुमार कठेरिया को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी से सावित्री कठेरिया और बीएसपी से राघवेंद्र गौतम प्रत्याशी हैं। राघवेंद्र गौतम के लिए प्रचार करने आई मायावती ने भरथना की रैली में कहाकि- ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे। इसलिए सपा-कांग्रेस गठबंधन भी गया काम से। मायावती के ये दोनों दरअसल अखिलेश-शिवपाल हैं। इटावा जिले की हर विधानसभा सीट पर अखिलेश-रामगोपाल के समर्थक मुलायम-शिवपाल के समर्थकों को चिढ़ाते नजर आ रहे हैं। इसीलिए मायावती का ये कहना कि ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे, अगर मुसलमानों को समझ में आ गया तो समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत बुनियादी ईंट इटावा में दरार पड़ सकती है। हो सकता है कि इस चुनाव में तीनों ही सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में आ जाएं लेकिन, लम्बे समय के लिए समाजवादी राजनीति का तगड़ा होता साफ दिख रहा है। क्योंकि, परिवार की लड़ाई की धुरी यही जिला है और इसी के चुनाव तय करेंगे कि लड़ाई 11 मार्च के बाद कैसे आगे बढ़ेगी। 

Saturday, November 05, 2016

मुलायम-अखिलेश की लड़ाई अपनी-अपनी जमीन बचाने की है

भला ऐसा भी कभी होता है कि भाई के लिए कोई अपने बेटे का ही राजनीतिक भविष्य चौपट करने पर तुल जाए। वो भी ऐसा भाई जिसकी छवि बहुत अच्छी न हो, उस पर अच्छी छवि वाले बेटे की बलि चढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन, जब राजनीति में कुछ इस तरह का हो, तो इसके मायने ठीक से समझने की जरूरत बन जाती है। इसीलिए मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की इस लड़ाई को सलीके से समझने की जरूरत दिखती है। दरअसल मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव एक दूसरे से लड़ने से ज्यादा अपनी-अपनी हासिल की गई जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जातियों में गजब तरीके से बंटे राज्य में  जमीन बचाने की लड़ाई इतनी कठिन है कि लग रहा है कि बेटा-बाप एक दूसरे के खिलाफ तलवार भांज रहे हैं। दरअसल इस तलवारबाजी के पीछे एक दूसरे का नुकसान करने से ज्यादा बाप-बेटे की चिंता इस बात की है कि दोनों की जमीन बची रह जाए और समाजवादी पार्टी से छिटककर दूसरी पार्टियों को जाने वाले वोट थम जाएं।

पहले बात करते हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बगावती तेवर के पीछे के राजनीतिक गणित की। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही और भले ही मुलायम सिंह यादव ये कहें कि जनादेश उनके नाम पर मिला था। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि अखिलेश यादव को नौजवानों ने वोट दिया था। इसको पुख्ता करता है समाजवादी पार्टी को मिला मत। आमतौर पर सामान्य धारणा यही रही कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों ने बहनजी को छोड़ दिया और वापस बीजेपी की तरफ चले गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि बीएसपी और समाजवादी पार्टी दोनों को ही 2012 में ब्राह्मण और राजपूतों के मत 2007 से ज्यादा मिले हैं। 2007 में पड़े हर 100 ब्राह्मण मतों में से बहुजन समाज पार्टी को 16 मत मिले थे। जबकि, 2012 में 100 में से 19 ब्राह्मण मत हाथी चुनाव चिन्ह पर पड़े थे। और यही ट्रेंड राजपूत और वैश्य मतों में भी बरकरार रहा। हर पड़े 100 मतों में 12 से बढ़कर 14 और वैश्य मत 14 से बढ़कर 15 बीएसपी के खाते में आ गए। इसी तरह समाजवादी पार्टी को हर 100 ब्राह्मण मतों में से 10 मत 2007 में मिले, जो 2012 में बढ़कर 19 मत हो गए। और राजपूतों के भी 2007 में मिले 20 मत 2012 में बढ़कर 26 हो गए। दरअसल यही वो मत हैं, जिन्हें बीजेपी में जाने से रोकने के लिए अखिलेश यादव पिता-चाचा के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। क्योंकि, ये मत मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव के नाम पर कतई नहीं मिलने वाले। और, इसीलिए अखिलेश यादव इस लड़ाई में कमजोर पड़ते दिखे, तो सवर्ण मत पूरी तरह से भागकर बीजेपी में वापस जा सकते हैं। 

ग्राफिक्स – स्रोत- सीएसडीएस
एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

ब्राह्मण      10          19

राजपूत      20          26


मामला सिर्फ सवर्ण मतों का ही नहीं है। दूसरी सामान्य धारणा ये है कि यादव किसी भी हाल में अपने नेता यानी मुलायम सिंह यादव से दूर नहीं जाता है। इसीलिए जब 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो ये माना गया कि यादवों का पूरा ही मतदान एसपी के पक्ष में हुआ। लेकिन, सच ये है कि यादवों के भरोसे तो अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत की सरकार कतई न बनती। क्योंकि, 2007 में 100 में से 72 यादवों ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया था। जबकि, 2012 में 100 में से सिर्फ 66 यादवों ने ही साइकिल की सवारी की। कमाल ये कि 2007 में 100 में से 5 यादव मत ही बीजेपी के खाते में आए थे। लेकिन, 2012 में हर 100 में से 9 यादव मत बीजेपी के खाते में आ गए। और सिर्फ बीजेपी ही नहीं बीएसपी के खाते में भी 2012 में यादव मत बढ़े हैं। 2007 में हर 100 में से सिर्फ 7 यादव मत ही बीएसपी को मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 11 हो गए। इसलिए ऐसा भी नहीं है कि यादव अब आंख मूंदकर साइकिल की सवारी करने को तैयार है। नया यादव मतदाता मुलायम के यादववाद से धीरे-धीरे ही सही लेकिन, नाराज होता दिख रहा है। इस नए यादव मतदाता को भी अखिलेश ही लुभाते हैं। लेकिन, ये भी सच है कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने के लिए इतने से काम नहीं चलने वाला। ये छिटपुट मत हैं।
मुलायम सिंह यादव जानते हैं कि जो एकमुश्त चुनाव जिताऊ मत समाजवादी पार्टी को मिलता है, वो मत अभी भी यादव और मुसलमान का ही है। और ये एकमुश्त वाला यादव, मुसलमान विकास और साफ छवि के बजाए भाजपा विरोध और जातीय दंभ पर ही वोट करता है। इसलिए ये वोट काफी हद तक मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव को ही मिलने वाले हैं। इन्हीं मतों के बूते मुलायम सिंह यादव अच्छी छवि वाले अपने मुख्यमंत्री बेटे को कार्यकर्ताओं के सामने चुनौती दे देते हैं कि तुम्हारी हैसियत ही क्या है। दरअसल मुलायम सिंह यादव को पता है कि अखिलेश की विकास और स्वच्छ वाली ब्रांडिंग बहुत ज्यादा मत नहीं खींच सकेगी। विकास और स्वच्छ छवि के मामले में बीजेपी बाजी मार सकती है। और फिर समाजवादी पार्टी बीजेपी के सामने सीधी लड़ाई में नहीं रही, तो मुसलमान मत बीएसपी की तरफ जा सकता है। और ये होता भी दिख रहा है। समाजवादी पार्टी को 2007 में हर 100 में से 45 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में घटकर 39 रह गए। 2012 में बीएसपी के खाते में मुसलमान मत 17 से बढ़कर 20 हो गए। कमाल की बात ये है कि 2007 के मुकाबले 2012 में मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस पर भी बढ़ा। कांग्रेस को 2012 में हर 100 मतों में 4 मत 2007 से ज्यादा मिले।

एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

यादव        72          66

मुस्लिम      45          39 

मुसलमानों का बीएसपी और दूसरी पार्टियों में जाने का खतरा मुलायम सिंह यादव समझ रहे हैं। इसीलिए वो मुसलमानों की बात करते हिन्दू विरोधी दिखने में भी गुरेज नहीं करते हैं। पिछले 3 विधानसभा चुनावों- 2002, 2007, 2012- में मुसलमान मत साइकलि से उतरकर मायावती के साथ हाथी पर सवार होते दिखे। बीएसपी को 2002 में 100 में से सिर्फ 9 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 20 हो गए। जबकि, 2002 में 100 में से 52 मुसलमानों का मत पाने वाली समाजवादी पार्टी के पास 2012 में सिर्फ 39 मत ही बचे।

 मुसलमान जीत की चाभी

साल         मुस्लिम मत सपा    मुस्लिम मत बसपा

2002        52                9      
2007        45                17     
2012        39                20               



इसलिए अगर समाजवादी पार्टी का झगड़ा सलीके से नहीं सुलझा, तो इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को होता दिख रहा है। क्योंकि, बीजेपी ने सवर्ण जातियों के परंपरागत बंधन से निकलकर पिछड़ी और गैर जाटव दलित जातियों में पहले से ही काफी असर बना लिया है। दूसरा सबसे बड़ा फायदा बीएसपी को हो सकता है। क्योंकि, बीजेपी के लड़ाई में सीधे आने का असर ये होगा कि मुसलमान आपस में लड़ रही समाजवादी पार्टी के बजाए मायावती के साथ जाना पसंद करेगी। और इसकी संभावना सबसे कम है लेकिन, इस तरह की भ्रम की स्थिति में थोड़ा बहुत फायदा कांग्रेस को भी मिल सकता है। दरअसल इन्हीं संभावनाओं को बनने से रोकने की कोशिश में बाप-बेटे झगड़ रहे हैं। लेकिन, ये झगड़ा इतना आगे बढ़ गया है कि समाजवादी पार्टी के आधार मतों में 2017 में सेंध सलीके से लगती दिख रही है। 

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