चीन मानवता के लिए ख़तरा है। वहाँ के नागरिक मानव नहीं, मशीन हो चुके हैं। किसी भी विचार के लिए वहाँ जगह ही नहीं है। कल प्रभाष प्रसंग में शामिल होने सत्याग्रह मण्डप में था। सामने हरी घास पर पीले कपड़ों में कुछ लोग योग जैसा कुछ कर रहे थे, चाइनीज़ जैसी भाषा में लिखा था। मैंने एक से पूछा- ये चीनी योग है क्या? जवाब मिला- शाक्य मुनि की परम्परा को चाइनीज़ मास्टर ने आगे बढ़ाया है। चीन ने इस प्रतिबन्धित कर दिया है। 1999 में चीन ने करोड़ों चीनियों को गिरफ़्तार कर लिया, नौकरी से निकाल दिया गया। स्कूल, घर सबसे बाहर कर दिए गए, सिर्फ इस वजह से कि वो लोग फालुन दफ़ा के साधक थे। क़रीब 10 लाख लोग अभी भी चीन में इस वजह बन्धक हैं। क्रूर यातना के शिकार हुए। वामपन्थी बुनियाद पर तैयार हुआ चीन ऐसा ही हो चुका है। वहाँ सुधार की उम्मीद कितनी ख़त्म है, इसका इसी से लगाइए कि वहाँ वामपन्थ की ही गुन्जाइश सबसे पहले ख़त्म हुई। मानव से मशीन में तब्दील हो चुका इतनी बड़ी आबादी वाला देश पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है। मशीनें हमेशा पहली नज़र में मानव से ताक़तवर दिखती हैं लेकिन, मानव मस्तिष्क ही हर मशीन का जनक (बाप) होता है। इसलिए मशीन डरा सकती है लेकिन, मनुष्य से जीत नहीं सकती है। फालुन दफ़ा एक उदाहरण है, ऐसे उदाहरणों को लिपिबद्ध करने पर ग्रन्थ तैयार हो जाएगा। जरूरी है चीनी मशीनों को दुनिया के मानव उनकी औकात बताएँ। भारत को क़तई भूटान की तरफ़ आने वाली चीनी मशीनों के रास्ते से हटना नहीं चाहिए।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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