बेटी हो या बेटा, खिलाड़ी शानदार हैं, दरअसल इस देश में सिस्टम बिगड़ा है

योगेश्वर दत्त भी बिना सोना-चांदी जीते निकल लिए हैं। अब तो हिंदुस्तान के बेटों की इज्जत बचना नामुमकिन है। पहले भी कहां बची थी। बेटों की बेइज्जती जाने-अनजाने लगभग पूरा का पूरा हिंदुस्तान बेटियों की इज्जत बढ़ाते कर रहा था। व्हाट्सएप पर अब नारी सशक्तिकरण के कुछ और नए चुटकुले, जुमले ईजान होंगे। लेकिन, सवाल क्या इस देश में खेल में बेटी-बेटा के मुकाबले का है। क्योंकि, मुझे तो लगता है कि बेटी हो या बेटा, खेल के मैदान में मजबूत होने के लिए गैर खिलाड़ी खेल संघों के धुरंधर, जमे-जमाए कोचों और सरकारी व्यवस्था से सबका मुकाबला होता है। उस कठिन मुकाबले से जीतकर बाहर निकलने वाले आपको दिख जाते हैं। दीपा कर्माकर की आज पूरे देश में चर्चा है। लेकिन, दीपा कर्मकार के कोच बता रहे हैं कि कैसे एक दूसरे गैरजिम्नास्ट कोच ने दीपा का भविष्य खत्म करने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। दीपा के कोच बिशेस्वर नंदी ने 9 फरवरी 2012 को त्रिपुरा खेल संघ के सचिव को लिखी एक चिट्ठी में दीपा के खिलाफ की जा रही साजिश के बारे में लिखा था। कमाल की बात ये कि दीपा के खिलाफ ये साजिश करने का आरोप जिम्नास्टिक फेडरेशन ऑफ इंडिया के जीवन पर्यंत मुख्य कोच गुरदयाल सिंह बावा पर है। सोचिए ये साजिश सफल हो जाती, तो भारतीय प्रोदुनोवा की सफलता की कहानी दुनिया को कतई न पता चलती। ये एक साजिश सफल नहीं हुई। लेकिन, भारतीय खेलों में ऐसी हजारों साजिशें सफल हो जाती हैं। और बेटियों को कोख में मारने से जितने पदक कम हुए हैं, उससे कहीं ज्यादा ऐसी साजिशों के जाल में फंसकर खिलाड़ियों- बेटा हो या बेटी- की खेलमृत्यु हो जाती है। अच्छा हुआ कि दीपा कर्मकार, पी वी सिंधु और साक्षी मलिक ने इस देश को बहुत सलीके से ये अहसास कराया कि खेल और भी हैं क्रिकेट के सिवाय। ऐसा नहीं है कि इससे पहले ये अहसास इस देश को कभी हुआ ही नहीं। पीटी ऊषा से शुरू हुआ ये अहसास इस देश में लगातार होने लगा है। अच्छा है कि ये अहसास बढ़ने लगा है। दीपा कर्मकार, पी वी सिंधु और साक्षी मलिक ने वो कर दिखाया, जो कोई नहीं कर सका था। कोई नहीं मतलब- कोई नहीं। न देश का कोई बेटा, न बेटी। बेटियों को लेकर इस देश में बहुत से पूर्वाग्रह हैं और इसीलिए जब बेटी ऐसे मेडल के साथ चमकती दिखती है, तो मेडल अनमोल हो जाता है। और इस बार बेटियों ने सचमुच भारतीय खेल स्थितियों के लिहाज से चमत्कार जैसा कर दिखाया है। अच्छा है कि बेटियों ने ये चमत्कार किया है। लेकिन, खेल के मामले में हिंदुस्तान में बेटों की कहानी आम जीवन की बेटियों से खास अलग नहीं है। आपको लग रहा होगा, ये क्या तुलना मैं कर रहा हूं। क्रिकेट में नेताओं की दिलचस्पी और प्रभुत्व इतनी ज्यादा है कि देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर आमजन तक खेल में सुधार मतलब क्रिकेट में सुधार मान लेते हैं और इसीलिए लगता है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू हो गईं, तो देश में खेल सुधर जाएगा। दरअसल ये मानना उसी तरह का है जैसे इस देश में क्रिकेट के अलावा कोई और खेल खेला ही नहीं जाता। इसीलिए और कहीं सुधार की भी जरूरत नहीं है।


अब जरा देखिए समाज में जैसे बेटियों के साथ ढेर सारे भेदभाव होते हैं। वैसे ही खेल में खिलाड़ियों को- बेटी हो या बेटा- कितनी तरह की मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। रियो ओलंपिक शुरू होने से पहले ही पहलवान नरसिंह यादव का डोप टोस्ट पॉजिटिव हुआ। इसका मतलब ये कि नरसिंह यादव ने प्रतिबंधित दवाई लेकर अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश की। नरसिंह यादव के मामले में मीडिया रिपोर्ट्स के साथ खेल संघ से आ रही आवाजें भी यही बता रहीं थीं कि नरसिंह के साथ साजिश हुई है। नरसिंह यादव का मामला मीडिया में आया। सरकार, खेल मंत्री सब नरसिंह के समर्थन में थे। नरसिंह यादव ओलंपिक तक पहुंच गया। लेकिन, भारतीय खेल का तंत्र कितना बिगड़ा इसका अंदाजा लगाइए कि ओलंपिक तक पहुंच जाने के बाद भी नरसिंह अपना मुकाबला नहीं खेल सका। अपने वर्ग में नरसिंह यादव पदक के पक्के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था। दूसरा उदाहरण देखिए- शॉट पुटर इंदरजीत सिंह। इंदरजीत सिंह को भी रियो ओलंपिक में पदक के पक्के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था। इसकी पक्की बुनियाद थी। इंदरजीत ने 2015 में हुई एशियन एथलेटिक चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया था। पिछले साल दो मुकाबलों में इंदरजीत ने स्वर्ण पदक जीता है। इसीलिए इंदरजीत की ओलंपिक में पदक दावेदारी तगड़ी मानी जा रही थी। लेकिन, इंदरजीत खेल संघों के खिलाफ काफी मुखर रहा। अमेरिका प्रशिक्षण के लिए अपने कोच को ले जाने के लिए इंदरजीत को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। इंदरजीत खेल संघ और उसके तंत्र की खामियों को बार-बार इंगित करता रहता था। इंदरजीत ने कई बार खेलों में फैले भ्रष्टाचार की बात मंत्रालय तक पहुंचाई। इसीलिए इंदरजीत को पहले से ही अपने खिलाफ होने वाली साजिश का शक था। और वही हुआ। ओलंपिक से ठीक पहले 22 जून की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। नरसिंह यादव को सरकार और मीडिया से मिले समर्थन ने रियो तक पहुंचाया। लेकिन, रियो में खेलने से पहले ही उसे पटक दिया गया और इंदरजीत तो रियो तक भी नहीं पहुंच पाया। खेल संघों में बैठे ताकतवर लोगों ने पदक के दावेदार शॉट पुटर को लंगड़ी मार दी। इंदरजीत के खिलाफ ये साजिश है। इसे साबित करने के लिए ये एक तथ्य ही काफी है। 22 जून को इंदरजीत की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आती है। जबकि, 29 जून की रिपोर्ट निगेटिव। कुल मिलाकर 28 अप्रैल से 11 जुलाई के बीच इंदरजीत का 6 बार टेस्ट लिया गया। इंदरजीत ओलंपिक के लिए करीब एक साल पहले ही क्वालीफाई कर गया था। ऐसे में सवाल ये उठता है कि उसे क्या जरूरत थी कि ओलंपिक के करीब एक महीने पहले वो प्रतिबंधित दवाओं का इस्तेमाल करके अपने भविष्य को दांव पर लगाता। 15 जुलाई 2016 को मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस में इंदरजीत ने कहा था- किसी एथलीट को खत्म करने का एकमात्र तरीका ये है कि उसे डोप टेस्ट में फंसा दो। दिक्कत इस देश के बेटे या बेटी में नहीं है। दिक्कत देश के बिगड़े, भ्रष्ट तंत्र की है। मुकाबला हर बात में हम चीन से करते हैं। अमेरिकी बनना, दिखना चाहते हैं। ओलंपिक की पदक सूची हमें अहसास दिलाती है कि अमेरिका और चीन के तंत्र ने उन खिलाड़ियों के साथ छोटी-बड़ी साजिशें नहीं रचीं। प्रधानमंत्री जी आप फिर मन की बात करेंगे। निवेदन है, इस बार मेरे और करोड़ों देशवासियों के मन की बात बोलिए। बोलिए कि किसी खिलाड़ी के साथ साजिश न होगी। और बोलने के साथ साजिश करने वालों के खिलाफ कुछ कर भी दीजिए।