GST के शुद्ध राजनीतिक मायने

(GST पर ऑस्ट्रेलिया के SBS RADIO से बातचीत भी आप सुन सकते हैं।)
आर्थिक सुधारों की बुनियाद पर कर सुधार के साथ देश की एक शानदार आर्थिक इमारत तैयार करने की कहानी को आगे बढ़ाने का नाम है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स। जीएसटी मंजूरी पर और इसके लंबी प्रक्रिया के बाद कानून बन जाने के बाद तक ढेर सारे आर्थिक विद्वान इसके अच्छे और अच्छे की राह में आने वाली बाधाओं पर बहुत कुछ बताएंगे। लेकिन, राज्यसभा में जीएसटी बिल पर हुए संशोधनों के लोकसभा में मंजूरी की बहस सुनते मुझे इसके विशुद्ध राजनीतिक मायने दिखे। और इसीलिए मैं जीएसटी बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों से बिना किसी विरोध के मंजूर होने को विशुद्ध रूप से राजनीतिक संदर्भों में ही देख रहा हूं। दिल्ली दरबार यानी दिल्ली के उच्चवर्ग वाले क्लब को सीधे चुनौती देकर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए इस जीएसटी के मंजूर होने के गजब के संदर्भ हैं। इसलिए ये संदर्भ ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि इसी बिल को मुख्यमंत्री रहते खुद नरेंद्र मोदी ने किसी भी कीमत पर मंजूर न होने देने की बात की थी। शायद यही वजह रही होगी कि राज्यसभा में प्रधानमंत्री जीएसटी पर चर्चा के समय नहीं रहे। और जब लोकसभा में इस पर चर्चा हुआ, तो सारे सवालों का जवाब देते समय उन्हें इस बात का खूब ख्याल था कि जीएसटी मंजूर होने का मतलब कितना बड़ा है। और इसीलिए जब प्रधानमंत्री ने कहा कि जीएसटी का संदेश साफ है कि कंज्यूमर इज किंग। लेकिन, ये आर्थिक भाषा थी, इसका राजनीतिक तर्जुमा ये हुआ कि नाउ नरेंद्र मोदी इज किंग। और ये साफ दिखा जब पूरी बहस में कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दलों के लोग कोई भी तीखी टिप्पणी करने से बचते दिखे। नतीजा ये रहा कि लोकसभा में 434 हां के मुकाबले कोई ना नहीं थी। राज्यसभा में भी 203 हां के सामने कोई ना नहीं रही। दरअसल देश के नए राजनीतिक मानस के मजबूत होने के संकेत है।

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश के राजनीतिक चिंतन में हमेशा ये द्वंद रहा कि क्या आर्थिक सुधारों से ही देश की तरक्की हो सकती है। और इन आर्थिक सुधारों का सीधा सा मतलब था, देश की आर्थिक गतिविधियां दुनिया में चल रहे व्यवहार के लिहाज बनें, बदलें। उदारीकरण या सुधार जब कहा जाता था तो इसका सीधा सा मतलब यही होता था कि भले ही 1991 में देश के प्रधानमंत्री पामुलवर्ती वेंकटपति नरसिंहा राव ने देश में आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा कदम उठाया और वित्त मंत्री के तौर पर डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारत की आर्थिक नीतियों को दुनिया के लिहाज से व्यवहारिक बनाने की हरसंभव कोशिश की हो, सच्चाई यही थी कि भारतीय राजनीतिक मानस पूरी तरह से सुधार के खिलाफ था। उदारीकरण को भारतीय संसाधनों पर दुनिया के कब्जे के तौर पर देखा जा रहा था। और उसी तरह देश में टैक्स सुधार के सबसे बड़े कदम जीएसटी को लंबे समय तक राज्यों पर केंद्र के बढ़ते अधिकार के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन, जीएसटी कानून के बनने की तरफ बढ़ते कदम ये साबित कर रहे हैं कि आर्थिक सुधार के साथ देश का राजनेता भी दुनिया के व्यवहार के लिहाज से सुधरें हैं, परिपक्व हुए हैं। ये कह सकते हैं कि जीएसटी बिल का इस तरह से मंजूर होना देश के राजनीतिक चिंतन ने आर्थिक सुधारों को आत्मसात कर लिया है। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे गिने-चुने मौके रहे हैं, जब किसी मौके पर खासकर किसी आर्थिक कानून पर सभी राजनीतिक पार्टियां एक सुर में बोल रही हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 1991 से शुरू हुए आर्थिक सुधारों पर अब देश के राजनेताओं की समझ बेहतर हुआ है। क्या भाजपा और क्या वामपंथी इस मुद्दे पर सब एक रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये अच्छे से पता है कि ये कितना महत्वपूर्ण और नाजुक वक्त है। क्योंकि, पहले मुख्यमंत्री के तौर पर और अब प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि आर्थिक सुधारों के साथ या कहें कि एक कदम आगे चलने वाले राजनेता के तौर पर विकसित कर ली है। और इसीलिए जीएसटी का इस तरह से मंजूर होना दरअसल नरेंद्र मोदी की राजनीति की भी मंजूरी है। हालांकि, पूरी तरह से सावधान मोदी इसीलिए ये कहना नहीं भूले कि ये किसी एक दल की जीत नहीं है, ये सबकी विजय है। उन्होंने बड़े सलीके से इसे धार्मिक दृष्टांत के जरिये समझाने की कोशिश की। मोदी ने कहाकि जन्म कोई दे, पालन कोई करे। कृष्ण को जन्म किसी ने दिया और बड़ा किसी ने किया। हालांकि, भगवान कृष्ण के साथ मां देवकी को कितने लोग याद करते हैं और मां यशोदा को कितने लोग याद करते हैं, इसी से समझ में आ जाता है कि दरअसल नरेंद्र मोदी क्या कह रहे हैं।


भले ही कर सुधारों के लिए कांग्रेस ने बहुत प्रयास किया हो। लेकिन, जीएसटी जैसा ऐतिहासिक कर सुधार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते ही मंजूर हो रहा है। प्रधानमंत्री ने कहाकि दरअसल देश की संसद ने टैक्स आतंकवाद से मुक्ति के लिए ये बड़ा कदम उठाया है। योजना आयोग को नीति आयोग बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी के भी नए मायने देश को बताने का प्रयास किया। जीएसटी को ग्रेट स्टेप बाई टीम इंडिया, ग्रेट स्टेप टुवर्ड्स ट्रांसफॉर्मेशन और ग्रेट स्टेप टुवर्ड्स ट्रांसपैरेंसी बताया। उन्होंने कहा यही जीएसटी है। ऐसा नहीं है कि जीएसटी के पहले सरकार ने कोई बड़ा आर्थिक सुधार नहीं किया। मोदी सरकार लगातार ढेर सारे आर्थिक सुधारों का एलान कर चुकी है। रक्षा क्षेत्र तक विदेशी निवेश की मंजूरी दे दी। जो हर लिहाज से मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी। कारोबार में आसानी करने को नरेंद्र मोदी ने इतना ब्रांड किया कि दुनिया की रेटिंग एजेंसियां इसी आधार पर भारत की रेटिंग बेहतर कर देती हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी विपक्ष को साथ न लेकर चल पाने वाले नेता के तौर पर देखे जा रहे थे। यही उनकी सबसे बड़ी आलोचना भी रही। GST के राज्यसभा और लोकसभा से बिना किसी विरोध के मंजूर होने और लोकसभा में नरेंद्र मोदी के बोले से उन पर लगने वाले इस आरोप में अब दम नहीं रह जाएगा। प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता सभी दलों में बढ़ने का संकेत है। सबसे बड़ी बात ये भी कह सकते हैं कि कांग्रेस और पूरे विपक्ष ने ढाई साल बाद आखिरकार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मान लिया है। अब भाजपा सरकार की तरह और कांग्रेस विपक्ष की तरह व्यवहार कर रही है। जीएसटी के विशुद्ध राजनीतिक मायने कितने बड़े हैं, इसी से समझा जा सकता है।