सरकारी योजनाएं बेहतर करेंगी मजदूरों का जीवन?

महात्मा गांधी ने देश में फैली असमानता पर अपने जीवन के आखिरी दिनों में जो कुछ लिखा। उसी में से कुछ पंक्तियां हैं कि मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूं। जब तुम्हें भ्रम होने लगे। तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो, इस आजमाकर देखो। उस आदमी या औरत का चेहरा याद करो। जो तुम्हें अब तक सबसे कमजोर, गरीब दिखा हो। और सोचो कि जो तुम करने जा रहे हो, उससे उसका क्या कुछ भला हो सकेगा। महात्मा गांधी ने ये पंक्तियां कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। देश की सामाजिक असमानता को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। लेकिन, आज के संदर्भ में ये पंक्तियां असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एकदम सटीक बैठती हैं। और मुझे लगता है कि ये ताबीज देश की सरकार को भी इस्तेमाल करनी चाहिए। देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लेकर ढेर सारी रिपोर्ट अब तक आ चुकी हैं। इससे इतना तो पता लगता है कि दरअसल देश की जीडीपी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के ही बूते चल रही है। लेकिन, शायद ही आजाद भारत में कोई सरकार आई हो जिसने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की दशा सुधारने के लिए कोई ऐसा कदम उठाया हो जिससे उनके जीवनस्तर में सकारात्मक बदलाव हो सके। मनरेगा जैसी योजनाएं असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण मजदूरों के जीवन में एक तय मजदूरी को सुनिश्चित करने के लिए आईं। लेकिन, इससे कितने ग्रामीण मजदूरों के जीवनस्तर में बेहतरी हुई, इस पर बहुतायत विवाद है। बल्कि, ज्यादातर मामलों में ये राजनीतिक बढ़त का एक बेहतर जरिया भर ही साबित हुई है। इसीलिए बार-बार ये सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कोई योजना बनाते समय महात्मा गांधी का वो ताबीज ध्यान में रहता है या नहीं। ये समझना इसलिए जरूरी है कि भारत में रोजगार की चुनौतियों पर 2004 बनी डॉक्टर अर्जुन के सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट कहती है कि देश में 2017 तक 55 करोड़ से ज्यादा बेरोजगार होंगे। अगर देश 9 प्रतिशत की रफ्तार से भी तरक्की करता है, तो देश में कुल रोजगार के मौके 49 करोड़ से भी कम होंगे। और इसमें से भी करीब 92 प्रतिशत यानी 50 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में होंगे। अब अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट 2009 में आई थी इसलिए 9 प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान लगाया गया था। जो अब साढ़े सात से आठ प्रतिशत के बीच ही दिख रही है। इससे लोगों को रोजगार मिलने का आंकड़ा भले बदल जाएगा लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हिस्सेदारी नब्बे प्रतिशत से ज्यादा ही रहने वाली है। और इनकी सबसे बड़ी तीन समस्याएं हैं जिससे छुटकारा मिलने का रास्ता बमुश्किल ही दिख रहा है।






पहली असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए फिलहाल कोई तय रकम नहीं है। बेहद कम रकम इन मजदूरों को मिल रही है और ज्यादातर उसका मिलना भी तय नहीं होता। न तो इन मजदूरों की छुट्टी पक्की होती है और न ही ज्यादातर नियोक्ता उनको काम के तय घंटे से ज्यादा काम करने पर अतिरिक्त मजदूरी देते हैं। दूसरी बड़ी समस्या है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सुरक्षा की। ज्यादातर असंगठित क्षेत्र के मजदूर निर्माण के काम में लगे हुए हैं और किसी भी क्षेत्र में ऐसे मजदूरों की सुरक्षा का कोई पक्का बंदोबस्त नहीं दिखता है। तीसरी सबसे बड़ी मुश्किल असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की खराब होती स्वास्थ्य समस्या की है। कठिन हालात में मजदूरी की वजह से ज्यादातर मजदूरों का स्वास्थ्य हर बीतते दिन के साथ खराब होता जाता है।

सवाल ये है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की इन तीन सबसे बड़ी परेशानी को लेकर अभी की सरकार ने क्या कुछ किया है। इस लिहाज से बेहतर मजदूरी दिलाने को लेकर अभी बहुत ठोस कदम फिलहाल तो नहीं दिखता है। लेकिन, सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर इस सरकार ने संजीदगी दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ध्यान में रखकर बनाई गई कई योजनाएं जीवनस्तर में बेहतरी में कुछ मदद तो करती दिख रही हैं। पेंशन तो अब धीरे-धीरे सभी क्षेत्रों में खत्म हो रही है। लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि इतनी कम और अनियमित कमाई में कैसे एक उम्र के बाद गुजारा हो पाएगा। इस लिहाज से अटल पेंशन योजना एक बेहतर पहल दिखती है। एक हजार रुपये से पांच हजार रुपये महीने तक की पेंशन के लिए कोई भी इसमें शामिल हो सकता है। बस उम्र 18 से 40 साल के बीच होनी चाहिए। 1000 रुपये महीने की पेंशन हासिल करने के लिए 18 साल के नौजवान को 40 साल तक 42 रुपये हर महीने और 40 साल के व्यक्ति को 291 रुपये हर महीने जमा करना होगा। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना भी असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों के लिए बेहद उपयोगी है। इसमें दुर्घटना में मृत्यु और अपाहिज होने पर 2 लाख रुपये तक मिल सकते हैं। सिर्फ 12 रुपये सालाना प्रीमियम पर सरकार ने ये बीमा योजना शुरू की है। इसके लिए किसी बैंक में खाता होना जरूरी है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना भी इसी तरह की योजना है। इसमें भी दो लाख रुपये तक दुर्घटना बीमा राशि मिलती है। इसके लिए 330 रुपये सालाना का प्रीमियम जमा करना होता है। 18 से 70 साल का कोई भी व्यक्ति बैंक में बचत खाते के जरिए इस योजना का लाभ ले सकता है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक सबसे बड़ी मुश्किल होती है कि बीमारी के समय उनके पास इलाज के लिए रकम ही नहीं होती है। इसके लिए सरकारी बीमा कंपनियों की स्वास्थ्य बीमा योजजना अस्पताल में होने वाले खर्च का बोझ कम करने में मददगार हो सकती है। इसमें 700-800 रुपये सालाना के प्रीमियम पर 50 हजार रुपये तक का हेल्थ कवर लिया जा सकता है। अब ये योजनाएं महात्मा गांधी की ताबीज के जैसा असर करेंगी या नहीं, इसका अंदाजा तो कुछ समय बाद मिलेगा। वैसे सरकार के स्तर पर असंगठित मजदूरों के जीवनस्तर में बेहतरी सिर्फ इन योजनाओं से ही नहीं होने वाली। इसके लिए जरूरी है कि सरकार सलीके से श्रम सुधारों को लागू करे और महंगाई के लिहाज से किसी जगह काम करने वाले मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन दिलाने का बंदोबस्त करे। क्योंकि, ऐसे तो उद्योग असंगठित मजदूरों को अच्छा जीवन जीने लायक वेतन देने से रहा। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ज्यादा रकम देने में उद्योग भले ही आगे आने में संकोच करे लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कमाई पर देश के हर उद्योग की तगड़ी नजर है। अब अगर सरकार की तरह निजी क्षेत्र और असंगठित मजदूरों से काम लेने वाले लोगों को भी अगर महात्मा गांधी की ये ताबीज याद रहे, तो इन मजदूरों का जीवन काफी बेहतर हो सकता है।
(ये लेख सोपान स्टेप पत्रिका में छपा है।)