भारतीयों में गुलामी का इनबिल्ट सॉफ्टवेयर

YSR रेड्डी की दुखद मौत के बाद आंध्र प्रदेश से करीब 150 लोगों की जान जाने की खबर आई है। कुछ लोगों ने अपने प्रिय नेता की मौत के बाद आत्महत्या कर ली। कुछ इस अंदाज में कि अब मेरे भगवान न रहे तो, हम रहकर क्या करेंगे। और, कुछ बेचारों ने आत्महत्या तो, नहीं की लेकिन, रेड्डी की मौत की खबर सुनने के बाद वो, ये सदमा झेल नहीं पाए। इससे जुड़ी-जुड़ी दूसरी खबर ये कि आंध्र प्रदेश से संदेश साफ है कि YSR रेड्डी का बेटा जगनमोहन रेड्डी की राज्य की बागडोर संभालेगा तो, राज्य का भला हो पाएगा। पिता के अंतिम संस्कार के समय टेलीविजन पर दिखती जगनमोहन की हाथ जोड़े तस्वीरें किसी शोक में डूबे बेटे से ज्यादा राज्य की विरासत संभालने के लिए तैयार खडे, दृढ़ चेहरे वाले प्रशासक की ज्यादा दिख रही है।



हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।


सवाल ये है कि क्या कई सौ सालों की गुलामी झेलने वाले हम भारतीयों के अंदर गुलामी का सॉफ्टवेयर ऐसा इनबिल्ट हो गया है कि ये भारतीयों के हार्डवेयर का हिस्सा बन गया है। जवाहरलाल नेहरू की मौत के बाद भले ही गुलजारी लाल नंदा और लाल बहादुर शास्त्री को थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल गया हो। लेकिन, इस देश के अंध भक्त कांग्रेसियों को इंदिरा गांधी के सत्ता संभालने के बाद ही लगा कि अब इस देश को असली शासक मिला है। और, सिर्फ कांग्रेसियों को ही क्यों खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में इंदिरा को दुर्गा कह डाला था।


वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा कहा था। उस समय बांग्लादेश बनाने में इंदिरा गांधी के रोल पर। लेकिन, आजादी मिलने के बाद से ही इस देश में हर नेता खुद को भगवान बनाने की जीतोड़ कोशिश में जुटा है। उसकी शुरुआत खुद के कुछ भक्त तैयार करने से होती है। और, एक बार सत्ता मिली तो, उसका इस्तेमाल भगवान के चमत्कारों (सत्ता की शक्ति) से ज्यादा से ज्यादा लोगों को भक्त बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। अब ताजा उदाहरण YSR रेड्डी का ही लें। रेड्डी निस्संदेह आंध्र प्रदेश के चमत्कारी नेता थे। जमीन से जुड़े हुए थे। गांव-गिरांव तक उनकी पहुंच थी। सीधे जनता से संवाद था। लेकिन, इस पहलू की चर्चा कम ही हो रही है कि 2004 से 2009 के 5 साल के समय में YSR रेड्डी के मुख्यमंत्री रहते बेटे जगनमोहन रेड्डी ने कैसे विशाल कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर लिया।


कंस्ट्रक्शन से लेकर मीडिया तक कोई कारोबार नहीं है जिसमें जगनमोहन की थोड़ी बहुत ही सही हिस्सेदारी न हो। अब जगनमोहन के पक्ष में अगर कांग्रेसी विधायकों के 70 प्रतिशत से ज्यादा का समर्थन है तो, इसे कैसे आंध्र प्रदेश की जनता की भावना मान लें। ये वो, लोग हैं जो YSR रेड्डी के सहारे 5 साल के बाद दोबारा सत्ता में हैं। ये भी उसी रेड्डी भगवान के भक्त हैं जिसने 2004 से 2009 के बीच ये साबित कर दिया कि जो, भी रेड्डी भगवान के खिलाफ है वो, राक्षस है।


ऐसा नहीं है कि ये भगवान बनने और गुलाम बनाने की कोशिश कांग्रेसी नेताओं का ही कॉपीराइट है। मायावती पूरे प्रदेश में खुद की मूर्तियां लगवा रही हैं। कह रही हैं इससे वो, मनुवाद को चुनौती दे रही हैं। अब तो लखनऊ में एक छात्र ने मायावती को देवी दिखाने वाली मूर्ति भी बना डाली है। इसी छात्र ने मायावती के साथ डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और कांशीराम को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अंदाज में दिखाया है। ज्यादा समय नहीं हुआ जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा के राज में उन्हें उनके राजनीतिक भक्तों ने अन्नपूर्णा देवी बना दिया था। लगे हाथ आडवाणी, राजनाथ और अटल बिहारी को भी ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनने का मौका मिल गया।



गुलाम बनने-बनाने का ये चक्र गजब चल रहा है। हर कोई मौका मिलते ही अपने से नीचे वाले का भगवान बनना चाहता है। नीचे वालों को गुलाम बनाने का मौका मिले इसलिए अपने से बड़े भगवान की भक्ति करने से कोई नहीं चूक रहा। ये गुलाम मानसिकता ऐसी है कि अटल-आडवाणी जैसे भगवान नहीं रहे तो, बीजेपी को कोई तारनहार ही नहीं नजर आ रहा। ऐसा नहीं है कि अच्छा काम करने पर नेता का समर्थक होना उसका अनुगामी होना भी बुरा नहीं है। लेकिन, अंधआस्था के स्तर तक किसी नेता के पीछे खड़ी ये जमात हमें अंग्रेजों की गुलामी से भी बुरे दौर में ले जा रही है। भगवान के नाम पर अंधआस्था के विरोध में तो मुहिम चलती मिल भी जाती है लेकिन, नेताओं के प्रति इस अंधआस्था, गुलामी से न बचे तो, ये मानसिक गुलामी बड़ी मुश्किल बनने जा रही है। YSR रेड्डी की दुखद मौत के बाद हुई करीब 150 मौतें इस भयानक खतरे का संकेत भर हैं।