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Monday, April 07, 2014

छोटे हित, छोटी चिंता, छोटे लालच, बड़े सुख

गजब था। मस्त एकदम। अपने में और साथी पंडे की पन्नी में। पन्नी- मतलब मोटी पॉलिथिन जिससे पंडाजी ने धूप, बारिश से बचने का इंतजाम कर रखा था। हवा अच्छी चल रही थी। तेज, तेज। मोटी पॉलिथिन बार-बार तेज-तेज उड़कर फिर बांस के खोंच में लग रही थी। खोंच- मतलब सलीके से बांस जो लगाने से रह गया और ऊपर निकला हुआ था। मुंह पान, गुटका टाइप की एकदम देसी दारागंजी सामग्री से भरा था। कुछ सामग्री तो कई दिनों तक मुंह में रह जाती थी। ऐसी अहसास पंडाजी का मुंह दे रहा था। वही पंडाजी बोले। बचाए लेओ नै तो पन्नी गै तुम्हार। वा देखो दर बनाइ लिहिस। अब ऊंही से फटी औ तुम्हार ग पैसा पानी। जिस पंडे की पन्नी थी उसने ऊपर हाथ लगाकर देखा और जहां दर (निशान) गया था। वहां फटा कपड़ा लपेटा दिया। मस्त पंडे के गुटके टाइप सामग्री से भरे मुंह से फिर आवाज निकली। देखो ई कपड़ा से न रुख पाई। उतार देओ एका। निकालके धै देओ। फिर काम आई। नै तो एत्ती हवा म ग समझो। केत्ते में लिहे रहेओ। जवाब आवा। 750 क रही। औ अब निकालब न। फाट जाए तो फाट जाए। एकै कई गुना दै गइन गंगा माई। माघ म। और का चाही। फाट जाई तो अगले माघ म फिर खरीदी जाई। अब पन्नी की समस्या खत्म। तो गुटके की सुगंध के साथ फिर से नई छोटी चिंता हाजिर थी। ई का किहे हो। हमरी सइकिलिया पे ई केकर केकर सइकिल लगवाए दियेओ। खाली पंडाजी ने सारी साइकिलें और एक हीरो पुक अलग करके सलीके से खड़ा किया। हम भी नहाकर लौटे थे। कपड़े भी बदल लिए। लौट आए।

(इलाहाबाद गए थे तो एक दिन संगम नहाने चले गए। वहीं दो पंडों की बातचीत थी ये। लगा कितनी छोटी चिता, लालच, हित हैं लेकिन, इनके सुख कितने बड़े हैं। पंडाजी लोगों की तस्वीर इसलिए नहीं ले पाया क्योंकि, गंगा नहाने मोबाइल लेकर नहीं गए। )

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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