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Friday, October 09, 2015

संघ जिम्मेदार है

कमाल है
इस देश में हर बात के लिए
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि जिनकी सरकार है
वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि जिनकी नहीं सरकार है
वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है

कमाल है
हिंदुस्तान की पिछली सरकारों के घोषित काबिल
पुरस्कार लौटा रहे हैं

कमाल है
पुरस्कार लौटाकर वो
खुद को और काबिल बताना चाहते हैं

कमाल है
पुरस्कारों की इस घर वापसी के लिए भी
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि हिंदुत्व की सरकार है
इसलिए ये सारा बवाल है

कमाल है
कि हिंदुत्व की सरकार है
इसलिए पुरस्कार का हो रहा तिरस्कार है


कमाल है
कि वो बता रहे हैं
हर बात चुनाव के फायदे से जुड़ी है

कमाल है
बिना चुनाव लड़े भी
हर चुनावी चकल्लस के लिए संघ ही जिम्मेदार है

कमाल है
जम्मू-कश्मीर में बन गई
पीडीपी-बीजेपी की साझा सरकार है

कमाल है
फिर भी हर अलगाव के लिए
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
बिहार में हो रहा चुनाव है
यूपी में हुआ बवाल है

कमाल है
इसके लिए भी
संघ ही जिम्मेदार है

कमाल है
लंबे समय बाद आई
पूर्ण बहुमत की सरकार है

कमाल है
जनता को वो बताते
भ्रमित बार-बार हैं

कमाल है
फिर भी वो सरोकारों के
झंडाबरदार हैं

कमाल है
अब क्या इसके लिए भी
संघ ही जिम्मेदार है
कमाल है


Wednesday, September 30, 2015

संघ को सांप्रदायिक, पिछड़ा साबित करने की साजिश

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण 3 अक्टूबर 2015
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत को पीछे ले जाने की हरसंभव कोशिश की है। प्रगतिशील समाज के तथाकथित नुमाइंदों ने इस बात को पिछले सत्तर सालों में बड़े सलीके से साबित करने की कोशिश की है। इसका जवाब खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन राव भागवत ने अभी एक पंक्ति में ही बिना इस साजिश के उल्लेख के दे दिया है। उन्होंने जयपुर में एक कार्यक्रम में साफ कहा कि हिंदू समाज को उन सारी परंपराओं को खत्म करना होगा, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खरी नहीं उतरती हैं। दरअसल यही संघ करता भी रहा है। हां, संघ समाज तोड़कर बनाने के बजाए, बने समाज की कुरीतियों को खत्म करके उसे बेहतर समाज में बदलने की धारणा पर यकीन करता है। लेकिन, वामपंथ और तथाकथित प्रगतिशील समाज ने सत्ताधारी कांग्रेस के साथ मिलकर ये साजिश बड़े सलीके से पूरी कर ली कि संघ सांप्रदायिक है और पिछड़ेपन को ही जारी रखना चाहती है। ये कोशिश कितनी कारगर रही कि ज्यादातर विद्वत स्थिति को हासिल करने वाले पहली बात यहीं से शुरू करते हैं कि संघ तो सांप्रदायिक है और हिंदू समाज को परंपरा और कुरीतियों की बेड़ी में जकड़कर रखना चाहता है। हालांकि, भारत में विद्वान की श्रेणी में आए ये बहुतायत या तो विशुद्ध वामपंथी रहे हैं या फिर वामपंथ की चादर ओढ़कर कांग्रेस की कृपा से सरोकारी बने हैं। लंबे समय तक सत्ता के साथ ने शैक्षिक पाठ्यक्रमों से लेकर इतिहास तक हर जगह संघ को गैरसरोकारी और वामपंथ को सरोकारी साबित करने की काफी हद तक सफल साजिश की है। इस साजिश के सफल होने का पैमाना देखिए कि जवाहर ला नेहरू विश्वविद्यालय में संघ के विचारों से जुड़े लोग भी वहां सफलतापूर्वक पढ़ने के लिए वामपंथ विरोध त्याग देते हैं। अच्छी बात ये कि इन तमाम साजिशों के बावजूद चुपचाप एक सामाजिक संगठन के तौर पर किया गया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम अब परिणा दिखाने लगा है। संघ के अनुषांगिक संगठन लगातार अपने क्षेत्र में सबसे बेहतर कर रहे हैं। यहां तक कि राजनीति पार्टी के तौर पर भारतीय जनतता पार्टी ने भी मुस्लिम विरोधी और दूसरे सांप्रदायिक से लेकर गैरसरोकारी होने के आरोपों के बावजूद देश की सत्ता में है। लेकिन, ये साजिश अब और तेज हो गई है। दरअसल अभी तक धर्मनिरपेक्षता और खोखले सरोकारी साम्यवाद के पैरोकारों को ये भ्रम लगा था कि उनकी दुकानें चलती रहेंगी। उनको भ्रम ये भी था कि उनकी धर्मनिरपेक्षता की ब्रांडिंग और कांग्रेस का तटस्थ मार्ग पर कब्जा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में कभी सर्व स्वीकार्य नहीं होने देगा। भ्रम उनको ये भी था कि कांग्रेस सत्ता वाली स्वाभाविक पार्टी के तौर पर भी बनी रहेगी। अब लगातार ये भ्रम टूटने लगा, तो साजिशी सिद्धांत तेज हो गए।

हाल के दिनों की कुछ घटनाएं देखिए। साफ समझ में आ जाएगा कि कैसे संघ को सांप्रदायिक और पिछड़ा साबित करने की बेहूदी कोशिशें हो रही हैं। महाराष्ट्र में गोविंद पानसारे और कर्ऩाटक में एम एम कलबुर्गी की हत्या होती है। कुछ बेहद अतिवादी हिंदुओं के नाम से संगठन चलाने वालों ने शायद पानसारे और कलबुर्गी की हत्या की है। निश्चित तौर पर ऐसे अतिवादियों के खिलाफ भारतीय कानूनों के अनुसार अधिकतम दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। महाराष्ट्र में अगर लंबे समय के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है, तो हो सकता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील लोगों को ये लगे कि महाराष्ट्र सरकार पानसारे के हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी। उनके शक की अपनी तय बुनियाद है कि संघ और स्वयंसेवक सांप्रदायिक ही हैं। और प्रगतिशील विचार के समर्थकों की हत्या के पक्षधर हैं। ये वही बुनियाद है, जो बड़े सलीके से नाथूराम गोडसे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ देती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंसेवकों की, हर तरह की सामाजिक से लेकर राजनीतिक, स्वीकार्यता सर्वोच्च होने के बाद भी यही बुनियाद हर बहस में संघ को सांप्रदायिक बता देती है। लेकिन, क्या महात्मा गांधी की हत्या में संघ या उसके किसी स्वयंसेवक का हाथ होने की बात आज तक साबित हो पाई है। इसका जवाब नहीं में है। उसी तरह से यूपीए के शासनकाल में गोविंद पानसारे की हुई हत्या में जो शक के दायरे में आ रहे हैं। वो मुंबई से सटे ठाणे में काम करने वाले एक गुमनाम अतिवादी हिंदू संगठन सनातन संस्था है। सनातन संस्था पहले भी विस्फोट के एक मामले में शक के दायरे में है। इसका भी दूर-दूर तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन, सिर्फ हिंदू लग जाने से किसी भी अतिवादी हिंदू संगठन के कुकृत्यों को संघ से जोड़ देने की लगातार चलती साजिश का ये नमूना है। सोचिए कोई हिंदू किसी तरह का कुकर्म, अतिवाद करे तो संघ के ऊपर ठीकरा फोड़ दिया जाता है। इसका उल्टा करके देखिए मुसलमान तुष्टीकरण, उनको पिछड़ा बबनाए रखने वाली कांग्रेस से लेकर सारी तथाकथित प्रगतिशील पार्टियों पर क्या कभी मुसलमान के आतंकवादी होने की वजह से सांप्रदायिक होने की बात उठी। नहीं वो पार्टियां धर्मनिरपेक्ष रहती हैं। वामपंथ धर्मनिरपेक्ष रहता है। आतंकवादी मुसलमान हो जाता है। इस साजिश ने बड़ी आसानी से एक रेखा खींची और रेखा के बाएं तरफ सरोकारी, धर्मनिरपेक्ष, अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता करने वाला वामपंथ खड़ा हो गया, वामपंथ के साथ वो सब आ गए जो दक्षिणपंथी नहीं थे। रेखा पर खड़े लोग या रेखा के दोनों तरफ पैर करके खड़े लोग भी सरोकारी, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी टाइप ही रहे। हां, दायीं तरफ अकेला संघ रह गया। और रह गए संघ विचार पर काम करने वाले उसके अनुषांगिक संगठन। सब मिल-मिलाकर लंबे समय तक संघ को घेरकर उसे और उसके अनुषांगिक संगठनों को सांप्रदायिक, पिछड़ा साबित करके एक कोने में ही बांध देने की कोशिश की। यानी सारी सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक बदलाव की जिम्मेदारी से ही संघ और उससे जुड़े अनुषांगिक संगठनों को बेदखल करने की कोशिश की गई। संघ का स्वयंसेवक बहुत अच्छा है लेकिन, संघ सांप्रदायिक है। इस जुमले को ही तथ्य बना देने की प्रयास हुआ, काफी हद तक सफल रहा। इस तरह की प्रोपोगैंडा मशीन निरंतर चलाने वाले तथाकथित प्रगतिशीलों ने एक और जुमला तथ्य की तरह स्थापित कर देने की कोशिश की कि संघ ही प्रोपोगैंडा मास्टर है। इसे तथ्य के तौर पर साबित करने का सीधा सा मकसद था कि वामपंथी गैंग के हर आरोप का जवाब देने के संघ के हर प्रयास को पहले ही प्रोपोगैंडा या अफवाह साबित कर दिया जाए।

अब एम एम कलबुर्गी की हत्या में शक के दायरे में आए आरोपियों की बात कर लें। यहां बंगलुरू के पब में मारपीट के बाद देश भर में सुर्खियों में आए श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के साथी रहे और फिर उससे अलग होकर अपना एक जिले का संगठन चलाने वाले पर कलबुर्गी की हत्या में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। अच्छी बात है तथाकथित धर्मनिरपेक्षों, प्रगतिशीलों की सर्वप्रिय कांग्रेस की सरकार यहां है। इसलिए वो ये सोच सकते हैं कि स्वयंसेवक के मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री न होने से उनके लिहाज से कार्रवाई हो जाएगी। अब जरा याद करिए कितनी कोशिश की गई थी कि श्रीराम सेना को संघ का ही संगठन साबित कर दिया जाए। उस श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक के गोवा में घुसने पर मनोहर पर्रिकर ने प्रतिबंध लगा दिया। मनोहर पर्रिकर स्वयंसेवक हैं। तब गोवा के मुख्यमंत्री थे। गोवा में किसी तरह की शांतिभंग नहीं हुई। लेकिन, इसकी चर्चा मीडिया ने इतने सकारात्मक तरीके से नहीं की। ये भी एक बड़ा उदाहरण है कि कैसे संघ को किसी भी तरह से सांप्रदायिक साबित करने के लिए हिंदू नाम पर होने वाली हर गलत गतिविधि का श्रेय संघ को दे दिया जाता है। वहीं अगर हिंदू के नाम पर बहुत कुछ सकारात्मक संघ कर रहा है, तो भी उसे सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करने वाली संस्था के तौर पर खांचा बनाकर कमतर साबित करने की कोशिश होती है। ये इसके बावजूद है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ही प्रेरणा से कश्मीर में तीन सौ से ज्यादा प्रकल्प मुस्लिम समाज की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं। ये इसके बाद भी है कि जम्मू कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार बने और हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई कम हो, इसकी जमीन तैयार करने का काम संघ के प्रचारक रहे और अब भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने जमकर किया। निष्पक्ष रिपोर्ट सामने आ रही हैं कि मुसलमान बिहार में कई इलाकों में नक्सलवाद, सामंतवाद से त्रस्त होकर भारतीय जनता पार्टी के पाले में आ रहा है। फिर भी शायद तथाकथित प्रगतिशील विचारक खुद के खत्म होने तक ये उद्घोष करते रहेंगे कि संघ सांप्रदायिक है।

यही तथाकथित प्रगतिशील विचारक ये भी बताते हैं कि संघ हिंदू समाज को प्रगतिशील नहीं होने दे रहा है। हिंदू समाज को इसलिए क्योंकि, मुसलमानों को तो वो प्रगतिशील बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। और यही ठप्पा लगाकर वो मुसलमानों को हिंदू का डर दिखाकर फंसाए रखना चाहते हैं उनकी खोखली प्रगतिशीलता के चक्कर में। पिछड़े होने और प्रगतिशील होने की बहस के शीर्षासन का एक अद्भुत उदाहरण अभी देखने को मिला है। दुनिया भर में शाकाहार को बढ़ावा देने के अनोखे तरीके से प्रयास करने वाले संगठन की छवि निश्चित तौर पर प्रगतिशील संगठन की है। वो शायद बिना कपड़ों की महिलाओं का इस्तेमाल करके भी तथाकथित प्रगतिशील बना जाते हैं। लेकिन, अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाकाहार को बढ़ावा देने की बात करता है, तो वो पिछड़ा है। संघ विचार से प्रेरित राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी की सरकार अगर सिर्फ कुछ दिनों के लिए जैन पर्व की वजह से मांसाहार बंद करने की बात करता है, तो फिर वो पिछड़ा साबित हो जाता है। मानवाधिकार तक यहां खतरे में पड़ जाता है। कई विद्वान तो जैन पर्व पर शाकाहार की बात करने को संघ का छिपा एजेंडा तक घोषित कर देते हैं। वो ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि इस कुछ दिनों के प्रतिबंध को लागू करके दरअसल संघ हिंदू एजेंडा लागू कर रहा है। अच्छी बात ये है कि संघ ने आगे की रणनीति के लिहाज से जो ढेर सारे अच्छे काम किए। उन्हीं में तकनीक को समझना भी शामिल रहा। भारत सहित दुनिया भर में निकले स्वयंसेवक ही आज तथाकथित वामपंथी प्रगतिशीलता का भांडा फोड़ रहे हैं। साजिश शीर्षासन कर गई है।

Thursday, July 16, 2015

संघ को बदनाम करने की साजिश

@RSSorg @PMOIndia @BJP4India इस रिपोर्ट को जरूर को देखें। ये फ्रांस के न्यूज चैनल @FRANCE24 पर शनिवार को आने वाली रिपोर्ट का प्रोमो है। ये रिपोर्ट दिल्ली, बेरुत, वॉशिंगटन और लंडन में भी दिखेगी। रिपोर्ट है Forced to pray in secret - Christians in India इस प्रोमो को ही देखकर लगता है कि संघ और बीजेपी हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए इसाइयों पर इतना दमन कर रहे हैं कि वो ईसामसीह को चर्च में याद करने के बजाए घर में ही याद करते हैं। प्रोमो में जब इतना कुछ है तो, पूरी रिपोर्ट के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। जबकि, अभी तक किसी भी चर्च पर हुए हमले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी या किसी दक्षिणपंथी संगठन का नाम दूर-दूर तक नहीं आया है। ऐसे में भारत चर्चों पर हुए हमले, चोरी की घटनाओं को संघ, बीजेपी से जोड़कर भारत की छवि खराब करने की ये बड़ी कोशिश है। ये एक घटना मेरी नजर में आई। ऐसी जाने कितनी कोशिशें, साजिशें चल रही होंगी। 

Monday, January 21, 2013

बीजेपी आजतक - ताजा स्टेटस अपडेट


ऐसे ही आज मैंने कुछ स्टेटस अपडेट्स डाले। एक बार उसे एक साथ पढ़ा तो, मुझे लगा कि ये तो, जाने-अनजाने भारतीय जनता पार्टी के ताजा हाल का विश्लेषण जैसा कुछ हो गया। ये पांचों स्टेटस एक साथ चिपका रहा हूं। क्योंकि, आज कई संयोग एक साथ बने हैं संघ के सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह लौटे हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर पुराने नितिन गडकरी की ताजपोशी की रिपोर्ट आ रही है। और, फिर से संघ-बीजेपी पर हिंदू आतंकवाद का आरोप लगा है। व्यक्ति निर्माण ही मूल सवाल दिख रहा है।
 
1- गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे आश्वस्त हैं कि तीसरी बार यूपीए की सरकार बन जाएगी। और, इस चुनाव में बीजेपी-संघ के शिविरों से निकले आतंकवादी वोट नहीं डालेंगे और न ही उनके सगे-संबंधी-शुभचिंतक। और, वोट डालेंगे तो, भी इतने कम हो गए हैं कि सरकार यूपीए की ही बनेगी। तो, शिंदे साहब इन आतंकवादियों के खिलाफ मुदकमे-जेल की कार्रवाई यूपीए 2 में होगी या यूपीए 3 का इंतजार करें। #rss #bjp #terrorism

 2- राम जेठमलानी के बेटे Mahesh Jethmalani नितिन गडकरी के खिलाफ BJP अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते हैं और वो, इतने भर से ही #tweeter पर नंबर 1 पर हैं। इस नब्ज को संघ, बीजेपी समझे तो, बेहतर। #rss #FB #BJP

3- कल्याण सिंह BJP में वापस आ गए हैं। कार्यकर्ता उत्साहित हैं। कल्याण भी पुराने जोश में भाषण देने की कोशिश कर रहे हैं। कह रहे हैं हमने 60 लोकसभा जिता के दी हैं। अब तो, 50 की ही बात कर रहे हैं। पूरे प्रदेश के दौरे की बात कह रहे हैं। चुनाव नहीं लड़ेंगे ये भी कह रहे हैं। जय श्रीराम का नारा लगा रहे हैं। बजरंगबली को भी याद कर रहे हैं। लेकिन, खांसने लगते हैं। क्या पुराने दिन लौटेंगे
4- एक जमाने में कल्याण सिंह, उमा भारती की अनुशासनहीनता को संघ के खिलाफ समझाकर उन्हें बाहर कर दिया गया। और, ये करने-कराने वाले ही बीजेपी के बड़े नेता हो गए। अब नितिन गडकरी सिर्फ पुराने बीजेपी नेताओं कल्याण सिंह-उमा भारती की वापसी कराके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय हैं।

और अंत में –

5- बीजेपी का काम अच्छा। बड़े-बड़े नाम अच्छे। फिर भी BJP को मजबूत बनाने का असली काम उसके काम और बड़े-बड़े नाम से ज्यादा शिंदे-दिग्विजय जैसों के बयान क्यों करने लगे हैं। #BJP #RSS इस पर सोचेगा क्या?

नहीं सोच रहे हैं तो, सोचिए कि जब सरकार के खिलाफ इतना गुस्सा लोगों में हो फिर भी आपकी बात पर भारत का लोकतंत्र भरोसा जताने को तैयार क्यों नहीं है?

Tuesday, October 23, 2012

एक विचार

अटल-आडवाणी-जोशी दरअसल संघ के स्वयंसेवक पहले थे। बीजेपी नेता बाद में। शुरुआती विरोध के बाद सर्वस्वीकार्य हो गए। क्या संघ अपने किसी ऐसे स्वयंसेवक को प्रचारक के तौर पर बीजेपी में नहीं निकाल सकता जिसने दरअसल त्याग का जीवन जिया हो। बेदाग हो और कम से कम 2 पीढ़ियों से जिसका ठीक संवाद हो और आगे की एक पीढ़ी से तरीके से संवाद करने लायक हो। रकम से राजनीति होती है इसे ध्वस्त करने वाला हो। ये स्थापित कर सके कि राजनीति ठीक रही तो, रकम तो, आती ही रहती है।

Monday, August 24, 2009

नई बीजेपी के साथ संघ भी नया चाहिए


ज्यादा समय नहीं हुआ। सिर्फ एक दशक पहले की ही बात है। 1999 में मोहनराव भागवत से मेरी मुलाकात इलाहाबाद के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर हुई थी। भागवतजी तब RSS के सह सरकार्यवाह थे और संघ के अनुषांगिक संगठनों में विद्यार्थी परिषद से संवाद का जिम्मा उन्हीं के पास था। आधे घंटे की बातचीत में संवाद के जरिए निजी रिश्ते बना लेने की उनकी क्षमता से हम सारे लोग ही प्रभाव में आ गए थे। उनका जोर सिर्फ एक ही बात पर था कि समय के साथ बदलाव जरूरी है और नौजवान कैसे सोचता-समझता है उसके साथ तालमेल बिठाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है इसलिए जरूरी है कि विद्यार्थी परिषद की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उपस्थिति मजबूत रहे। करीब डेढ़ दशक बाद 1998 के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में परिषद की ताकत दिखी थी।


तब तक बीजेपी सत्ता में आ चुकी थी। और, देश के सर्वोच्च पद पर एक स्वयंसेवक के पहुंच जाने के दंभ की वजह से एक धारणा सी बनने लगी थी कि हमने वो किला फतह कर लिया। जो, केशवराव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय तय किया था। लेकिन, सच्चाई वो थी नहीं। सच्चाई तो ये थी कि संघ के विचारों के अनुकूल तैयार हुआ राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंचा था। काम बस इतना ही हुआ था। लेकिन, सत्ता के जरिए समाज में बदलाव का लक्ष्य बीजेपी को याद ही नहीं रह गया। और, संघ के याद दिलाने पर सरकार चलाने वाले दो वरिष्ठ स्वयंसेवकों- प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी- और संघ के बीच शीतयुद्ध सा शुरू हो गया था।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...