ये बड़े काबिल अधिकारी हैं। नाम है Srivats Krishna ये कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी हैं। 1995 बैच के टॉपर हैं। इनका मत है कि अंग्रेजी न जानने वाले को देश में आईएएस बनना ही नहीं चाहिए। अंग्रेजी का देश का सबसे बड़ा अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया इनकी इस सोच को संपादकीय में जगह देता है। ये हिन्दी वाले आईएएस जो जाने कितने सालों तक टॉपर रहे होंगे, काबिल भी होंगे। कहां मरे बैठे हैं। या फिर हिन्दी, अंग्रेजी का कोई अखबार हिन्दी के काबिल आईएएस अधिकारी का मत अपने संपादकीय पन्ने पर छापने से बचते हैं। श्रीवत्स कृष्ण अकसर टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए संपादकीय लिखते हैं। इनकी काबिलियत पर अखबार ने इन्हें दूसरे अधिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया था। पूरी खबर इनके ऊपर थी। इनकी उपलब्धियों पर। इस तरह से सोचने समझने वाले देश, समाज, मीडिया के लिए अपने देश, अपनी भाषा, अपना समाज बचाना कहीं प्राथमिकता में होता ही नहीं है। ऐसे में कहां यूपीएससी में हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे अन्याय कोई सरकार हरकत में आएगी। सचमुच हिन्दी के लिए फैसला लेना हिंदुस्तान में बड़ा कठिन है।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Thursday, July 31, 2014
Tuesday, October 22, 2013
भारतीयों में गुलामी का हार्डवेयर
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| प्रेस कांफ्रेंस से पहले बिना तौलिये की ऊंची कुर्सी |
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| चिदंबरम के आने से ठीक पहले ऊंची कुर्सी पर लगा तौलिया |
इस गुलाम मानसिकता को तोड़ने की कोशिश पूर्व वित्त मंत्री और अभी के हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने की है। उन्होंने सर्कुलर भेजकर कहा है कि उनके नाम के आगे महामहिम न लगाया जाए। श्री या आदरणीय लगाने में एतराज नहीं।
Monday, June 14, 2010
राजीव पर उंगली उठाते क्यों नहीं बनता
21 मई 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई लेकिन, उसकी खबर देश भर में 22 मई की सुबह पहुंची। मुझे याद है कि इलाहाबाद में मेरे पढ़ाई के दिन थे। जब सोकर उठा तो, पता चला कि रात में जबरदस्त तूफान आया था। बारिश-तूफान की वजह से पानी-बिजली का संकट बन गया था। घर में शायद मेरी माताजी को जब पता चला कि राजीव गांधी की हत्या हो गई है तो, राजनीति से बिल्कुल अनजान होने के बावजूद उन्हें जैसे झटका सा लग गया। उन्होंने कहाकि एतना बड़ा-भला मनई मरा इही से आंधी-तूफान आएस।
राजीव गांधी तो, हमारे कॉलेज से विश्वविद्यालय पहुंचते तक ही दुनिया से चले गए। लेकिन, जाने-अनजाने पता नहीं कैसे राजीव गांधी का वो, मुस्कुराता, निर्दोष चेहरा ऐसे हमारे जेहन में समा गया कि कांग्रेस की ढेर सारी हरकतें बुरी लगने के बावजूद हमेशा लगता रहा कि राजीव होते तो, देश की राजनीति का चेहरा बेहतर होता। स्वच्छ राजनीति होती। लेकिन, क्या ये मेरे दिमाग में बसी भ्रांति भऱ है या सचमुच कुछ बदलाव होता।
ज्यादा ध्यान से देखने पर और पत्रकारीय कर्म करते 12 साल हुई नजर से देखता हूं तो, साफ दिखता है कि ये मेरे दिमाग की भ्रांति भर ही है। राजीव गांधी के सिर पर इस देश को 21वीं सदी में ले जाने का एतिहासिक तमगा ऐसे सज गया जैसे, राजीव गांधी नहीं होते तो, ये देश अब तक 19वीं शताब्दी में ही पड़ा होता। जैसे राजीव नहीं होते तो, भारत के लोग कंप्यूटर निरक्षर ही रह जाते। दरअसल युवा होते भारत को इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव का चेहरा ऐसा निर्दोष दिखा कि उन्हें लगा कि भारतीय राजनीति का चेहरा बदल रहा है। ऐसा समझने वाली जमात में ही हम जैसे लोग भी शामिल थे। जो, उस समय कॉलेज में पढ़ते थे। हमारे दिमाग में जाने कैसे भर गया कि राजीव गांधी राजनीति में ईमानदारी का दूसरा नाम है। राजीव के खिलाफ बोफोर्स के भ्रष्टाचार की तोप दागकर विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के बाद और भ्रष्टाचार के मुद्दा बनने के बाद भी राजीव की छवि पाक-साफ ही रही । लेकिन, शायद ये कांग्रेसी तरीका है कि बोफोर्स का भ्रष्टाचार और भोपाल की गैस त्रासदी सब जनता भूल जाती है। जनता कांग्रेसी राज की ऐसी गुलाम है कि सरकार के सबसे जिम्मेदार मंत्री प्रणव मुखर्जी दम ठोंककर कहते हैं कि उस वक्त कानून-व्यवस्था की स्थिति ऐसी थी कि एंडरसन को भगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। ध्यान रहे ऐसी भयावह कानून व्यवस्था के समय केंद्र और राज्य (मध्य प्रदेश) दोनों ही जगह कांग्रेस की ही सरकारें थीं।
मैं ये समझ नहीं पाता कि आखिर कैसे एक ही परिवार के दो गांधी भाइयों में से एक संजय गांधी इस देश में तानाशाह और जाने अप्रिय संबोधनों से बुलाया जाता है। वहीं, दूसरा राजीव गांधी हमेशा इस देश की तरक्की का अगुवा माना जाता है। जबकि, संजय गांधी पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप तो मुझे याद नहीं आ रहा है। जबकि, राजीव पर बोफोर्स जैसा भ्रष्टाचार का आरोप और भोपाल गैस त्रासदी के मामले में एंडरसन को भगाने तक के मामले सामने आ रहे हैं। एक और बात है चाहे बोफोर्स के ओटावियो क्वात्रोची का मामला हो या फिर भोपाल की तबाही के जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड के वॉरेन एंडरसन की। दोनों जगह विदेशी दबाव साफ दिखता है।
अब तो मामला एक पीढ़ी आगे तक निकल गया है। राहुल को इस देश में सारी अच्छाइयों का प्रतीक माना जा रहा है और वरुण गांधी को सारी बुराइयों का। वो, भी तब जब वरुण को भारतीय जनता पार्टी में जगह बनाने के लिए सारी मशक्कत करनी है और राहुल को सब कुछ पका-पकाया मिल रहा है। सुपर प्राइममिनिस्टर राहुल बाबा का हाल ये है कि यूपीए-2 के एक साल का रिपोर्ट कार्ड रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन जी ये कहकर खुश होते हैं कि मैं तो, उन्हें मंत्री देखना चाहता हूं लेकिन, वो मना कर रहे हैं। और, साथ में ये भी कि जब वो, चाहेंगे मैं प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ दूंगा।
मीडिया में भी संजय, राजीव के बेटों को विरासत का नफा-नुकसान ही उसी अनुपात में मिल रहा है। राहुल का प्रभाव ऐसा है कि एक साल होने पर न्यूज चैनलों पर सर्वे चला तो, उसमें एक सवाल ये भी था कि अगर राहुल प्रधानमंत्री बने तो, .... और इस चमत्कारी सवाल के जवाब में सर्वे में शामिल जनता हर राज्य में बीजेपी के खाते से निकालकर 2-4 सीट और कांग्रेस के खाते में जोड़ दे रही है। सचमुच इस देश में गुलामी की जड़ें बड़ी गहरी हैं। बस खेल ये है कि कौन सलीके से जनमानस को गुलाम बनाने में कामयाब हो जाता है। गांधी परिवार की असल विरासत गुलाम बनाने का महामंत्र साबित हो चुकी है। गाहे-बगाहे, उसमें थोड़ी बहुत सेंध दूसरे भी लगाते रहते हैं।
Thursday, September 17, 2009
हमें सत्ता देने के लिए तुम मर जाओ!!!
ये साबित हो गया तो, राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी कालिख होगी। आंध्र प्रदेश के जनप्रिय नेता YSR Reddy की दुखद मौत के बाद हिला देने वाला सच सामने आ रहा है। उनकी मौत की घटना के तुरंत बाद करीब डेढ़ सौ लोगों के आत्महत्या करने, सदमे से मरने की खबर थी। अब तक ये आंकड़ा चार सौ के ऊपर बताया जा रहा है।
लेकिन, अब चौंकाने वाली खबर (मुझे तो खबर सुनने के बाद ही घिन सी आ रही है) ये आ रही है कि जगन सेना- ये वो गुलामों की ब्रिगेड है जो, YSR Reddy के बेटे जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अभियान चला रही है। बाप की मौत के बाद उसकी आत्मा की शांति का प्रयास करने के बजाए जगन आंध्र प्रदेश की ज्यादा से ज्यादा मौतों को अपने बाप की दुखद मौत का साझीदार बनाने की कोशिश कर रहा है। अब इन सबकी आत्मा को शांति कैसे मिल पाएगी।
खबर ये आ रही है कि YSR Reddy की मौत के बाद राज्य भर में जितनी भी मौतें हुईँ। उन सबको रेड्डी के बाद के दुखद असर के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश हो रही है। सबसे घिनौनी बात ये कि इसमें रेड्डी के गुलाम अफसर भी मदद कर रहे हैं। खुद जिला कलेक्टर किसी भी कारण से मरने वाले लोगों के घर जाकर ये जानने या कहें कि साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मरने से ठीक पहले रेड्डी का अंतिम संस्कार तो, नहीं देखा था या फिर YSR Reddy के मरने की खबर तो नहीं सुनी थी।
लेकिन, अब चौंकाने वाली खबर (मुझे तो खबर सुनने के बाद ही घिन सी आ रही है) ये आ रही है कि जगन सेना- ये वो गुलामों की ब्रिगेड है जो, YSR Reddy के बेटे जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अभियान चला रही है। बाप की मौत के बाद उसकी आत्मा की शांति का प्रयास करने के बजाए जगन आंध्र प्रदेश की ज्यादा से ज्यादा मौतों को अपने बाप की दुखद मौत का साझीदार बनाने की कोशिश कर रहा है। अब इन सबकी आत्मा को शांति कैसे मिल पाएगी।
खबर ये आ रही है कि YSR Reddy की मौत के बाद राज्य भर में जितनी भी मौतें हुईँ। उन सबको रेड्डी के बाद के दुखद असर के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश हो रही है। सबसे घिनौनी बात ये कि इसमें रेड्डी के गुलाम अफसर भी मदद कर रहे हैं। खुद जिला कलेक्टर किसी भी कारण से मरने वाले लोगों के घर जाकर ये जानने या कहें कि साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मरने से ठीक पहले रेड्डी का अंतिम संस्कार तो, नहीं देखा था या फिर YSR Reddy के मरने की खबर तो नहीं सुनी थी।
Tuesday, September 08, 2009
भारतीयों में गुलामी का इनबिल्ट सॉफ्टवेयर
YSR रेड्डी की दुखद मौत के बाद आंध्र प्रदेश से करीब 150 लोगों की जान जाने की खबर आई है। कुछ लोगों ने अपने प्रिय नेता की मौत के बाद आत्महत्या कर ली। कुछ इस अंदाज में कि अब मेरे भगवान न रहे तो, हम रहकर क्या करेंगे। और, कुछ बेचारों ने आत्महत्या तो, नहीं की लेकिन, रेड्डी की मौत की खबर सुनने के बाद वो, ये सदमा झेल नहीं पाए। इससे जुड़ी-जुड़ी दूसरी खबर ये कि आंध्र प्रदेश से संदेश साफ है कि YSR रेड्डी का बेटा जगनमोहन रेड्डी की राज्य की बागडोर संभालेगा तो, राज्य का भला हो पाएगा। पिता के अंतिम संस्कार के समय टेलीविजन पर दिखती जगनमोहन की हाथ जोड़े तस्वीरें किसी शोक में डूबे बेटे से ज्यादा राज्य की विरासत संभालने के लिए तैयार खडे, दृढ़ चेहरे वाले प्रशासक की ज्यादा दिख रही है।
हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।
हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।
Wednesday, October 10, 2007
सब कुछ विदेशी मांगता है!
मुंबई को शंघाई बनाने का मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है। लेकिन, महाराष्ट्र में ज्यादातर योजनाएं विदेशों की ही तर्ज पर बन रही हैं। शायद यहां की सरकार को भरोसा हो गया है कि किसी विदेशी शहर का नाम लेकर कोई योजना शुरू करने पर उसको मीडिया में पब्लिसिटी तो मिलती है। भारत जैसे देश में जहां अभी भी विदेश घूमना ज्यादातर लोगों के लिए सबसे बड़े सपने जैसा होता है, अपील भी ज्यादा करता है।
सबसे पहले विलासराव देशमुख ने मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाया। जबसे सपना दिखाया है तब से दो बार शहर ठीक-ठाक बाढ़ जैसे हालात से गुजर चुका है। कहां तक पहुंची है ये योजना इसका कुछ ठीक-ठीक पता शायद मुख्यमंत्रीजी को भी नहीं होगा। अभी ये योजना अंटकी ही है कि अब यहां के मंदिरों का संचालन भी विदेशी धर्मस्थलों की तर्ज पर करने की तैयारी है। अखबार में छपी खबर के मुताबिक, शिरडी के साई बाबा का स्थान अब इसाई धर्म शहर वेटिकन सिटी की तरह बेहतर बनाया जाएगा। शिरडी में 300 करोड़ की बिल्ड ऑन ट्रांसफर वाली योजना सरकार ने तैयार कर रखी है। यहां पर MSRDC हवाई सड़कें (स्काईवॉक), बहुमंजिला कार पार्क, पैदल चलने वालों के लिए अलग रास्ते के साथ चौड़ी सड़कें बनाएगा। खबर के मुताबिक, ये सब कुछ वेटिकन सिटी के आधार पर ही तैयार किया जाएगा। शिरडी का ब्लूप्रिंट बनाने से पहले MSRDC के अधिकारी वेटिकन, जेरुशलम और मक्का मदीना के तीर्थस्थलों की व्यवस्था का जायजा लेंगे।
मंदिर ही नहीं, मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था लंदन मॉडल पर चलाने की तैयारी हो रही है। लंदन की ही तरह किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए MMRDA लाइनलाइन रोड प्लान तैयार कर रही है। करीब 200 किलोमीटर लंबी कुल मिलाकर तीन लाइफलाइन रोड बनाई जाएगी। प्लान के मुताबिक, पहली 60 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड नरीमन प्वाइंट से वर्ली और बांद्रा होते हुए वसई तक जाएगी। दूसरी 65 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक से मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के जरिए करजत तक जाएगी। और, तीसरी 60 किलोमीटर लंबी आउटर लाइफलाइन रिंग रोड करजत और वसई-विरार को जोड़ेगी।
मामला सिर्फ मंदिर और ट्रांसपोर्टेशन का ही नहीं है। मुंबई की पुलिस को भी विदेशी तर्ज पर ज्यादा चाक चौबंद करने की तैयारी है। महाराष्ट्र के एक मंत्री चाहते हैं कि मुंबई पुलिस शिकागो पुलिस की तर्ज पर काम करे। वो कह रहे हैं कि मुंबई पुलिस अधिकारियों के पास लैपटॉप पर माफिया-बदमाशों की फोटो हो। जो, पूरी तरह से नेटवर्क से कनेक्टेड होगा। पुलिस टीम को हेलीकॉप्टर दिए जाएं, रात में देखने वाले कैमरे दिए जाएं। गाड़ियों की स्पीड जांचने वाली मशीन हर दूसरे चौराहे पर होगी।
अब मंत्रीजी को कौन बताए कि शिकागो में अपराध करने के तरीके और मुंबई में अपराध करने के तरीके में काफी फर्क है। इसके अलावा मुंबई में बहुत बड़े माफियाओं को छोड़कर मोबाइल के अलावा शायद ही कोई अपराधी अत्याधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करता हो। रात के अंधेरे में देखने वाले कैमरे के साथ हेलीकॉप्टर से पुलिस वाले क्या किसी फिल्मी माफिया से जंग लड़ेंगे। शिरडी की व्यवस्था बेहतर करने, मुंबई की सड़कों को सुधारने और पुलिस को अत्याधुनिक बनाने पर किसी को कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन, क्या सारे के सारे मॉडल विदेशों में ही मिलते हैं। यही मुंबई पुलिस है जिसने थोड़ी सी अत्याधुनिक सुविधाओं, असलहों और गाड़ियों के साथ माफियाओं को मार भगाया। देश में ही तिरुपति ट्रस्ट की व्यवस्था का उदाहरण कहीं भी कारगर हो सकता है। दिल्ली में पिछले 5-7 सालों में बनी रेड सिग्नल फ्री सड़कें और एक दूसरे को जोड़ते प्लाईओवर मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था बेहतर करने का अच्छा उदाहरण हो सकते हैं। लेकिन, शायद महाराष्ट्र को कोई भी देसी प्लान (उदाहरण) समझ में नहीं आता जब तक प्लान के साथ लंदन, शंघाई या शिकागो न जुड़ा हो।
सबसे पहले विलासराव देशमुख ने मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाया। जबसे सपना दिखाया है तब से दो बार शहर ठीक-ठाक बाढ़ जैसे हालात से गुजर चुका है। कहां तक पहुंची है ये योजना इसका कुछ ठीक-ठीक पता शायद मुख्यमंत्रीजी को भी नहीं होगा। अभी ये योजना अंटकी ही है कि अब यहां के मंदिरों का संचालन भी विदेशी धर्मस्थलों की तर्ज पर करने की तैयारी है। अखबार में छपी खबर के मुताबिक, शिरडी के साई बाबा का स्थान अब इसाई धर्म शहर वेटिकन सिटी की तरह बेहतर बनाया जाएगा। शिरडी में 300 करोड़ की बिल्ड ऑन ट्रांसफर वाली योजना सरकार ने तैयार कर रखी है। यहां पर MSRDC हवाई सड़कें (स्काईवॉक), बहुमंजिला कार पार्क, पैदल चलने वालों के लिए अलग रास्ते के साथ चौड़ी सड़कें बनाएगा। खबर के मुताबिक, ये सब कुछ वेटिकन सिटी के आधार पर ही तैयार किया जाएगा। शिरडी का ब्लूप्रिंट बनाने से पहले MSRDC के अधिकारी वेटिकन, जेरुशलम और मक्का मदीना के तीर्थस्थलों की व्यवस्था का जायजा लेंगे।
मंदिर ही नहीं, मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था लंदन मॉडल पर चलाने की तैयारी हो रही है। लंदन की ही तरह किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए MMRDA लाइनलाइन रोड प्लान तैयार कर रही है। करीब 200 किलोमीटर लंबी कुल मिलाकर तीन लाइफलाइन रोड बनाई जाएगी। प्लान के मुताबिक, पहली 60 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड नरीमन प्वाइंट से वर्ली और बांद्रा होते हुए वसई तक जाएगी। दूसरी 65 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक से मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के जरिए करजत तक जाएगी। और, तीसरी 60 किलोमीटर लंबी आउटर लाइफलाइन रिंग रोड करजत और वसई-विरार को जोड़ेगी।
मामला सिर्फ मंदिर और ट्रांसपोर्टेशन का ही नहीं है। मुंबई की पुलिस को भी विदेशी तर्ज पर ज्यादा चाक चौबंद करने की तैयारी है। महाराष्ट्र के एक मंत्री चाहते हैं कि मुंबई पुलिस शिकागो पुलिस की तर्ज पर काम करे। वो कह रहे हैं कि मुंबई पुलिस अधिकारियों के पास लैपटॉप पर माफिया-बदमाशों की फोटो हो। जो, पूरी तरह से नेटवर्क से कनेक्टेड होगा। पुलिस टीम को हेलीकॉप्टर दिए जाएं, रात में देखने वाले कैमरे दिए जाएं। गाड़ियों की स्पीड जांचने वाली मशीन हर दूसरे चौराहे पर होगी।
अब मंत्रीजी को कौन बताए कि शिकागो में अपराध करने के तरीके और मुंबई में अपराध करने के तरीके में काफी फर्क है। इसके अलावा मुंबई में बहुत बड़े माफियाओं को छोड़कर मोबाइल के अलावा शायद ही कोई अपराधी अत्याधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करता हो। रात के अंधेरे में देखने वाले कैमरे के साथ हेलीकॉप्टर से पुलिस वाले क्या किसी फिल्मी माफिया से जंग लड़ेंगे। शिरडी की व्यवस्था बेहतर करने, मुंबई की सड़कों को सुधारने और पुलिस को अत्याधुनिक बनाने पर किसी को कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन, क्या सारे के सारे मॉडल विदेशों में ही मिलते हैं। यही मुंबई पुलिस है जिसने थोड़ी सी अत्याधुनिक सुविधाओं, असलहों और गाड़ियों के साथ माफियाओं को मार भगाया। देश में ही तिरुपति ट्रस्ट की व्यवस्था का उदाहरण कहीं भी कारगर हो सकता है। दिल्ली में पिछले 5-7 सालों में बनी रेड सिग्नल फ्री सड़कें और एक दूसरे को जोड़ते प्लाईओवर मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था बेहतर करने का अच्छा उदाहरण हो सकते हैं। लेकिन, शायद महाराष्ट्र को कोई भी देसी प्लान (उदाहरण) समझ में नहीं आता जब तक प्लान के साथ लंदन, शंघाई या शिकागो न जुड़ा हो।
Tuesday, September 25, 2007
हम अब भी गुलाम हैं क्या
आजाद भारत में अंग्रेज इंग्लैंड से आकर विजय दिवस मना रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों के विद्रोह को दबाने में मारे गए अंग्रेज सैनिकों-अफसरों को उनके परिवार के लोग भारत में हर उस जगह जाकर महान बता रहे हैं। जहां उनके बाप-दादाओं ने हमारे स्वाधीनता सेनानियों का खून बहाया था। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत का वो मजाक उड़ा रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों को विद्रोह को बेरहमी से कुचलने वाले मेजर जनरल हैवलॉक के पड़पोते को विजय दिवस मनाने की इजाजत हमारी सरकार ने ही दी है।
कमीने हैवलॉक का पड़पोता मार्क एलेन हैवलॉक के साथ हम भारतीयों का मजाक उड़ाने के लिए पूरा अंग्रेज दस्ता साथ आया है। हमें तो पता भी नहीं चलता। वो आकर हम पर 200 साल हुकूमत करने का जश्न मनाकर चले भी जाते। लेकिन, मेरठ में विद्रोह दबाने वाले अंग्रेज अफसरों के बचे निशानों पर विजय दिवस मनाने की खबर मीडिया में आने के बाद इसका विरोध शुरू हुआ तो, लोगों के गुस्से को दबाने के लिए लखनऊ में गोरी चमड़ी वालों को भारतीयों की बगावत को कुचलने वाले अफसरों के रिश्तेदारों को विजय दिवस मनाने की इजाजत वापस ले ली गई।
लेकिन, सवाल यही है कि आखिर केंद्र की यूपीए सरकार क्या इजाजत देने से पहले ये नहीं जानती थी कि वो कैसा अनर्थ कर रही है। पश्चिमी सभ्यता हममें कुछ ऐसी रच बस रही है कि अपने स्वाधीनता सेनानियों की स्मृतियां बहुत कम ही हमारे मन-मस्तिष्क में बची हुई हैं। अब हमारी खुद की चुनी लोकतांत्रिक सरकार ही हमें गुलाम बनाने वालों को देश में बुलाकर विजय दिवस मनाने की इजाजत दे रही है। ये खबर पढ़ने के बाद मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा है कि हम अभी भी गुलाम हैं क्या।
कमीने हैवलॉक का पड़पोता मार्क एलेन हैवलॉक के साथ हम भारतीयों का मजाक उड़ाने के लिए पूरा अंग्रेज दस्ता साथ आया है। हमें तो पता भी नहीं चलता। वो आकर हम पर 200 साल हुकूमत करने का जश्न मनाकर चले भी जाते। लेकिन, मेरठ में विद्रोह दबाने वाले अंग्रेज अफसरों के बचे निशानों पर विजय दिवस मनाने की खबर मीडिया में आने के बाद इसका विरोध शुरू हुआ तो, लोगों के गुस्से को दबाने के लिए लखनऊ में गोरी चमड़ी वालों को भारतीयों की बगावत को कुचलने वाले अफसरों के रिश्तेदारों को विजय दिवस मनाने की इजाजत वापस ले ली गई।
लेकिन, सवाल यही है कि आखिर केंद्र की यूपीए सरकार क्या इजाजत देने से पहले ये नहीं जानती थी कि वो कैसा अनर्थ कर रही है। पश्चिमी सभ्यता हममें कुछ ऐसी रच बस रही है कि अपने स्वाधीनता सेनानियों की स्मृतियां बहुत कम ही हमारे मन-मस्तिष्क में बची हुई हैं। अब हमारी खुद की चुनी लोकतांत्रिक सरकार ही हमें गुलाम बनाने वालों को देश में बुलाकर विजय दिवस मनाने की इजाजत दे रही है। ये खबर पढ़ने के बाद मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा है कि हम अभी भी गुलाम हैं क्या।
Saturday, June 16, 2007
फिर हम क्यों बोलें हिंदी ...
बॉलीवुड कलाकारों को (आर्टिस्ट पढ़िए) अब अंग्रेजी या फिर रोमन में ही स्क्रिप्ट देनी पड़ती है। क्योंकि, उन्हें हिंदी में लिखी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आती। वैसे ये मुश्किल सिर्फ स्क्रिप्ट लिखने वालों की ही नहीं है। इन फिल्मी कलाकारों की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए जब पत्रकार (जर्नलिस्ट पढ़िए) साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने जाते हैं तो, उन्हें भी यही मुश्किल झेलनी पड़ती है। देश के हिंदी प्रदेशों में दीवानेपन की हद तक चाहे जाने वाले इन कलाकारों को इतनी भी हिंदी नहीं आती कि ये फिल्म के डायलॉग पढ़कर बोल सकें। फिर भी ये हिट हैं क्योंकि, ये बिकते हैं।
वैसे हिंदी की ये मुश्किल सिर्फ फिल्मी कलाकारों के मामले में नहीं है। बात यहीं से आगे बढ़ा रहा हूं जबकि, ये बात बहुत आगे बढ़कर ही यहां तक पहुंची है। देश में सभी चीजों को सुधारने का ठेका लेने वाला हिंदी मीडिया भी हिंदी से परेशान है। अब आप कहेंगे कि हिंदी चैनलों में हिंदी क्यों परेशान है। हिंदी का चैनल, देखने वाले हिंदी के लोग, बोलने-देखने-लिखने वाले हिंदी के लोग, फिर क्या मुश्किल है। दरअसल मुश्किल ये सीधे हिंदी बिक नहीं रही थी (अंग्रेजी में कहते हैं कि हेप नहीं दिख रही थी)। इसलिए हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगने लगा। शुरुआत में हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगना शुरू हुआ जब ज्यादा बिकने लगा तो, अंग्रेजी में हिंदी का मसाला भर बचा रह गया। हां, नाम हिंदी का ही था।
वैसे ये मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है कि फिल्मी कलाकार या कोई भी बड़ा होता आदमी या औरत (बिगीज) अब हिंदी बोलना नहीं चाहते। हिंदी वही बोल-पढ़ रहे हैं जो, और कुछ बोल-पढ़ नहीं सकते। लेकिन, दुखद तो ये है कि हिंदी वो भी बोल-पढ़ नहीं रहे हैं जो, हिंदी की ही खा रहे हैं। हिंदी खबरिया चैनलों का हाल तो ये है कि अगर बहुत अच्छी हिंदी आपको आती है तो, यहां नौकरी (जॉब) नहीं मिलने वाली। गलती से नौकरी मिल भी गई तो, कुछ ही दिन में ये बता-बताकर कि यहां खबर लिखो-साहित्य मत पेलो, कह-कहकर हिंदी का राम नाम सत्य करवा दिया जाएगा वो भी आपसे ही। जिस दिन पूरी तरह राम नाम सत्य हो गया और हिंदी के ही शब्दों-अक्षरों-वाक्यों पर आप गड़बड़ाने लगे तो, चार हिंदी में गड़बड़ हो चुके लोग मिलकर सही हिंदी तय करेंगे और ये तय हो जाएगा कि अब यही लिखा जाएगा भले ही गलत हो। और, जब मौका मिला थोड़ी बची-खुची सही हिंदी जानने वाले बड़े लोग आपको डांटने का मौका हाथ से जानने नहीं देंगे।
मैं फिर लौटता हूं कि हिंदी की मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है। हिंदी चैनलों में भर्ती (रिक्रूटमेंट) होती है तो, अगर उसने u know.... i hope ... so.. i think कहकर अपने को साबित (प्रूव) कर दिया तो, फिर नौकरी (जॉब) पक्की। समझाया ये जाएगा कि थोड़ी हिंदी कमजोर है लेकिन, लड़की या लड़के को समझ बहुत अच्छी है। हिंदी तो, पुराने लोग मिलकर ठीक कर देंगे। वैसे जिनके दम पर नई भर्ती को हिंदी सिखाने का दम भरा जा रहा होता है उनमें हिंदी का दम कितना बचा होता है ये समझ पाना भी मुश्किल है। वैसे हिंदी के इस दिशा में जाने के पीछे वजह जानने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जगह के रिसेप्शन को भी पार (क्रॉस) करने के लिए अंग्रेजी ही काम आती है। सिर्फ हिंदी के भरोसे अगर आप घर से बाहर निकले हैं तो, मन में ही हिंदी को संजोए हुए चुपके से ही रिसेप्शन पार कर गए तब तो ठीक है नहीं तो, हिंदी के सवाल के जवाब में अंग्रेजी में may i help u आपको फिर से बाहर कर सकता है। मेरे जैसे हिंदी जानने-बोलने-पढ़ने-समझने-लिखने वालों की मंडली तो आपस में मजाक भी कर लेती है कि किसी मॉल या किसी बड़ी-छोटी जगह के रिसेप्शन पर या किसी सेल्स गर्ल से बात करने के लिए बीवी को आगे कर ही काम निकलता होगा। क्योंकि, बड़े मॉल्स, स्टोर्स में तो कुछ खऱीदने के लिए जेब में पैसे होने ही जितना जरूरी है कि आपमें अंग्रेजी में बात करने का साहस हो। शायद ये साहस लड़कियों में कुछ ज्यादा होता है।
खैर बॉलीवुड के कलाकार हिंदी की स्क्रिप्ट पढ़ने से मना कर रहे हैं। इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे ये लिखने की सूझी। इसी खबर में गुलजार ने कहा था कि ये तो बहुत पहले से होता आ रहा है। लेकिन, मुझे जो लगता है कि ये पहले से होता आ रहा है या इसमें कलाकारों का कितना दोष है इस पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या हम सचमुच ये मान चुके हैं कि हिंदी छोटे लोगों की, हल्का काम करने वालों की भाषा है। जो भी हिंदी बोले उसे छोटे दर्जे का मानना और फिर उस अपने से मान लिए छोटे दर्जे की जमात के लिए हिंदी समझना-बोलना कहां तक ठीक है। यहां तक कि अपने घर में पाले जानवरों से भी ये अंग्रेजीदां लोगों की जमात अंग्रेजी में ही बात करती है क्योंकि, इनके घर के बच्चे उन जानवरों से भी बात करते हैं उनके साथ खेलते हैं। इसलिए घर के पालतू कुत्ते से हिंदी में बातकर ये अंग्रेजीदां लोग अपने बच्चों को बिगाड़ना नहीं चाहते, डर ये कि कहीं बच्चा भी हिंदी न बोलने लगे।
हिंदी की मुश्किल शब्द का कई बार में इस्तेमाल कर चुका हूं। लेकिन, इसका कतई ये आशय नहीं है कि मैं हिंदी की सिर्फ दारुण कथा लेकर बैठ गया हूं। दरअसल मैं सिर्फ इस बात की तरफ इशारा करना चाह रहा हूं कि क्या हम अपनी भाषा को छोटे लोगों की भाषा समझकर अपनी खुद की इज्जत मिट्टी में नहीं मिला रहे हैं। अंग्रेजी आना और बहुत अच्छे से आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन, हिंदी के शब्दों में अंग्रेजी मिलाकर रोमन में लिखी हिंदी बोलने वाले हिंदी का अहसास कहां से लाएंगे क्योंकि, उसमें तो अंग्रेजी की feel आने लगती है। ये सही है कि अंग्रेजी के विद्वान बन जाने से दुनिया में हमें बहुत इज्जत भी मिली और दुनिया से हमने बहुत पैसा भी बटोर लिया। लेकिन, अब हम इतने मजबूत हो गए हैं कि दुनिया हमारी भाषा, हमारे देश का भी सम्मान करने के लिए मजबूर हो। और, ये तभी हो पाएगा जब हम खुद अपनी भाषा अपने देश का सम्मान करें। चूंकि, मीडिया का ही सबसे ज्यादा असर लोगों पर होता है और मीडिया में भी खबर देने वाले चैनल और फिल्मी कलाकार लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए इस सम्मान को समझने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। वैसे मुझे भी कभी-कभी लगता है कि जब अंग्रेजी से ही तरक्की मिल रही हो तो, हम क्यों बोलें हिंदी।
वैसे हिंदी की ये मुश्किल सिर्फ फिल्मी कलाकारों के मामले में नहीं है। बात यहीं से आगे बढ़ा रहा हूं जबकि, ये बात बहुत आगे बढ़कर ही यहां तक पहुंची है। देश में सभी चीजों को सुधारने का ठेका लेने वाला हिंदी मीडिया भी हिंदी से परेशान है। अब आप कहेंगे कि हिंदी चैनलों में हिंदी क्यों परेशान है। हिंदी का चैनल, देखने वाले हिंदी के लोग, बोलने-देखने-लिखने वाले हिंदी के लोग, फिर क्या मुश्किल है। दरअसल मुश्किल ये सीधे हिंदी बिक नहीं रही थी (अंग्रेजी में कहते हैं कि हेप नहीं दिख रही थी)। इसलिए हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगने लगा। शुरुआत में हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगना शुरू हुआ जब ज्यादा बिकने लगा तो, अंग्रेजी में हिंदी का मसाला भर बचा रह गया। हां, नाम हिंदी का ही था।
वैसे ये मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है कि फिल्मी कलाकार या कोई भी बड़ा होता आदमी या औरत (बिगीज) अब हिंदी बोलना नहीं चाहते। हिंदी वही बोल-पढ़ रहे हैं जो, और कुछ बोल-पढ़ नहीं सकते। लेकिन, दुखद तो ये है कि हिंदी वो भी बोल-पढ़ नहीं रहे हैं जो, हिंदी की ही खा रहे हैं। हिंदी खबरिया चैनलों का हाल तो ये है कि अगर बहुत अच्छी हिंदी आपको आती है तो, यहां नौकरी (जॉब) नहीं मिलने वाली। गलती से नौकरी मिल भी गई तो, कुछ ही दिन में ये बता-बताकर कि यहां खबर लिखो-साहित्य मत पेलो, कह-कहकर हिंदी का राम नाम सत्य करवा दिया जाएगा वो भी आपसे ही। जिस दिन पूरी तरह राम नाम सत्य हो गया और हिंदी के ही शब्दों-अक्षरों-वाक्यों पर आप गड़बड़ाने लगे तो, चार हिंदी में गड़बड़ हो चुके लोग मिलकर सही हिंदी तय करेंगे और ये तय हो जाएगा कि अब यही लिखा जाएगा भले ही गलत हो। और, जब मौका मिला थोड़ी बची-खुची सही हिंदी जानने वाले बड़े लोग आपको डांटने का मौका हाथ से जानने नहीं देंगे।
मैं फिर लौटता हूं कि हिंदी की मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है। हिंदी चैनलों में भर्ती (रिक्रूटमेंट) होती है तो, अगर उसने u know.... i hope ... so.. i think कहकर अपने को साबित (प्रूव) कर दिया तो, फिर नौकरी (जॉब) पक्की। समझाया ये जाएगा कि थोड़ी हिंदी कमजोर है लेकिन, लड़की या लड़के को समझ बहुत अच्छी है। हिंदी तो, पुराने लोग मिलकर ठीक कर देंगे। वैसे जिनके दम पर नई भर्ती को हिंदी सिखाने का दम भरा जा रहा होता है उनमें हिंदी का दम कितना बचा होता है ये समझ पाना भी मुश्किल है। वैसे हिंदी के इस दिशा में जाने के पीछे वजह जानने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जगह के रिसेप्शन को भी पार (क्रॉस) करने के लिए अंग्रेजी ही काम आती है। सिर्फ हिंदी के भरोसे अगर आप घर से बाहर निकले हैं तो, मन में ही हिंदी को संजोए हुए चुपके से ही रिसेप्शन पार कर गए तब तो ठीक है नहीं तो, हिंदी के सवाल के जवाब में अंग्रेजी में may i help u आपको फिर से बाहर कर सकता है। मेरे जैसे हिंदी जानने-बोलने-पढ़ने-समझने-लिखने वालों की मंडली तो आपस में मजाक भी कर लेती है कि किसी मॉल या किसी बड़ी-छोटी जगह के रिसेप्शन पर या किसी सेल्स गर्ल से बात करने के लिए बीवी को आगे कर ही काम निकलता होगा। क्योंकि, बड़े मॉल्स, स्टोर्स में तो कुछ खऱीदने के लिए जेब में पैसे होने ही जितना जरूरी है कि आपमें अंग्रेजी में बात करने का साहस हो। शायद ये साहस लड़कियों में कुछ ज्यादा होता है।
खैर बॉलीवुड के कलाकार हिंदी की स्क्रिप्ट पढ़ने से मना कर रहे हैं। इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे ये लिखने की सूझी। इसी खबर में गुलजार ने कहा था कि ये तो बहुत पहले से होता आ रहा है। लेकिन, मुझे जो लगता है कि ये पहले से होता आ रहा है या इसमें कलाकारों का कितना दोष है इस पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या हम सचमुच ये मान चुके हैं कि हिंदी छोटे लोगों की, हल्का काम करने वालों की भाषा है। जो भी हिंदी बोले उसे छोटे दर्जे का मानना और फिर उस अपने से मान लिए छोटे दर्जे की जमात के लिए हिंदी समझना-बोलना कहां तक ठीक है। यहां तक कि अपने घर में पाले जानवरों से भी ये अंग्रेजीदां लोगों की जमात अंग्रेजी में ही बात करती है क्योंकि, इनके घर के बच्चे उन जानवरों से भी बात करते हैं उनके साथ खेलते हैं। इसलिए घर के पालतू कुत्ते से हिंदी में बातकर ये अंग्रेजीदां लोग अपने बच्चों को बिगाड़ना नहीं चाहते, डर ये कि कहीं बच्चा भी हिंदी न बोलने लगे।
हिंदी की मुश्किल शब्द का कई बार में इस्तेमाल कर चुका हूं। लेकिन, इसका कतई ये आशय नहीं है कि मैं हिंदी की सिर्फ दारुण कथा लेकर बैठ गया हूं। दरअसल मैं सिर्फ इस बात की तरफ इशारा करना चाह रहा हूं कि क्या हम अपनी भाषा को छोटे लोगों की भाषा समझकर अपनी खुद की इज्जत मिट्टी में नहीं मिला रहे हैं। अंग्रेजी आना और बहुत अच्छे से आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन, हिंदी के शब्दों में अंग्रेजी मिलाकर रोमन में लिखी हिंदी बोलने वाले हिंदी का अहसास कहां से लाएंगे क्योंकि, उसमें तो अंग्रेजी की feel आने लगती है। ये सही है कि अंग्रेजी के विद्वान बन जाने से दुनिया में हमें बहुत इज्जत भी मिली और दुनिया से हमने बहुत पैसा भी बटोर लिया। लेकिन, अब हम इतने मजबूत हो गए हैं कि दुनिया हमारी भाषा, हमारे देश का भी सम्मान करने के लिए मजबूर हो। और, ये तभी हो पाएगा जब हम खुद अपनी भाषा अपने देश का सम्मान करें। चूंकि, मीडिया का ही सबसे ज्यादा असर लोगों पर होता है और मीडिया में भी खबर देने वाले चैनल और फिल्मी कलाकार लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए इस सम्मान को समझने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। वैसे मुझे भी कभी-कभी लगता है कि जब अंग्रेजी से ही तरक्की मिल रही हो तो, हम क्यों बोलें हिंदी।
Sunday, May 27, 2007
हमें गुलामी ज्यादा पसंद आती है
भारत के ज्यादातर लोगों को अभी गुलामी ज्यादा पसंद आती है। गुलामी की प्रवृत्ति यानी किसी की जय-जयकार से ही काम बन सकता है, ऐसा सोचने वाले लोग बहुत ज्यादा हैं। और, ये बात हर दूसरे-चौथे दिन अखबारों-टलीविजन चैनलों में दिखने वाली खबरों से साबित होती रहती है। कल की दो बड़ी खबरें हैं। पहली खबर है वसुंधरा राजे अन्नपूर्णा देवी बन गई हैं और राजे के ही राज में आडवाणी, राजनाथ और अटल बिहारी को भी ब्रह्मा, विष्णु और महेश बनने का मौका मिल गया। वरना तो, प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी अटल बिहारी बाजपेयी मानुष भर ही रहते। राजे के राज में भगवान बनने का मौका मिला तो, फिर वो क्यों कुछ कहते, भगवान भला भक्तों को कुछ कहते हैं।
ये थी बीजेपी राज की खबर। दूसरी खबर है महाराष्ट्र के कांग्रेसी राज से। विलासराव देशमुख को भी कुछ भक्त मानस वाली जनता ने भगवान श्रीकृष्ण बना दिया। और, इस भगवान के जन्मदिवस के समारोह में बॉलीवुड की अप्सरा थोड़ा देर से पहुंची तो, भक्त मानस वाली जनता नाराज हो गई और अप्सरा पर चप्पलें फेंकनी शुरू कर दी।
खैर, ये दोनों खबरें बहाना भर हैं मैं जो बात रखने की कोशिश कर रहा हूं वो, ये कि भारत के ज्यादातर लोगों को अभी भी जय-जयकार से ही आगे जाने का रास्ता दिख रहा है। यानी गुलामी में ही राजसी ठाट के मजे लिए जा सकते हैं ये सोचने वाले बहुतेरे हैं। चलिए ये बात कैसे साबित होती है। वसुंधरा को अन्नपूर्णा देवी का दर्जा देने वाले कौन हैं ये हैं राजस्थान में बीजेपी के एक विधायक। विधायकजी राजे को देवी सिर्फ इसलिए बता रहे हैं कि राजस्थान में उनका भी राज ठीक-ठाक चलता रहे। इसका विरोध भी हो रहा है यहां तक कि खुद बीजेपी नेता जसवंत सिंह की पत्नी ने राजे और आडवाणी, राजनाथ, अटल को देवी-देवता दिखाने वाले कैलेंडर के प्रकाशक के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला दर्ज करा दिया है। लेकिन, अब तक बीजेपी के किसी बड़े नेता ने राजे से ये नहीं पूछा कि उनके राज में ये क्या हो रहा है।
महाराष्ट्र में यही काम कांग्रेस के लोग कर रहे हैं। पूरी मुंबई में विलासराव देशमुख के अलग-अलग स्टाइल के चित्र किसी न किसी नेता के साथ चिपके हुए हैं। सभी उनको जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं। मंत्रालय जाने वाली सड़क पर ये ज्यादा इसलिए लगे हैं विलासराव भी अच्छे से जान जाएं कि उनकी गुलामी की मानसिकता वाले कितने लोग हैं जो, जय-जयकार कर उनसे कुछ पाना चाहते हैं। और, ये रोग सिर्फ राज्यों में नहीं है। कांग्रेस में तो इसलिए भी कोई कुछ नहीं बोलने वाला क्योंकि, गुलामी से लड़कर देश को आजाद कराने वाली कांग्रेस आजादी के बाद सिर्फ और सिर्फ गुलामी को पालने-पोसने में लगी है। गुलामी का ये चक्र इंदिरा गांधी-संजय गांधी के समय में चरम पर था।
आपातकाल के बाद इस मानसिकता के लोगों को थोड़ा धक्का लगा लेकिन, बाद में पता चला कि ये धक्का इसलिए था कि उन्हें गुलाम नहीं मिल रहे थे। जो, उनकी जय-जयकार करते। जब उन्हें ज्ञान हुआ कि बिना राज के राजा नहीं बना जा सकता। तो, ये राजा के खिलाफ दूसरे को तैयार करने लगे जो, पुराने गुलामों के खिलाफ नारे लगा सकें। खैर इन्हें सत्ता मिली नए गुलाम भी मिले। किसी गुलाम ने लालू प्रसाद यादव की भक्ति में लालू चालीसा लिखी। लेकिन, ये उसी समय हुआ जब लालू डेढ़ दशक तक एक राज्य के मुख्यमंत्री (राजा) थे। अब वसुंधरा औऱ विलासराव का राज है इसलिए अब दूसरे गुलामों ने वसुंधरा को देवी और विलासराव को देवता बना दिया।
खैर बात कांग्रेसियों की हो रही थी। आजादी की लड़ाई वाली पार्टी का नाम बदनाम कर रहे इन लोगों में गुलामी के सबसे ज्यादा अवशेष मिलते हैं जो, अक्सर उभर कर सामने आ जाते हैं। उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस को पिछली विधानसभा से तीन सीटें कम मिलीं तो, मीडिया में हल्ला मचा कि राहुल बाबा फेल हो गए। लेकिन, राहुल बाबा क्यों फेल होने लगे जब गुलामों की पूरी टीम किसी भी फेल होने को अपने सर लेने और कुछ भी बढ़िया होने पर राहुल बाबा का चमत्कार बताने के लिए तैयार खड़ी हो। फिर क्या था राजकुमार राहुल और साम्राज्ञी सोनिया ने कहा कि उन्होंने तो कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की पूरी कोशिश की लेकिन, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन किसी लायक न होने से पार्टी का ये बुरा हाल हुआ है। अब कोई इनसे ये पूछने वाला तो, था नहीं कि मैडम उत्तर प्रदेश का संगठन किसने बनाया है। लेकिन, कोई पूछता भी कैसे जब संगठन के लोगों ने ही ये मान लिया कि वही खराब हैं मैडम और राहुल बाबा ने तो बहुत मेहनत की थी।
मामला सिर्फ इतना भर नहीं है ये गुलामी का रोग इतना मजा देने लगा है कि हर जगह जय-जयकार करने वाले चापलूसों की फौज खड़ी है जो, जानते-बूझते भी किसी गलत को सही मानने को सिर्फ इसलिए तैयार खड़ी है कि इससे उसका गुलामी का रुतबा तो कायम है और उसके नीचे कुछ गुलाम मिल रहे हैं। विद्रोह सिर्फ वही कर रहा है जिससे नीचे के गुलाम छीने जा रहे हों। लेकिन, क्या इसी के लिए अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ इतना खून बहा। इतने शहीदों के घर दीपक बुझ गए।
नेताओं के जरिए ये बात मैंने रखने की कोशिश की। सिर्फ इसलिए कि ये लोग ज्यादा जाने समझे जाते हैं। और, इससे लोगों की समझ में बात जल्दी आएगी। लेकिन, सच्चाई यही है कि सिर्फ राजनीतिक दलों में ही नहीं ज्यादातर ऑफिसों में और दूसरी जगहों पर भी गुलामों, जय-जयकार करने वालों की फौज खडी है। इसीलिए विलासराव, वसुंधरा, राहुल, सोनिया जैसे लोग गुलामों को पाल-पोसकर बड़ बनते जा रहे हैं। और, ब़ड़े बनने की इच्छा तो सबमें होती है। तो, सब गुलाम बन रहे हैं, गुलाम बना रहे हैं औऱ बड़े बन रहे हैं।
ये थी बीजेपी राज की खबर। दूसरी खबर है महाराष्ट्र के कांग्रेसी राज से। विलासराव देशमुख को भी कुछ भक्त मानस वाली जनता ने भगवान श्रीकृष्ण बना दिया। और, इस भगवान के जन्मदिवस के समारोह में बॉलीवुड की अप्सरा थोड़ा देर से पहुंची तो, भक्त मानस वाली जनता नाराज हो गई और अप्सरा पर चप्पलें फेंकनी शुरू कर दी।
खैर, ये दोनों खबरें बहाना भर हैं मैं जो बात रखने की कोशिश कर रहा हूं वो, ये कि भारत के ज्यादातर लोगों को अभी भी जय-जयकार से ही आगे जाने का रास्ता दिख रहा है। यानी गुलामी में ही राजसी ठाट के मजे लिए जा सकते हैं ये सोचने वाले बहुतेरे हैं। चलिए ये बात कैसे साबित होती है। वसुंधरा को अन्नपूर्णा देवी का दर्जा देने वाले कौन हैं ये हैं राजस्थान में बीजेपी के एक विधायक। विधायकजी राजे को देवी सिर्फ इसलिए बता रहे हैं कि राजस्थान में उनका भी राज ठीक-ठाक चलता रहे। इसका विरोध भी हो रहा है यहां तक कि खुद बीजेपी नेता जसवंत सिंह की पत्नी ने राजे और आडवाणी, राजनाथ, अटल को देवी-देवता दिखाने वाले कैलेंडर के प्रकाशक के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला दर्ज करा दिया है। लेकिन, अब तक बीजेपी के किसी बड़े नेता ने राजे से ये नहीं पूछा कि उनके राज में ये क्या हो रहा है।
महाराष्ट्र में यही काम कांग्रेस के लोग कर रहे हैं। पूरी मुंबई में विलासराव देशमुख के अलग-अलग स्टाइल के चित्र किसी न किसी नेता के साथ चिपके हुए हैं। सभी उनको जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं। मंत्रालय जाने वाली सड़क पर ये ज्यादा इसलिए लगे हैं विलासराव भी अच्छे से जान जाएं कि उनकी गुलामी की मानसिकता वाले कितने लोग हैं जो, जय-जयकार कर उनसे कुछ पाना चाहते हैं। और, ये रोग सिर्फ राज्यों में नहीं है। कांग्रेस में तो इसलिए भी कोई कुछ नहीं बोलने वाला क्योंकि, गुलामी से लड़कर देश को आजाद कराने वाली कांग्रेस आजादी के बाद सिर्फ और सिर्फ गुलामी को पालने-पोसने में लगी है। गुलामी का ये चक्र इंदिरा गांधी-संजय गांधी के समय में चरम पर था।
आपातकाल के बाद इस मानसिकता के लोगों को थोड़ा धक्का लगा लेकिन, बाद में पता चला कि ये धक्का इसलिए था कि उन्हें गुलाम नहीं मिल रहे थे। जो, उनकी जय-जयकार करते। जब उन्हें ज्ञान हुआ कि बिना राज के राजा नहीं बना जा सकता। तो, ये राजा के खिलाफ दूसरे को तैयार करने लगे जो, पुराने गुलामों के खिलाफ नारे लगा सकें। खैर इन्हें सत्ता मिली नए गुलाम भी मिले। किसी गुलाम ने लालू प्रसाद यादव की भक्ति में लालू चालीसा लिखी। लेकिन, ये उसी समय हुआ जब लालू डेढ़ दशक तक एक राज्य के मुख्यमंत्री (राजा) थे। अब वसुंधरा औऱ विलासराव का राज है इसलिए अब दूसरे गुलामों ने वसुंधरा को देवी और विलासराव को देवता बना दिया।
खैर बात कांग्रेसियों की हो रही थी। आजादी की लड़ाई वाली पार्टी का नाम बदनाम कर रहे इन लोगों में गुलामी के सबसे ज्यादा अवशेष मिलते हैं जो, अक्सर उभर कर सामने आ जाते हैं। उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस को पिछली विधानसभा से तीन सीटें कम मिलीं तो, मीडिया में हल्ला मचा कि राहुल बाबा फेल हो गए। लेकिन, राहुल बाबा क्यों फेल होने लगे जब गुलामों की पूरी टीम किसी भी फेल होने को अपने सर लेने और कुछ भी बढ़िया होने पर राहुल बाबा का चमत्कार बताने के लिए तैयार खड़ी हो। फिर क्या था राजकुमार राहुल और साम्राज्ञी सोनिया ने कहा कि उन्होंने तो कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की पूरी कोशिश की लेकिन, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन किसी लायक न होने से पार्टी का ये बुरा हाल हुआ है। अब कोई इनसे ये पूछने वाला तो, था नहीं कि मैडम उत्तर प्रदेश का संगठन किसने बनाया है। लेकिन, कोई पूछता भी कैसे जब संगठन के लोगों ने ही ये मान लिया कि वही खराब हैं मैडम और राहुल बाबा ने तो बहुत मेहनत की थी।
मामला सिर्फ इतना भर नहीं है ये गुलामी का रोग इतना मजा देने लगा है कि हर जगह जय-जयकार करने वाले चापलूसों की फौज खड़ी है जो, जानते-बूझते भी किसी गलत को सही मानने को सिर्फ इसलिए तैयार खड़ी है कि इससे उसका गुलामी का रुतबा तो कायम है और उसके नीचे कुछ गुलाम मिल रहे हैं। विद्रोह सिर्फ वही कर रहा है जिससे नीचे के गुलाम छीने जा रहे हों। लेकिन, क्या इसी के लिए अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ इतना खून बहा। इतने शहीदों के घर दीपक बुझ गए।
नेताओं के जरिए ये बात मैंने रखने की कोशिश की। सिर्फ इसलिए कि ये लोग ज्यादा जाने समझे जाते हैं। और, इससे लोगों की समझ में बात जल्दी आएगी। लेकिन, सच्चाई यही है कि सिर्फ राजनीतिक दलों में ही नहीं ज्यादातर ऑफिसों में और दूसरी जगहों पर भी गुलामों, जय-जयकार करने वालों की फौज खडी है। इसीलिए विलासराव, वसुंधरा, राहुल, सोनिया जैसे लोग गुलामों को पाल-पोसकर बड़ बनते जा रहे हैं। और, ब़ड़े बनने की इच्छा तो सबमें होती है। तो, सब गुलाम बन रहे हैं, गुलाम बना रहे हैं औऱ बड़े बन रहे हैं।
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