Monday, September 21, 2009

ऐसे संस्कारों को आग लगा दो

ये दावा करते हैं कि हम संस्कृति रक्षक हैं, संस्कार बचा रहे हैं। संस्कृति और संस्कार बचाने के लिए बाकायदा इन्होने कानून बना रखे हैं। इक्कीसवीं सदी में जंगल जैसा या शायद अब तो जंगल कानून भी शर्मा जाए- ऐसा कानून है इनका। लेकिन, कमाल ये कि हम-आप दिल्ली या इनके देस से बाहर बैठकर चाहें जो कहें- इनको इनके देस में हर किसी का समर्थन मिला हुआ है।


ये देश के सबसे मॉडर्न दो शहरों दिल्ली और चंडीगढ़ के बीच में बसते हैं लेकिन, इनके संस्कार, संस्कृति ऐसी है कि ये अपने ही बच्चों, परिवारों का खून करते हैं। खबर तो, ये आई है कि एक प्रेम में पागल लड़की ने अपने पागल प्रेमी के साथ मिलकर परिवार के 7 सदस्यों को मार डाला। लेकिन, ये खबर जहां से आ रही है वो, है हरियाणा का रोहतक शहर। हरियाणा से ही इसके पहले एक और खबर आई थी कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद अपनी ही पत्नी को विदा कराने गए लड़के को संस्कृति-संस्कार के रक्षकों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अदालत का आदेश धरा का धरा रह गया। पुलिस तमाशा देखती रही।


अदालत का आदेश यहां क्यों धरा का धरा रह गया। इसे समझने के लिए दो चीजें एक तो, ये जाटलैंड है भले दिल्ली से सटा हुआ है लेकिन, अलग देस जैसे कायदे-कानून हैं यहां के। दूसरा इन जाटों की खाप पंचायत के सदस्य बने रहने के लिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवी सिंह तेवतिया इस कदर बावले हैं कि खाप पंचायतों को कानूनी मान्यता देने की बात कहते हैं। देवी सिंह मानते हैं कि ‘‘खाप नेता ही हैं जिनकी वजह से जाट पंरपरा बची हुई है”


अब जरा देखिए कि ये खाप कौन सी जाट परंपरा बचाने में लगी है। ये हर दूसरे-चौथे अपनी ही बेटियों को इसलिए मार देते हैं कि वो, अपनी पसंद के लड़के से शादी करना चाहती हैं। कुछ खबर बन जाती है तो, हम-आप जैसे जाटलैंड से बाहर के बेवकूफ निवासी इनके खिलाफ जहर उगलने लगते हैं, खबर नहीं बनती तो, ये जाट परंपरा बचाना निर्विरोध जारी रखते हैं। पता नहीं ये कौन सी परंपरा बचा रहे हैं कि इतने सालों से अपने ही बच्चों को ये संस्कार समझा नहीं पाते और हर बार इन्हें अपने बच्चों की जान लेकर ही परंपरा बचानी पड़ती है।


और, ये हुक्का गुड़गुड़ाते तथाकथित-स्वनामधन्य जाट परंपरा के रक्षक इतने मजबूत हैं कि इनके सामने वो, भी मुंह नहीं खोलता जिसे लोकतंत्र में सरकार कहा जाता है। हरियाणा के युवा सांसद दीपेंद्र हुड्डा – ये भी राहुल गांधी की बदलाव वाली यूथ सांसद ब्रिगेड के सक्रिय सदस्य हैं - कह रहे हैं कि “खाप पंचायत की स्थानीय परंपरा और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए”। ऐसे ही सेंटिमेंट उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सहयोगी जाट किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के भी हैं। टिकैत तो जाने कितना बार खबरों में एलानिया कह चुके हैं आपके देस और हमारे कानून अलग हैं। ये डर ही है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में लड़कियों को मारकर इज्जत बढ़ रही है।


इस बार एक लड़की ने पूरे परिवार को मारकर अपनी इज्जत बढ़ा ली है। इतने सालों से जाट परंपरा की रक्षा देखते-देखते अब नई पीढ़ी खाप पंचायतों से काफी कुछ सीख चुकी है। खाप पंचायतों के डर से मां-बाप खुद अपने बच्चों के खाने में पेस्टिसाइड मिलाकर उसे मौत की नींद सुला देते थे। इस बार बच्चों ने यही परंपरा अपने परिवार के साथ निभा दी। हरियाणा से आई ये दिल को चीर कर रख देने वाली खबर एक अति के खिलाफ दूसरी। एक अति ये कि हरियाणा में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने, उनके प्रेम विवाह पर जिंदा जला देने से लेकर, जहर देने, पेस्टिसाइड देने और प्रेमी-प्रेमिका को पीट-पीटकर मार जालने की खबर।


दूसरी अति की खबर आज ये है कि एक 19 साल की लड़की ने अपने पूरे परिवार को इसलिए खत्म कर दिया कि वो, लोग उसे प्रेमी के साथ शादी की इजाजत नहीं दे रहे थे। शादी की इजाजत इसलिए नहीं दी जा रही थी कि लड़का-लड़की एक ही गोत्र के थे।


संस्कृति-संस्कार के रक्षकों जिस तरह से तुम लड़कियों को मार रहे हो- उसमें कोई रास्ता तो बच नहीं रहा है। तुम्हारा पेस्टिसाइड का साइलेंट किलर हथियार उनके हाथ भी लग गया है। आखिरकार वो, तुम्हारी परंपरा सीख गए हैं। अरे– कम से कम तुम लोग तो चेतो जो, अपने ही बच्चों की मौत के जिम्मेदार बने हो। लोकतंत्र के औजार का इस्तेमाल करो, समाज- खाप पंचायत के डर से बच्चों को मारने वालों चुपचाप उसके पक्ष में वोट करो जो, खाप पंचायत को कानूनी मान्यता दिलाने नहीं, इन्हें खत्म कराने की बात करे। अभी तो, कोई बात करने से भी डरेगा लेकिन, खाप पंचायतों के खिलाफ तो, खड़े होना ही होगा। इन्हें बर्दाश्त हम नहीं कर सकते। अपने लिए भी-अपनी आने वाली पाढ़ियों के लिए भी। अब इनको कौन समझाए कि जब हम ही नहीं बचेंगे तो, हमारी परंपरा कौन बचाएगा। खाली हुक्के देश के संग्रहालयों की शोभा बढ़ाएंगे।

15 comments:

  1. हर्षवर्हन जी, बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है ये. 21 वीं शताब्दी में भी समाज के कुछ् हिस्से परम्परा के नाम पर दकियानूस बने हुये हैं और शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं दीखता.

    ReplyDelete
  2. संस्कृति-संस्कार के रक्षकों जिस तरह से तुम लड़कियों को मार रहे हो- उसमें कोई रास्ता तो बच नहीं रहा है।
    बिल्‍कुल सही कहना है आपका !!

    ReplyDelete
  3. बहुत सही लेख लिखा है। टिकैत जी ने तो यहाँ तक भी कहा था कि केवल वैश्याएँ अपने साथी चुनती हैं। उन्होंने न जाने कितनी स्त्रियों को यह कहकर वैश्या कह डाला है। खैर शायद जिसे वे भली कहें उसे अपमानित महसूस करना चाहिए।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  4. आज आप को बहुत बहुत बधाइयाँ। इस समस्या पर खुल कर लिखने के लिए। यह कौन सी परंपरा है। शास्त्र कहते हैं कि गोत्रों का पुनर्निधारण तेरह पीढ़ियों के उपरांत हो जाता है। लेकिन यहाँ गांव की गांव में शादी संभव नहीं है। बदलाव दुनिया का नियम है। उत्पादन की तकनीक मनुष्य और समाज को बदलती है। यह संभव ही नहीं कि जाट बदलाव से अलग रह जाएँ। बाँध पानी को रोकता है। लेकिन जरूरत के माफिक ही। ज्यादह रोकने की कोशिश करे तो पानी बांध को तोड़ डालता है। यह वैसा ही प्रतिकार है। अब तो खापों को कुछ समझ आ जाना चाहिए।

    ReplyDelete
  5. ये जगहें कहां हैं - स्वात घाटी में?

    ReplyDelete
  6. Parmpra ke nam kisi ki hatya kar dena jaghnya apradh hai or Ye kisi bhi sabhya samaj ki parampra nahi ho sakti.......Easa bilkul nahi hai ki hariyana me sab kuch enhi khapo ke esaro per chalta hai......Kisi bhi rajnaitik ya samajik muddho per en khapo ne koi jan aandolan nahi kiya hai......Easa bhi nahi hai gotra khap ke kahane per koi bahut bada parivartan hua ho......

    ReplyDelete
  7. केन्द्र और राज्य सरकारों के नाक के नीचे संविधान की धज्जियाँ उड़ाती यह खाप पंचायत यदि अबतक क्रिआयाशील और प्रभावशाली है तो यह हमारे नेताओं और सत्ता की कुर्सियों पर बैठे संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए डूब मरने की बात है। यह कलंक-कथा प्रायः हर साल सुनायी देती है। जाने कितनी कहानियाँ अज्ञानता के अंधेरे में दफ़न हो जाती होंगी। इसका प्रतिकार अब उन्ही के बीच से आया है।

    यही अवसर है जब इस बुराई पर चारो ओर से हमला बोला जाय और इसका समूल नाश किया जाय। उसी प्रकार जैसे तमिल चीतों का हो गया है। राजनेताओं के संरक्षण पर लम्बे समय से अपनी काली करतूतों को चलाने वाला संगठन जब उन्हीं के लिए खतरा बन गया तो सत्ताशक्ति ने उनका समूल नाश कर दिया। इस खाप का खात्मा भी अब जरूरी है। वोट की खातिर इनका संरक्षण अब बन्द होना चाहिए।

    अब समय आ गया है जब सभी मिलकर इस आदमयुगीन जंगली कानून को मिटा दिया जाय। आपका यह आलेख उस दिशा में एक ठोस कदम माना जा सकता है।

    ReplyDelete
  8. हमेशा की तरह बिलकुल धारदार आलेख |

    क्या कहें हमारे देश मैं कानून तो बने ही टूटने के लिए है | और टूटे भी क्यों नहीं, जब भारत का संविधान भारत का कम और ब्रिटेन या अन्य देशों के कानूनों की copy ज्यादा हो तो .... |

    खैर... , ऐसी घटनाओं का विरोध जारी रहना चाहिए ताकि भविष्य मैं दुहराई ना जाए |

    ReplyDelete
  9. संस्कृ्ति,संस्कार और परम्परा जैसे शब्दों को तो सिर्फ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है......नियम और परम्पराएं सदैव समय के साथ बदल जाया करते हैं। ये नहीं कि आज के युग में भी पुरातनपंथी परम्पराओं को ढोते चले जाएं.......

    ReplyDelete
  10. dhaar daar lekh,sateek baat se dakiyanoosiapn par chot.

    ReplyDelete
  11. बिल्कुल सही

    ReplyDelete
  12. आख़िर हम बुजुर्गों का सम्मान करना कब सीखेंगे? ये हमारे बुजुर्ग हैं इन्होने हममे से एक दो की जान भी ले ली तो क्या बिगड़ गया? समाज की परंपरा और पगड़ी बचाए रखने के ऐवज मे उनका इतना तो हक़ बनता है :)

    ReplyDelete
  13. देखिए प्यार तो गोत्र देखता नहीं है, और न ही किसी खाप से डरता है.. मैं तो कहता हूं इस घटना की ही तरह दस पंद्रह खुद को संस्कृति का रखवाला बताने वाले इस तरह मारे जाएंगे, तो समझ आ जाएगा। इतने साल इन लोगों ने जहर फैलाया है, अब जब सांप अपने ही जहर से मरने लगेगा फिर देखेंगे कि कितनी हिम्मत है खाप पंचायत और उसके गद्दीनशीनों में.. वैसे भी किसी की बेटी को मार देने का आदेश देने में दिल में कहां दर्द होता है, और वो भी जब हजारों बेवकूफ आपकी बात पर जान लेने को तैयार हों.. हर्ष जी ने सही लिखा, ये सचमुच दुखद और शर्मनाक था कि पुलिस के साथ अपनी बीवी को लेने पहुंचे युवक को मार दिया गया.. और इस तालिबानी घटना के खिलाफ सरकार ने क्या किया.. कुछ नहीं क्योंकि इन्ही वोटों से वो सरकार बनी है जो केंद्र में और राज्य में चल रही है... सेंट लगाकर डंडा मारने से कुछ नहीं होगा.. पूरा डंडा घुसा दें.. फिर देखें पंचायत होगी कि पंचायतनामा... वर्ना मरने दें बेचारी प्यार को सबकुछ मानने वाली अभागी लड़कियों को..

    ReplyDelete
  14. Anonymous11:38 AM

    hey guys!
    plz join this community on orkut to protest against these dictators:
    http://www.orkut.co.in/Main#Community?rl=cpp&cmm=98220745

    thnx!

    ReplyDelete

भारत के नेतृत्व में ही पर्यावरण की चुनौती का समाधान खोजा जा सकता है

हर्ष   वर्धन   त्रिपाठी  @MediaHarshVT पर्यावरण की चुनौती से निपटने के लिए भारत को नेतृत्व देना होगा विकसित होने की क़ीमत सम्...