ऐसे संस्कारों को आग लगा दो

ये दावा करते हैं कि हम संस्कृति रक्षक हैं, संस्कार बचा रहे हैं। संस्कृति और संस्कार बचाने के लिए बाकायदा इन्होने कानून बना रखे हैं। इक्कीसवीं सदी में जंगल जैसा या शायद अब तो जंगल कानून भी शर्मा जाए- ऐसा कानून है इनका। लेकिन, कमाल ये कि हम-आप दिल्ली या इनके देस से बाहर बैठकर चाहें जो कहें- इनको इनके देस में हर किसी का समर्थन मिला हुआ है।


ये देश के सबसे मॉडर्न दो शहरों दिल्ली और चंडीगढ़ के बीच में बसते हैं लेकिन, इनके संस्कार, संस्कृति ऐसी है कि ये अपने ही बच्चों, परिवारों का खून करते हैं। खबर तो, ये आई है कि एक प्रेम में पागल लड़की ने अपने पागल प्रेमी के साथ मिलकर परिवार के 7 सदस्यों को मार डाला। लेकिन, ये खबर जहां से आ रही है वो, है हरियाणा का रोहतक शहर। हरियाणा से ही इसके पहले एक और खबर आई थी कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद अपनी ही पत्नी को विदा कराने गए लड़के को संस्कृति-संस्कार के रक्षकों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अदालत का आदेश धरा का धरा रह गया। पुलिस तमाशा देखती रही।


अदालत का आदेश यहां क्यों धरा का धरा रह गया। इसे समझने के लिए दो चीजें एक तो, ये जाटलैंड है भले दिल्ली से सटा हुआ है लेकिन, अलग देस जैसे कायदे-कानून हैं यहां के। दूसरा इन जाटों की खाप पंचायत के सदस्य बने रहने के लिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवी सिंह तेवतिया इस कदर बावले हैं कि खाप पंचायतों को कानूनी मान्यता देने की बात कहते हैं। देवी सिंह मानते हैं कि ‘‘खाप नेता ही हैं जिनकी वजह से जाट पंरपरा बची हुई है”


अब जरा देखिए कि ये खाप कौन सी जाट परंपरा बचाने में लगी है। ये हर दूसरे-चौथे अपनी ही बेटियों को इसलिए मार देते हैं कि वो, अपनी पसंद के लड़के से शादी करना चाहती हैं। कुछ खबर बन जाती है तो, हम-आप जैसे जाटलैंड से बाहर के बेवकूफ निवासी इनके खिलाफ जहर उगलने लगते हैं, खबर नहीं बनती तो, ये जाट परंपरा बचाना निर्विरोध जारी रखते हैं। पता नहीं ये कौन सी परंपरा बचा रहे हैं कि इतने सालों से अपने ही बच्चों को ये संस्कार समझा नहीं पाते और हर बार इन्हें अपने बच्चों की जान लेकर ही परंपरा बचानी पड़ती है।


और, ये हुक्का गुड़गुड़ाते तथाकथित-स्वनामधन्य जाट परंपरा के रक्षक इतने मजबूत हैं कि इनके सामने वो, भी मुंह नहीं खोलता जिसे लोकतंत्र में सरकार कहा जाता है। हरियाणा के युवा सांसद दीपेंद्र हुड्डा – ये भी राहुल गांधी की बदलाव वाली यूथ सांसद ब्रिगेड के सक्रिय सदस्य हैं - कह रहे हैं कि “खाप पंचायत की स्थानीय परंपरा और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए”। ऐसे ही सेंटिमेंट उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सहयोगी जाट किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के भी हैं। टिकैत तो जाने कितना बार खबरों में एलानिया कह चुके हैं आपके देस और हमारे कानून अलग हैं। ये डर ही है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटलैंड में लड़कियों को मारकर इज्जत बढ़ रही है।


इस बार एक लड़की ने पूरे परिवार को मारकर अपनी इज्जत बढ़ा ली है। इतने सालों से जाट परंपरा की रक्षा देखते-देखते अब नई पीढ़ी खाप पंचायतों से काफी कुछ सीख चुकी है। खाप पंचायतों के डर से मां-बाप खुद अपने बच्चों के खाने में पेस्टिसाइड मिलाकर उसे मौत की नींद सुला देते थे। इस बार बच्चों ने यही परंपरा अपने परिवार के साथ निभा दी। हरियाणा से आई ये दिल को चीर कर रख देने वाली खबर एक अति के खिलाफ दूसरी। एक अति ये कि हरियाणा में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने, उनके प्रेम विवाह पर जिंदा जला देने से लेकर, जहर देने, पेस्टिसाइड देने और प्रेमी-प्रेमिका को पीट-पीटकर मार जालने की खबर।


दूसरी अति की खबर आज ये है कि एक 19 साल की लड़की ने अपने पूरे परिवार को इसलिए खत्म कर दिया कि वो, लोग उसे प्रेमी के साथ शादी की इजाजत नहीं दे रहे थे। शादी की इजाजत इसलिए नहीं दी जा रही थी कि लड़का-लड़की एक ही गोत्र के थे।


संस्कृति-संस्कार के रक्षकों जिस तरह से तुम लड़कियों को मार रहे हो- उसमें कोई रास्ता तो बच नहीं रहा है। तुम्हारा पेस्टिसाइड का साइलेंट किलर हथियार उनके हाथ भी लग गया है। आखिरकार वो, तुम्हारी परंपरा सीख गए हैं। अरे– कम से कम तुम लोग तो चेतो जो, अपने ही बच्चों की मौत के जिम्मेदार बने हो। लोकतंत्र के औजार का इस्तेमाल करो, समाज- खाप पंचायत के डर से बच्चों को मारने वालों चुपचाप उसके पक्ष में वोट करो जो, खाप पंचायत को कानूनी मान्यता दिलाने नहीं, इन्हें खत्म कराने की बात करे। अभी तो, कोई बात करने से भी डरेगा लेकिन, खाप पंचायतों के खिलाफ तो, खड़े होना ही होगा। इन्हें बर्दाश्त हम नहीं कर सकते। अपने लिए भी-अपनी आने वाली पाढ़ियों के लिए भी। अब इनको कौन समझाए कि जब हम ही नहीं बचेंगे तो, हमारी परंपरा कौन बचाएगा। खाली हुक्के देश के संग्रहालयों की शोभा बढ़ाएंगे।