Friday, July 31, 2009

ये फैसला थोड़ा और सही होना मांगता है

सड़क किनारे या किसी सार्वजनिक स्थान पर कोई भी धार्मिक स्थल न बने। मतलब ये कि ऐसी किसी जगह पर मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा न बने जो, रास्ते के बीच में हो। आम लोगों के लिए परेशानी की वजह बन जाए। सुप्रीमकोर्ट ने आज ये फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकार से चार हफ्ते में इस पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है।


ये फैसला आया है गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुनवाई के दौरान। गुजरात हाईकोर्ट ने रास्ते में सार्वजनिक स्थल पर लोगों के लिए परेशानी की वजह बनने वाले सभी अवैध मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च तोड़ने का आदेश दिया है। जिसे लागू कराने की वजह से नरेंद्र मोदी विश्व हिंदु परिषद और अपने ही सहयोगियों के निशाने पर हैं।


लेकिन, आज सुप्रीमकोर्ट का जो फैसला आया है उसमें अभी के ऐसे स्थलों को छूट दे दी गई है। सिर्फ इस दलील की वजह से कि अभी अवैध धार्मिक स्थलों को तोड़ने में कानून व्यवस्था की दिक्कत हो सकती है। लेकिन, मुझे लगता है कि इतने अच्छे फैसले में बस यही खामी रह गई है। क्योंकि, देश के लगभग हर शहर में ऐसे मंदिर, मस्जिद या दूसरे धार्मिक स्थल कही सड़क के बीच में तो, कहीं बस अड्डे के पास या फिर रेलवे पटरी के बगल में दिख जाते हैं।


हमारे शहर इलाहाबाद के सबसे संपन्न बाजार सिविल लाइन्स में ही सड़क पर ही एक मस्जिद है जहां सड़क पर नमाज अता की जाती है। और, इसकी वजह से उतने समय के लिए सड़क का वो हिस्सा बंद कर दिया जाता है। अब अगर सभी अवैध धार्मिक स्थलों को तोड़ा जाएगा बिना किसी भेदभाव के तो, फिर कानून व्यवस्था का हाल खराब क्यों होगा। और, होगा तो भई अवैध कामों को ठीक करने के लिए ही तो कानून है ना। इस्तेमाल करो उसका। जब मोदी अवैध मंदिर तुड़वाने का खतरा ले सकते हैं तो, फिर दिक्कत किसे है ...

Thursday, July 30, 2009

हमें गिरते जाना है

क्या ये सच नहीं है कि एक बड़े पत्रकार की विधवा आपके न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी वाले घर में करीब 2 साल रही और उसको अपने साथ पत्नी की तरह रखते थे


क्या ये भी सच नहीं है कि उस महिला के साथ आपके रिश्ते खराब होना तब शुरू हुए जब आपने उसकी बेटी पर भी बुरी नजर डालनी शुरू कर दी


एक सच ये भी है कि आप बाराखंभा रोड के सूरी अपार्टमेंट में अकसर जंगल विभाग, राजबाग के एक कर्मचारी की विधवा से मिलने जाते हैं


क्या ये सच नहीं है कि एक पूर्व न्यायाधीश की बेटी आपके साथ आपके बारामूला वाले घर में करीब दो महीने रहती थी


दिल्ली के एक सिनेमाघर के मालिक के बहन के साथ क्या आपके अवैध रिश्ते नहीं थे। जब आप दिल्ली जाते हैं तो, उसके दरियागंज वाले घर में रहते हैं


क्या आपने अपनी भतीजी को करीब 6 सालों तक अपने साथ companion बनाकर रखा था


ये सवाल किसी सच का सामना शो में किसी एंकर ने किसी सेलिब्रिटी या फिर किसी आम आदमी या औरत से नहीं पूछे हैं। ये सवाल पूछे गए हैं जम्मू कश्मीर विधानसभा में PDP नेता मुजफ्फर बेग से। सवाल पूछने वाले थे नेशनल कांफ्रेंस के विधायक नाजिर अहमद गुराजी। यहां कोई पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं था। ये सवाल पब्लिक के सामने नहीं बल्कि बेहद सम्मानित विधानसभा सदस्यों के सामने पूछे जा रहे थे। न पॉलीग्राफ था न जनता का दबाव। तो, मुजफ्फर बेग ने सवालों की लिस्ट फाड़कर हवा में उड़ा दी। लेकिन, सवाल तो उठ चुके हैं हवा में तो उड़ेंगे नहीं।



लगातार तीसरे दिन जम्मू कश्मीर विधानसभा ने गिरने के पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। पहले पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने शोपियां बलात्कार मामले पर स्पीकर का ही माइक तोड़ डाला। खैर, स्पीकर ने भी महबूबा के साथ कुछ सड़कछाप लफंगों जैसी भाषा में ही बात किया था- स्पीकर ने कहा मुझे पता है कि तुम किस खेत की मूली हो। इसके दूसरे ही दिन मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर 2006 के सेक्स स्कैंडल में शामिल होने का आरोप लगा दिया।



मेरा भी ये मानना है कि उमर अब्दुल्ला प्रतिभावान मुख्यमंत्री हैं। और, उनके ऊपर लगे ये आरोप बेबुनियाद हैं। लेकिन, CBI ने जो घंटे भर में ही चीते जैसी फुर्ती से बयान जारी किया कि उमर का नाम 2006 के सेक्स स्कैंडल में था ही नहीं वो, तो निश्चित तौर पर राहुल की यूथ ब्रिगेड में उमर की एंट्री का ही प्रताप था। वरा तो बहुत जरूरी मामलों में भी CBI का बयान कछुए की रफ्तार में भी आ जाए तो, बड़ी बात।


हिंदी फिल्म का एक गाना है कि हमें चलते जाना है ... बस चलते जाना। हमारे राजनेता भी कुछ उसी तर्ज पर कह रहे हैं हमें गिरते जाना है ... बस गिरते जाना ...



जम्मू कश्मीर की विधानसभा इस गिरते जाने का बस एक उदाहरण भर है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में जमकर चले जूते-चप्पल और माइक किसी के भी जेहन से धूमिल नहीं हो सकते। दूसरी विधानसभाओं में भी ऐसे हादसे आम हो चुके हैं। आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री पर पैसे लेकर प्रोजेक्ट देने का आरोप लगा था।


संसद भी इससे अछूती नहीं रही है। जनता दल यूनाइटेड के सांसद प्रभुनाथ सिंह और लालू प्रसाद के साले साधु यादव का संवाद भी किसी को भूला नहीं होगा। पैसे लेकर सवाल पूछना, काम के लिए सांसद-विधायक निधि जारी करने से पहले कमीशन दबा लेना ये सब तो अब ऐसी खबरें हो गई हैं। जिस पर अब जनता भी कान नहीं देती। वैसे जनता भी क्या कान देगी। वो भी तो नेताजी जैसा ही बनना चाहती है। और, तो और जातियों के लंबरदार खुद साबित करने में जुटे हैं कि वो नीचे गिर गए हैं, मान लो।


अब इतना गिर जाने के बाद कैसे साहस होता कि ये सांसद सच का सामना शो को बंद करा पाते। आखिर सच का सामना से पैदा हो रही गंध से ज्यादा नरक तो ये फैला ही रहे हैं। यही वजह रही होगी कि सच का सामना पर हड़काने के लिए स्टार प्लस को नोटिस जारी कर उसका सार्वजनिक प्रपंच तो रच दिया गया। लेकिन, बंद कमरे में जब बात हुई तो, सब एक ही धुन पर आंख बद कर लेट गए – हमें गिरते जाना है ... बस गिरते जाना

Monday, July 27, 2009

जो कुछ किया सिर्फ हमने किया

करगिल भारतीय इतिहास का ऐसा पड़ाव है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इस महान विजय दिवस को 10 साल पूरे हो गए और मीडिया ने जिस तरह से करगिल के शहीदों, जवानों पर खास कार्यक्रम पेश किए उससे निश्चित ही देश में देशप्रेम की भावना उफान मार रही होगी। मीडिया ने तो अपना काम बखूबी किया। लेकिन, मैंने कल और आज (26 और 27 जुलाई) के सारे अखबार देख डाले उसमें कहीं भी एक छोटा सा भी विज्ञापन सरकार की ओर से शहीदों की याद करने वाला नहीं दिखा।


अखबारों में आधे से ज्यादा पेज पर रविवार, सोमवार दोनों ही दिन करगिल के शहीदों की याद दिलाने वाली खबरें छपी थीं। टीवी चैनलों (हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही) पर तो शनिवार से ही करगिल के हर पहलू को याद दिलाने वाले खास शो चल रहे हैं। जिन्हें करगिल कम याद होगा। वो, भी उससे जुड़ गए होंगे। फिर क्या वजह है कि सरकार इसे याद करने से भी बच गई। हमें क्या सबको ही ये अच्छे से दिखता होगा कि कैसे गांधी परिवार में किसी की भी पुण्यतिथि हो तो, जाने कितने मंत्रालयों की तरफ से विज्ञापनों की कतार लगी होती है।



अरे छोटी सी उपलब्धि किसी मंत्रालय की होती है तो, एकाध पेज का विज्ञापन तो ऐसे ही चला जाता है। फिर देश को, देश के सम्मान को बचाने वाले इस दिन को सरकार कैसे भूल गई। क्या सिर्फ इसलिए कि ये महान विजय बीजेपी के शासनकाल में आई थी। क्या अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते जो कुछ भी देश के लिए हासिल किया वो, इतिहास में दर्ज नहीं होगा। क्या कांग्रेस ये तय करके बैठी है कि देश में आने वाली पीढ़ी को यही पता लगेगा कि आजादी से लेकर आज तक देश में जो कुछ हुआ है वो सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की सरकार ने किया है।


अगर ऐसा न होता तो, क्या वजह है कि करगिल विजय दिवस मनाने से सरकार डर रही है। अब तो चुनाव भी 5 साल बाद हैं। क्या वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय शुरू हुई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की रफ्तार बहुत कम कर दी गई है। ऐसा नहीं है कि यूपीए के समय सड़कें नहीं बन रही हैं। खूब बन रही हैं कि लेकिन, उस योजना की कामयाबी लोगों के जेहन से मिटाने की हर कोशिश ये सरकार कर रही है।


अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ही देश के सभी किनारों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना की ही तरह नदियों को जोड़ने की योजना का भी प्रस्ताव लाया था। अब उस पर कोई चर्चा ही नहीं है जबकि, अगर ये काम हो जाए तो, देश के एक हिस्से की बाढ़ और दूसरे हिस्से के सूखे के असंतुलन को बहुत कम किया जा सकता है। ऐसे ही चुनाव के समय चिदंबरम और प्रधानमंत्री तक बता रहे थे कि देश के पैसे को काला धन बनाकर जितना भी पैसा विदेश ले जाया गया है उसे सरकार हर हाल में वापस ले आएगी। लेकिन, अब उस पर कुछ सुनाई इसलिए नहीं दे रहा कि बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ये मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। बताइए न मैं गलत कह रहा हूं क्या ...

Saturday, July 25, 2009

तुम लोग बेवकूफी की बात कब बंद करोगे

तुम लोगों के पास थोड़ी भी अकल है या नहीं। या पुराना फंसा हुआ रिकॉर्ड हो गए हो तुम मीडिया वाले। जहां अंटक गए उसके आगे बढ़ ही नहीं पाते। दरअसल तुम लोगों का दोष भी नहीं है। तुम लोग क्या जानो कानून के बारे में। लेकिन, मैं तो जानता हूं इसलिए मेरी बात सुनो।



और, अब तो मैं गृहमंत्री भी हूं। बड़ा वकील हूं बड़ा मंत्री हूं। अब दुबारा मत पूछना कि अफजल को फांसी देने में हमारी सरकार देर क्यों कर रही है। चलो तुम बेवकूफों को मैं समझा देता हूं। अफजल गुरु को जब फांसी की सजा सुनाई गई है। और, अभी तक कुल फांसी के 28 मामले हैं। उन 28 मामलों में अफजल का नंबर 22वां है। तो, जाहिर है हमारी सरकार कानून तोड़कर तो अफजल को फांसी देगी नहीं। पहले 21 लोगों को फांसी चढ़ने दीजिए फिर अफजल की बात करिएगा।



अब कसाब का भी ट्रायल चल ही रहा है। कसाब के कबूलनामे के बाद भी विशेष अदालत के न्यायाधीश महोदय पता नहीं क्यों कह रहे हैं कि फैसला अभी नहीं सुनाया जाएगा। फैसले के लिए कसाब का कबूलनामा रिकॉर्ड के तौर पर रखा जरूर जाएगा। बड़ा एहसान मुंबई हमले में कसाब और दूसरे उसके साथी आतंकवादियों की गोली से मारे गए लोगों के परिजनों पर। मारे गए लोगों की आत्मा को भी इतनी शांति तो मिल ही रही होगी तो, आज नहीं तो कल आंतकवादी अंजाम तक पहुंचेंगे।



अरे लेकिन, इसमें मुश्किल है। क्योंकि, कसाब का नंबर तो अगर तुरंत फांसी सुनाई जाए तो, 29वां हो जाएगा। तो, पहले 21 फिर, 22वां अफजल, फिर 29वां कसाब फांसी चढ़ेगा। और, अपने गृहमंत्रीजी तो बहुत दुखी हैं। कह रहे हैं कि तुम मीडिया के बेवकूफों को तो पता नहीं होता। फांसी चढ़ने से ज्यादा कष्ट वो झेल रहे होते हैं जो, फांसी दिए जाने का इंतजार कर रहे होते हैं। वाह रे समझदार सरकार और उसके समझदार गृहमंत्री ... लेकिन, हम तो भइया बेवकूफ ही भले

Friday, July 24, 2009

तर्क नहीं बस इस सवाल का जवाब दे दीजिए

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा दिया कि उन्हें कॉण्टिनेंटल एयरलाइंस ने कोई माफीनामा नहीं भेजा है। अभी तक तो ये था कि कलाम साहब से एयरलाइंस ने माफीनामा मांग लिया है। लेकिन, ये भी बता दिया है कि आगे भी वो उनकी सुरक्षा जांच करने से बाज नहीं आएगी। अब तो लीजिए साहब ये साफ हो गया कि कलाम से एयरलाइंस ने माफी भी नहीं मांगी।

इस पर विपक्ष ने खूब हंगामा मचाया। एयरलाइंस का लाइसेंस रद्द करने की मांग तक कर डाली। लेकिन, अपने देश में अब विपक्ष की बात पर सत्ता पक्ष तो क्या कोई भी लोड नहीं लेता। नया फंडा है सिर्फ हंगामा करने के लिए कर रहे हैं। लोगों को ये बड़ा मुद्दा भी नहीं लगता। सुरक्षा जांच के नाम पर कलाम साहब के जूते उतरवाने और लाइन में खड़ा रखने की खबर पर मीडिया ने नया सवाल उछाला।


क्या ये वक्त नहीं आ गया है कि VIP को सुरक्षा जांच से छूट मिलनी बंद होनी चाहिए?


अमेरिकी एयरलाइंस कुतर्क कर रही है कि 'वो ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के नियमों के मुताबिक, एयरक्राफ्ट में चढ़ने से ठीक पहले एयरोब्रिज पर सुरक्षा जांच जरूरी है। और, अमेरिका से दुनिया भर में जाने वाली सभी उड़ानों में ये नियम लागू है। इस नियम से किसी को छूट नहीं है। '


मेरा सवाल ये है कि क्या हिलेरी क्लिंटन, बिल क्लिंटन, जॉर्ज बुश और अभी ओबामा की भी उसी तरह जांच होती है जैसे कलाम साहब की की गई है? मुझे नहीं लगता। देश में अचानक तटस्थ हो गए लोग ये सवाल तो उठा रहे हैं कि बेवजह छोटी सी बात पर विपक्षी हंगामा कर रहे हैं। लेकिन, क्या हमारी सरकार ये भी साहस दिखा सकती है कि अगली बार कोई भी अमेरिकी या कोई और तथाकथित VIP हमारे देश की किसी एयरलाइंस में सफर करे तो, उसकी भी सुरक्षा जांच उसी तरह से हो जैसे कलाम की हुई।

Thursday, July 23, 2009

दलितों के बलात्कार की कीमत मिलती रहेगी

माफ कीजिएगा मैं ये लिखना नहीं चाहता था। लेकिन, न्यूज एजेंसी PTI पर आई इस खबर के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। अपनी बहनजी की ही सरकार में दलितों का सम्मान बच नहीं पा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने तो एक बयान देकर खुद का और पार्टी का काम फिट कर लिया। लेकिन, उस बयान का झटका (अंग्रेजी में Aftereffect) एक के बाद एक लगता ही जा रहा है।


अब सुनिए जरा यूपी के गृह सचिव महेश कुमार गुप्ता क्या कहा रहे हैं। मैं PTI पर आया उनका बयान वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं- "Now, District Magistrates in presence of concerned SP and DIG will hand over cheques to Dalit rape victims"। यानी प्रदेश सरकार दलितों की इज्जत नहीं बचा पाएगी। इसीलिए दलितों के बलात्कार को वो एक सामान्य घटना मान रही है जो, होती रहेगी और इसीलिए इस पर कानून बना दिया कि अब पीड़ित दलितों को चेक जिलाधिकारी ही दे दिया करेंगे। यानी दलितों के साथ व्यवहार वैसा ही होता रहेगी जिसके खिलाफ लड़झगड़कर, मायावती के पीछे जय भीम-जय भारत का नारा लगाकर इन्होंने मायावती को राज्य का 'मुख्तार' बना दिया है। यानी इनकी पूज्य बहनजी इनके सम्मान बचाने का भरोसा नहीं दे सकतीं। लेकिन, बहनजी जगह-जगह पत्थर के हाथी जरूर लगवा रही हैं जिससे इन्हें लगे कि सत्ता में इनकी हिस्सेदारी बनी रहेगी।



अब ये भी जान लीजिए कि दलित लड़कियों-महिलाओं के बलात्कार की कीमत देने के तरीके में ये बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि, कांग्रेस अध्यक्ष रीता जोशी ने ये कह दिया था कि जितनी रकम सरकार पीड़ित दलितों के जख्म पर मरहम लगाने के लिए दे रही है उससे ज्यादा राज्य के पुलिस प्रमुख के हेलीकॉप्टर से वहां पहुंचने पर खर्च हो जाता है। खबर के मुताबिक, एक जून से DGP राज्य में 18 जगहों पर पीड़ित दलितों को चेक देने जा चुके हैं।


अब अगर राज्य सरकार को जरा भी शर्म होती तो, ऐसे नियम बदलने और उसकी जानकारी के लिए गृह सचिव को न तैनात करती। अच्छा तो ये होता कि मायावती ये दिखा देतीं कि पहले तो किसी दलित क्या राज्य की किसी लड़की अस्मिता से कोई खिलवाड़ नहीं कर पाएगा। और, उस कानून के बारे में उनका गृह सचिव मीडिया को बताता जिसे सुनकर किसी बदमाश, लफंगे की हिम्मत न होती कि किसी की इज्जत की ओर आंख उठाकर भी देखता।

Wednesday, July 22, 2009

सूर्यग्रहण के बहाने

360 साल बाद ... यानी अगर मैं अपने पूर्वजों की उम्र औसत 60 साल भी मानूं तो, मेरे पिताजी के पहले की 5 पीढ़ी ऐसा ग्रहण नहीं देख पाई होगी। और, अब आगे ये दिखेगा 123 साल बाद ... यानी मेरे बाद की कम से कम 2 पीढ़ी ऐसा सूर्यग्रहण नहीं देख पाएगी। खैर, मैं टीवी युग में हूं इसलिए मजे से अपने शहर इलाहाबाद (प्रयागराज) और बगल के वाराणसी (काशी) से लेकर बिहार के तारेगना और चीन तक का सूर्यग्रहण देख लिया।



पत्नी ने उठा दिया। सुबहै से बइठे-बइठे चैनल परिक्रमा के जरिए बहुत कुछ देखा। देखा कि कइसे तारेगना में बेचारे बस तारे ही गिनते रह गए-बादल के आगे न सूरज दिखा और न उसका गहन। पता नहीं कल ही सारे चैनलों पर ये स्टोरी खूब चली कि कैसे तारेगना देश का क्या दुनिया का एक बड़ा पर्यटन स्थल बन गया है। खैर मैं तो चाहकर भी रोज सुबह जल्दी नहीं उठ पाता। आज सूर्यग्रहण के बहाने उठ गया।


सुबह उठकर ब्लॉगरी का कोई इरादा नहीं थी। लेकिन, टीवी पर रवीश की कुछेक लाइनों ने पोस्ट लिखने की जरूरत पैदा कर दी। एनडीटीवी पर अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलाते-चलाते रवीश अचानक कुछ ज्यादा ही आलोचक अंदाज में आ गए। बोल दिया कि घाट पर बैठने वाले पोंगा पंडितों की कमाई पर FBT यानी फ्रिंज बेनिफिट टैक्स लगाया जाए। ये अनमोल सुझाव वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को रवीश ने फेसबुक के जरिए भी दिया है।



मैंने फेसबुक पर रवीश के इस सुझाव पर छोटा सा सवाल उठाया है - किन पंडितों पर ... किसी घाट पर गउदान कराने वाले या फिर आपके पास बैठे -टीवी स्टूडियो में विचरण करने वाले श्रेष्ठ गैर अंधविश्वासी पंडितों पर


मेरी टिप्पणी के ठीक नीचे फेसबुक किन्हीं महेंद्र गौर ने इस टिप्पणी के जरिए आरक्षण नीति पर भी तंज कसा है - जब आपको टीवी पर सुनते हैं तो आप फेसबुक और गूगल की बाते करते हैं! और यहाँ आप पहले से ही जमकर बेचारे पंडितो के पीछे पड़े हैं! अरे भाई सारी नौकरिया अगर रिजेर्वेशन की भेट चढ़ गयी तो बेचारा पंडित क्या सदी में एक बार भी नहीं कमाएगा!



खैर, मेरा जो अपना अनुभव है उससे तो रवीश का ये सुझाव सिर्फ अंधविश्वास की आलोचना और उसके लिए पंडितों को जिम्मेदार मानते हुए उन पर प्रहार करने की कोशिश में उछाला गया एक हास्यास्पद जुमला ही दिखता है। रवीश की रिपोर्टिंग देखकर मैं प्रसन्न होता हूं। लेकिन, अकसर मैंने ये देखा है कि रवीश किसी अच्छी चीज की मुहिम चलाते-चलाते टीवी पर पता नहीं किस पूर्वाग्रह के प्रभाव में आ जाते हैं।



आज सूर्यग्रहण के बहाने भी कुछ ऐसा ही हुआ। रवीश परंपरा को बचाने-समझने और अंधविश्वास पोंगापंथी को तोड़ने की शानदार मुहिम में लगे थे। लेकिन, अब जरा रवीश के इसी सुझाव को समझने की कोशिश करते हैं कि पंडितों की कमाई पर FBT लगना चाहिए। मैं जाति से ब्राह्मण हूं। अब मुझे तो अपने आसपास में गिने चुने ऐसे पंडित दिखे हैं जो, पंडिताई करके इतनी कमाई कर पाते हों कि वो बेचारे टैक्स की लिमिट तक में आ पाएं।


सत्यनारायण कथा कराने से लेकर भागवत कराने के महा आयोजन तक एक पंडित 50 रुपए से लेकर एक गाय, कुछ बर्तन, धोती-कुर्ता और कुछ सौ से लेकर हजार तक से ज्यादा दक्षिणा शायद ही कमा पाता हो। मैंने खुद देखा है हमारे पूरे समाज में शायद ही कोई अपनी लड़की उस परिवार में देना चाहता हो जो, पूरी तरह से पंडिताई की कमाई पर आश्रित हो। हां, रवीश की बगल में बैठे टीवी स्टूडियो-स्टूडियो घूमने वाले ज्योतिषी, पंडितों (जरूरी नहीं है कि वो जाति से भी ब्राह्मण हों) की कमाई संभवत: इतनी कमाई जरूर होती होगी। कुछ मठ-मंदिर के आचार्यों की भी कमाई ऐसी हो सकती है लेकिन, वो बमुश्किल एक परसेंट से ज्यादा होंगे।



रवीश कह रहे थे कि पंडितों की कमाई पर टैक्स लग जाए और उनके जैसे लोगों की कमाई पर FBT हट जाए। मैं ब्राह्मण भी हूं और रवीश जैसा भी यानी टीवी वाला जिनको मिलने वाली कुछ सुविधाओं पर FBT लगता है। मैं अगर पंडिताई करने वाला होता तो, मुझे नहीं लगता कि FBT क्या साधारण टैक्स वाली कतार में भी खड़ा हो पाता।



एक और बात जो, रवीश ने इलाहाबाद-बनारस के किनारे गउदान करते लोगों की फुटेज देखकर कही। गउदान करने से कुछ नहीं होगा। रवीश ने कहाकि दो-चार हजार की गाय देकर कोई अपने पाप नहीं काट सकता, चोरी किया है तो उसकी सजा से बच नही सकता। ये किसने कहाकि आप चोरी करके जाइए गउदान करिए और चारी की सजा से बच जाइए। पहली बात तो, अब शादी-मृत्यु जैसे अवसरों को छोड़ दें तो, गिने-चुने सामर्थ्यवान लोग ही गउदान करते हैं वरना तो, 11 से 101 रुपए में गाय की पूंछ पकड़कर पुण्य करने के भ्रम में जी लेते हैं।



अब सवाल ये है कि पर्यावरण-जमीन पर शानदार स्पेशल रिपोर्ट करने वाले रवीश गउदान की आलोचना करते समय इस तर्क को ज्यादा अच्छे से क्यों नहीं प्रतिस्थापित कर पाते कि गाय खरीदकर दान कीजिए। खुद भी गाय पालिए उसकी सेवा कीजिए और शुद्ध दूध पीजिए, स्वस्थ रहिए। अमूल, मदर डेयरी के पैकेट वाले दूध की चर्चा रवीश ने की। लेकिन, सोचिए गाय अगर बढ़ें तो, मिलावटी दूध की डराने वाली खबरों से भी हम बच पाएंगे। हां, दर्शक छूटने के डर से एनडीटीवी हेडलाइन की पट्टी में नदियों में पवित्र स्नान लिखना नहीं छोड़ पा रहे थे। आधुनिक तर्कों पर चलें तो आखिर ये भी तो मिथ ही है कि गंगाजल पवित्र है। वैसे वाराणसी, इलाहाबाद और कुरुक्षेत्र के घोर पारंपरिक और पता नहीं कितन अंधविश्वासी लोगों का नदियों किनारे जमावड़ा ही था जिसने सूर्यग्रहण के अद्भुत नजारे के बीच भी टीआरपी के लिए अपनी पूरी जगह बना ली थी। शायद इन्हीं दर्शकों के चक्कर में रवीश और उनकी साथी एंकर बार-बार ये सफाई देने से नहीं चूकते कि परंपरा को समझिए-जानिए लेकिन, उसके साथ पनपे अंधविश्वास को खत्म करिए। ये बात एकदम सही है इस बात पर तो हम सब आपके साथ हैं।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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