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Wednesday, January 18, 2017

मां-बाप का मजबूत साथ होता, तो जायरा माफी न मांगती

हरियाणा में लड़कों के मुकाबले लड़कियां बहुत कम हैं। फिर भी हरियाणा में लड़कों की चाहत सबको है। और हरियाणा ही क्या हिन्दुस्तान में लड़कों की चाहत सबको ही है। महावीर सिंह फोगट की पत्नी भी लड़के की चाहत में मन्दिर जाने से लेकर मन्नत मांगने तक सब करती रहीं। और यही वजह रही होगी कि महावीर सिंह फोगट के 4 लड़कियां हुईं। लड़के की चाहत मन में रही होगी। पति-पत्नी के खुद भी और समाज के दबाव में भी। लेकिन, महावीर सिंह फोगट सिर्फ शरीर से ही पहलवान नहीं थे। फोगट कलेजे से भी पहलवान निकले। इस कदर कि अपनी सभी बेटियों को अखाड़े में उतार दिया। हरियाणा में पहलवानी खूब होती है। लेकिन, अपनी सभी बेटियों को अखाड़े में उतारने वाले महावीर सिंह फोगट शायद अकेले पहलवान होंगे। और यही असली पहलवान होने को साबित करता है। महावीर सिंह फोगट की जीवन चरित्र इतना ऊंचा उठ गया कि नीतेश तिवारी ने दंगल फिल्म की कहानी ही महावीर पर लिख डाली। इस फिल्म में महावीर सिंह फोगट का अभिनय आमिर खान ने किया है। इस फिल्म की खूब तारीफ हुई है। सिर्फ आमिर खान की ही तारीफ नहीं हुई महावीर सिंह फोगट बनने के लिए। फिल्म में गीता फोगट का अभिनय करने वाली जायरा वसीम की भी खूब तारीफ हुई है। लड़कों के गालियां देने पर पटककर पीटने पर सिनेमाहॉल और उसके बाहर भी खूब तालियां बजीं। असल पहलवान गीता फोगट का अभिनय भर कर लेने से लोगों ने उसे असली गीता फोगट मान लिया। और उसे अपना आदर्श मानने लगे। लेकिन, जायरा वसीम ने खुद ही लोगों से कहाकि वो आदर्श नहीं है। ये अलग बात है कि ये कहने के पीछे जायरा का बड़प्पन नहीं था। जायरा की बुजदिली थी। जायरा के 16 साल के होने की बात कहकर उसकी बुजदिली को हल्का करने के भी तर्क आने लगे हैं। दरअसल जायरा पर्दे पर पहलवानी से इतनी प्रसिद्ध हुई कि जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उसे मिलने के लिए बुला लिया। बस यही मिलन कश्मीर घाटी के अलगाववादी एजेंडे को चलाने वालों को रास नहीं आया। फेसबुक से लेकर सोशल मीडिया पर जायरा को जमकर गालियां दी गईं। इस कदर कि जायरा को हारकर माफी मांगनी पड़ी। माफी मांगने के साथ जायरा ने कहाकि वो कश्मीर को नौजवानों का आदर्श नहीं हैं। जायरा ने डरकर यहां तक लिखा कि वो नहीं चाहते कि लोग उनके रास्ते पर चलें। जायरा ने ये भी माफीनामे में ये भी लिखा मैं खुद उस पर गर्व नहीं करती, जो मैं कर रही हूं। इसलिए नौजवानों को असली आदर्शों के रास्ते पर चलना चाहिए। जायरा ने खुद के 16 साल की होने के आधार पर भी लोगों से माफ कर देने की विनती की है।

आखिर वो कौन लोग हैं, जिनसे जायरा ने इस तरह से माफी मांगी। बताया जा रहा है कि फक्र-ए-कश्मीर और ऐसे कई दूसरे समूहों के जरिये जायरा को गालियां दी गईं और उसे माफी मांगने पर मजबूर किया गया। इन समूहों के जरिये कहा जा रहा था कि जायरा ने धर्म के खिलाफ काम किया है। धमकियां दी जा रही थीं। इन धमकियों का असर इस कदर था कि जायरा ने अपने माफीनामे का अंत अल्लाह के रास्ता दिखाने और रहम करने की गुजरिश के साथ किया है। पर्दे की गीता फोगट सोशल मीडिया पर पड़ी गालियों से डरी या फिर उसे असल में भी धमकाया गया और ढेर सारी गालियां दी गईं। ये जान लेने से बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन, ये जानने की जरूरत है कि जायरा वसीम के मां-बाप की इस बारे में क्या राय है। ये राय शायद ही पता चले। लेकिन, जो दिख रहा है वो यही है कि जायरा के मां-बाप उसके साथ खड़े नहीं हुए। बल्कि, शायद उन धमकियों से डरे मां-बाप ने जायरा को और डराया होगा। कश्मीर में इससे पहले भी प्रगाश बैंड को अपना संगीत की यात्रा बंद करनी पड़ी थी। कश्मीर को बांटने वाली ताकतें ये डर कश्मीरी नौजवानों के मन से निकलने नहीं देना चाहतीं। इसीलिए जायरा को इस कदर डराया गया कि पर्दे पर गीता फोगट जैसी साहसी लड़की का अभिनय करने वाली जायरा ने कश्मीरी नौजवानों से विनती कर डाली कि उसे आदर्श न माने। अच्छा है कि जायरा ने खुद ही ये कह दिया। कश्मीर के नौजवानों, वहां की लड़कियों का आदर्श असली वाली गीता फोगट है। और उसके पिता महावीर सिंह फोगट। वो गीता फोगट जो कह रही है कि उनके साथ भी समाज में ऐसी ढेर सारी मुश्किलें आईं और उनसे जूझकर वो आगे निकलीं। शायद जायरा भी आदर्श बन जाती। लेकिन, उसके मां-बाप उसके साथ नहीं दिखे। जबकि, गीता, बबिता फोगट के साथ उसके पिता महावीर सिंह फोगट और मां दया कौर खड़े रहे। इसीलिए किसी लड़के में असल जिंदगी में भी ये साहस नहीं है कि फोगट बहनों को गाली देकर बिना हड्डियां तुड़वाए निकल जाए। महावीर सिंह फोगट के अपनी 4 बेटियां और भाई की 2 बेटियां हैं। सभी 6 बेटियां पहलवान हैं। गीता, बबिता और विनेश फोगट तो अंतर्राष्ट्रीय पहलवान हैं। लेकिन, फोगट बहनों की सारी पहलवानी का दम पहलवान महावीर सिंह फोगट के दम से है। महावीर ने दम न दिखाया होता तो गीता, बबिता भी लड़कों, समाज की गालियां-ताने सुनकर घर बैठ गए होते या फिर जायरा की तरह माफी मांगने को मजबूर हो गए होते। इसलिए बुजदिली जायरा की नहीं है। बुजदिली जायरा के मां-बाप की है, परिवार की है। बताया जाता है कि जायरा के बैंकर पिता और शिक्षक मां जायरा के मुंबई जाने के खिलाफ थे। फिल्मी करियर के खिलाफ थे। लेकिन, जिद पर अड़ी जायरा नहीं मानी। मजबूरी में जायरा का वो फैसला उन्हें स्वीकार करना पड़ा। लेकिन, समाज का आदर्श बनने की दहलीज पर खड़ी जायरा के साथ उसके मां-बाप नहीं खड़े हो सके। नतीजा जायरा बुजदिल साबित हो गई। बेटियों के साथ मां-बाप खड़े रहेंगे, तो किसी बेटी को जायरा की तरह माफी नहीं मांगनी पड़ेगी।
(ये लेख quinthindi पर छपा है)

Sunday, March 15, 2015

हिंदुस्तान के भले के लिए बीजेपी-पीडीपी गठजोड़ बने रहना जरूरी

मसरत आलम की रिहाई के बाद लगा कि अब जम्मू कश्मीर के साथ देश का भ्रम भी बना रहने वाला है। वो भ्रम ये कि देश में भारतीय जनता पार्टी सिर्फ हिंदुओं की पार्टी है और इसका किसी भी ऐसी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं हो सकता जो, मुसलमानों के वोट के भरोसे ही राजनीति करती हो। मतलब साफ है कि ये भ्रम नहीं पक्की धारणा बन चुकी है कि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ हिंदुओं और वो भी कट्टर किस्म के हिंदुओं के ही मतों से जीतने वाली पार्टी है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को गठजोड़ करने के लिए पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना के अलावा देश में कोई पक्का सहयोगी नहीं मिल सकता। सहयोगी मिलेगा भी तो तभी जब तक भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के सामने कमजोर गठजोड़ की अगुवा हो, जिसमें राज्य की लड़ाई की वजह से जनता दल यूनाइडेट जैसे सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को मिलते हैं। यही कुल मिलाकर देश की राजनीतिक स्थिति थी और काफी हद तक अभी भी है। इसीलिए 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद बीजेपी को विपक्षी हिंदुओं और वो भी सिर्फ कट्टर हिंदुओं से आगे की पार्टी मानने को तैयार नहीं हैं। या ये कहें कि दूसरी पार्टियां डर रही हैं कि अगर बीजेपी की सिर्फ और सिर्फ कट्टर हिंदुओं के मतों से जीतने वाली पार्टी की छवि न बनी रही तो राजनीति कठिन हो जाएगी। तब सिर्फ धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीति नहीं की जा सकेगी। और इसीलिए सब पुरजोर कोशिशश में लगे रहे कि किसी तरह बीजेपी-पीडीपी का गठजोड़ टूट जाए।

पहली नजर में देखें तो पीडीपी-बीजेपी का गठजोड़ किसी तरह से होने लायक नहीं था, है। दोनों को वोट देने वाले दो ध्रुव पर रहते हैं। पीडीपी वाला कश्मीर पाकिस्तानी भावना के साथ जुनूनी दिखता है तो, बीजेपी वाला जम्मू-लद्दाख हिंदुस्तान के साथ जुनूनी दिखता है। पीडीपी का पुराना इतिहास तथ्यों के साथ ये साबित करने के लिए काफी है कि पीडीपी आतंकवादियों के साथ सहानुभूति ही नहीं रखती है, सीधे पीडीपी नेताओं का आतंकवादियों के साथ जुड़ाव है। और आतंकवादी संगठन शेख-उमर अब्दुल्ला की सरकार पर मुफ्ती सरकार को अपने नजदीक पाते हैं। भारतीय जनता पार्टी जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा से राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे- के आधार पर खड़ी पार्टी है। इसीलिए ये गठजोड़ भला कैसे हो सकता है। और हो भी गया तो कितने दिनों तक चलेगा, ये बड़ा सवाल है। लेकिन, अब जब मसरत आलम की रिहाई की खबरें पूरी तरह से साफ हो रही हैं तो लग रहा है कि ये गठजोड़ अभी टूटता नहीं दिख रहा है। और इस गठजोड़ का होना हिंदुस्तान के हित में है। देश की सड़ी-गड़ी लकीर पर हो रही राजनीति के शुद्धीकरण के लिए बेहद जरूरी है। वो लकीर जो हिंदू-मुसलमान को राजनीतिक तौर पर दो ध्रुवों पर खड़ा करके ही राजनीति करने देती है। वो लकीर जो धर्म के बाद जाति और पुराने इतिहास के सहारे वहीं खड़े रहने देना चाहती है। इसीलिए जरूरी है कि जम्मू कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी गठजोड़ बना रहे। और इस गठजोड़ की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो गठजोड़ के जरिए मिले इस मौके का इस्तेमाल सिर्फ जम्मू कश्मीर ही नहीं देश में दो ध्रुवों पर खड़ें हिंदू मुसलमान में गठजोड़ कराने का रास्ता बनाए। और ये रास्ता बनता भी दिख रहा है। अच्छा हुआ कि गठजोड़ टूटने के पहले ही साफ हो गया कि मुफ्ती मोहम्मद सईद का अकेला फैसला नहीं था मसरत आलम को छोड़ने का। दरअसल मसरत आलम को तो पहले ही छूट जाना चाहिए था। ये रास्ता इसलिए भी बनता दिख रहा है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती बार-बार ये कह रहे हैं कि वो उसी नीति पर कश्मीर को आगे ले जाना चाहते हैं जिसकी कोशिश प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू की थी। ये विश्लेषण का विषय है लेकिन, मैं निजी तौर पर जितना समझ पाता हूं कि लालकृष्ण आडवाणी जब हिंदू हितों के रक्षक नेता बने तो वो सिर्फ हिंदुओं की बात, संगत करते थे। जबकि, अटल बिहारी वाजपेयी जब हिंदू हिंतों के रक्षक नेता बनते थे तो, उनके मन मस्तिष्क में ये साफ रहता था कि हिंदू हित तभी बचेंगे जब मुसलमान भी ये बात समझेंगे और मुसलमान ये बात तभी समझेंगे जब उन्हें ये लगेगा कि हिंदू मतों से जीतने वाली पार्टी उनके हितों पर डाका नहीं डालने वाली। और काफी हद तक ये काम अटल बिहारी वाजपेयी ने किया भी। शायद दूसरा पांच साल उनको मिला होता तो देश की राजनीति की बीमार लकीर काफी हद तक स्वस्थ हुई होती। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। देश की तरक्की के दूसरे मोर्चे पर भी जो बेहतर काम 1999-2004 के दौरान हुए, उनका भी असर ठीक से देश समझ नहीं सका।

अब वही मौका प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को मिला है। अच्छी बात ये है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बार इस मौके को खोना नहीं चाहता। राम माधव ने जिस तरह से बीजेपी-पीडीपी का गठजोड़ बनाने की बुनियाद तैयार की, यही साबित करता है। इसलिए अब जब मुफ्ती सरकार की तरह से ये बयान आता है कि आगे से कोई भी फैसला बीजेपी की सहमति के बाद ही लिया जाएगा। अच्छा है गठजोड़ का सम्मान बचा रहा तो अनायास ही सही हिंदुस्तान में हिंदू मुसलमान भी एक दूसरे का सम्मान धीरे धीरे करना सीख लेंगे। ये कितना जरूरी है इसे समझने के लिए एक और बेहतर तथ्य सामने आ गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग की बातचीत की जो रिकॉर्डिंग सामने आई है। उसके बाद अरविंद केजरीवाल की जोड़तोड़ से सरकार बनाने की कोशिश और नैतिकता पर बहस हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन, अरविंद केजरीवाल के मुंह से निकली एक बात बेहद खतरनाक है। वो खतरनाक बात है कि कांग्रेस के छे में से तीन विधायक मुसलमान हैं, वो किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ नहीं जा सकते। मतलब साफ है कि देश की राजनीति में मुसलमान विधायक सबसे ज्यादा सीटों वाली बीजेपी के साथ इसीलिए नहीं जा सकते क्योंकि, बीजेपी के साथ जाने पर मुसलमान उन्हें अगली बार मत नहीं देगा। यानी हिंदू मुलमान विभाजन की सबसे बड़ी जमीन भारतीय राजनीति के इसी स्थापित तथ्य की वजह से हैं। अरविंद केजरीवाल कहते थे कि हम राजनीति बदलने आए हैं। कितनी बदलने आए हैं, ये अब बहुत अच्छे से साफ हो रहा है। सोचिए कि अरविंद केजरीवाल सरकार बनाने के लिए किस कदर लगे हुए थे कि पूरी कांग्रेस तोड़कर नई पार्टी बनाकर उसके साथ गठजोड़ कर लेना चाहते थे। राजनीति बदलने वाले अरविंद केजरीवाल भी मुसलमानों को बीजेपी से अछूत बनाकर राजनीति में आसानी देख रहे थे। यानी देश की राजनीति बदलने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल भी हिंदू मुसलमान वाली राजनीति बदलने के पक्ष में नहीं हैं। उसकी वजह भी साफ है। पुरानी लकीर टूटी तो जनता देश की तरक्की की बात करने, पूछने लगेगी। रोजगार की बात करने लगेगी। जीवनस्तर बेहतर क्यों नहीं हुआ, ये पूछने लगेगी। इसीलिए हिंदुस्तान की भलाई के लिए जरूरी है कि जम्मू कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी का गठजोड़ चले और दोनों पार्टियों को राजनीतिक मजबूरी से जो मौका मिला है उसका इस्तेमाल लंबे समय में राजनीतिक मजबूरियों को खत्म करने में करें। अच्छा है कि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी विकास के एजेंडे से हट नहीं रहे हैं। जाहिर है इसका परिणाम दिखने में समय लगेगा। लेकिन, हिंदुस्तान में हिंदू मुसलमान गठजोड़ में से पूर्वाग्रह हटा तो बहुत कुछ बेहतर होगा।

Thursday, July 30, 2009

हमें गिरते जाना है

क्या ये सच नहीं है कि एक बड़े पत्रकार की विधवा आपके न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी वाले घर में करीब 2 साल रही और उसको अपने साथ पत्नी की तरह रखते थे


क्या ये भी सच नहीं है कि उस महिला के साथ आपके रिश्ते खराब होना तब शुरू हुए जब आपने उसकी बेटी पर भी बुरी नजर डालनी शुरू कर दी


एक सच ये भी है कि आप बाराखंभा रोड के सूरी अपार्टमेंट में अकसर जंगल विभाग, राजबाग के एक कर्मचारी की विधवा से मिलने जाते हैं


क्या ये सच नहीं है कि एक पूर्व न्यायाधीश की बेटी आपके साथ आपके बारामूला वाले घर में करीब दो महीने रहती थी


दिल्ली के एक सिनेमाघर के मालिक के बहन के साथ क्या आपके अवैध रिश्ते नहीं थे। जब आप दिल्ली जाते हैं तो, उसके दरियागंज वाले घर में रहते हैं


क्या आपने अपनी भतीजी को करीब 6 सालों तक अपने साथ companion बनाकर रखा था


ये सवाल किसी सच का सामना शो में किसी एंकर ने किसी सेलिब्रिटी या फिर किसी आम आदमी या औरत से नहीं पूछे हैं। ये सवाल पूछे गए हैं जम्मू कश्मीर विधानसभा में PDP नेता मुजफ्फर बेग से। सवाल पूछने वाले थे नेशनल कांफ्रेंस के विधायक नाजिर अहमद गुराजी। यहां कोई पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं था। ये सवाल पब्लिक के सामने नहीं बल्कि बेहद सम्मानित विधानसभा सदस्यों के सामने पूछे जा रहे थे। न पॉलीग्राफ था न जनता का दबाव। तो, मुजफ्फर बेग ने सवालों की लिस्ट फाड़कर हवा में उड़ा दी। लेकिन, सवाल तो उठ चुके हैं हवा में तो उड़ेंगे नहीं।



लगातार तीसरे दिन जम्मू कश्मीर विधानसभा ने गिरने के पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। पहले पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने शोपियां बलात्कार मामले पर स्पीकर का ही माइक तोड़ डाला। खैर, स्पीकर ने भी महबूबा के साथ कुछ सड़कछाप लफंगों जैसी भाषा में ही बात किया था- स्पीकर ने कहा मुझे पता है कि तुम किस खेत की मूली हो। इसके दूसरे ही दिन मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर 2006 के सेक्स स्कैंडल में शामिल होने का आरोप लगा दिया।



मेरा भी ये मानना है कि उमर अब्दुल्ला प्रतिभावान मुख्यमंत्री हैं। और, उनके ऊपर लगे ये आरोप बेबुनियाद हैं। लेकिन, CBI ने जो घंटे भर में ही चीते जैसी फुर्ती से बयान जारी किया कि उमर का नाम 2006 के सेक्स स्कैंडल में था ही नहीं वो, तो निश्चित तौर पर राहुल की यूथ ब्रिगेड में उमर की एंट्री का ही प्रताप था। वरा तो बहुत जरूरी मामलों में भी CBI का बयान कछुए की रफ्तार में भी आ जाए तो, बड़ी बात।


हिंदी फिल्म का एक गाना है कि हमें चलते जाना है ... बस चलते जाना। हमारे राजनेता भी कुछ उसी तर्ज पर कह रहे हैं हमें गिरते जाना है ... बस गिरते जाना ...



जम्मू कश्मीर की विधानसभा इस गिरते जाने का बस एक उदाहरण भर है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में जमकर चले जूते-चप्पल और माइक किसी के भी जेहन से धूमिल नहीं हो सकते। दूसरी विधानसभाओं में भी ऐसे हादसे आम हो चुके हैं। आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री पर पैसे लेकर प्रोजेक्ट देने का आरोप लगा था।


संसद भी इससे अछूती नहीं रही है। जनता दल यूनाइटेड के सांसद प्रभुनाथ सिंह और लालू प्रसाद के साले साधु यादव का संवाद भी किसी को भूला नहीं होगा। पैसे लेकर सवाल पूछना, काम के लिए सांसद-विधायक निधि जारी करने से पहले कमीशन दबा लेना ये सब तो अब ऐसी खबरें हो गई हैं। जिस पर अब जनता भी कान नहीं देती। वैसे जनता भी क्या कान देगी। वो भी तो नेताजी जैसा ही बनना चाहती है। और, तो और जातियों के लंबरदार खुद साबित करने में जुटे हैं कि वो नीचे गिर गए हैं, मान लो।


अब इतना गिर जाने के बाद कैसे साहस होता कि ये सांसद सच का सामना शो को बंद करा पाते। आखिर सच का सामना से पैदा हो रही गंध से ज्यादा नरक तो ये फैला ही रहे हैं। यही वजह रही होगी कि सच का सामना पर हड़काने के लिए स्टार प्लस को नोटिस जारी कर उसका सार्वजनिक प्रपंच तो रच दिया गया। लेकिन, बंद कमरे में जब बात हुई तो, सब एक ही धुन पर आंख बद कर लेट गए – हमें गिरते जाना है ... बस गिरते जाना

Sunday, June 17, 2007

कश्मीर से सेना हटाने से किसका भला होगा

जम्मू-कश्मीर की सरकार में सहयोगी पीडीपी किसी भी कीमत पर सेना को कश्मीर से हटाना चाहती है। इसके लिए पीडीपी लगातार कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद औऱ केंद्र की यूपीए सरकार के ऊपर दबाव बना रही है। पीडीपी का तर्क ये है कि बेवजह कश्मीर घाटी में सेना लगाकर दहशत का माहौल बनाया जा रहा है। जबकि, पिछले एक दशक से घाटी में आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है। और, अब सेना की जगह कश्मीर की कानून-व्यवस्था देखने का जिम्मा कश्मीर की पुलिस को ही दे देना चाहिए। लेकिन, पीडीपी की ये मांग ठीक वही मांग है जो, घाटी में काम कर रही अलगाववादी ताकतें भी लगातार चाह रही हैं। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पीडीपी सेना को हटाकर किसका भला करना चाहती है।

वैसे इसे केंद्र के ऊपर दबाव कहें या फिर एक बार सेना हटा देने पर कश्मीर के हाथ से निकल जाने का भय कहें, अभी तक केंद्र और राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने सेना को सीमा पर ही तैनात करने की पीडीपी की मांग नहीं मानी है। लेकिन, राज्य सरकार में सहयोगी पीडीपी की इस मांग ने राज्य में फिर से कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करना शुरू कर दिया है। सेना हटाने की पीडीपी की मांग तो पूरी नहीं हुई लेकिन, कट्टरपंथी ताकतों के दबाव में आकर सेना को मस्जिदों और मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों से बाहर निकालने का फरमान सुना दिया गया। ऐसा नहीं है कि सेना को मस्जिदों या मुस्लिम धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के काम से बाहर कर दिया गया है। सरकार ने सेना को मस्जिदों और मुस्लिम धार्मिक स्थलों के रीकंस्ट्रक्शन के काम से बाहर कर दिया है। यहां तक कि वो काम भी रोक दिए गए जो, सेना अपने फंड से मस्जिदों को ठीक करने के लिए कर रही थी। दरअसल, आतंकवादी मुठभेड़ों में कभी-कभी सेना की ओर से निर्दोष कश्मीरियों के एनकाउंटर के बाद कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए सेना सद्भावना के तहत ये काम कर रही थी।
इसके तहत स्थानीय लोगों की मदद से सेना ऐसी मस्जिदों को ठीक करवाने का काम खुद ही कर रही थी जो, आतंकवाद के दौर में टूट गई थीं या जिनको किसी तरह का नुकसान पहुंचा था। सेना ने पिछले तीन सालों में इस काम पर 52 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए। कई मस्जिदें सुधारीं और आगे भी उसकी योजना कई मस्जिदों और मुस्लिम धर्मस्थलों को सुधारने की थी। सिर्फ सुरक्षा की जिम्मेदारी से आगे बढ़कर मस्जिदों को सुधारने के लिए सेना की तारीफ होनी थी लेकिन, इसकी तारीफ के बजाए कट्टरपंथी मौलवियों ने सेना को बाहर भगाने का अभियान शुरू कर दिया। ये सेना को कश्मीर घाटी से हटाकर सीमा पर तैनात करने की मांग को ही दूसरी तरह से रखा गया और सरकार इसमें फंस गई।

सरकार ऐसे समय में इसमें फंस रही है जब डेढ़ दशक के बाद फिर से एक बार कट्टर अलगाववादी ताकतें कश्मीर घाटी में सिर उठाने की कोशिश कर रही हैं। हुर्ऱियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की अप्रैल में श्रीनगर में हुई एक रैली में लश्कर-ए-तैबा के लोग शामिल हुए थे। लश्कर-ए-तैबा के आतंकवादी न सिर्फ गिलानी की रैली में शामिल हुए थे बल्कि, चिल्ला-चिल्लाकर भारत विरोधी नारे लगा रहे थे। उन सबके हाथ में लश्कर के झंडे भी थे। लेकिन, इसके बाद भी सरकार गिलानी के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकी। अगर सरकार ये डर रही है कि गिलानी पर कार्रवाई से घाटी में अमन पर असर पड़ सकता है तो, मुझे नहीं लगता कि ये ठीक है क्योंकि, अगर गिलानी जैसी मानसिकता के लोगों से डरकर काम किया जाएगा तो, फिर से डेढ़ दशक पहले वाली डरावनी घाटी बनने में कश्मीर में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं खुद इसी साल फरवरी में कश्मीर, गुलमर्ग होकर आया हूं। और, इसमें कोई शक नहीं है कि सेना की मौजूदगी की वजह से धरती की इस जन्नत का मजा लेने के लिए लोग बेखौफ होकर जा रहे हैं। यहां व्यापार बढ़ रहा है, खुशहाली बढ़ रही है। इसलिए राजनीति करने वालों से सिर्फ इतनी गुजारिश है कि एक बार फिर से धरती पर जन्नत को दोजख बनाने की किसी भी कोशिश में शामिल न हों। हां, सेना अगर कहीं आतंकवाद पर काबू के बहाने ज्यादती कर रही है तो, जिम्मेदार लोगों को कड़ी से क़ड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन, सेना को घाटी से हटाकर कश्मीर को आतंकवादियों के हवाले करना कहीं से भी समझदारी का फैसला नहीं होगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...