(अंतराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च)पर महिला किसानों के हाल को बेहतर बनाने के लिए प्रतापजी ने एक ऐसा सुझाव दिया है जो, सही मायनों में महिला सशक्तिकरण, महिलाओं के बराबरी के हक की बात करता है। में ये पूरा लेख ही छाप रहा हूं)
बिवाई फटे पैर
हम निकालती हैं खरपतवार
ताकि पौधों को रस मिल सके
फूले-फलें पौधे
खेतों में सोना बरसे
हमारे फटे आंचल से
रस्ते में गिर जाता है
मजूरी का अनाज
जनकवि गोरख पांडेय की इन पक्तियों से गुजरते हुए खेतों में काम करने वाली औरतें आपके जेहन में आ चुकी होगीं। ये देश के 70 प्रतिशत की देहात की आबादी की वे औरतें हैं जो 85 प्रतिशत से अधिक खेती के काम में अपना योगदान देती हैं। पहला विवरण नेशनल सैंपल सर्वे और दूसरा तथ्य इंटरनेशनल वीमेन रिसर्च इंस्टीट्यूट का है। हमारे अनुभव तो इसे 90 फीसदी से उपर का बताते हैं। पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में तो यह शत-प्रतिशत जा गिरता है। गोरख की कविता की इन औरतों को देहरी के भीतर और बाहर किस पहचान और अधिकार की दरकार है, उन महिला किसानों पर कुछ जरूरी बातें हो जाएं।
इंटरनेशनल फंड फार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ने गुजरी फरवरी को रोम में एक सम्मेलन किया। 165 देशों के प्रतिनिधि थे, जर्मनी, नाइजीरिया, पाकिस्तान और भारत सहित। वहां के तीन प्रमुख विषयों में खाद्यान्न और मूल्य वृद्धि,मौसम के बदलाव का खेती पर असर के साथ दुनिया के महिला किसानों की चुनौतियों को खास तौर पर शामिल किया गया था। शामिल देशों के सभी प्रतिनिधियों के बीच आमराय थी कि विश्व भर में महिलाएं खेती के काम में सबसे अधिक योगदान करती हैं और उनका योगदान अदृश्य वाली स्थिति में रहता है। उनके श्रम को घरेलू सहयोग की श्रेणी में रखा जाता है। जहां औरतें खेत मजदूर के तौर पर काम करती हैं वहां पुरूषों की तुलना में उनकी मजदूरी का कम होना भी विसंगति का एक प्रकार है।
महिलाएं अन्न उत्पादन ही नहीं पर्यावरण संरक्षण और पशुपालन दोनों में आगे की भूमिका निभाती हैं। खेती में जुताई के अलावा अधिकतर काम महिलाओं की मुख्य भूमिका में ही संपादित होते हैं। इस परंपरा को हम अतीत से यूं भी समझ सकते हैं कि बुवाई, कटाई से लेकर कृषि के तमाम कार्यो से जुड़े लोकगीत महिलाओं की भूमिका को प्रामाणिक अभिव्यक्ति देते हैं। भारत में कर्नाटक फोरम फार लैंड राइट्स नाम की संस्था पिछले दो दशक से यह अभियान चला रही है कि भूमि खाते स्त्री और पुरूष के संयुक्त नाम से होने चाहिए। सरकार कृषक परिवार के तौर पर देखे न कि व्यक्तिगत खातेदार के तौर पर। देश के दूसरे हिस्सों से भी इस मांग को समर्थन मिलता रहा है। इसके पीछे के ठोस तर्क हैं कि इससे महिलाओं के परिवार में अधिकार को आधार मिलेगा। घरेलू हिंसा के नियंत्रण में भी यह कदम कारगर होगा।
इसके पक्ष में कहा जाता है कि शादी के बाद जब लडक़ी ससुराल आती है तो राशन कार्ड और दूसरे दस्तावेजों पर उसका नाम जोड़ा जाता है तो जमीन के कागजातों में जोडऩे की अनिवार्यता होनी चाहिए। राजस्व के रिकार्ड कर वसूली की सहूलियत के लिए परिवार के मुखिया के नाम से बनाए जाते रहे हैं। यह मांग इस राजस्व वसूली के दस्तावेज के सामाजिक निहितार्थ को स्पष्ट करती है। पिछले दिनों विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर दिल्ली में महिला किसानों की रैली में भी जमीन के दस्तावेजों में महिला को बराबर का महत्व देने की मुख्य मांग रखी गई थी। इंडियन साइंस कांग्रेस 2008 के दौरान विशाखापत्तनम में भी महिला किसानों से संबंधित 9 प्रमुख मांगों का एक प्रस्ताव पारित किया गया था।
सरकार, बजट, नीतियां, आयोग इन सारे शब्दों के आगे-पीछे झांकने पर तो इधर कुछ दिखता नहीं। सन 2005 में राष्ट्रपति को भेजे एक ज्ञापन में महिला किसानों के लिए एक डाक टिकट जारी करने की साधारण सी मांग की गई थी। मंशा थी कि देश महिलाओं के कृषि में योगदान को एक स्वीकृति दे। दुनिया में महिला किसानों का हाल इसी से समझा जा सकता है कि ज्ञापन के अनुसार भारत अगर डाक टिकट जारी करता है तो ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला देश होगा। वर्तमान के अनुत्तरित प्रश्नों में एक सबसे बड़ा यह है कि बंटाई पर खेती करने वाले किसान माने जा सकते हैं, लेकिन महिला नहीं। औरतों की आत्महत्या को किसान पत्नी के नाम से दर्ज किया जाता है। इस तरह नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 1997 से 2007 तक 182, 936 किसानों की आत्महत्या का जो विवरण है, वो आधा-अधूरा है, क्योंकि इसमें किसान परिवार की औरतें शामिल नही हैं। यानि हम औरतों को परिदृश्य में रखकर यथार्थ से भी भागते हैं।
राष्ट्रीय किसान नीति-2007 में महिलाओं को सहायक सुविधाएं दिए जाने पर जोर देती है। मसलन, काम के स्थान पर बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच, उनके लिए बीमा की विशेष सुविधा, स्वास्थ्य संबंधी सहूलियतें आदि। यहां मसला महिलाओं को मजदूर के अधिकार से उपर उठाकर देखने की है, जो उनकी वास्तविक भूमिका है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर वीमेन फारमर के नाम पर इधर जो कुछ सामने भी आ रहा है, उसके एक बड़े हिस्सें में कई तरह की बदनीयती भी नजर आती है, जिसे आप देखने वालों की अपनी नीयत भरी दृष्टि भी कह सकते हैं।
इधर के कई एनजीओ महिला किसानों के नाम पर स्वंय सहायता समूह बनाने, ट्रेनिंग देने और विशेष ऋण देने के नाम पर कार्यक्रम चला रहे हैं। दक्षिण एशिया केकई देशों (भारत और पाकिस्तान सहित) में एक अंतराष्ट्रीय संस्था हंगर फ्री वूमेन अभियान चला रहा है, उसमें भी महिला किसानों के अधिकारों और स्वावलंबन के एजन्डे को रखा गया है। अंतराष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं से वित्त पोषित एनजीओ के अपने लक्ष्य और अपनी सीमाएं है। फंडिग एजेंसी के एजेन्डे के बंधन को तोड़ पाना उनके लिए संभव नहीं है। जरूरत एक बड़े बदलाव की है। एक खतरे से यहां बचना है कि इसे महिला बनाम पुरूष का मुद्दा बनाने की जगह महिलाओं की शक्ति को संगठित करने और उसके महत्व को अधिकार देने की बात की जानी चाहिए। राहत के कुछ उपाय और महिला सशक्तिकरण के नाम पर देशी-विदेशी वित्त पोषित अभियान थोड़ी दूर चलकर रूक जाते हैं।
गोरख पाण्डेय के उसी गीत में आखिर की दो लाइनें हैं-जिसमें खेत में काम करती औरतें अपनी इच्छा और अधिकार की अपेक्षा दोनों जाहिर करती हैं। औरतों के सवाल कुछ वैसे ही नतीजे की परिणिति चाहते हैं।
पक्तियां है-
उगाया करें हम मिट्टी में सोना । और हमें दूसरों के आगे आंचल न पसारना पड़े।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Saturday, March 07, 2009
Wednesday, November 28, 2007
महिलाओं को कम समझना बंद कीजिए
दया चौधरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की पहली महिला जज बन गई हैं। सीनियर एडवोकेट दया को एडीशनल जज नियुक्त किया गया है। 88 साल के हाईकोर्ट के इतिहास में ये पहली बार है जब कोई महिला जज बनी है। दया चौधरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बार की पहली महिला प्रेसिडेंट और केंद्र सरकार की एडीशनल सॉलीसिटर जनरल भी रह चुकी हैं।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में एक महिला जज की नियुक्ति इसलिए भी मायने रखती है कि ये दोनों ही राज्य लड़के-लड़कियों के मामले में सबसे खराब अनुपात रखते हैं। पंजाब और हरियाणा से कन्या भ्रूण हत्या के भी बड़े मामले सामने आते रहे हैं। देश में लड़के-लड़कियों का सबसे खराब अनुपात इन्हीं दोनों राज्यों में है। पंजाब और हरियाणा में 1000 लड़कों पर सिर्फ 704 लड़कियां हैं। जबकि, देश में 1000 लड़कों पर 933 लड़कियां हैं।
पंजाब और हरियाणा की ही तरह चंडीगढ़, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तरांचल में भी लड़कों के मुकाबले लड़कियां कम हो रही हैं। अमीर राज्यों के साथ ही दिल्ली के पॉश इलाके साउथ दिल्ली में कन्या भ्रूण हत्या सबसे ज्यादा होती है जो, साफ दिखाता है कि ज्यादा पढ़े-लिखे और समृद्ध भारत को लड़कियां कम पसंद हैं। इसका दुष्परिणाम भी सामने आता दिख रहा है। अगर यही हाल रहा तो, 42 साल बाद करीब 3 करोड़ लड़के कुंआरे रह जाएंगे।
सिर्फ केरल ही अकेला राज्य है जहां लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं। केरल में 1000 लड़कों पर 1058 लड़कियां हैं। देश में सामाजिक संतुलन बने इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को समाज में आगे बढ़ने का मौका मिले। अब ये आश्चर्य की ही बात है कि 88 साल से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को एक लायक महिला वकील नहीं मिल पाई थी जो, जज बन सकती। दया चौधरी जैसे उदाहरण शायद लोगों को कन्या भ्रूण हत्या से रोक पाएं और भारत संतुलित विकास कर सके।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में एक महिला जज की नियुक्ति इसलिए भी मायने रखती है कि ये दोनों ही राज्य लड़के-लड़कियों के मामले में सबसे खराब अनुपात रखते हैं। पंजाब और हरियाणा से कन्या भ्रूण हत्या के भी बड़े मामले सामने आते रहे हैं। देश में लड़के-लड़कियों का सबसे खराब अनुपात इन्हीं दोनों राज्यों में है। पंजाब और हरियाणा में 1000 लड़कों पर सिर्फ 704 लड़कियां हैं। जबकि, देश में 1000 लड़कों पर 933 लड़कियां हैं।
पंजाब और हरियाणा की ही तरह चंडीगढ़, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और उत्तरांचल में भी लड़कों के मुकाबले लड़कियां कम हो रही हैं। अमीर राज्यों के साथ ही दिल्ली के पॉश इलाके साउथ दिल्ली में कन्या भ्रूण हत्या सबसे ज्यादा होती है जो, साफ दिखाता है कि ज्यादा पढ़े-लिखे और समृद्ध भारत को लड़कियां कम पसंद हैं। इसका दुष्परिणाम भी सामने आता दिख रहा है। अगर यही हाल रहा तो, 42 साल बाद करीब 3 करोड़ लड़के कुंआरे रह जाएंगे।
सिर्फ केरल ही अकेला राज्य है जहां लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं। केरल में 1000 लड़कों पर 1058 लड़कियां हैं। देश में सामाजिक संतुलन बने इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को समाज में आगे बढ़ने का मौका मिले। अब ये आश्चर्य की ही बात है कि 88 साल से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को एक लायक महिला वकील नहीं मिल पाई थी जो, जज बन सकती। दया चौधरी जैसे उदाहरण शायद लोगों को कन्या भ्रूण हत्या से रोक पाएं और भारत संतुलित विकास कर सके।
Tuesday, November 13, 2007
ज्यादा पढ़े-लिखे भारत को लड़कियां कम पसंद हैं
दीपावली बीत गई। सबने लक्ष्मी पूजन किया। घर की लक्ष्मी की भी इज्जत बढ़ाई। और, घर में ढेर सारी लक्ष्मी आने के लिए तरह-तरह की पूजा की, दीप जलाया, मिठाइयां बांटी। वैसे भी अक्सर भारतीय संस्कृति-संस्कारों में लड़की को मातृशक्ति, देवी, घर की मालकिन कहकर उसे ज्यादा इज्जत देने की कोशिश दिखती रहती है। लेकिन, हर साल तरक्की करता भारत शायद इसका दिखावा ही करता है। दरअसल ज्यादा पढ़ा-लिखा भारत लड़कियों से ज्यादा ही भेदभाव कर रहा है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ताजा जेंडर गैप इंडेक्स में भारत सबसे नीचे के दस देशों में शामिल है। लड़कियों से भेदभाव के मामले में भारत की स्थिति और खराब हुई है। इस सर्वे में 128 देश शामिल हुए। इसमें भारत 115वें नंबर पर है। जबकि, पिछले साल भारत 98वें नंबर पर था। पिछले साल से इस साल में पढ़े-लिखे लोग तेजी से बढ़े। भारतीयों के घर सुविधाओं बढ़ीं और ज्यादा समृद्धि आई। लेकिन, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य के मामले में लड़कियों के साथ भेदभाव भी बढ़ता गया।
कुछ दिन पहले दिल्ली से एक सर्वे में ये साफ निकलकर आया था कि दक्षिण दिल्ली में सबसे ज्यादा कन्याएं गर्भ में ही मार दी जाती हैं। दक्षिण दिल्ली, सिर्फ दिल्ली का ही नहीं देश का वो इलाका है, जहां लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। ज्यादा तरक्की की है। किसी तरह की सुविधाओं की कमी नहीं है। इसके खतरे भी साफ नजर आने लगे हैं।
खैर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सर्वे के मुताबिक, लड़कियों को आर्थिक तरक्की यानी रोजगार के मौके देने के मामले में भारत 128 देशों में 122वें नंबर पर चला गया है। इस मामले में भारत से खराब स्थिति सिर्फ ऐसे देशों की है जिनका जिक्र करने का भी मतलब नहीं है। तरक्की के मामले में अक्सर BRIC देशों (ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन) की तुलना होती है। लड़कियों को समान मौके देने के मामले में ये देश भारत से बहुत आगे हैं। ब्राजील इसमें 62वें, रूस 16वें और चीन 60वें नंबर पर है।
दीपावली पर लक्ष्मी की पूजा करने वालों को ये समझ में क्यों नहीं आता कि अगर असल लक्ष्मी (लड़कियों) के साथ इसी तरह भेदभाव होता रहा। तो, लक्ष्मी किस बहाने ऐसे लोगों के घर आ पाएंगी। भारतीय शास्त्र और संस्कृति में तो ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी (पत्नी) के साथ की गई पूजा का फल जल्दी और ज्यादा मिलता है। तो, लक्ष्मी को सम्मान (बराबर का दर्जा) तो देना सीखो।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ताजा जेंडर गैप इंडेक्स में भारत सबसे नीचे के दस देशों में शामिल है। लड़कियों से भेदभाव के मामले में भारत की स्थिति और खराब हुई है। इस सर्वे में 128 देश शामिल हुए। इसमें भारत 115वें नंबर पर है। जबकि, पिछले साल भारत 98वें नंबर पर था। पिछले साल से इस साल में पढ़े-लिखे लोग तेजी से बढ़े। भारतीयों के घर सुविधाओं बढ़ीं और ज्यादा समृद्धि आई। लेकिन, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य के मामले में लड़कियों के साथ भेदभाव भी बढ़ता गया।
कुछ दिन पहले दिल्ली से एक सर्वे में ये साफ निकलकर आया था कि दक्षिण दिल्ली में सबसे ज्यादा कन्याएं गर्भ में ही मार दी जाती हैं। दक्षिण दिल्ली, सिर्फ दिल्ली का ही नहीं देश का वो इलाका है, जहां लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। ज्यादा तरक्की की है। किसी तरह की सुविधाओं की कमी नहीं है। इसके खतरे भी साफ नजर आने लगे हैं।
खैर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सर्वे के मुताबिक, लड़कियों को आर्थिक तरक्की यानी रोजगार के मौके देने के मामले में भारत 128 देशों में 122वें नंबर पर चला गया है। इस मामले में भारत से खराब स्थिति सिर्फ ऐसे देशों की है जिनका जिक्र करने का भी मतलब नहीं है। तरक्की के मामले में अक्सर BRIC देशों (ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन) की तुलना होती है। लड़कियों को समान मौके देने के मामले में ये देश भारत से बहुत आगे हैं। ब्राजील इसमें 62वें, रूस 16वें और चीन 60वें नंबर पर है।
दीपावली पर लक्ष्मी की पूजा करने वालों को ये समझ में क्यों नहीं आता कि अगर असल लक्ष्मी (लड़कियों) के साथ इसी तरह भेदभाव होता रहा। तो, लक्ष्मी किस बहाने ऐसे लोगों के घर आ पाएंगी। भारतीय शास्त्र और संस्कृति में तो ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी (पत्नी) के साथ की गई पूजा का फल जल्दी और ज्यादा मिलता है। तो, लक्ष्मी को सम्मान (बराबर का दर्जा) तो देना सीखो।
Thursday, November 01, 2007
42 साल बाद 2.80 करोड़ लड़कों की शादी नहीं होगी!
हैदराबाद में एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस में एक डराने वाली बात सामने आई है कि 2050 तक करीब 3 करोड़ लड़कों को शादी के लिए लड़की नहीं मिलेगी। भारत में गर्भ में ही लड़कियों को मार देने का चलन न रुक पाने की वजह से लड़कों-लड़कियों के बीच का अनुपात घटता ही जा रहा है। लेकिन, अभी भी भारतीय समाज शायद इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहा है। ये कितना बड़ा खतरा है इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश के एक गांव की कहानी से लगाया जा सकता है। यहां अभी ही लड़कियां खोजने से नहीं मिल रही हैं। शाहजहांपुर के बहादुरपुर गांव में दस से बारह लड़कों के बीच में अकेली लड़की परिवारों में जन्म ले पा रही है। सिर्फ एक गांव की ये बुरी हालत नहीं है। जिले की सदर तहसील में लड़कों के आधे से थोड़ी ज्यादा ही लड़कियां हैं। सदर तहसील में 1,000 लड़कों पर सिर्फ 535 लड़कियां हैं।
शाहजहांपुर के शहरी इलाके में भी लड़कों के लिए लड़कियां खोजे नहीं मिल रही है। 1,000 लड़कों के बीच सिर्फ 678 लड़कियां हैं। हाल ये है कि एक-एक परिवारों में छे-छे लड़कों के बीच में अकेली बहनें हैं। शाहजहांपुर में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने का चलन ऐसा है कि खुद महिलाएं अबॉर्शन की बात मानती हैं। वो, भी खुश हैं कि बेटी की शादी के लिए दहेज जुटाने की चिंता से वो मुक्त हैं। लड़कियों के हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बाद भी हर साल एक करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। मुझे समझ में नहीं आता कि वो कौन से लोग हैं जो, अपने ही बच्चे को गर्भ में मारकर दहेज बचा लेने की चिंता दूर होने से खुश होते हैं। मैं तो, अब ये सोचता हूं कि हमारे समाज के वो लोग ज्यादा भले हैं जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दिया। कम से कम यहां लड़के की चाहत किसी लड़की जिंदगी तो नहीं ले रही है।
पता नहीं कब हम भारतीय ये समझ पाएंगे कि दस लड़के पैदा करने से अच्छा है कि एक-दो लड़कियों को ही इतनी अच्छी परवरिश दे दी जाए कि वो लड़के भी उनकी किस्मत से रश्क करें। उम्मीद करता हूं कि कम से कम हमारी पीढ़ी 2050 में आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसी सामाजिक विसंगति तैयार करके नहीं देगी।
शाहजहांपुर के शहरी इलाके में भी लड़कों के लिए लड़कियां खोजे नहीं मिल रही है। 1,000 लड़कों के बीच सिर्फ 678 लड़कियां हैं। हाल ये है कि एक-एक परिवारों में छे-छे लड़कों के बीच में अकेली बहनें हैं। शाहजहांपुर में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने का चलन ऐसा है कि खुद महिलाएं अबॉर्शन की बात मानती हैं। वो, भी खुश हैं कि बेटी की शादी के लिए दहेज जुटाने की चिंता से वो मुक्त हैं। लड़कियों के हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बाद भी हर साल एक करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। मुझे समझ में नहीं आता कि वो कौन से लोग हैं जो, अपने ही बच्चे को गर्भ में मारकर दहेज बचा लेने की चिंता दूर होने से खुश होते हैं। मैं तो, अब ये सोचता हूं कि हमारे समाज के वो लोग ज्यादा भले हैं जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दिया। कम से कम यहां लड़के की चाहत किसी लड़की जिंदगी तो नहीं ले रही है।
पता नहीं कब हम भारतीय ये समझ पाएंगे कि दस लड़के पैदा करने से अच्छा है कि एक-दो लड़कियों को ही इतनी अच्छी परवरिश दे दी जाए कि वो लड़के भी उनकी किस्मत से रश्क करें। उम्मीद करता हूं कि कम से कम हमारी पीढ़ी 2050 में आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसी सामाजिक विसंगति तैयार करके नहीं देगी।
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