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Sunday, January 17, 2010

गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद

केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वो, टीचरों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दें। साथ ही प्रोफेसरों को 70 साल तक पढ़ाने दिया जाए। केंद्र सरकार का ये निर्देश राज्यों को इस वजह से आया है कि देश के स्कूलों में पढ़ाने वालों की बेहद कमी है और अगर ऐसे में टीचरों, प्रोफेसरों की 58-60 उम्र वाले लोग रिटायर हो गए तो, विद्यालयों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वालों की समस्या और बढ़ जाएगी।

 पहली नजर में देखें तो, लगता है कि देश में जिस तरह से शिक्षकों के पद खाली हैं उसमें ये राहत की बात होगी। देश भर में आठवीं तक के विद्यालयों में ही करीब दस लाख शिक्षकों की कमी है। सरकार बरसों से शिक्षाकार्य में लगे इन बुजुर्ग शिक्षकों के जरिए गुणवत्ता बेहतर करने की भी बात कह रही है। अब सवाल ये है कि जहां लाखों नौजवान अपने बुजुर्गों से कई गुना ज्यादा प्रतियोगी माहौल में पढ़ाई करके नौकरी के लिए आवेदन करते घूम रहे हैं। और, उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल रही है। वहां संन्यास की उम्र में पहुंच चुके लोगों से अपने परिवार के साथ आखिरी समय का बेहतर इस्तेमाल करने का ये मौका सरकार क्यों छीनना चाह रही है।

 पहले ही सरकार विश्वविद्यालय के शिक्षकों की सेवानिवृ्त्ति की आयु 65 साल कर चुका है। दिल्ली और कुछ दूसरे राज्यों में प्राइमरी से सेकेंडरी तक के अध्यापकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल हो चुकी है। अब ऐसे में पहले से ही 58 साल की उम्र के बाद के हर साल की नौकरी पर बुजुर्ग किसी न किसी बेरोजगार को कुछ समय और बेरोजगार रहने का श्राप दे रहा है। ये श्राप हो सकता है कि वो अपने ही परिवार के किसी बच्चे को दे रहा हो। नौकरी मिलने में 25-26 साल के बाद जितनी भी देरी होती है एक नौजवान की पूरी सामाजिक स्थिति को वो उतना ही खराब करती जाती है।

मंदी की मार के बाद अभी तक निजी कंपनियों में भर्ती की प्रक्रिया तेज नहीं हुई है। ऐसे में सरकारी नौकरियां ही नौजवानों के लिए मुफीद दिख रही हैं। अब अगर इस नौकरी पर बुढ़ाता भारत अगले 5-7-10 सालों के लिए इस तरह से कुंडली मारकर बैठ गया तो, दुनिया के सबसे जवान देश भारत के नौजवान को कुंठा के गर्त में जाने से नहीं रोका जा सकेगा। हिंदू दर्शन के आश्रमों की व्यवस्था को आज के दौर में ज्यादा प्रासंगिक इसलिए भी हो जाती है कि आज रोजगार-कमाई से ही सारी सामाजिक व्यवस्था का निर्वहन हो रहा है।

सरकार को चाहिए तो, ये कि वो तेजी से विद्यालयों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करे। ये नौजवान आज के लिहाज की शिक्षा पद्धति को बेहतर जान-समझ रहे हैं। नए जमाने के बच्चों को आगे बढ़ने के लिए किस तरह से तैयार करना है ये अभी ताजा-ताजा पढ़ाई से पढ़ाने का काम पाने वाला नौजवान ज्यादा अच्छे से समझेगा बनिस्बत पिछले 30-35 सालों से एक ही तरह का कोर्स पढ़ाते-पढ़ाते अपने जीवन के आखिरी दिनों में पहुंच चुके किसी बुजुर्ग अध्यापक से।

सरकार अकसर चिंता जाहिर करती रहती है कि विश्वविद्यालयों में रिसर्च में तो दाखिले न के बराबर हो रहे हैं। दरअसल यहां भी मसला वही आड़े आ जाता है कि किसी नौजवान को रिसर्च करने के बाद उसका सामाजिक स्थिति बेहतर करने में जब खास उपयोग नहीं दिखता तो, वो रिसर्च की तरफ क्यों जाएगा। शिक्षकों के पद खाली हैं तो, उसे भरने के लिए लोगों की कमी तो बिल्कुल ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में प्राइमरी अध्यापकों के पचास हजार पदों के इंतजार में लाखों बेरोजगार नौजवान बैठे हैं। ये हाल हर राज्य का है।

सरकार बार-बार आंकड़ों में जवान भारत के दुनिया के सभी देशों से आगे निकलने की बात जोर-जोर से कहती रहती है। लेकिन, सरकारी नीतियों में नौजवान को देश को आगे बढ़ाने में जल्दी इस्तेमाल की गुंजाइश कम होती जा रही है। सरकारी नीति कुछ ऐसी हो गई है कि पहले नौजवान को आधा बुजुर्ग बना देंगे तब उससे गुणवत्ता की उम्मीद करेंगे। और, ये सिर्फ अध्यापन का ही मसला नहीं है। केंद्रीय कानून मंत्रालय भी इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल से बढ़ाकर 65 साल कर दी जाए। ये करके मंत्रालय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र में समानता करना चाहता है। साथ ही लंबित मुकदमों की संख्या और बढ़ने से रोकना चाहता है।

यहां भी मसला वही है कि ढेर सारे न्यायाधीशों के पद खाली हैं लेकिन, उनकी भर्ती प्रक्रिया तेज नहीं हो पा रही है। देश के 21 उच्च न्यायालयों में 886 न्यायाधीश होने चाहिए लेकिन, 652 न्यायाधीश ही हैं। समझ में नहीं आता कि देश के विश्वविद्यालयों से कानून की डिग्रियां लेकर निकलते छात्रों में से क्या दो सौ लायक लोग भी नहीं हैं जो, देश के तीन करोड़ से भी ज्यादा लंबित मामलों को निपटाने में मददगार बन सकें। ऐसा इसलिए भी नहीं है कि इन्हीं छात्रों में से बड़ी जमात काला कोट पहनकर न्यायालयों में वकीलों के बैठने की जगह तक कम कर दे रही है।

साफ है सरकार समस्या के समाधान में जो कोशिश करती दिख रही है वो, और बड़ी समस्या तैयार कर रही है। नए लोगों पर भरोसा न करने की ये मानसिकता ही है कि अध्यापन से लेकर राजनीति तक बुढ़ाया नेतृत्व ही चाहिए। सरकार अध्यापकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65-70 कर देने के पीछे 6-14 साल तक के बच्चों को जरूरी शिक्षा देने का बहाना तर्क के लिए ले रही है। अच्छा है कि देश के हर बच्चे को उच्च शिक्षा का अधिकार सरकार लागू कर दे। लेकिन, साथ ही ये भी सरकार को तय करना होगा कि इतनी शिक्षा मिलने के बाद नौजवान भारत कुंठा के भंवर में न फंसे। उसकी योग्यता-शिक्षा के लिहाज से सरकार को उसे सही समय पर सही रोजगार का अधिकार भी देना होगा। सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर सारी समस्याओं का समाधान खोजने वाली सरकार को ये समझना होगा कि इससे समस्या बढ़ेगा, समाधान नहीं होगा। गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद करना गलत होगा।



(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

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