बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित


ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि अभी दिल्ली के वर्ल्ड क्लास बनने में अक्टूबर 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन का डर ज्यादा है।

 लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन के डर में सरकार की पूरी ताकत लगा देने के बाद भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बोल ही पड़ती हैं कि वो, कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर नर्वस हैं। और, शीला दीक्षित का इस तरह से नर्वस होना देश के शहरी सिस्टम और सरकार के बेहतर शहर बनाने के फोकस पर काले धब्बे जैसा दिखता है। क्योंकि, दरअसल दिल्ली ही पूरे देश में ऐसा शहर हैराज्य भी कहा जाता हैजहां से शहर बनाने के सारे पैमानों का परीक्षण होकर ही देश के दूसरे शहरों में लागू किया जाता है। यही वजह है कि दूसरे शहरों से काफी ज्यादा चमकती दिल्ली में हर शहर से लोग आकर इस शहरी चमक के हकदार पहले बन जाना चाहते हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री का डर दिखा रहा है कि दिल्ली इतना अच्छा शहर नहीं बन सका है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में देश की इज्जत बचा सके। डर लग रहा है कि दुनिया भर से जो खिलाड़ी आएंगे वो, दिल्ली की सड़कों के जाम में कहीं फंस तो नहीं जाएंगे। डर लग रहा है कि दिल्ली का शहरी कहीं विदेशी महिला/पुरुष खिलाड़ियों के साथ ऐसी हरकत न कर दे कि असभ्य शहरी होने का दिल्ली पर ठप्पा लग जाए।

 डर सिर्फ जाम और लोगों के सिविक सेंस का नहीं है। देश के सबसे अच्छे शहर के पुलिस सिस्टम से भी दिल्ली सरकार डर रही है। वो, इस बात से भी डर रही है कि पिछले कई सालों से बिना मीटर के धड़ल्ले से चलने वाले ऑटो चालक कॉमनवेल्थ गेम्स के समय भी अनाप-शनाप मुनाफा कमाने के चक्कर में दिल्ली की इज्जत में पलीता तो नहीं लगा देंगे। दिल्ली की सड़कों पर चमकती लो फ्लोर बसें उतरीं तो लगा कि चलो एक मामला तो जम गया। लेकिन, महीने-सवा महीने में 10-12 लो फ्लोर बसों में लगी आग डराने लगी है कि कहीं कॉमनवेल्थ गेम्स के समय ये लो फ्लोर बसें डरावनी बसों में न तब्दील हो जाएं।

 दिल्ली की मेट्रो ने दुनिया भर में तारीफ पाई। सच्चाई भी यही है कि मेट्रो में यात्रा करके यकीन होने लगता है कि भारत में शानदार शहरी सिस्टम तेजी से अपनी जगह बना रहा है लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि जब दुनिया की नजर कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हमारी इस शहरी तरक्की पर होगी उससे ठीक पहले मेट्रो के खंभे में दरार से लेकर मेट्रो के पटरी से उतरने तक की डरावनी खबरें आ गईं। शीला जी का नर्वसनेस बेवजह नहीं है।

 पटरियों पर तो रेड सिगनल के बिना काम नहीं चलने वाला। शीला जी जुट गईं कि कम से कम सड़कों को तो रेड सिगनल फ्री कर दिया जाए। दस साल पहले की दिल्ली और अभी की दिल्ली की तुलना की जाए तो, दिल्ली की सड़कें दोगुनी से ज्यादा हो गई होंगी। ITO चुंगी पास, धौलाकुआं, मूलचंद, DND के फ्लाईओवर देखकर विदेशी शहरों में होने का भ्रम होता है लेकिन, इन चौराहों-दस राहों से आगे बढ़ते ही रेंगती कारों की कतार में फंसी अपनी कार में घिसटते हुए सारा भ्रम टूट जाता है।

शीला दीक्षित इसीलिए नर्वस हैं। वो, नर्वस इसलिए भी हैं कि दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में 8 सबवे बनाने का काम अब शुरू हो पाया है। अब इसके बनते-बनते 8-9 महीने का समय कैसे बीत जाएगा पता ही नहीं चलेगा। अब दिल्ली वालों को तो, इन सबवे के बनते तक कनॉट प्लेस में लिमिटेड एंट्री करके काम चला लेंगे। लेकिन, विदेशी खिलाड़ियों मेहमानों को दिल्ली का दिल देखने से कैसे मना कर सकेंगे। लुटियंस की दिल्ली में तो हर दूसरे चौराहे पर मिट्टी-धूल दिख रही है। एक फ्लाईओवर जाम से बचा रहा है तो, दूसरे फ्लाईओवर बनाने के लिए कार्य प्रगति पर है वाले बोर्ड गाड़ियों का शीशा खोलने तक की इजाजत नहीं दे रहे हैं। फ्लाईओवर पर चढ़ी कारों को और लंबी लाइन जाम में दिखती है और रहा-सहा देश के सबसे शानदार शहर में रहने का भ्रम भी टूट जाता है। हाल ये है कि 4-5 किलोमीटर में एक फ्लाईओवर से दूसरे फ्लाईओवर का सफऱ भी रेंगते हुए तय हो पाता है।

 शीला जी के नर्वस होने की एक वजह हो तो, चल भी जाए। दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली यूपी लिंक रोड को चौड़ा करने के काम का श्रीगणेश भी ताजा-ताजा ही हुआ है। काम बड़ी तेजी में चल रहा है। लेकिन, बीच में एकाध फ्लाईओवर भी बनने हैं इस सड़क को भी रेड लाइट फ्री करने के लिए। सब मिलाकर इसके भी पूरा होने का समय वही कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के ठीक पहले तक जा रहा है। उस रास्ते से आते-जाते नर्वस तो हम भी हुए जा रहे हैं। शीला जी तो, मुख्यमंत्री हैं उनको तो होना ही चाहिए।

 फिर इन सबके बाद सभ्य शहरी होने का सवाल तो सबसे ज्यादा नर्वसनेस की वजह है ही। पता नहीं कौन अचानक 135 किलोमीटर की रफ्तार से किसी को टक्कर मार दे। पता नहीं कौन सत्ता के रुआब में किसी को सरेराह पीटने लगे, पिस्टल लगा दे या फिर किसी पब-बार में अपनी बीवी-बहन की तथाकथित बेइज्जती का बदला लेने निकल पड़े।

 सरकार शहरों और शहरियों के भरोसे इंडिया ग्रोथ स्टोरी लिखना चाह रही है। लेकिन, देश के सबसे शानदार शहरी मॉडल में इतने छेद दिख रहे हैं कि दुनिया जब इस ओर तकने को तैयारी में है तो, इस शहरी मॉडल को चलाने-बनाने वाले नर्वस हैं। शीला जी की नर्वसनेस बेवजह नहीं है। ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या हम आने वाले समय के लिहाज से शहर बना पा रहे हैं।