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Friday, April 25, 2014

भारत के शहर, भारत के गांवों के खिलाफ साजिश हैं?

ये बड़ी बहस का विषय हो गया है कि आखिर इस देश का विकास मॉडल क्या होना चाहिए। शहरी विकास मॉडल या गांवों का विकास मॉडल। इस बात की बहस में आमतौर पर शहरों में रहने वाले या कुछ गांवों में कुछ करके शहरी सुविधाओं का भरपूर उपयोग, उपभोग करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी होते हैं जो कहते हैं कि शहरीकरण इस देश की सारी समस्याओं की जड़ है। वो तर्क देते-देते ऐसे तर्क साबित करने तक पहुंच जाते हैं जहां के बाद लगता है कि अगर भारत में सिर्फ गांव होते तो ये क्या देश होता। अगर भारत में शहर न होते तो कोई समस्या ही न होती। ढेर सारे बहस, तर्क हैं जिन पर बात की जा सकती है लेकिन, अभी उन सारी बातों पर इसी एक ब्लॉग में बहस करने, तर्क देने का मेरा इरादा है नहीं। आज बात करूंगा सिर्फ उस लड़के की जो मुझे ऑफिस के बाहर चाय पीते मिल गया। कंधे पर लटका पिट्ठू बैग। जिसमें लैपटॉप नहीं था लेकिन, उसे लैपटॉप बैग के ही नाम से जाना जाता है। हाथ में ढेर सारे परचे। उसने देखा कि हम दो-चार लोग चाय की चुस्की ले रहे हैं तो मतलब खाली हैं। उसने वो परचे पकड़ा दिए। परचे में प्लॉट ही प्लॉट था। उसकी तस्वीर चिपका रहा हूं। जानबूझकर प्लॉट बेचने वाले का नाम, पता काट दिया है। चूंकि उसका कोई महत्व नहीं था। उस लड़के ने बचाया इस काम के बदले उसे कंपनी दस हजार रुपये महीने देती है। हालांकि, इस दस हजार में वो दूसरे भी कई काम कराती है। जैसे, चेक लगाना, किसी से ले आना, देने जाना, पैसा ले आना, लेने जाना। इसके अलावा कंपनी के प्लॉट बेचने के लिए इस परचे को ज्यादा से ज्यादा लोगों को बांटना। मुझे लगा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार से आया कोई लड़का होगा। पता चला यहीं गाजियाबाद का ही है। मैंने पूछा तो उसने कहा प्लॉट कितने बिके इससे मुझे मतलब नहीं। और नौकरी की गारंटी कितनी है तो उसने कहा इतनी जमीनें हैं। बिक ही रही हैं तो नौकरी की कोई दिक्कत नहीं है। इसने निकाला तो दूसरा देगा। ये गाजियाबाद का लड़का नोएडा, गाजियाबाद की उन्हीं जमीनों की वजह से दस हजार रुपये महीने कमा रहा है जो शहरी अर्थव्यवस्था या भारत के गांवों को शहर बनाने की साजिश वाली अर्थव्यवस्था है। नोएडा की जमीनों पर अकसर रियल एस्टेट कारोबारियों (बिल्डर, डेवलपर) के औने-पौने दामों में कब्जे वाली खबरें भारत के गांवों को शहर बनाने की साजिश वाली अर्थव्यवस्था के सिद्धांत को और बल दे देती हैं। लेकिन, अगर इस शहरी अर्थव्यवस्था से यहां के गांवों के दस हजार रुपये महीने कमाने वाले लड़कों को थोड़ा अपनी सुख-सुविधा आसानी से जुटाने का जुगाड़ मिल रहा है तो ये साजिश तो बेहतर हुई। दरअसल जरूरत इस बात की है कि गांवों में भी शहरों जैसी सुविधा जुटे। इसका कतई मतलब नहीं कि वहां मॉल, मल्टीप्लेक्स खुल जाए। और अगर 25-50 गांवों के बीच में खुल जाए तो बुराई भी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि गांव के लोग शहरों के लोगों जैसा खाएं-पिएं-जिएं। और शहरों के लोग गांवों के लोगों जैसा अहसास पा सकें। जरूरत इस बात की है कि ऐसे नियामक हों, प्रशासन हो जो, तय करे कि बनते शहर या बने शहर में कोई लोगों का हक न छीन पाए। लेकिन, अक्सर बहस शहर ठीक से बनाने और उससे लोगों का जीवनस्तर कैसे बदले इसकी बहस के बजाए सीधे गांव चाहिए या शहर वाली बहस में बदल जाती है। इसमें होता क्या है। होता ये है कि गांव बचाने की पुरजोर बहस करने वाले शहरों में पूरी सुख, सुविधा का मजा लेते हैं। लेकिन, ये बुरा गांव का कर रहे होते हैं। क्योंकि, शहर, गांव के दुश्मन हो जाते हैं। शहर बनना भारत के खिलाफ साजिश नहीं है ये समझना होगा। हां, गांव बचाइए। गांवों को स्वपोषित करने की योजनाएं लाइए। गांवों में शहरों जैसे मौके दीजिए और शहरों में विकास के हर पैमाने को विकसित कीजिए। लेकिन, शहर-गांव को लड़ाकर शहर-गांव दोनों बर्बाद मत कीजिए।

Friday, January 15, 2010

बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित


ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि अभी दिल्ली के वर्ल्ड क्लास बनने में अक्टूबर 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन का डर ज्यादा है।

 लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन के डर में सरकार की पूरी ताकत लगा देने के बाद भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बोल ही पड़ती हैं कि वो, कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर नर्वस हैं। और, शीला दीक्षित का इस तरह से नर्वस होना देश के शहरी सिस्टम और सरकार के बेहतर शहर बनाने के फोकस पर काले धब्बे जैसा दिखता है। क्योंकि, दरअसल दिल्ली ही पूरे देश में ऐसा शहर हैराज्य भी कहा जाता हैजहां से शहर बनाने के सारे पैमानों का परीक्षण होकर ही देश के दूसरे शहरों में लागू किया जाता है। यही वजह है कि दूसरे शहरों से काफी ज्यादा चमकती दिल्ली में हर शहर से लोग आकर इस शहरी चमक के हकदार पहले बन जाना चाहते हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री का डर दिखा रहा है कि दिल्ली इतना अच्छा शहर नहीं बन सका है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में देश की इज्जत बचा सके। डर लग रहा है कि दुनिया भर से जो खिलाड़ी आएंगे वो, दिल्ली की सड़कों के जाम में कहीं फंस तो नहीं जाएंगे। डर लग रहा है कि दिल्ली का शहरी कहीं विदेशी महिला/पुरुष खिलाड़ियों के साथ ऐसी हरकत न कर दे कि असभ्य शहरी होने का दिल्ली पर ठप्पा लग जाए।

 डर सिर्फ जाम और लोगों के सिविक सेंस का नहीं है। देश के सबसे अच्छे शहर के पुलिस सिस्टम से भी दिल्ली सरकार डर रही है। वो, इस बात से भी डर रही है कि पिछले कई सालों से बिना मीटर के धड़ल्ले से चलने वाले ऑटो चालक कॉमनवेल्थ गेम्स के समय भी अनाप-शनाप मुनाफा कमाने के चक्कर में दिल्ली की इज्जत में पलीता तो नहीं लगा देंगे। दिल्ली की सड़कों पर चमकती लो फ्लोर बसें उतरीं तो लगा कि चलो एक मामला तो जम गया। लेकिन, महीने-सवा महीने में 10-12 लो फ्लोर बसों में लगी आग डराने लगी है कि कहीं कॉमनवेल्थ गेम्स के समय ये लो फ्लोर बसें डरावनी बसों में न तब्दील हो जाएं।

 दिल्ली की मेट्रो ने दुनिया भर में तारीफ पाई। सच्चाई भी यही है कि मेट्रो में यात्रा करके यकीन होने लगता है कि भारत में शानदार शहरी सिस्टम तेजी से अपनी जगह बना रहा है लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि जब दुनिया की नजर कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हमारी इस शहरी तरक्की पर होगी उससे ठीक पहले मेट्रो के खंभे में दरार से लेकर मेट्रो के पटरी से उतरने तक की डरावनी खबरें आ गईं। शीला जी का नर्वसनेस बेवजह नहीं है।

 पटरियों पर तो रेड सिगनल के बिना काम नहीं चलने वाला। शीला जी जुट गईं कि कम से कम सड़कों को तो रेड सिगनल फ्री कर दिया जाए। दस साल पहले की दिल्ली और अभी की दिल्ली की तुलना की जाए तो, दिल्ली की सड़कें दोगुनी से ज्यादा हो गई होंगी। ITO चुंगी पास, धौलाकुआं, मूलचंद, DND के फ्लाईओवर देखकर विदेशी शहरों में होने का भ्रम होता है लेकिन, इन चौराहों-दस राहों से आगे बढ़ते ही रेंगती कारों की कतार में फंसी अपनी कार में घिसटते हुए सारा भ्रम टूट जाता है।

शीला दीक्षित इसीलिए नर्वस हैं। वो, नर्वस इसलिए भी हैं कि दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में 8 सबवे बनाने का काम अब शुरू हो पाया है। अब इसके बनते-बनते 8-9 महीने का समय कैसे बीत जाएगा पता ही नहीं चलेगा। अब दिल्ली वालों को तो, इन सबवे के बनते तक कनॉट प्लेस में लिमिटेड एंट्री करके काम चला लेंगे। लेकिन, विदेशी खिलाड़ियों मेहमानों को दिल्ली का दिल देखने से कैसे मना कर सकेंगे। लुटियंस की दिल्ली में तो हर दूसरे चौराहे पर मिट्टी-धूल दिख रही है। एक फ्लाईओवर जाम से बचा रहा है तो, दूसरे फ्लाईओवर बनाने के लिए कार्य प्रगति पर है वाले बोर्ड गाड़ियों का शीशा खोलने तक की इजाजत नहीं दे रहे हैं। फ्लाईओवर पर चढ़ी कारों को और लंबी लाइन जाम में दिखती है और रहा-सहा देश के सबसे शानदार शहर में रहने का भ्रम भी टूट जाता है। हाल ये है कि 4-5 किलोमीटर में एक फ्लाईओवर से दूसरे फ्लाईओवर का सफऱ भी रेंगते हुए तय हो पाता है।

 शीला जी के नर्वस होने की एक वजह हो तो, चल भी जाए। दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली यूपी लिंक रोड को चौड़ा करने के काम का श्रीगणेश भी ताजा-ताजा ही हुआ है। काम बड़ी तेजी में चल रहा है। लेकिन, बीच में एकाध फ्लाईओवर भी बनने हैं इस सड़क को भी रेड लाइट फ्री करने के लिए। सब मिलाकर इसके भी पूरा होने का समय वही कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के ठीक पहले तक जा रहा है। उस रास्ते से आते-जाते नर्वस तो हम भी हुए जा रहे हैं। शीला जी तो, मुख्यमंत्री हैं उनको तो होना ही चाहिए।

 फिर इन सबके बाद सभ्य शहरी होने का सवाल तो सबसे ज्यादा नर्वसनेस की वजह है ही। पता नहीं कौन अचानक 135 किलोमीटर की रफ्तार से किसी को टक्कर मार दे। पता नहीं कौन सत्ता के रुआब में किसी को सरेराह पीटने लगे, पिस्टल लगा दे या फिर किसी पब-बार में अपनी बीवी-बहन की तथाकथित बेइज्जती का बदला लेने निकल पड़े।

 सरकार शहरों और शहरियों के भरोसे इंडिया ग्रोथ स्टोरी लिखना चाह रही है। लेकिन, देश के सबसे शानदार शहरी मॉडल में इतने छेद दिख रहे हैं कि दुनिया जब इस ओर तकने को तैयारी में है तो, इस शहरी मॉडल को चलाने-बनाने वाले नर्वस हैं। शीला जी की नर्वसनेस बेवजह नहीं है। ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या हम आने वाले समय के लिहाज से शहर बना पा रहे हैं। 

Thursday, January 14, 2010

शहर तो हमने बनाए ही नहीं

सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन, सारी तरक्की शहरों के जरिए होते देखने वाली सरकारों ने क्या सचमुच के शहर बनाए भी हैं।


 देश के महानगरों की बात आज मैं छोड़ रहा हूं। अगले लेख में देश का सबसे बड़ा शहर, दिल्ली कितना शहर हो पाया है इसकी बात करूंगा लेकिन, अभी बात देश के दूसरे शहरों की जो, किसी जिले के मुख्यालय होते हैं। कुछ समय पहले जौनपुर गया। वैसे तो, हमेशा ही जौनपुर में गाड़ी चलाना मौत के कुएं में कार चलाने जैसा होता है। जैसे मौत के कुएं में जरा सा चूके तो, जान गई वैसे ही जौनपुर में गाड़ी चलाते जरा सा सावधानी हटी कि बड़ा दुर्घटना घटी। सड़कें तो शहर जैसी हैं नहीं लेकिन, नरसिम्हाराव-मनमोहन की जोड़ी के करीब दो दशक पहले लाए गए उदारीकरण ने सबकी जेब में गाड़ी खरीदने लायक पैसे डाल दिए हैं।


इस बार जौनपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने शहर के तंगहाल ट्रैफिक को सुधारने का नया रास्ता निकाला है- बीच सड़क में पार्किंग। यानी पार्किंग सड़क के बीच डिवाइडर जैसा काम करे। और, दोनों तरफ ट्रैफिक बिना रुके चलता रहे। अब प्रशासनिक अधिकारियों के पास इतना बूता तो है नहीं कि तंग जौनपुर कस्बे की सड़कों को शहर की चौड़ी सड़कों में तब्दील करा सकें तो, बेचारे अपने बस भर का कर रहे हैं। अब इसमें हाल ये कि हमारी गाड़ी बस दोनों तरफ बमुश्किल ही रगड़ाते बच रही थी।


और लगभग जौनपुर जैसा ही हाल देश के सारे शहरों का है। अभी कुछ दिन पहले बालाजी मेंहदीपुर से लौटते समय मथुरा जाना हुआ। लगा बस नाम बदल गया है। वरना तो, गाड़ी चलाने में वैसे ही कौशल की जरूरत है जैसे जौनपुर में। अब देखिए ये साहब हमारी कार के आगे कितने शान से पाइप लादे चले जा रहे हैं। गलती इनकी नहीं है, कहां से ला जाएं।


मथुरा में हाईवे से घुसते ही मिलने वाला ट्रैफिक कृष्ण जन्मभूमि तक पहुंचते-पहुंचते दमघोंटू ट्रैफिक में बदल जाता है। और, कृष्ण जन्मभूमि की डीग गेट पुलिस चौकी के सामने से होली गेट की ओर जाने वाला रास्ता तो, बस सही में भगवान कृष्ण ही मालिक है। कृष्ण की नगरी है तो, यहां लड़ने-भिड़ने पर लोग राधे-राधे करके मुस्कुरा देते हैं। वरना तो, ये शहर और ये ट्रैफिक कब किसकी जान ले लें क्या पता। आजादी के 63 सालों में हमने कौन सा शहर बनाया ये तो, दिख ही रहा है। हां, गांव उजड़ जाएं इसका भरपूर बंदोबस्त हमारी सरकारी नीतियां करती जा रही हैं। देश का दिल दिल्ली सबको भाता है। इसकी चर्चा कल करूंगा कितना दिलवाला है ये दिल्ली शहर।



Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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