नाम की राजनीति

बांद्रा-वर्ली सी लिंक, राजीव गांधी ब्रिज—ये दोनों नाम एक ही पुल के हैं। पहला नाम बांद्रा-वर्ली सी लिंक- वो, है जो पुल बनने की योजना बनने के समय से लोगों के जेहन में दर्ज है। भौगोलिक, स्थानीय आधार पर देश के पहले समुद्री पुल की असली पहचान बताता है।



दूसरा- राजीव गांधी ब्रिज वो, नाम है जो सिर्फ इसलिए रखा गया कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सत्ता है। केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार है। स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी सोनिया और उनका बेटा राहुल देश के सबसे ताकतवर लोग हैं। यही वजह है जो, मुंबई की नई पहचान पर राजीव गांधी का नाम लिख दिया गया।



अब ये राजनीति के लिए ही नाम रखा गया है तो, इस पर राजनीति तो होनी ही है। शिवसेना-बीजेपी इस पर राजनीति शुरू कर चुके हैं। लेकिन, उनकी राजनीति सिर्फ मीडिया में कुछ दिन दिखेगी-दब जाएगी। कांग्रेस की राजनीति पुल पर अमिट छाप छोड़ चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे बेवजह देश के हर छोटे-बड़े शहर, हर छोटे-बड़े विकास की पहचान पर गांधी परिवार का नाम खोद दिया गया है। नामों से भारत की पहचान बने तो, पूरा भारत गांधी परिवार के राजवंशीय शासन की तरह दिखता है।



बीजेपी MLC ने तो मामला अदालत के सामने रख दिया है कि जब शिवसेना-बीजेपी की सरकार के समय पुल का नाम वीर सावरकर रखा गया था तो, अभी ये नाम क्यों बदला गया। उसका जवाब तो, अदालत से पहले मैं ही दे देता हूं कि जब सत्ता का इस्तेमाल करके वीर सावरकर नाम रखा गया तो, सत्ता की ही ताकत से उसके राजीव गांधी पुल बनने पर एतराज क्यों। लेकिन, मुझे भी राजीव गांधी के नाम पर इस पुल के होने से एतराज है। वो, इसलिए कि राजीव गांधी महाराष्ट्र, मुंबई, बांद्रा, वर्ली कहीं से किसी तरह से जुड़े होते तो, भी ये चल जाता। अच्छा भला नाम था- मुंबई के दो उपनगरों- बांद्रा-वर्ली की पहचान से जुड़ा हुआ।


भारतीय इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) के इस नायाब नमूने पर जाने क्यों राजनीति की काली नजर गड़ गई। इसका नाम गेटवे ऑफ इंडिया जैसा-इंडिया गेट जैसा ही कुछ रख देते तब भी बेहतर था।