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Friday, June 20, 2014

कच्चे तेल की फिसलन


बीते एक हफ्ते से कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही है। हफ्ते भर में कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब दस डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ गईं। इराक में विद्रोहियों और वहां की सेना के बीच चल रहे युद्ध की वजह से ये सब हो रहा है। विद्रोही आतंकवादियों ने सेना के कई अहम ठिकानों, शहरों पर कब्जा किया और जब वो तेल कुओं पर कब्जा करने लगे तो दुनिया की नींद उड़ने लगी। खबर आई कि इराक की सबसे बड़ी रिफाइनरी पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। इराक की राजधानी बगदाद से दो सौ किलोमीटर दूर बैजी की ये रिफाइनरी हर दिन तीन लाख बैरल कच्चे तेल को इस्तेमाल के लायक बनाती है। हालांकि, ये रिफाइनरी फिर से इराक की सेना के कब्जे में आ गई है। लेकिन, अगर ये रिफाइनरी ज्यादा समय तक बंद रहती है तो इराक के लिए घरेलू आपूर्ति पूरा करना मुश्किल हो जाएगा। और इससे दुनिया के तेल बाजार पर भी सीधा असर पड़ेगा। दरअसल मामला यही है कि इराक में शिया सरकार और सुन्नी विद्रोहियों के बीच जो युद्ध चल रहा है उसका सबसे बुरा असर फिलहाल इराक पर ही पड़ रहा है। अभी तक भारत के संदर्भ में देखें तो किसी भी तरह की कोई मुश्किल हमारी आपूर्ति पर नहीं है। लेकिन, खबरें जिस तरह से आ रही हैं उसमें भारत का कोई भी आम व्यक्ति तेल के मामलों का विद्वान बनकर सीधे बता देता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार और देश की जनता मुश्किल में आने वाली है। क्योंकि, इराक संकट की वजह से भारत को कच्चा तेल महंगा मिलेगा और आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के महंगे होने के असर से फिर से भारत के लोगों को महंगाई के दुष्चक्र में फंसना पड़ेगा। ये काफी हद तक सच्चाई है। लेकिन, इसकी वजह सिर्फ इराक में रहा युद्ध नहीं है। इसकी असल वजह ये है कि भारत अभी भी करीब अस्सी प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। और जिस तरह से देश में प्याज और दूसरी जरूरी चीजों के दाम अच्छी आपूर्ति के बाद भी बढ़े हैं। ठीक वही दुनिया में भी हो रहा है। जमाखोरों, तेल एक्सचेंज पर कच्चा तेल खरीदने, बेचने वाले कारोबारियों ने इराक की स्थिति का फायदा उठाकर कच्चे तेल का भाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसी का असर है कि हफ्ते भर में कच्चा तेल दस डॉलर प्रति बैरल महंगा हो गया है। कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रखने में इस तथ्य का भी कोई असर नहीं हुआ कि दरअसल इराक में जहां से कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। वो, दक्षिणी इराक अभी भी इराक के गृह युद्ध से अछूता है।

भारत के संदर्भ में देखें तो अब तक आपूर्ति की कोई समस्या नहीं है। लेकिन, इराक के संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमतें काबू से बाहर होती दिख रही है। उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भारत को सालाना करीब 250 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल की जरूरत होती है और भारत सिर्फ 45 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल ही खुद खोज, निकाल पाता है। जाहिर है जब करीब अस्सी प्रतिशत भारत की जरूरत आयातित कच्चे तेल से पूरी होगी तो दुनिया के किसी भी कोने में, खासकर पश्चिम एशिया के देशों सउदी अरब, इराक, कुवैत, इरान में होने वाले हल्के से संकट से भी भारत में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसी बेहद जरूरी सामानों के दाम बढ़ने की आशंका हो ही जाएगी। इसके साथ ये भी तथ्य है कि जिस तरह से पूरे इलाके में लगातार गृह युद्ध हो रहा है और वहां आतंकवादी और विद्रोही मजबूत हुए हैं उसमें इस इलाके में लंबे समय तक शांति की उम्मीद रखना ही बेमानी है। इसीलिए जरूरी है कि भारत सरकार अब देश की ऊर्जा नीति पर नए सिरे से विचार करे। भारत की सरकार को ये सोचना होगा कि कब तक अस्सी प्रतिशत आयातित कच्चा तेल बताकर पेट्रोलियम उत्पादों की सारी समस्या के लिए विदेशी उतार-चढ़ाव को दोष दिया जाता रहेगा। अब जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार खुद तेल कुएं खोजने की कोशिश करे। सरकारी तेल कंपनियों के जरिए और देश की निजी कंपनियों के जरिए। नरेंद्र मोदी की जब सरकार बनी थी तो एक उम्मीद ये भी की जा रही थी कि पेट्रोलियम के नाम पर बने मंत्रालय को ऊर्जा मंत्रालय में बदला जाएगा। और ऊर्जा से संबंधित सारे फैसले इसी मंत्रालय के अधीन लिए जाएंगे। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये तो तय करना ही होगा कि देश को वो जिस स्वाभिमान से जगाने की कोशिश चुनावों के दौरान करते रहे हैं। वो कैसे जाग पाएगा अगर देश की सबसे बड़ी ऊर्जा की जरूरत हमारे लिहाज से नहीं दुनिया के दूसरे देशों में होने वाली अच्छी-बुरी गतिविधियों के लिहाज से तय होगी। अच्छी बात ये है कि यूपीए की सरकार ने जाते-जाते पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी को धीरे-धीरे लगभग खत्म कर दिया है। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार के पास ये मौका है कि दुनिया के बाजार के लिहाज से कीमत अदा करने के लिए तैयार भारतीयों को सस्ते पेट्रोलियम उत्पाद देने की नीति तैयार की जाए। लेकिन, इसके लिए एक काम और करना होगा। जैसे धीरे-धीरे करके देश की जनता को बिना सब्सिडी के जीने की आदत डाली गई है। वैसे ही देश की कंपनियों को भी सरकार को समझाना होगा कि वो सरकार से ऐसी किसी मदद की उम्मीद न रखें जो, देश की जनता के हितों में से काटकर उन कंपनियों का हित पूरा करती हो। ऊर्जा में सरकार को एक कोशिश ये भी करनी चाहिए कि वो ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा क्षेत्र में सरकारी कंपनियों को ही प्रोत्साहित करे। जहां जरूरत हो वहां निजी कंपनियों को भी आगे बढ़ाया जाए। सरकार को नीतियों में एकरूपत रखने की भी जरूरत है। नरेंद्र मोदी को पांच साल सरकार चलाने का मौका मिला है, पूरी ताकत मिली है। तो इसका इस्तेमाल उन्हें देश की ऊर्जा ताकत बढ़ाने में करना होगा। अभी रिलायंस के साथ चल रहा विवाद खत्म हो। लेकिन, इस विवाद के खत्म होने में किसी भी तरह से सरकार (सीधा सा मतलब देश की जनता) के हितों से समझौता होता नहीं दिखना चाहिए। रंगराजन समिति के फॉर्मूले पर नरेंद्र मोदी खुद विचार कर रहे हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी इस पर विचार का प्रस्ताव दिया है। सरकार इस पर जल्दी से फैसला ले। अच्छा होगा कि एक जुलाई को एक तय नीति के साथ गैस की कीमतें लागू हो जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेट्रोलियम मंत्रालय को देश, दुनिया के जानकारों की राय लेकर कम से कम पांच साल की एक बेहतर ऊर्जा नीति तैयार करनी होगी। जिसमें कच्चा तेल, गैस, कोयला, बिजली- सबकी आपूर्ति के मामले में ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भर होने की पक्की योजना हो। वरना बिना आपूर्ति पर असर पड़े भी इराक या दूसरे पश्चिम एशिया के देशों का एक धमाका भारतीयों की रसोई और सड़कों, मंडियों में आग लगा देगा। और कच्चे तेल की फिसलन पर पूरा देश फिसलता, गिरता रहेगा।

Sunday, April 06, 2008

अमेरिकी मान रहे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है

अमेरिका- दुनिया का दादा। एक ऐसा देश, जिसकी दुनिया में छवि ये है कि वहां के लोग दुनिया के दादा का ये खिताब अपने पास रखने के लिए अपने प्रतिनिधियों (राष्ट्रपतियों) के हर फैसले पर आंख-मूंदकर मुहर लगा देते हैं। यहां तक कि इराक को नेस्तनाबूद करने के अपने राष्ट्रपति के फैसले को भी उन्होंने दुनिया में अपनी बढ़ती ताकत के सुबूत के तौर पर मान लिया। लेकिन, अब शायद अमेरिकी बदल गए हैं या दुनिया में ताकत, कंज्यूमर, बाजार की बदलती ताकत ने उन्हें बदल दिया है।

The newyork times और CBS News अमेरिकी चुनाव से पहले पूछे गए पोल में शामिल अमेरिकियों में से 81 प्रतिशत कह रहे हैं अमेरिका इतने गलत रास्ते पर चल रहा है कि अब संभालना मुश्किल हो गया है। दरअसल इराक में अमेरिका की मचाई भारी तबाही और अमेरिका पर लादेन के हमले ने अमेरिकियों का डराया भी और चेताया भी है। शायद यही वजह है कि उन्हें ये लगने लगा है कि मामला गड़बड़ा गया है। अमेरिकी, अब अमेरिका से बाहर दुनिया के सबसे ज्यादा लोगों के दुश्मन हो गए हैं।

इसीलिए क्या महिलाएं-पुरुष, क्या बड़े-बच्चे, शहरी, कुछ गांव में बचे अमेरिकी और सिर्फ हाईस्कूल की पढ़ाई कर निकले छात्र- सब कह रहे हैं कि अमेरिका को सही रास्ता चुनना होगा। यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए आपस में और विरोधी पार्टी से लड़ रहे डेमोक्रैट और रिपब्लिकन भी मान रहे हैं अमेरिकी सरकार की नीतियों में बड़े सुधार की जरूरत है। 71 प्रतिशत लोग मान रहे हैं कि पांच साल में हालात अमेरिकियों के लिए बेहद खराब हुए हैं। सिर्फ 4 परसेंट को लगता है कि बीते 5 सालों में कुछ पहले से अच्छा हुआ है।

ये सब सुनने में बड़ा अच्छा लग रहा है कि अमेरिकी इतना बदलान पसंद कर रहे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि अमेरिका के इन दो मीडिया हाउस के सर्वे में अमेरिकियों के ये भाव इसीलिए सामने आ रहे हैं अमेरिकी इस समय बुरी तरह डरे हुए अमेरिका की दुनिया में ताकत घटी है। अमेरिकियों की खर्च करने की ताकत कम हो रही है। एक-एक झटके में एक-एक लाख नौकरियां घट रही हैं। और, ये लगातार कई महीनों से हो रहा है। रियल एस्टेट सेक्टर बरबाद हो गया है।

कुल मिलाकर सीधी सी बात ये है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मंदी आ गई है (फिर भी अमेरिकी सरकार और अर्थशास्त्री, अमेरिकियों को ये दिलासा देने की कोशिस कर रहे हैं कि मंदी का खतरा है)। अमेरिका भारतीय दार्शनिक चार्वाक के सिद्धांत- ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, यावत जीवेत सुखम जीवेत- के शिकार हो गए हैं। क्रेडिट की ऑक्सीजन पर जिंदा अमेरिका का क्रेडिट मार्केट (साख तो रह ही नहीं गई है।) पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

इसको आप ऐसे समझ सकते हैं अच्छी नौकरी और अगले साल उस नौकरी से भी अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद में अमेरिकियों में बरसों से घर-गाड़ी खरीदनी की होड़ लगी है। उस घर खरीदने की भूख को तृप्त करने के लिए बिल्डर्स बिना सोचे बड़े-बड़े शानदार कंक्रीट के जंगल तैयार करते चले गए। उन जंगलों को तैयार करने के लिए बैंकों ने उन्हें बिना सोचे-समझे और सही आंकलन किए, मनचाहा लोन दे दिया। यहां तक बैंकों ने ऐसे लोगों को भी लोन देने शुरू कर दिए जिनके रिकॉर्ड लोन लौटाने के मामले में बेहतर नहीं हैं या यूं कहिए कि आगे उनकी खर्च करने और कर्ज चुकाने की उतनी बेहतर क्षमता नहीं दिख रही है।

तेजी के दौर में अमेरिकी बेतहाशा खर्च करते रहे और तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के भरोसे अमेरिकी शेयर बाजार में शेयरों के भाव छलांग लगाते रहे। लेकिन, इस बीच मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में डिमांड में कमी आई और इसकी वजह से उन्हें कर्मचारियों को नौकरी से निकालना पड़ा। नौकरी से निकाले गए कर्मचारी घरों के कर्ज की स्त चुकाने में नाकाम होने लगे। कंक्रीट के जंगलों के खरीदार कम होने लगे। कई बड़े बिल्डर्स के प्रोजेक्ट रुक गए और बिल्डरों को दिया बैंकों का कर्ज एनपीए यानी ऐसा कर्ज बन गया जिसके लौटने की गुंजाइश कम ही दिखती है।

घर खरीदने वाले घटे तो, तेजी से घरों की कीमत घटी। जिन्होंने अपने घर गिरवी रखकर बैंकों से कर्ज लिया था। उसकी कीमत कर्ज से बहुत कम रह गई। बस भारतीय किसान के गरीबी के दुश्चक्र की तरह अमेरिकी फाइनेंशियल मार्केट क्रेडिट के दुश्चक्र में फंस गया। अमेरिका का पांचवां सबसे बड़ा बैंक बेयर स्टर्न्स, जिसके एक शेयर का भाव जनवरी में 150 डॉलर था। मार्च में सिर्फ 10 डॉलर शेयर के भाव पर बिक गया। अब मंदी के इससे बड़े लक्षण क्या होते हैं। लेकिन, अभी भी सफेद दाढ़ी वाला अमेरिकी सेंट्रल बैंक का चेयरमैन बेन बर्नानके और कार्टूनिस्ट की पहली पसंद वाली शक्ल वाला अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दोनों ही कह रहे हैं कि अमेरिका को मंदी से बचाने की कोशिश जारी है।

खैर, हम फिर से लौटते हैं कि अमेरिकी कह रहे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है। वैसे इस सर्वे में शामिल 72 प्रतिशत अमेरिकी अभी भी मान रहे हैं कि उनके घर की आर्थिक स्थिति ठीक है। लेकिन, जब ये पूछा गया कि हाल के बरसों में आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है तो, ये कहने का दम सिर्फ 23 प्रतिशत अमेरिकियों में बचा है। 28 प्रतिशत खुद को पहले से गरीब मान रहे हैं (वैसे ये शब्द अमेरिकी सिर्फ विकासशील नाम के देशों के लोगों के लिए इस्तेमाल करते हैं) और 48 प्रतिशत कह रहे हैं कि पांच साल पहले जितने ही पैसे अब भी उनके पास हैं।

अपने स्वास्थ्य के लिए 42 प्रतिशत अमेरिकी बेहद चिंतित हैं। 29 प्रतिशत को थोड़ी बहुत चिंता है। 28 प्रतिशत ही हैं जो, पुराने अमेरिकियों जैसी बात कर रहे हैं कि उन्हें खास चिंता नहीं है। घर की कीमत को लेकर 31 प्रतिशत अमेरिकी बहुत चिंतित हैं, 38 प्रतिशत की चिंता अभी हल्की-हल्की है। लेकिन, 30 प्रतिशत को अब भी चिंता नहीं है। लेकिन, फिर भी 81 प्रतिशत अमेरिकी कह रहे हैं अमेरिका बहुत गलत रास्ते पर चला गया है। भीषण त्रासदी का समय है दुनिया के दादा के लिए।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...