नेताओं को शर्म क्यों नहीं आती


भारतीय क्रिकेट की दुनिया की सबसे बड़ी जीत हासिल कर नई टीम इंडिया भारत लौटी तो, मुंबई के लोगों ने टीम का ऐतिहासिक सम्मान किया। जीत जितना ही ऐतिहासिक। विश्व विजेता टीम के हर खिलाड़ी को सम्मान के साथ ही इनाम से भी लाद दिया गया। आखिर ऐसा मौका 24 साल बाद जो देश को मिला था। लेकिन, ऐसे ऐतिहासिक मौके पर भी नेताओं ने देश को शर्मसार कर दिया।
मुंबई एयरपोर्ट से वानखेड़े स्टेडियम पहुंचने तक बीसीसीआई अध्यक्ष शरद पवार सहित कांग्रेस-एनसीपी के नेता विश्व विजयी टीम को इस तरह से घेरे रहे जैसे, धोनी ब्रिगेड महाराष्ट्र सरकार या फिर कांग्रेस-एनसीपी की टीम हो। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के साथ ही पवार के भरोसेमंद महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री ने टीम इंडिया को बंधक सा बना लिया था। अच्छा हुआ दो मंजिल की खुली बस में भारतीय सूरमाओं को आना था नहीं तो, पवार-पाटिल जैसे नेता तो शायद ही असली हीरोज की हमें शक्ल भी देखने देते। टीम के साथ लोगों के उमड़े सैलाब का कांग्रेस-एनसीपी राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश में ऐसे लगे थे कि पार्टी के कार्यकर्ता इस ऐतिहासिक जीत पर भी भारत झंडा लहराने के बजाए अपनी पार्टी का झंडा लहरा रहे थे।

इतने से भी इन बेशर्म नेताओं का पेट नहीं भरा। वानखेड़े स्टेडियम में धोनी के धुरंधर जब सम्मान के लिए मंच पर पहुंचे तो, उन्हें पीछे की सीट पर टरका दिया। सिर्फ कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को ही पहली लाइन में शरद पवार, निरंजन शाह, ललित मोदी, राजीव शुक्ला, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री आर आर पाटिल और राज्य के ही एक दूसरे मंत्री वसंत पुरके के साथ जगह मिल पाई। अब आप ही बताइए वसंत पुरके को आप जानते हैं क्या। शुरू में पहली लाइन में बैठे युवराज सिंह को तो एक बेशर्म नेता के लिए दूसरी लाइन में जाकर बैठना पड़ा। मंच पर पहुंचने के बाद ही खिलाड़ियों को पता चला कि जीत भले ही उनके दमखम से आई हो लेकिन, इसका श्रेय लेने के लिए बेशर्म नेता और बोर्ड के अधिकारी पहले से ही पूरी तैयारी करके बैठे हैं। आखिर, सबको दिखाना जो था कि टीम इंडिया उनकी ही बदौलत ही जीती है।

अब इन बेशर्म बोर्ड अधिकारियों और नेताओं से कोई ये पूछे कि वो उस समय कहां थे जब, भारतीय टीम विश्व कप से बुरी तरह हारकर बाहर हो गई थी। तब बीसीसीआई के इन्हीं अध्यक्ष शरद पवार ने टीम की हार की जांच की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी। और, सारा दोष खिलाड़ियों पर ही डाल दिया था। अब कोई इनसे पूछे कि भाई जब टीम के खराब प्रदर्शन में तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। तो, फिर विश्व कप जीतने वाली टीम के मैदान में अच्छे खेल के तुम साझीदार कैसे हो गए।

इनकी बेशर्मी का आलम ये था कि बड़ी मुश्किल से ही किसी को भी पूरी टीम को एक साथ देखने को मिला होगा। ज्यादातर मौकों पर पवार के साथ धोनी, पाटिल के साथ धोनी, बोर्ड अधिकारियों के साथ धोनी या फिर टीम के अलग-अलग खिलाड़ी अलग-अलग नेताओं-अधिकारियों के साथ दिख रहे थे। कल अखबारों को छापने के लिए भी विश्व विजेता पूरी टीम के दर्शन शायद ही हो पाएं। अब ये बेशर्म नेता-बोर्ड अधिकारी तो समझने से रहे। जरूरत आपके जागने की है। ये सिर्फ बात क्रिकेट की ही नहीं है। हर जगह बेशर्म नेता और ब्यूरोक्रैट आपका हमारा हिस्सा छीनकर अपनी छवि चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यहां तक कि अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए हमारा आपका गलत इस्तेमाल भी कर लेते हैं।

धोनी ने प्रेस से बात करते हुए कई बहुत महत्व की बातें कहीं। पहली ये कि देश के छोटे शहरों में असली प्रतिभा है। उनमें ज्यादा विश्वास है, कुछ कर गुजरने का। टीम इंडिया टीम की तरह खेली। इस देश के नेता तो, शायद ही इससे कुछ सीखें। क्योंकि, वो तो सब जानते हैं, इसीलिए कुछ नहीं करते। हमें-आपको देश के छोटे शहरों के लोगों को, देश के जवान लोगों को इससे सबक लेना होगा।
आखिर विश्व कप जीतने वाली टीम के स्वागत में नेताओं के पीछे तिरंगे की जगह अपने नेता के लिए झंडा लेकर चलने वाले लोग भी हमारे-आपके बीच के ही थे। यानी इन नेताओं को ऐसी बेशर्मी करने का मौका भी हमारी-आपकी वजह से ही मिल रहा है। धोनी की यूथ ब्रिगेड ने वो कमाल किया है जो, बड़े-बड़े निजी रिकॉर्ड वाले खिलाड़ियों से सजी टीम इंडिया भी 24 साल से नहीं कर सकी।
आज देश की आधी से ज्यादा आबादी जवान है। इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि शायद आजादी के साठ साल बाद नौजवान देश से इन बेशर्म नेताओं को धक्का मारकर देश के लिए सच में सोचने-करने वाले नेताओं को मजबूत करेगा। अगर नहीं चेते तो, शायद फिर इस इतिहास को दोहराने के लिए या इससे बेहतर करने के लिए अगले पता नहीं कितने सालों का इंतजार करना होगा। और, तब टीम के कप्तान को भी नेताओं-अधिकारियों की वजह से अगली पांत में शायद ही बैठने का मौका मिल सके।