Saturday, September 29, 2007

फिर एक दिल्ली वाले ने आग लगा दी!

इंडियन आइडल प्रतियोगिता से कौन बाहर हुआ। कौन अंदर आया। इस पर हर बार की तरह इस बार भी खूब विवाद हुआ। लेकिन, इस बार जब फाइनल मुकाबला प्रशांत तमांग और अमित पॉल के बीच हुआ तो, एक जो सबसे अच्छी बात दिखी वो ये कि इंडियन आइडल के बहाने पूरा पूर्वोत्तर भारत, भारत में खुशी-खुशी शामिल हो गया था। पूर्वोत्तर भारत के कई शहर प्रशांत तमांग और अमित पॉल के पोस्टरों से लदे पड़े थे। सबको लग रहा था पूर्वोत्तर भारत का भाई, बेटा, पूरे भारत का हीरो बनने जा रहा है। ये पहली बार हो रहा था।

वैसे इससे पहले भी असम के देबोजीत उर्फ देबू इंडियन आइडल बन चुके हैं। और, देबोजीत की प्रतिभा पर भी किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन, पिछली बार मीडिया में बार-बार ये बात आती रही कि असम के उग्रवादी संगठन उल्फा ने कहा है कि अगर देबोजीत नहीं जीता तो, वो हिंसा फैला देंगे। उल्फा की ओर से देबोजीत के समर्थन में एक फरमान जारी करने की भी खबर थी। इस बार के इंडियन आइडल की दौड़ में लगे सुर के सरताजों के लिए न तो किसी ने फरमान जारी किया और न ही इस बार कहीं से किसी क्षेत्रवाद या भाषावाद की बदबू आई।

पिछले जाने कितने सालों से भारत से कटे होने का दर्द झेल रहे पूर्वोत्तर भारत के लोग इंडियन आइडल के बहाने भारत से जुड़कर खुश थे। लेकिन, रेडियो पर बकबक के लिए पैसे लेने वाले एक RJ को पूर्वोत्तर भारत के लोगों की ये खुशी बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपने शो में हंसी-मजाक में कह दिया कि अगर चौकीदार इंडियन आइडल बनने लगेंगे तो, चौकीदारी कौन करेगा। बस फिर क्या था। हफ्ते भर पहले इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के पोस्टरों के साथ रैली वाली सड़क पर आग जल रही थी। खुशी मनाने वाले चेहरों पर गुस्सा था। मिठाइयां बांटने वाले लोग तोड़फोड़ कर रहे थे।

लेकिन, अगर आपको ये लग रहा है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के दिलों में जो आग लगी है वो, सिर्फ दिल्ली के एक RJ के बर्ताव की वजह से है तो, आप गलत हैं। दरअसल ये गुस्सा दिल्ली में बैठी सरकार की उस मानसिकता के खिलाफ है जो, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ एक सा बर्ताव नहीं करते। ये उस बर्ताव के खिलाफ है जो, पिछले कई दशकों से दिल्ली की सरकार पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ कर रही है। दिल्ली में सत्ता में रहने वाले नेताओं के भाषणों में ही भारत का हिस्सा बनकर रह गए हैं, पूर्वोत्तर भारत के लोग। कश्मीर में जेहाद के लिए पाकिस्तान से मदद मिलती है, इसका हल्ला बार-बार होता है। और, घाटी का आतंकवाद सुर्खियों में भी बना रहता है। लेकिन, क्या असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में सामान्य जिंदगी के लिए सेना और उग्रवादियों के बीच पिस रहे लोगों की बात पूरे भारत तक पहुंच पाती है। अगर पहुंच पाती तो, वहां की महिलाओं को निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन न करना पड़ता।

पूर्वोत्तर भारत बारे में भारत के दूसरे हिस्से में रहने वालों की राय का अंदाजा इस एक बात से ही लगाया जा सकता है। देश की सबसे प्रतिष्ठित (रुतबेदार) परीक्षा IAS पास होने के बाद भी लोग पूर्वोत्तर का कैडर नहीं लेना चाहते। वो, दिल्ली, अपने राज्य या फिर किसी दूसरे नजदीक के राज्य में SDM, DSP बन जाना पसंद करते हैं। लेकिन, असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के किसी जिले में DM, SP नहीं बनना चाहते। दरअसल देश में सरकार चलाने वालों ने जिस संवेदनहीन तरीके से पूर्वोत्तर के मामले को खराब किया है। उससे पूर्वोत्तर के लोग मुश्किल से ही भारत के साथ जुड़ पाते हैं। यही वजह है कि चुनावों में भारत विरोध वहां वोट बटोरने का जरिया बन जाता है।

आजादी के इतने सालों के बाद भी अगर कोई सर्वे कराया जाए कि देश के लोगों का सामान्य ज्ञान पूर्वोत्तर भारत के बारे में कितना है तो, चौंकाने वाले आंकड़े सुनने को मिल सकते हैं। इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के बारे में (गोरखाओं को चुभने वाली टिप्पणी) शर्मनाक टिप्पणी करने वाले RJ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी इसलिए भी जरूरी है कि देश में जुड़ने की पूर्वोत्तर भारत के लोगों की कोशिश फिर एक दिल्ली वाली मानसिकता की वजह से बेकार न हो जाए।

3 comments:

  1. सचमुच पूर्वोत्तर भारत की प्रतिभा पर समग्र राष्ट्र गौरवान्वित है!

    किन्तु ये इण्डियन आइडल, वॉइस ऑफ इण्डिया आदि आम जनता को ही लूट रहे हैं। एसएसएस का खेल है सारा। एसएमएस की दर तीन रुपये तक वसूली जाती है। एसएमएस के कुल कमाई 30 करोड़ की हुई है तो प्रतियोगिता में विजेताओं को एक करोड़ और अन्य खर्च मिलाकर कुल 3 करोड़ खर्च हुए होंगे। शेष 27 करोड़ का फायदा ही हुआ है आयोजकों को। आम जनता की जेब से अप्रत्यक्ष वसूल कर कमाई करने का तरीका भर है यह।

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  2. Anonymous9:26 PM

    जाकी नितिन पहले दर्जे का बेवकूफ और निहायत ही नालायक इन्सान है. उसे उल्लु के पट्ठे को सुनता कौन है.

    लेकिन भाई, आप क्या फरमा रहे हैं? ईंट का जवाब पत्थर से दे रहे हैं.

    उस गधे ने पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के बारे में गलत कहा, उसके बदले में आप दिल्ली के लोगों को कह रहे हैं?

    खबीस की औलाद नितिन के बारे में तो हमारे विचार साफ है.

    आपके बारे में क्या सोचें?

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  3. आपने अपना नाम नहीं लिखा। खैर, जो भी हो मैं इतना बता दूं कि दिल्ली हम सबकी है। और, हम सभी दिल्ली वाले ही हैं। अगर आपने लेख ध्यान से पढ़ा होता तो मेरे बारे में साफ समझ में आ जाता। जहां तक बात रही दिल्ली वाला लिखने की तो, दिल्ली वाले यानी वो सरकारी मानसिकता वाले लोग जो,देश के अलग-अलग हिस्से में रहने वाले लोगों के साथ अलग-अलग बर्ताव करती है। जो, समझती है कि मेट्रो शहरों के अलावा भारत बसता ही नहीं। मामला सिर्फ पूर्वोत्तर का ही नहीं है। अगर आप पढ़ें तो, समझकर जवाब जरूर दीजिएगा। इंतजार रहेगा।

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