शूटआउट एट सिविल लाइंस!

बीसों पुलिस वाले निहत्थे-निरीह आदमी पर गोलियां चला रहे थे। खून से लथपथ दुबला-पतला सा दिखने वाला आदमी टीवी पर चिल्ला रहा था। मुझे बचा लो, मैं सरेंडर करना चाहता हूं। आजादी के साठ साल पूरे होने के एक दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक एक टीवी चैनल के कैमरे पर पहली बार लाइव शूटआउट के उदघोष के साथ शुरू हुआ वीडियो लगातार लाइव चलता रहा। कैमरे पर चीख रहा एंकर बार-बार ये बताना नहीं भूल रहा था कि ये एक्सक्लूसिव वीडियो सिर्फ उसी के पास है। यहां तक कि 15 अगस्त को जब सभी चैनलों के पास ये वीडियो पहुंच गया, तब भी। आखिर, शूटआउट एट लोखंडवाला फिल्म से भी बेहतर दृश्य जो थे।
चैनल पर काफी देर तक देखने के बाद ही ये रहस्य खुल पा रहा था कि टीवी पर खून से लथपथ अपनी जान की गुहार लगाने वाला कोई सामान्य आदमी नहीं था। उसने कुछ देर पहले ही पुलिस के एक सिपाही के सिर पर बम मारकर उसकी जान ले ली थी। उसने और उसके साथियों ने मिलकर एक इंस्पेक्टर का पैर भी गोली मारकर खराब कर दिया था। इतनी जानकारी देने के बाद टीवी एंकर या उससे फोनलाइन पर जुड़ा संवाददाता फिर चीखने लगता था... ये सही है कि पिंटू मिश्रा नाम के इस बदमाश ने एक पुलिस वाले की हत्या कर दी थी। बावजूद इसके हमारा सवाल यही है कि क्या पुलिस को इस बात का हक है कि वो किसी ऐसे आदमी पर गोली चलाए जो, निहत्था है और लगातार सरेंडर करने की बात कह रहा हो। वीडियो में बदमाश सरेंडर के लिए गुहार लगाता दिख रहा था। मौत सामने थी, इसलिए निरीह भी दिख रहा था। और, इसलिए देखने वाले लोगों को भी पुलिस आतंकवादी से कम नहीं लग रही थी। इसी बात को टीवी चैनल वालों ने जमकर भुनाया भी। हद तो तब हो गई, जब टीवी चैनलों पर इस वीडियो को साठ साल के भारत की आजादी के सच की तरह दिखाया जाने लगा। साठ साल के आजाद भारत की पुलिस का सच। ऐसे बिकने वाले कैप्शंस के साथ वीडियो लाइव चलता रहा। फिर किसी चैनल ने ये भी बताया कि मरने वाले बदमाश ने पहले भी कई अपराध किए हैं। जिसमें हत्या भी शामिल है। फिर ये भी कि वो और उसके साथी किसी की हत्या के ही मकसद से बम और गोलियां लेकर निकले थे। लेकिन, जागरूक टीवी पत्रकारों के सामने फिर वही सवाल मुंह बाए खड़ा था कि क्या किसी सरेंडर करने के लिए चिल्लाते निहत्थे आदमी को पुलिस गोली मार सकती है।

बीच-बीच में टीवी चैनल ये भी बता दे रहे थे कि ये वीडियो करीब एक साल पहले यानी सितंबर 2006 का है। ये वो घटना थी जिसके बाद तीन-चार घंटे तक इलाहाबाद शहर के सबसे पॉश रिहायशी और व्यवसायिक इलाके सिविल लाइंस में लोग दहशत में रहे थे। दो बदमाशों ने एक पुलिस सिपाही की हत्या की। एक इंस्पेक्टर पर गोली चलाई। इसके बाद जब पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेरा तो, वो भागते हुए सिविल लाइंस की गलियों में छिपने की कोशिश करने लगे। जब तक बदमाशों के पास बम-गोलियां बची रहीं वो, बीच-बीच में उसका भी लगातार इस्तेमाल करते रहे। वीडियो में भी ये साफ दिख रहा था कि पुलिस के जवान भी डर रहे थे कि कहीं से कोई बम या गोली आकर उन्हें लग ना जाए। वीडियो में एक पुलिस वाला जो, सिर्फ डंडा लिए हुए था। रिवॉल्वर वाले दरोगा का साथ ही नहीं छोड़ रहा था।

सिविल लाइंस इलाके के तीन से चार हजार लोग बंधक से बने हुए थे। जब बदमाशों के पास गोली-बम खत्म हो गया तो, उन्होंने सरेंडर करने की गुहार लगाई। अब सवाल यही है कि क्या जब किसी बदमाश के पास गोलियां बची रहें और पुलिस उसे मार गिराए तभी वो सही एनकाउंटर है। क्या कोई भी बदमाश पहले किसी की गोली मारकर (वो भी पुलिस वाले की) हत्या कर दे और उसके बाद सरेंडर करके अदालत से जमानत लेकर दहशत की मिसाल बन जाए। पुलिस एनकाउंटर को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन, जब लोगों की रक्षा करने वाले पुलिस वालों को ही अपनी जान पर खतरा बन आए तो, क्या उन्हें हथियार सिर्फ इसलिए मिलते हैं कि बदमाश गोली चलाए तो, उससे सिर्फ बचाव किया जा सके। टीवी चैनलों ने एक बदमाश को हीरो बनाने की कोशिश की। सिवाय एक टीवी चैनल के किसी ने भी पुलिस वालों की जान की कीमत नहीं समझी। जो, पुलिस वाला बदमाश के बम से मरा, उसके परिवार वालों के मानवाधिकार का सवाल नहीं उठाया।

सवाल ये भी है कि साल भर बाद ये वीडियो टीवी चैनलों के पास कैसे आया। ये किसी कछार या सूनसान इलाके में पुलिस ने किसी को ले जाकर हत्या नहीं की थी। ये एक बदमाश की पुलिस की हत्या के बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई थी जिसक गवाह हजारों वो लोग थे, जिनकी जान पर बन आई थी। फिर ये वीडियो एक्सक्लूसिव के नाम पर किस नीयत से बेचा गया। वैसे मुझे जो उड़ती खबरें मिली हैं कि इस वीडियो को बनाने वाले ने एक चैनल को ये वीडियो 18 लाख रुपए में बेचा। दूसरे चैनलों को भी मु्फ्त में तो नहीं ही मिला होगा। टीवी चैनलों के लाइव विजुअल का दबाव था कि मायावती सरकार ने इस मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं। डीजीपी विक्रम सिंह भी दहाड़ रहे हैं कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वो कितनी भी ऊंची पोस्ट पर क्यों न हो। मानवाधिकार के लोग भी झंडा-बैनर पुलिस वालों के खिलाफ तान चुके हैं। मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि निश्चित तौर पर पुलिस किसी को भी गोली मारे ये बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन, इस मामले में जब पुलिस को अपनी ही जान गंवानी पड़ी हो, ऐसे मामले में अगर गलत कार्रवाई हुई तो, आगे कोई अपने परिवार के लोगों को पुलिस में क्यों भर्ती कराएगा, बदमाश ही बनाएगा ना। जो, गोलियां चलाकर जान लेगा-दहशत फैलाएगा। उसके बाद गोलियां खत्म होने के बाद सरेंडर कर देगा।