ये फर्क इंडिया और भारत का है

दो दिन पहले मैंने हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म के सर्वे के लिहाज से लिखा था कि किस तरह देश के शहर तेजी से महंगे हो रहे हैं। लेकिन, इसके बाद भी दुनिया के कामकाजी लोगों के लिहाज भारत अभी एशिया के ही शहरों में भी सबसे सस्ता ही है। इस पर उम्दा सोच की टिप्पणी आई कि यहां आमदनी कम है वरना तो, दुनिया के दूसर शहरों के लिहाज से भारत के शहर अभी भी बहुत सस्ते हैं। इस पर अनिल रघुराज की टिप्पणी आई जो, ज्यादा वाजिब थी कि इस लिहाज से दुनिया के दूसरे शहरों में रहना ज्यादा सुखकर है। और, मुझे लगता है कि कहीं भी महंगाई का पैमाना वहां रहने वालों कमाई के लिहाज से ही तय होता है।
मैंने क्यों कहा कि मुंबई और दूसरे मेट्रो शहरों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। इसको नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) का ताजा सर्वे भी पुख्ता करता है। इस सर्वे के मुताबिक, देश में 83 करोड़ 60 लाख लोग ऐसे हैं जो, हर रोज बीस रुपए यानी सिर्फ 600 रुपए महीने की कमाई कर पाते हैं। वैसे देश में गरीबी रेखा की परिभाषा में ये सभी लोग गरीबी रेखा के ऊपर ही आते हैं। क्योंकि, गरीबी रेखा के नीचे उन्हीं लोगों को रखा जाता है जो, हर रोज 12 रुपए से भी कम की कमाई करते हैं, यानी इतनी ही रकम जितने में हम-आप जैसे मेट्रोज में रहने वाले लोग प्यास लगने पर पानी पी जाते हैं। उनती ही रकम में पूरा दिन चलाने वाले ही इस देश में गरीबी रेखा के नीचे आते हैं।
अब आपको लग रहा होगा कि ये कैसे संभव है कि, देश के 77 प्रतिशत लोग सिर्फ बीस रुपए रोज कमा रहे हों जबकि, हर रोज देश और तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी मनमोहक 10 प्रतिशत की विकास दर की बात कर रही है। वैसे इसी मनमोहक आंकड़े से विश्व बैंक भी प्रभावित जो, कहता है कि भारत में एक व्यक्ति की सालाना कमाई करीब एक हजार डॉलर यानी करीब चालीस हजार रुपए है। दरअसल एक व्यक्ति की कमाई का विश्व बैंक का आंकड़ा इतना खाया पिया इसलिए दिखता है। क्योंकि, द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास और दुनिया को मुट्ठी में करते भारतीय उद्योगपतियों की जेब में इतना पैसा बढ़ गया है कि वो देश के गरीबों को भी अमीर दिखा देता है। लेकिन, जब उन अमीरों और अमीर होते लोगों को हटाकर सिर्फ खेती या फिर दूसरी ऐसी जगहों पर बिना तय रकम के काम करने वाले लोगों का सर्वे किया गया तो, निकलकर आया कि वो तो, जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खा जाते हैं। दरअसल वो कमाते ही इतना कम हैं कि खाने को भी पूरा नहीं होता।
नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) के ही आंकड़ों के मुताबिक, देश के किसानों में से 84 प्रतिशत किसान हर महीने सिर्फ 2115 रुपए कमा पाते हैं जबकि, उनका खेती पर खर्च हर महीने करीब 2770 रुपए होता है। और, यहीं से शुरू होती है किसान के कर्ज के जाल में फंसने और आतमहत्या की। ऐसा नहीं है कि सरकार ये सब जानती नहीं है। ये सर्वे सरकार से जुड़ी संस्था ने ही कराया है सरकार में बैठे लोगों को ये असलियत अच्छे से मालूम है। लेकिन, उन्हें मर्सिडीज में जाने वाला किसान ही दिखता है। जो, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहा है। और, बड़े-बड़े व्यापारियों को भी पीछे छोड़ रहा है। वो, एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति के मालिक मुकेश अंबानी के रिलायंस फ्रेश को सीधे सब्जी, अनाज बेच रहा है। उसके पास देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी के मालिक सुनील भारती मित्तल के नुमाइंदे सौदे के लिए आ रहे होते हैं। टाटा-बिड़ला-मित्तल-गोदरेज सब बियानी के दिखाए रास्ते पर रिटेल में कूदे जा रहे हैं। और, इसलिए ज्यादातर को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का धंधा ज्यादा मुनाफे वाला दिख रहा है। इसलिए हर जगह बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ही दिखती है। लेकिन, ये भी समझना जरूरी है कि बावजूद इसके खेती में क्यों ढाई प्रतिशत की भी विकास दर नहीं मिल पा रही है।
कुल मिलाकर मामला यही है कि देश में एक वर्ग बना है जो, अचानक मेट्रो में कारों में घूमने लगा है। जो, मॉल में खरीदारी करता है और मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। लेकिन, बड़ा वर्ग अभी भी इन लोगों को अचरज से ही देखता है। उसको लगता है कि ये कहीं दूसरे देश के लोग तो नहीं हैं। शायद उसकी समझ कुछ ठीक भी है क्योंकि, कमाई शाइनिंग इंडिया में रहने वालों की ही बढ़ रही है। भारत और इंडिया में बढ़ते फर्क की ही वजह से ही देश किसी शहर-गांव-कस्बे में 20 रुपए रोज कमाने वाला भी गरीबी रेखा के ऊपर है। और, मुंबई-दिल्ली जैसे मेट्रो में रहने वाला हर रोज 2000 रुपए की कमाई के बाद भी अमीरों के बीच में अपने को गरीबी रेखा के आसपास ही पाता है।