Tuesday, September 16, 2014

लाइफ इन अ मेट्रो!

स्पर्श सुख
वो दोनों शायद इसी इंतजार में केवल महिलाओं के लिए लिखे के नीचे वाली सीट पर बैठे थे। एक स्टेशन बाद ही उनकी इच्छा पूरी हो गई। पिट्ठू बैग लादे हाथ में मोबाइल और इयर फोन कान में लगाए लड़की तेजी से लड़कियों के लिए आरक्षित सीट की तरफ बढ़ी। इसी इंतजार में पहले से बैठे दोनों लड़कों में से एक उठा और दूसरे ने अपने पृष्ठ भाग को थोड़ा तिरछा करते हुए इतनी जगह बना दी कि वो लड़की उसी में समाती हुई बैठ जाए। लड़की धक्कामुक्की करती आई थी। तेजी से वो उस जगह में अपनी जगह बनाने लगी। लेकिन, उसी दौरान उसने शायद उन दोनों लड़कों की आंखें पढ़ लीं। उसने कहा कोई बात नहीं मैं खड़े-खड़े ही ठीक हूं। और खड़े, तिरछे बैठे लड़कों की कोशिश के बाद भी वो नहीं बैठी। दोनों लड़कों की शातिर नजरें, एक दूसरे से मिलकर मुस्कुरा रही थीं। लड़की मेट्रो के दरवाजे के पास की जगह पर टिककर अपने स्मार्टफोन में व्यस्त हो गई। दो स्टेशन बाद। एक अधेड़ उम्र महिला आई। वही महिलाओं के लिए आरक्षित सीट निशाने पर थी। तिरछे बैठे लड़के को महिला ने थोड़ा धकियाया और अपने लिए जगह ज्यादा बनाई। दोनों लड़कों की मुस्कुराहट में से शातिर भाग खड़ा हुआ था। तिरछे से सीधे बैठे लड़के को हालांकि, स्पर्शसुख अब भी मिल रहा था। बिना चाहा।

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आगे बढ़ने का मंत्र

सोनी का बड़ा सा स्मार्टफोन उसके हाथ में था। फोन की घंटी बजी। हां मां। ... मेट्रो में हूं। ... अरे मां सीनियर के पास चला गया था। इसीलिए देर हो गई। ... मां तुम नहीं समझोगी। सीनियर के पास समय बिताना जरूरी होता है। आगे बढ़ने में सीनियर ही तो मदद करते हैं।

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