Thursday, January 22, 2015

उस दिल्ली में मोदी इस दिल्ली में बेदी


भारतीय जनता पार्टी का ये फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। या सीधे कहें कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह और अरुण जेटली का फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। दिल्ली में हर ओर बीजेपी की ताजा-ताजा नेता से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन गईं किरन बेदी के पक्ष में माहौल बनने से पहले ही बिगड़ता दिख रहा है। टेलीविजन की स्क्रीन पर शुरुआत मनोज तिवारी के थानेदार नहीं नेता वाले बयान और हर्षवर्धन के देर से चाय पार्टी में पहुंचने से हुई। तो इसके बाद दिल्ली में आई भाजपा की सूची ने ऐसी ढेर सारी तस्वीरें टीवी न्यूज चैनलों को परोस दीं जिससे पक्का हो जाता है कि दिल्ली में नेता के तौर पर किरन बेदी को लाने का फैसला उतना बेहतर नीचे तक जाता नहीं दिख रहा। आखिर क्या जरूरत थी लगातार सफलता के ऊंचे मापदंड स्थापित करती जा रही मोदी-शाह की जोड़ी को चुनाव से ठीक पहले इस तरह का फैसला लेने की। और सबसे बड़ी बात ये कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से देश वित्त मंत्री के पद पर आसीन अरुण जेटली ने भी इस दांव को खेलने की जमीन पक्की करने में पूरी मेहनत की। किरन बेदी आईं और आकर भी अरविंद केजरीवाल की सीट से चुनाव लड़ने से बच गईं। अरविंद केजरीवाल ने किरन बेदी को आमने-सामने बहस की चुनौती दी, उससे भी किरन बेदी ने किनारा कर लिया। भगोड़ा केजरीवाल किरन बेदी को भगाता दिख रहा है। फिर भी मोदी-शाह-जेटली की तिकड़ी को क्या जरूरत थी कि वो किरन बेदी पर ही भरोसा कर रहे हैं। सिर्फ भरोसा नहीं किया। ऐसा दांव खेला है जिसे हारने की जरा सी भी गुंजाइश बनी तो वो राजनीति हार जाएगी जिसने उस दिल्ली में नरेंद्र मोदी को अप्रतिम व्यक्तित्व वाले प्रधानमंत्री के तौर पर पूर्ण बहुमत से चुन लिया है।

दरअसल मुश्किल यहीं है कि मोदी-शाह की जोड़ी के फैसलों को राजनेता और विश्लेषक दोनों ही तय खांचों में बांधकर देखते हैं। इसीलिए लगता है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने अरुण जेटली पुरजोर पैरोकारी के साथ अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है। लेकिन, ऐसा है नहीं। अब जरा किरन बेदी के आने के बाद और पहले के समीकरणों पर चर्चा कर लें। शुरुआत इसी से कि आखिर क्या सूझी थी बीजेपी को किरन बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की। इसके लिए सिर्फ और सिर्फ एक तर्क और जवाब है। वो तर्क है अरविंद केजरीवाल। अगर अरविंद केजरीवाल जैसा नेता दिल्ली में नहीं होता तो मोदी-शाह किसी कीमत पर यहां कोई चेहरा चुनाव के पहले घोषित नहीं करते। लेकिन, ये दिल्ली है। और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल है जो हर बात पर नंगा होने, करने को तैयार दिखता है। इस केजरीवाल की दिल्ली में स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव के समय भी नरेंद्र मोदी को मत देने वाला नौजवान, मध्य वर्ग भी कहता रहा कि उस दिल्ली (लोकसभा) में मोदी लेकिन, इस दिल्ली (विधानसभा) में अरविंद केजरीवाल। यही असल कहानी है किरन बेदी के मुख्यमंत्री के तौर पर मैदान में आने की। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर को उदाहरण के तौर पर पेश करने वाले भूल जाते हैं कि वहां परंपरागत राजनीति और उसी से निकले राजनेता मुकाबले में थे। इसलिए नरेंद्र मोदी के अलावा किसी नेता की जरूरत नहीं थी। लेकिन, यहां अरविंद केजरीवाल है जो परंपरागत राजनीति के सारे स्थापित समीकरणों की ऐसी तैसी करके दिखा चुका है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी मुकाबले में थे जो खुद सारे परंपरागत मापदंडों को उलट चुके हैं। इसलिए अरविंद पिट गए। लेकिन, दिल्ली विधानसभा में बिना किसी चेहरे के मोदी मैजिक मुश्किल में पड़ता दिख रहा था। इसीलिए किरन बेदी को लाना पड़ा।

किरन बेदी को लाकर भारतीय जनता पार्टी ने अरविंद के सामने बराबरी का मुकाबला खड़ा कर दिया है। बल्कि कई मामलों में किरन बेदी अरविंद की राजनीति को आसानी से पटकनी देती नजर आती हैं। किरन बेदी अरविंद केजरीवाल की हर उस कमजोरी को जानती हैं जो घर का भेदी ही जान सकता है। और उस पर यहां तो रावण विभीषण जैसी मजबूती कमजोरी भी नहीं है। अरविंद के पास न तो रावण जैसी अथाह ताकत है और न किरन बेदी के पास विभीषण जैसी कमजोरी है। इसलिए बराबरी के मुकाबले में घर का भेदी तोड़ लेना बड़ी सफलता है। इसके बाद बात दोनों की काबिलियत की। अरविंद केजरीवाल शानदार विद्यार्थी रहे हैं। इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज के अधिकारी रहे हैं। लेकिन, विज्ञापनों में वो भले ही कहते रहें कि कमिश्नर की नौकरी को उन्होंने लात मार दी। सच्चाई यही है कि अरविंद केजरीवाल असिस्टेंट कमिश्नर की शुरुआती नौकरी में ही रहे और उस ओहदे पर रहते हुए उन्होंने कोई बड़ा चमत्कार नहीं किया। अरविंद ने इस्तीफा अपने रास्ते खोजने के तहत दिया। जबकि, किरन बेदी के साथ ये जगजाहिर है कि व्यवस्था ने उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया। इसलिए किरन बेदी ने इस्तीफा दिया। किरन बेदी जहां भी रही हैं, वहां खुद को स्थापित करती आई हैं। इसलिए इस पैमाने पर भी किरन बेदी अरविंद केजरीवाल से बीस ही बैठती हैं।

बात हो रही है कि किरन बेदी का तानाशाही रवैया भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। और इससे पार्टी में बिखराव होगा। अगर ऐसा होता तो किरन बेदी से कई गुना ज्या तानाशाही होने का आरोप नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर लगता रहा है। फिर तो बीजेपी को कहीं परिदृष्य में होना ही नहीं चाहिए था। दरअसल तानाशाही और मजबूत नेतृत्व में फासला बड़ा हल्का होता है। इसलिए जिस राजनीति को विश्लेषक तानाशाही राजनीति कहते हैं। उसे पार्टी कार्यकर्ता कब मजबूत नेतृत्व मानने लगता है ये समझना कठिन है। एक और तर्क है कि किरन बेदी अरविंद के सामने न चुनाव लड़ रही हैं और न ही बहस कर रही हैं। तो पहले मामले पर ये कि मोदी-शाह की जोड़ी आज की राजनीति के मामले में सबसे समझदार फैसले लेने वाली है। ये स्थापित होता रहा है। अब सोचिए कि नई दिल्ली सीट से किरन बेदी लड़तीं तो भी जीतता तो कोई एक ही। और मान लीजिए कि बीजेपी को बहुमत मिल जाता लेकिन, सिर्फ नई दिल्ली सीट अरविंद केजरीवाल जीत जाते तो मोदी-शाह के किरन बेदी को नेता चुनने पर ही बड़े सवाल खड़े हो जाते। फिर से बीजेपी में मुख्यमंत्री बनने की अंधी दौड़ शुरू हो जाती। अब दूसरा परिदृष्य मान लीजिए कि अरविंद नूपुर शर्मा से हार गए या जीते भी बहुत मुश्किल से और बीजेपी सरकार बना लेती है। ऐसे में अरविंद को हर रोज किरन बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर झेलना पड़ेगा। और अरविंद के ऊपर जिस तरह से तानाशाही के आरोप लगाकर ढेर सारे आम आदमी पार्टी के नेता बाहर हुए हैं। उसमें अरविंद को किरन बेदी की तथाकथित तानाशाही को झेलना ज्यादा कठिन होगा। अब बात ये कि बहस से भाग रही किरन बेदी जनता की नजरों में कमजोर साबित होंगी और बीजेपी के चुनाव अभियान पर इसका असर पड़ेगा। इसका जवाब सबसे बेहतर भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी दे सकते हैं। वो लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने मौन रहने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह को लोकसभा चुनाव से पहले बहस की चुनौती दी थी। इरादा उनका भी वही था कि मैं बहस में मनमोहन सिंह को हराऊंगा और उसी आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने का हक भी मेरा पक्का हो जाएगा। लेकिन, इतिहास गवाह है कि न तो मनमोहन सिंह ने बहस की। न लालकृष्ण आडवाणी बहस कर सके, बहस जीत सके और न ही प्रधानमंत्री बन सके। और किरन बेदी को लाने का फैसला गलत है इसके तर्क देने वाले ज्यादातर वो बीजेपी के नेता हैं जो कभी न कभी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले बैठे थे। जाहिर है विकल्प ही नहीं है वाले सिद्धान्त के आधार पर दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की आस रखे भाजपा नेताओं को  अब अनिद्रा की नियमित बीमारी हो गई है। इसलिए वो आधी नींद में बड़बड़ा रहे हैं कि किरन बेदी बीजेपी का बेड़ा गर्क करने आई हैं। लेकिन, टेलीविजन चैनलों के सर्वे साफ दिखा रहे हैं कि अब तक बीजेपी का सबसे बेहतर चेहरा रहे डॉक्टर हर्षवर्धन से भी ज्यादा उत्साह कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में किरन बेदी का चेहरा देखने पैदा हो रहा है। सच्चाई भी यही है कि बीजेपी के कार्यकर्ता किरन बेदी को और किरन बेदी बीजेपी को हमेशा अपना स्वाभाविक विकल्प मानते रहे हैं और उसी स्वाभाविक विकल्प को सही समय पर मोदी-शाह-जेटली की तिकड़ी ने सलीके की पैकेजिंग में परोस दिया है। फिलहाल ब्रांड केजरीवाल पहले से ज्यादा मुश्किल में हैं। वरना तो बीजेपी से पहले ही अरविंद ने जगदीश मुखी को बीजेपी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके उनके साथ लड़ाई भी जीत ली थी।  

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