राजीव पर उंगली उठाते क्यों नहीं बनता

21 मई 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई लेकिन, उसकी खबर देश भर में 22 मई की सुबह पहुंची। मुझे याद है कि इलाहाबाद में मेरे पढ़ाई के दिन थे। जब सोकर उठा तो, पता चला कि रात में जबरदस्त तूफान आया था। बारिश-तूफान की वजह से पानी-बिजली का संकट बन गया था। घर में शायद मेरी माताजी को जब पता चला कि राजीव गांधी की हत्या हो गई है तो, राजनीति से बिल्कुल अनजान होने के बावजूद उन्हें जैसे झटका सा लग गया। उन्होंने कहाकि एतना बड़ा-भला मनई मरा इही से आंधी-तूफान आएस।

राजीव गांधी तो, हमारे कॉलेज से विश्वविद्यालय पहुंचते तक ही दुनिया से चले गए। लेकिन, जाने-अनजाने पता नहीं कैसे राजीव गांधी का वो, मुस्कुराता, निर्दोष चेहरा ऐसे हमारे जेहन में समा गया कि कांग्रेस की ढेर सारी हरकतें बुरी लगने के बावजूद हमेशा लगता रहा कि राजीव होते तो, देश की राजनीति का चेहरा बेहतर होता। स्वच्छ राजनीति होती। लेकिन, क्या ये मेरे दिमाग में बसी भ्रांति भऱ है या सचमुच कुछ बदलाव होता।

ज्यादा ध्यान से देखने पर और पत्रकारीय कर्म करते 12 साल हुई नजर से देखता हूं तो, साफ दिखता है कि ये मेरे दिमाग की भ्रांति भर ही है। राजीव गांधी के सिर पर इस देश को 21वीं सदी में ले जाने का एतिहासिक तमगा ऐसे सज गया जैसे, राजीव गांधी नहीं होते तो, ये देश अब तक 19वीं शताब्दी में ही पड़ा होता। जैसे राजीव नहीं होते तो, भारत के लोग कंप्यूटर निरक्षर ही रह जाते। दरअसल युवा होते भारत को इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव का चेहरा ऐसा निर्दोष दिखा कि उन्हें लगा कि भारतीय राजनीति का चेहरा बदल रहा है। ऐसा समझने वाली जमात में ही हम जैसे लोग भी शामिल थे। जो, उस समय कॉलेज में पढ़ते थे। हमारे दिमाग में जाने कैसे भर गया कि राजीव गांधी राजनीति में ईमानदारी का दूसरा नाम है। राजीव के खिलाफ बोफोर्स के भ्रष्टाचार की तोप दागकर विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के बाद और भ्रष्टाचार के मुद्दा बनने के बाद भी राजीव की छवि पाक-साफ ही रही । लेकिन, शायद ये कांग्रेसी तरीका है कि बोफोर्स का भ्रष्टाचार और भोपाल की गैस त्रासदी सब जनता भूल जाती है। जनता कांग्रेसी राज की ऐसी गुलाम है कि सरकार के सबसे जिम्मेदार मंत्री प्रणव मुखर्जी दम ठोंककर कहते हैं कि उस वक्त कानून-व्यवस्था की स्थिति ऐसी थी कि एंडरसन को भगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। ध्यान रहे ऐसी भयावह कानून व्यवस्था के समय केंद्र और राज्य (मध्य प्रदेश) दोनों ही जगह कांग्रेस की ही सरकारें थीं।

मैं ये समझ नहीं पाता कि आखिर कैसे एक ही परिवार के दो गांधी भाइयों में से एक संजय गांधी इस देश में तानाशाह और जाने अप्रिय संबोधनों से बुलाया जाता है। वहीं, दूसरा राजीव गांधी हमेशा इस देश की तरक्की का अगुवा माना जाता है। जबकि, संजय गांधी पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप तो मुझे याद नहीं आ रहा है। जबकि, राजीव पर बोफोर्स जैसा भ्रष्टाचार का आरोप और भोपाल गैस त्रासदी के मामले में एंडरसन को भगाने तक के मामले सामने आ रहे हैं। एक और बात है चाहे बोफोर्स के ओटावियो क्वात्रोची का मामला हो या फिर भोपाल की तबाही के जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड के वॉरेन एंडरसन की। दोनों जगह विदेशी दबाव साफ दिखता है।

अब तो मामला एक पीढ़ी आगे तक निकल गया है। राहुल को इस देश में सारी अच्छाइयों का प्रतीक माना जा रहा है और वरुण गांधी को सारी बुराइयों का। वो, भी तब जब वरुण को भारतीय जनता पार्टी में जगह बनाने के लिए सारी मशक्कत करनी है और राहुल को सब कुछ पका-पकाया मिल रहा है। सुपर प्राइममिनिस्टर राहुल बाबा का हाल ये है कि यूपीए-2 के एक साल का रिपोर्ट कार्ड रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन जी ये कहकर खुश होते हैं कि मैं तो, उन्हें मंत्री देखना चाहता हूं लेकिन, वो मना कर रहे हैं। और, साथ में ये भी कि जब वो, चाहेंगे मैं प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ दूंगा।

मीडिया में भी संजय, राजीव के बेटों को विरासत का नफा-नुकसान ही उसी अनुपात में मिल रहा है। राहुल का प्रभाव ऐसा है कि एक साल होने पर न्यूज चैनलों पर सर्वे चला तो, उसमें एक सवाल ये भी था कि अगर राहुल प्रधानमंत्री बने तो, .... और इस चमत्कारी सवाल के जवाब में सर्वे में शामिल जनता हर राज्य में बीजेपी के खाते से निकालकर 2-4 सीट और कांग्रेस के खाते में जोड़ दे रही है। सचमुच इस देश में गुलामी की जड़ें बड़ी गहरी हैं। बस खेल ये है कि कौन सलीके से जनमानस को गुलाम बनाने में कामयाब हो जाता है। गांधी परिवार की असल विरासत गुलाम बनाने का महामंत्र साबित हो चुकी है। गाहे-बगाहे, उसमें थोड़ी बहुत सेंध दूसरे भी लगाते रहते हैं।