फिर हम क्यों बोलें हिंदी ...

बॉलीवुड कलाकारों को (आर्टिस्ट पढ़िए) अब अंग्रेजी या फिर रोमन में ही स्क्रिप्ट देनी पड़ती है। क्योंकि, उन्हें हिंदी में लिखी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आती। वैसे ये मुश्किल सिर्फ स्क्रिप्ट लिखने वालों की ही नहीं है। इन फिल्मी कलाकारों की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए जब पत्रकार (जर्नलिस्ट पढ़िए) साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने जाते हैं तो, उन्हें भी यही मुश्किल झेलनी पड़ती है। देश के हिंदी प्रदेशों में दीवानेपन की हद तक चाहे जाने वाले इन कलाकारों को इतनी भी हिंदी नहीं आती कि ये फिल्म के डायलॉग पढ़कर बोल सकें। फिर भी ये हिट हैं क्योंकि, ये बिकते हैं।

वैसे हिंदी की ये मुश्किल सिर्फ फिल्मी कलाकारों के मामले में नहीं है। बात यहीं से आगे बढ़ा रहा हूं जबकि, ये बात बहुत आगे बढ़कर ही यहां तक पहुंची है। देश में सभी चीजों को सुधारने का ठेका लेने वाला हिंदी मीडिया भी हिंदी से परेशान है। अब आप कहेंगे कि हिंदी चैनलों में हिंदी क्यों परेशान है। हिंदी का चैनल, देखने वाले हिंदी के लोग, बोलने-देखने-लिखने वाले हिंदी के लोग, फिर क्या मुश्किल है। दरअसल मुश्किल ये सीधे हिंदी बिक नहीं रही थी (अंग्रेजी में कहते हैं कि हेप नहीं दिख रही थी)। इसलिए हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगने लगा। शुरुआत में हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगना शुरू हुआ जब ज्यादा बिकने लगा तो, अंग्रेजी में हिंदी का मसाला भर बचा रह गया। हां, नाम हिंदी का ही था।

वैसे ये मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है कि फिल्मी कलाकार या कोई भी बड़ा होता आदमी या औरत (बिगीज) अब हिंदी बोलना नहीं चाहते। हिंदी वही बोल-पढ़ रहे हैं जो, और कुछ बोल-पढ़ नहीं सकते। लेकिन, दुखद तो ये है कि हिंदी वो भी बोल-पढ़ नहीं रहे हैं जो, हिंदी की ही खा रहे हैं। हिंदी खबरिया चैनलों का हाल तो ये है कि अगर बहुत अच्छी हिंदी आपको आती है तो, यहां नौकरी (जॉब) नहीं मिलने वाली। गलती से नौकरी मिल भी गई तो, कुछ ही दिन में ये बता-बताकर कि यहां खबर लिखो-साहित्य मत पेलो, कह-कहकर हिंदी का राम नाम सत्य करवा दिया जाएगा वो भी आपसे ही। जिस दिन पूरी तरह राम नाम सत्य हो गया और हिंदी के ही शब्दों-अक्षरों-वाक्यों पर आप गड़बड़ाने लगे तो, चार हिंदी में गड़बड़ हो चुके लोग मिलकर सही हिंदी तय करेंगे और ये तय हो जाएगा कि अब यही लिखा जाएगा भले ही गलत हो। और, जब मौका मिला थोड़ी बची-खुची सही हिंदी जानने वाले बड़े लोग आपको डांटने का मौका हाथ से जानने नहीं देंगे।

मैं फिर लौटता हूं कि हिंदी की मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है। हिंदी चैनलों में भर्ती (रिक्रूटमेंट) होती है तो, अगर उसने u know.... i hope ... so.. i think कहकर अपने को साबित (प्रूव) कर दिया तो, फिर नौकरी (जॉब) पक्की। समझाया ये जाएगा कि थोड़ी हिंदी कमजोर है लेकिन, लड़की या लड़के को समझ बहुत अच्छी है। हिंदी तो, पुराने लोग मिलकर ठीक कर देंगे। वैसे जिनके दम पर नई भर्ती को हिंदी सिखाने का दम भरा जा रहा होता है उनमें हिंदी का दम कितना बचा होता है ये समझ पाना भी मुश्किल है। वैसे हिंदी के इस दिशा में जाने के पीछे वजह जानने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जगह के रिसेप्शन को भी पार (क्रॉस) करने के लिए अंग्रेजी ही काम आती है। सिर्फ हिंदी के भरोसे अगर आप घर से बाहर निकले हैं तो, मन में ही हिंदी को संजोए हुए चुपके से ही रिसेप्शन पार कर गए तब तो ठीक है नहीं तो, हिंदी के सवाल के जवाब में अंग्रेजी में may i help u आपको फिर से बाहर कर सकता है। मेरे जैसे हिंदी जानने-बोलने-पढ़ने-समझने-लिखने वालों की मंडली तो आपस में मजाक भी कर लेती है कि किसी मॉल या किसी बड़ी-छोटी जगह के रिसेप्शन पर या किसी सेल्स गर्ल से बात करने के लिए बीवी को आगे कर ही काम निकलता होगा। क्योंकि, बड़े मॉल्स, स्टोर्स में तो कुछ खऱीदने के लिए जेब में पैसे होने ही जितना जरूरी है कि आपमें अंग्रेजी में बात करने का साहस हो। शायद ये साहस लड़कियों में कुछ ज्यादा होता है।

खैर बॉलीवुड के कलाकार हिंदी की स्क्रिप्ट पढ़ने से मना कर रहे हैं। इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे ये लिखने की सूझी। इसी खबर में गुलजार ने कहा था कि ये तो बहुत पहले से होता आ रहा है। लेकिन, मुझे जो लगता है कि ये पहले से होता आ रहा है या इसमें कलाकारों का कितना दोष है इस पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या हम सचमुच ये मान चुके हैं कि हिंदी छोटे लोगों की, हल्का काम करने वालों की भाषा है। जो भी हिंदी बोले उसे छोटे दर्जे का मानना और फिर उस अपने से मान लिए छोटे दर्जे की जमात के लिए हिंदी समझना-बोलना कहां तक ठीक है। यहां तक कि अपने घर में पाले जानवरों से भी ये अंग्रेजीदां लोगों की जमात अंग्रेजी में ही बात करती है क्योंकि, इनके घर के बच्चे उन जानवरों से भी बात करते हैं उनके साथ खेलते हैं। इसलिए घर के पालतू कुत्ते से हिंदी में बातकर ये अंग्रेजीदां लोग अपने बच्चों को बिगाड़ना नहीं चाहते, डर ये कि कहीं बच्चा भी हिंदी न बोलने लगे।

हिंदी की मुश्किल शब्द का कई बार में इस्तेमाल कर चुका हूं। लेकिन, इसका कतई ये आशय नहीं है कि मैं हिंदी की सिर्फ दारुण कथा लेकर बैठ गया हूं। दरअसल मैं सिर्फ इस बात की तरफ इशारा करना चाह रहा हूं कि क्या हम अपनी भाषा को छोटे लोगों की भाषा समझकर अपनी खुद की इज्जत मिट्टी में नहीं मिला रहे हैं। अंग्रेजी आना और बहुत अच्छे से आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन, हिंदी के शब्दों में अंग्रेजी मिलाकर रोमन में लिखी हिंदी बोलने वाले हिंदी का अहसास कहां से लाएंगे क्योंकि, उसमें तो अंग्रेजी की feel आने लगती है। ये सही है कि अंग्रेजी के विद्वान बन जाने से दुनिया में हमें बहुत इज्जत भी मिली और दुनिया से हमने बहुत पैसा भी बटोर लिया। लेकिन, अब हम इतने मजबूत हो गए हैं कि दुनिया हमारी भाषा, हमारे देश का भी सम्मान करने के लिए मजबूर हो। और, ये तभी हो पाएगा जब हम खुद अपनी भाषा अपने देश का सम्मान करें। चूंकि, मीडिया का ही सबसे ज्यादा असर लोगों पर होता है और मीडिया में भी खबर देने वाले चैनल और फिल्मी कलाकार लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए इस सम्मान को समझने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। वैसे मुझे भी कभी-कभी लगता है कि जब अंग्रेजी से ही तरक्की मिल रही हो तो, हम क्यों बोलें हिंदी।

Comments

  1. हिंदी की यही तो कमजोरी है कि जिस हिंदी के पक्ष में इतना कहा जाता है या जो कहते हैं उनके खुद के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते है…।

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  2. यही तो हिन्दी का दुर्भाग्य चल रहा है कि इसको बोलने वाले और इसकी रोटी खाने वाले खुद ही इसको गरिया रहे हैं।

    @दिव्याभ,
    दिव्याभ भाई आपकी बात उनके लिए तो ठीक है जो अंग्रेजी का विरोध करते हैं लेकिन हम लोग अंग्रेजी का विरोध नहीं करते, बल्कि खुद उसका प्रयोग करते हैं। हाँ हमें हिन्दी को अंग्रेजी से कमतर मानने पर आपति है।

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  3. पर यहाँ अमरीका में भारतीय लोग अपने बच्चों को हर शनिवार / इतवार मंदिर या किसी जहाँ हिन्दी सिखाई जाती है क्यों ले जाते हैं समझने का विषय है।

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  4. बहुत अच्छा लेख लिखा है। वैसे सच तो यह है कि हर भाषा को बाजार चला रहा है। अंग्रेजी भी दिन पर दिन बदल रही है। उसमें हिंदी और दूसरी भाषाऒं के शब्द धंसते जा रहे हैं। मोबाइल और एस.एम.एस. की भाषा ही लगता है असली भाषा है। मिर्ची सेठ की बात पर गौर किया जाये। अमरीका में बच्चों को हिन्दी इसलिये सिखाते हैं शायद ताकि कड़ी बनी रहे!

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  5. Anonymous1:02 PM

    बहुत अच्छा लेख लिखा है। हम दिमाग से अभी भी गुलाम हे,भारत समेत सभी वो देश जो अन्ग्रेजो के गुलाम थे, इन्हे छोर कर वाकी किसी भी देश मे बहा की स्थनीय भाषा का प्रजोग होता हे ओर लोग अपनी मात्रभाषा को बोलना आपना गर्ब समझते हे, हम गोरो की भाषा,इन की नकल,इन की जुथन को खाना,आपने को मोड्र्न समझते हे ध्न्य हे हमारे विचार( कुछ समय पेहले ही हम ने जही पढा था किसी रजनीश मनगला का लेख जिस मे एक पकित..हिन्दी जानने बाले रिक्शाछाप ...जिस देश को मिटाना हो,वहा की भाषा को खत्म कर दो

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  6. पहले सब तरह की शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा हिन्दी में उपलब्ध करवाईए, फिर हिन्दी को भाव न देने पर लोगों को कोसें।

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  7. रजनीशजी ठीक कह रहे हैं।

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  8. अरे त्रिपाठीजी, घरे घबरात हउअ? आई... आई... अपनों समय आई। जिन ससुर हिंदी के महत्व आ बुझियें उनकरा से फीनिक्स मिल के बहरवा भूज़ा बेचवायेंम...

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  9. हां, तुम्हारी बात से काफी सहमत हूं, लेकिन इसके लिए दोषी हम लोग ही हैं। हमारे-तुम्हारे जैसे लोग भी शायद मौका मिलने पर अंग्रेजी का पिछलग्गू बनना ही पसंद करेंगे। भारत जैसे विविधता से भरे देश में एक common language तो होनी ही चाहिए, नहीं तो दक्षिणी राज्यों के बारे में हमारा ज्ञान अधूरा ही रह जाएगा। अगर साउथ के लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं अपनाना चाहते तो हमें बड़प्पन का परिचय देते हुए अंग्रेजी जैसे किसी भी विकल्प पर विचार करना होगा। साथ ही हमें अंग्रेजी के ग्लोबल महत्व को समझना होगा अन्यथा वक्त के साथ रेस में हम काफी पिछड़ जाएंगे।

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