आर्थिक मामले में सरकार सही रास्ते पर है

11 फरवरी 2016 को छपा लेख
इधर भारतीय जनता पार्टी के घोर समर्थक भी बहुत मजबूती से मोदी सरकार के कामों का बचाव नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि, एक तो पूर्ण बहुमत वाली लोकप्रिय सरकार से लोगों को उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं। जो जाहिर है, इतनी तेजी से कहां पूरी होने वाली हैं। दूसरी खुद प्रधानमंत्री जिस अंदाज में काम करते हैं, उससे लोगों को हर मुश्किल सुलझाने के लिए नरेंद्र मोदी अलादीन के चिराग जैसे नजर आने लगे थे। अलादीन का चिराग भी तो सिर्फ किस्से कहानियों में ही होता है। शायद यही वजह है कि सरकार सही रास्ते पर है या नहीं। इसे जताने में विपक्ष तो तमाम तर्क गिना देता है। लेकिन, सरकार के सही रास्ते पर होने के पक्ष वाले थोड़ा दबे-छिपे से दिख रहे हैं। खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली बार-बार देश की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर लोगों को इस बात के लिए तैयार करने में लगे हैं कि सरकार से फिलहाल बहुत ज्यादा उम्मीद न की जाए। वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा भी लगातार मीडिया से बात करने में ये बताते रहते हैं कि किस तरह से मोदी सरकार देश के खजाने को दुरुस्त करने में लगी है। ये बात बड़े-छोटे वित्त मंत्री अकसर इस सवाल के जवाब में बताते हैं कि आखिर कच्चे तेल की कीमतों में आई इतनी बड़ी कमी का फायदा क्यों लोगों को पूरी तरह से नहीं मिल पा रहा है। इससे गड़बड़ ये हो रही है कि पूर्ण बहुमत की लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए जी-जान लगा देने वाले और मोदी को देश की हर मर्ज की दवा समझने वालों को ये डर लगने लगा है कि क्या सरकार सही रास्ते पर है। संयोग से इसी महीने बजट पेश होने वाला है। तो उम्मीद करें कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ऐसा बजट पेश करेंगे, कि कम से कम उन लोगों को जिन्होंने इस सरकार को बड़ी उम्मीदों से चुना है, जिससे लगने लगे कि सरकार सही रास्ते पर है। कम से कम आर्थिक मामले में।

बजट के महीने में अच्छी बात ये आई है कि सरकार के हाथ में एक ऐसा आंकड़ा आ गया है। जिससे कम से कम ये बताया जा सकता है कि सरकार सही रास्ते पर है। ये आंकड़ा इस वित्तीय वर्ष के लिए जीडीपी का है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में जीडीपी सात दशमलव छह प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में ये रफ्तार सात दशमलव दो रही है। इससे एक तो ये कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए खास नहीं कर रही है। इस तरह की आलोचना करने वालों को जवाब मिल गया है। दूसरा ये कि आने वाला समय भारत का ही है, ये भी तय हो गया है। क्योंकि, इस रफ्तार के साथ भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन गया है। चीन हमसे पीछे छूट गया है। लेकिन, हमारा बाजार अभी भी चीन के सामानों से भरा पड़ा है। बजट चीन की उस हिस्सेदारी को ध्वस्त करके वो हिस्सेदारी भारत के पक्ष में करने के रास्ते साफ-साफ बताए। क्योंकि, भारत की आबादी की जितनी जरूरतें हैं उसमें साढ़े सात प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार से खुश नहीं हुआ जा सकता। इसके आठ से नौ प्रतिशत के बीच लंबे समय तक रहने की जरूरत है। दस प्रतिशत की बात इसलिए नहीं करूंगा कि वो मनमोहिनी सपने जैसा नजर आने लगता है। उम्मीद की जा सकती है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट में ढेर सारे ऐसे प्रावधान करेंगे कि चीन के बाजार में हमारी हिस्सेदारी बढ़े न बढ़े, कम से कम हमारा बाजार हमारी जीडीपी बढ़ाने में ही मददगार हो।

अब बजट में क्या आएगा ये तो महीने के अंत में ही पता चलेगी। लेकिन, सरकार सही रास्ते पर है और ये रास्ता पक्का बन रहा है। इसे बताने वाला भी आंकड़ा सरकार ने पेश किया है। ये आंकड़ा है सरकारी खजाने में करों की वसूली का। वैसे तो सीधे-सीधे बात ये है कि सरकार कर वसूली के मामले में तय किया लक्ष्य हासिल करने के रास्ते पर है। सरकार ने कुल चौदह करोड़ उन्चास लाख करोड़ रुपये की कर वसूली करने का लक्ष्य किया था। इकतीस जनवरी दो हजार सोलह तक यानी बजट वाले महीने के पहले तक सरकार ने कुल दस लाख छियासठ हजार करोड़ रुपये की कर वसूली कर ली है। लेकिन, इसको जरा विस्तार से समझने की जरूरत है। यही विस्तार बता रहा है कि आर्थिक मामले पर सरकार सही रास्ते पर है। सरकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर वसूली के आंकड़े गौर से देखें, तो काफी कुछ समझ आ जाता है। पहले प्रत्यक्ष कर वसूली की बात करें, तो इसमें करीब ग्यारह प्रतिशत की बढ़त देखने को मिल रही है। कुल मिलाकर जनवरी के आखिर तक पांच लाख बाइस हजार करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर के रूप में सरकार को मिले हैं। यानी सरकार ने तय लक्ष्य का पैंसठ प्रतिशत पूरा कर लिया है। लेकिन, इसका दूसरा मतलब ये भी हुआ कि सरकार अगले दो महीने में इस लक्ष्य को शायद ही हासिल कर पाए। यानी प्रत्यक्ष कर, कॉर्पोरेट टैक्स और इनकम टैक्स, के मामले में लक्ष्य पूरा होने में थोड़ी मुश्किल हो रही है। क्या इससे ये मतलब निकाला जाए कि लोगों की कमाई घटी है। इस वजह से कॉर्पोरेट टैक्स और इनकम टैक्स सरकार के तय लक्ष्य के नजदीक नहीं पहुंच पा रहा है। दरअसल ऐसा है नहीं। सच्चाई ये है कि सरकार ने लक्ष्य ही ज्यादा बड़ा तय कर लिया था। ये लक्ष्य दरअसल आठ से साढ़े आठ प्रतिशत की जीडीपी को आधार बनाकर तय किया गया था। इसलिए साढ़े सात प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा जीडीपी ग्रोथ के लिहाज से प्रत्यक्ष कर की वसूली भी बेहतर हुई है। ये आंकड़े भी बता रहे हैं। कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन करीब ग्यारह प्रतिशत बढ़ा है। ऐसे ही इनकम टैक्स कलेक्शन करीब बारह प्रतिशत बढ़ा है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि लोगों की जेब में ज्यादा रकम आई और उसी पर उन्होंने टैक्स दिया है।

अब अगर अप्रत्यक्ष कर वसूली के आंकड़े देख लें, तो मामला ज्यादा साफ हो जाएगा। सरकारी खजाने में पांच करोड़ चौवालीस लाख रुपये का अप्रत्यक्ष कर आया है। जो पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले तैंतीस प्रतिशत ज्यादा है। और अप्रत्यक्ष कर के मामले में तो सरकार ने अपने लक्ष्य का अठासी प्रतिशत पूरा कर लिया है। अप्रत्यक्ष कर से 40 हजार करोड़ रुपये ज्यादा मिलने की उम्मीद है। राजस्व सचिव हंसमुख अधिया इसी के भरोसे ये मान रहे हैं कि सरकार कुल तय लक्ष्य की कर वसूली कर लेगी। अप्रत्यक्ष कर को सीधी, सरल भाषा में समझें, तो ये अलग-अलग तरह के उद्योगों से होने वाली वसूली है। अप्रत्यक्ष कर में कस्टम ड्यूटी के आंकड़े देखें, तो ये पक्का समझ आता है कि देश में नया काम काफी तेजी से शुरू हुआ है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिकल मशीनरी पर पिछले वित्तीय वर्ष से करीब पैंतीस प्रतिशत ज्यादा कस्टम ड्यूटी मिली है। अन्य मशीनें भी कस्टम ड्यूटी के तौर पर सरकार के खजाने में पिछले साल से करीब अट्ठाइस प्रतिशत ज्यादा रकम दे गईं हैं। इसका सीधा, सरल मतलब यही हुई कि देश में औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आई है। उन्हीं गतिविधियों को पूरा करने के लिए ये मशीनें मंगाई गई हैं।


ये सिर्फ मशीनों के मामले में ही नहीं है। सर्विस सेक्टर में कर वसूली सत्ताइस प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। बैंकिंग, फाइनेंशियल क्षेत्र ने करीब पैंतालीस प्रतिशत ज्यादा रकम टैक्स के तौर पर सरकार के खजाने में डाल दी है। वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और गुड्स, ट्रांसपोर्टेशन के जरिये भी सरकारी खजाने में पिछले वित्तीय वर्ष से चालीस प्रतिशत से ज्यादा रकम आ गई है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि पिछले करीब इक्कीस महीने में मोदी सरकार ने जो कुछ किया है। इसका असर इस तरह से दिखने लगा है। सरकार आर्थिक मामले में सही रास्ते पर है। इसलिए बहुमत की सरकार बनाने वाले अभी सरकार पर भरोसा बनाए रख सकते हैं। लेकिन, अलादीन के चिराग की उम्मीद न पालें। ये चमत्कारिक कहानियां नहीं हैं। ये देश की अर्थव्यवस्था है।