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Thursday, December 01, 2016

आर्थिक फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया से देश का भरोसा खोता विपक्ष

2 दिसंबर को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर
नोटबन्दी के फैसले ने देश की जनता को परेशान किया है। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल हो रही है। कई जगह पर तो लोगों को बेहद सामान्य जरूरत पूरा करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। ये सब सही है। लेकिन, आम जनता की परेशानी की असली वजह क्या है, इस पर पहले बात करनी चाहिए। दरअसल आम जनता को होने वाली इस सारी परेशानी की वजह नरेंद्र मोदी सरकार का वो फैसला है, जिसके बाद 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की जरूरत आ पड़ी। इस वजह से देश की आम जनता परेशान है। वो कतारों में है। अपने पुराने नोट बदलने के लिए बैंकों की कतार में है। 2000 रुपये निकालने के लिए एटीएम की कतार में है। इस स्थिति को देखकर ये लगता है कि जैसे देश बड़ी मुश्किल में है। लेकिन, जनता के मन में एक भावना आसानी से देखी जा सकती है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले को ज्यादातर जनता हर तरह की परेशानी के बाद भी काला धन रखने वालों, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ देखी जा रही है। और जनता की इस भावना ने दरअसल देश के विपक्ष के लिए कतार में लगी जनता से ज्यादा परेशानी की जमात खड़ी कर दी है। परेशान विपक्ष इस कदर है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परेशानी के इस समय में बंगाल की जनता को छोड़कर दिल्ली की आजादपुर मंडी में रैली कर रही हैं। रैली में उनके साथ आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए केजरीवाल का दिल्ली के आजादपुर में नोटबंदी से व्यापारियों को होने वाली मुश्किलों पर रैली करना सही राजनीति माना जा सकता है। लेकिन, ये कितनी सही राजनीति है या खराब राजनीति को सही साबित करने की कोशिश, ये इससे भी समझ में आता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की परेशान जनता की परेशानियों को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। और ममता बनर्जी तो इस मामले में और भी खराब राजनेता साबित होती दिख रही हैं। जब मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की जनता को नोटबंदी से होने वाले नफा-नुकसान के बारे में समझाना चाहिए था, उनके जीवन की मुश्किलों को आसान करने के रास्ते बताने चाहिए थे, उस समय ममता बनर्जी देश की राजधानी दिल्ली में आजादपुर में रैली कर रही थीं। ममता और केजरीवाल ये कह रहे थे कि कभी भी इसकी वजह से देश में दंगे हो सकते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने एक संयुक्त विपक्ष जैसा माहौल बनाने की कोशिश की। मुद्दा सही हो तो ये कोशिश सराही जानी चाहिए। ममता बनर्जी की ये सफलता कही जा सकती है कि उन्होंने कम से कम इसी मुद्दे के बहाने एनडीए के दो सहयोगियों को सरकार के खिलाफ खड़ा करके दिखा दिया। हालांकि, इन दोनों सहयोगियों का सरकार के खिलाफ खड़ा होना लंबे समय से होता दिख रहा था। नोटबंदी के मुद्दे पर शिवसेना और अकाली दल का सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपनी वजहें हैं और बिना बहस इसका नए नोट के लिए कतार में लगी जनता की परेशानी से कोई वास्ता नहीं है। पंजाब में चुनाव के लिए रकम जुटाकर रखने वाले अकाली दल की इस फैसले से परेशानी समझी जा सकती है। पंजाब में कार्यकर्ताओं की पक्का वाला नेटवर्क खड़ा हो गया होता, तो शायद ही पंजाब का चुनाव भाजपा-अकाली साथ लड़ते। एनडीए के दूसरे सहयोगी शिवसेना की मुश्किल यही है कि बालासाहब के समय तक राज्य में बड़े भाई से शिवसेना बीजेपी में अमित शाह के आते ही छोटे भाई की भूमिका में आ गई है। इससे साफ साबित होता है कि एनडीए के दोनों सहयोगियों की भी इस इतने बड़े आर्थिक फैसले पर नाराजगी की वजह घोर राजनीतिक है।
साफ है ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अकाली दल, शिवसेना, समाजवादी पार्टी का ये राजनीतिक विरोध है। लेकिन, बड़ा सवाल है कि पूरी तरह से आर्थिक फैसले को क्या विपक्ष पूरी तरह से राजनीतिक विरोध की कसौटी पर कसकर जनता का विश्वास जीत सकता है। इसका जवाब देश के दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के व्यवहार से आसानी से समझा सकता है। इन दो मुख्यमंत्रियों में से एक हैं विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी से अलग हुए नीतीश कुमार और दूसरे अभी बीजेपी के साथ खड़े चंद्रबाबू नायडू। नायडू दक्षिण भारत में भाजपा के मजबूत और महत्वपूर्ण सहयोगी हैं और नीतीश कुमार उत्तर भारत में मोदी विरोधी गठजोड़ के महत्वपूर्ण नेता। लेकिन, इन दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने हिन्दुस्तान के इस सबसे बड़े आर्थिक फैसले पर आर्थिक नजरिये से प्रतिक्रिया देकर राजनीतिक बढ़त भी हासिल कर ली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह से इस फैसले के साथ खड़े हैं। नीतीश कुमार ने कहाकि इससे काला धन, भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तो पहले ही प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बड़े नोटों को खत्म करने की मांग की थी, जिससे काले धन पर रोक लगाई जा सके। जैसे ही प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के पुराने नोटों को खत्म किया। उसी समय चंद्रबाबू नायडू हरकत में आ गए। आंध्र प्रदेश में सरकार ने बैंकों और डाकघरों में कतार में खड़े लोगों की परेशानी कम करने के लिए पीने के पानी और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से महिलाओं, बुजर्गों और दिव्यांगों के लिए अलग काउंटर की व्यवस्था के निर्देश जारी किया गया। कहा जाता है कि कई बार बैंकों से पपहले मुख्यमंत्री कार्यालय के पास ये खबर होती है कि कहां कितनी नोट आने वाली है। नायडू ने वित्त मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर विमुद्रीकरण से जनता खासकर छोटे कारोबारियों, सड़क के किनारे ठेला लगाने वालों की मुश्किलें आसान करने को कहा है।

नोटबंदी के सरकार के फैसले के खिलाफ विपक्ष को तर्कों के साथ आना चाहिए था। और अगर सरकार ने कोई गलत फैसला लिया, तो उसका जमकर विरोध विपक्ष को करना चाहिए। लेकिन, हुआ क्या? हुआ ये कि दरअसल विपक्ष के पास सरकार के नोटबंदी के फैसले के विपक्ष में कोई सटीक तर्क नहीं है। यहां तक कि कतार में लगी जनता ने भी जब अरविंद केजरीवाल जैसे आंदोलनप्रिय और आरोप उछालकर राजनीति करने वाले नेताओं को भगाना शुरू किया तो भी इन्हें समझ नहीं आया कि जनता क्या चाहती है? ये समझना इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि, राजनीति के अंतिम परिणाम के तौर पर नेता जनता को अपने पक्ष में चाहता है। ये बात विपक्ष के नेता नहीं समझ सके और कुतर्क की तरफ बढ़ चले। उससे भी बात नहीं बनी तो साजिश के सिद्धान्त पर बाखूबी काम किया गया। उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी की बंगाल इकाई के खाते में दो किस्तों में एक करोड़ रुपये जमा करने की बात प्रचारित की गई। जिससे साबित किया जा सके कि नोटबंदी की खबर पहले ही लीक कर दी गई थी। दूसरा साजिशी सिद्धान्त आया जिसमें भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की बेटी को 2000 के नोटों की गड्डियों के साथ दिखाया गया। वो खबर पूरी तरह से गलत निकली। मौर्य ने बताया कि उनके कोई बेटी है ही नहीं। ये कुछ उदाहरण भर हैं। और ये उदाहरण साबित करते हैं कि दरअसल विपक्ष के पास इस मामले विरोध के लिए कोई सही तर्क, तथ्य हैं ही नहीं।
ऐसा नहीं है कि विपक्ष को राजनीति के लिए मौका नहीं मिल सकता था। सकारात्मक विरोध के लिए विपक्ष मानसिक तौर पर तैयार होता, तो बड़ी जमीन एटीएम और बैंक की कतारों में लगे लोग तैयार कर देते। लेकिन, दो बातें थीं। पहली ये कि कतारों में खड़े लोगों को नरेंद्र मोदी के किए पर भरोसा है। और दूसरा ये कि विपक्ष के नेताओं की विश्वसनीयता और मंशा संदेह के दायरे में आती रही। इस कदर कि दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ लोगों का हाल जानने पहुंचे, तो लोगों ने उन्हीं के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए। ये सब उसके बावजूद हो रहा था, जब मीडिया के बड़े चेहरे ये साबित करने पर तुले हुए थे कि लोग बुरी तरह से परेशान हैं। किसी भी हाल में देश में 8 नवंबर के 8 बजे के बाद से हुए हर हादसे दुर्घटना को नोटबंदी से जोड़ने की कवायद में सिर्फ विपक्षी नेता ही शामिल नहीं थे। बड़े पत्रकार, लेखक के तौर पर समाज में पहचाने जाने वाले लोग सरकार के फैसले के खिलाफ कुछ भी करने को उतारू हैं। दरअसल ये कुछ भी करने पर उतारू जमात में बहुतायत लोग वही हैं, जो किसी भी हाल में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखने को तैयार नहीं थे। और नहीं थे, वाली मानसिकता अभी भी जड़ अवस्था में है। इसका अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है कि करीब 150 ऐसे ही बड़े बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। बुद्धिजीवियों की चिट्ठी है इसलिए पूरी तरह से उसमें चिन्ता आम आदमी के कष्टों की ही की गई है। लेकिन, कमाल की बात ये भी है कि नोटबंदी से आम आदमी को होने वाले कष्टों की चिन्ता करने वाले ज्यादातर वही लोग हैं, जिन्होंने असहिष्णुता को इस देश का वर्तमान चरित्र बता देने की कोशिश की और देश से मिले सम्मानों को वापस कर दिया था। देश में बुद्धिजीवी, लेखक के तौर पर सम्मान पाने वाले ढेरों लोग भी जब इस आर्थिक फैसले पर राजनीतिक तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं, तो संदेह होता है कि क्या मोदी विरोध के नाम पर सरकार के हर फैसले का विरोध करके जनता को गुमराह करने की कोशिश, उनका मानस बदलने की कोशिश कहां तक सही है। एक कोशिश हुई जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की खबर को माल्या की कर्ज माफी के तौर पर प्रचारित किया गया। जबकि, सच ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में माल्या और दूसरे डिफॉल्टर से कर्ज वसूली की प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरी करने की कोशिश हुई, वैसी कोशिश कभी नहीं हुई। बल्कि, पिछली सरकार के समय में ही ज्यादातर सरकारी बैंकों ने बड़े कर्ज दिए और कॉर्पोरेट से उनकी वसूली नहीं हो सकी। सच्चाई यही है कि आर्थिक मामलों पर नरेंद्र मोदी की सरकार बहुत ही चरणबद्ध तरीके से चल रही है। जिसमें सरकार आने के बाद सबसे पहले काला धन बनने से रोकने की कोशिश शुरू हुई। उसके बाद बेनामी संपत्ति पर रोक लगाने कोशिश, लोगों को अपना काला धन बताकर उसे बैंकिंग सिस्टम में वापस लाने की कोशिश। ये सब बहुत चरणबद्ध तरीके थे। इसी बीच में सरकार ने बैंकों का एनपीए खत्म करने और बैंकों की स्थिति मजबूत करने के लिए पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुवाई में बैंक बोर्ड ब्यूरो बना दिया। सबसे बड़ी बात कि इन सारे कदमों के साथ नरेंद्र मोदी जनता को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रहे हैं कि ये फैसला पूरी तरह से आम जनता के हित में है। 

Thursday, March 17, 2016

मोदी सरकार की साख तय करेंगे माल्या

विजय माल्या को मोदी सरकार सलाखों के पीछे पहुंचाएगी या नहीं। इससे भी बड़ा सवाल अब ये पूछा जाने लगा है कि मोदी सरकार माल्या को सलाखों के पीछे पहुंचाना भी चाहती है या नहीं। ये सवाल तब खड़ा हो रहा है, जब मोदी सरकार के सिर्फ बाइस महीने में ही माल्या का इतना बुरा हुआ कि उन्हें देश छोड़कर भागना ही बेहतर लगा। माल्या को लगने लगा कि अब किसी भी समय वो सीबीआई दफ्तर के रास्ते जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकता है। धीरे से वो भारत से बाहर चला गया। उस पर तुर्रा ये कि माल्या सोशल मीडिया के जरिये मीडिया से लेकर सबको धमका सा रहे हैं। नसीहत दे रहे हैं। जानबूझकर गलतियां तो ढेर सारे लोग पहले भी करते रहे हैं। लेकिन, गंभीर गलतियां करने के बाद भी छाती चौड़ी करके चुनौती देने वाले अंदाज में बात करने वाले कम ही उदाहरण हैं। इससे पहले कुछ इसी तरह की हरकत सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय ने की थी। हालांकि, दोनों के मामले अलग हैं। लेकिन, जब कोई उद्योगपति इस तरह से सरकार, सत्ता को चुनौती देने लगे, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई सरकार, सत्ता की साख के लिए जरूरी हो जाती है। फिर जब नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री हो, तो उसकी साख के लिए ये और जरूरी हो जाता है कि माल्या जैसे लोगों को उनके अपराध के लिए सलाखों के पीछे भेजा जाए। लेकिन, ये इतना आसान नहीं है। इसका अंदाजा पूर्व प्रधानमंत्री और अभी के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर के बयान से समझ में आ जाता है।

विजय माल्या के अच्छे दिनों में शायद ही कोई राजनीतिक दल या राजनेता रहा हो, जिससे माल्या से अच्छे रिश्ते न रहे हों। लेकिन, जब माल्या के बुरे दिन शुरू हुए, तो सबने दूरी बना ली। हां, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा खुलकर माल्या के समर्थन में आ गए हैं। देवगौड़ा ने विजय माल्या को कर्नाटक धरती पुत्र बताते हुए मीडिया पर आरोप लगा दिया है कि राज्यसभा सदस्य होने की वजह से माल्या के मामले को इतना तूल दिया जा रहा है। देवगौड़ा कह रहे हैं कि दूसरे इसी तरह के साठ से ज्यादा बड़े कर्ज न चुका पाने वाले उद्योगपतियों की बात मीडिया में क्यों नहीं हो रही। दरअसल ये एक बड़ा सवाल है जो देवगौड़ा ने उठाया है। दिसंबर अंत तक देश के बैंकों का बैड लोन या एनपीए साढ़े चार लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। हालांकि, बजट चर्चा पर जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बात को बेबुनियाद बताया कि कोई भी डूबा छोड़ दिया गया है। लेकिन, डूबे कर्ज की ये रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल के बजट में योजनागत खर्च छे लाख करोड़ से कम का ही है। बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन के मुताबिक, 2001 से 2013 के बीच दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज माफ कर चुके हैं। और सबसे बड़ी बात है कि ये सारे कर्ज बड़े उद्योगपतियों के हैं। सरकारी बैंकों में चार सबसे बड़े डिफॉल्टर की ही बात करें, तो ये रकम तेईस हजार करोड़ रुपये की है। इसीलिए जब देवगौड़ा ये कहते हैं कि सिर्फ माल्या निशाना क्यों, तो बात सही लगने लगती है। इसका कतई ये मतलब नहीं कि विजय माल्या के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। दरअसल इसी आधार पर विजय माल्या के खिलाफ और ऐसे सभी कर्ज न चकाने वाले बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कर्ज, ब्याज और जुर्माना मिलाकर सरकारी बैंकों का करीब नौ हजार करोड़ रुपये माल्या पर बकाया है। अभी तो खबरें ये भी आ रही हैं कि विजय माल्या काफी रकम देश बाहर ले जाने में भी कामयाब रहे हैं। अच्छा है कि सेबी भी इस मामले में कड़ाई बरत रहा है। क्योंकि, ये ऐसे कर्ज न चुकाने वाले उद्योगपति हैं, जो ऐशोआराम की किसी भी सोची जा सकने वाली ऊंचाई पर दिखते हैं। लेकिन, माल्या के खिलाफ कार्रवाई करने में कितनी मुश्किलें हैं। इसकी ओर इशारा रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का ताजा बयान करता है। राजन ने एक सवाल के जवाब में कहा कि किसी भी कर्ज के डूब जाने की ढेर सारी वजहें होती हैं। इसीलिए क्या किया जा सकता था इसमें पड़ना ठीक नहीं होगी। ज्यादातर समझदार उद्योगपति डूबते कर्ज रीस्ट्रक्चर कराने के पीछे बहुत आशावादी होते हैं। किंगफिशर मामले में क्या हुआ। इसे नहीं देखना चाहिए। बैंकिंग सिस्टम में अपराध को जगह नहीं दी जा सकती।


राजन कह रहे हैं कि अपराध को बैंकिंग सिस्टम में जगह नहीं दी जा सकती। लेकिन, बैंकिंग में बड़े कार्पोरेट किस तरह से अपराध कर रहे हैं या ये कहें कि बैंकिंग व्यवस्था के साथ दुष्कर्म कर रहे हैं। इसे समझने के लिए एसबीआई चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य को सुनना चाहिए। एसबीआई देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक है। और विजय माल्या को कर्ज देने वाले 17 बैंकों का अगुवा बैंक है, जिनका कर्ज डूब गया है। अरुंधति भट्टाचार्य ने माल्या के मामले बताया कि किसी खाते से संबंधित जानकारी बैंक सार्वजनिक नहीं करता है। लेकिन, इस मामले पर जनता की बहुत ज्यादा नजर है। बैंक माल्या से 2013 से कर्ज वसूली प्राधिकरण में लड़ रहा है। हमारी 81 सुनवाई वहां हो चुकी है। माल्या ने हमारे खिलाफ ढेर सारे केस दर्ज कराए हैं। जिसका जवाब हमने दिया है। कुल 22 मामले हम माल्या के खिलाफ लड़ रहे हैं। 508 सुनवाई हो चुकी है। और 180 बार सुनवाई स्थगित हो गई। भट्टाचार्य ने बताया कि माल्या के गोवा के एक बंगले पर कब्जे के लिए उच्च न्यायालय ने आदेश दे दिया कि तीन महीने के भीतर बंगले का कब्जा बैंक को मिल जाना चाहिए। लेकिन, कलेक्टर ने उसके बाद आठ सुनवाई की और फिर छुट्टी पर चला गया। विजय माल्या का मामला बैंकिंग सिस्टम के साथ पूरे सरकारी तंत्र की गंदगी का जीता जागता उदाहरण है। और इसीलिए जरूरी है कि इस मामले में सरकार सख्ती बरते और माल्या को सलाखों के पीछे भेजा जाए। इसीलिए मैं मानता हूं कि ये सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी की उस साख से जुड़ा हुआ है। जिसकी बुनियाद उनके, न खाउंगा-न खाने दूंगा, बयान से तैयार हुई है। जिस तरह से देश के बड़े उद्योगपति ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत का चार्वाक सिद्धांत को अमल में ला रहे हैं। उसमें जरूरी है कि उनके देश की जनता की खून पसीने की कमाई से घी पीने पर रोक लगे। विजय माल्या के खिलाफ अगर सलीके की कार्रवाई हुई, तो ये ऐसे कर्ज लेकर घी पीने वाले उद्योगपतियों की जमात को तगड़ा झटका होगा। इसका ताजा उदाहरण है। अभी कुछ समय पहले तक कहां कल्पना थी कि चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कोई सरकार कभी कुछ कर पाएगी। सेबी से सुब्रत रॉय की सीधी लड़ाई न हुई होती, तो शायद चिटफंड कंपनियां अभी भी गरीबों की गाढ़ी कमाई लूट रही होतीं। लेकिन, सुब्रत रॉय को सरकार, सत्ता के जेब में होने या फिर उसे खरीद लेने का गुरूर था। झगड़ा बढ़ा और आगे क्या हुआ, ये सब देख रहे हैं। सुब्रत रॉय जेल में हैं। इसी के साथ दूसरे चिटफंडियों पर भी कार्रवाई की सिलसिला तेज हुआ। पर्ल्स, सारदा, साईं प्रसाद और ऐसी जाने कितनी चिटफंड कंपनियों के मालिक फर्जीवाड़े के मामले में जेल में हैं। कमाल ये कि इनमें से ज्यादातर मीडिया हाउस के भी मालिक रहे या हैं। लेकिन, सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी की बुनियाद इतनी मजबूत थी कि एक के बाद एक सारे चिटफंडिये जेल के भीतर पहुंच गए। विजय माल्या का गिरफ्तारी भी ऐसी ही एक बुनियाद है। इससे बैंकिंग सिस्टम में कर्ज डुबाकर बैंकों की हालत खराब करने वाले उद्योगपतियों को उनकी औकात में लाया जा सकेगा। मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा लगाइए। सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज डुबाने वाले उद्योगपतियों की सूची मांगी है। सुप्रीमकोर्ट ये भी पूछ रहा है कि शाही अंदाज में जीने वाले इन उद्योगपतियों के अपनी कंपनी को बीमार घोषित करने के बाद भी बैंक कैसे कर्ज देकर खुश है। बाजार नियामक सेबी ने विलफुल डिफॉल्टरों, यानी ऐसी कंपनियां जिन्होंने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाया है, को कंपनी में किसी भी पद पर रहने से, बाजार में किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल होने से रोक दिया है। देश में नियामक होने न होने पर बहुत बहस चली है। लेकिन, सेबी ने इस बहस को सकारात्मक संदर्भ दे दिए हैं। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की संपत्तियों से ये सारा कर्ज वसूला जाना चाहिए। ठीक है कि ऐसा काम न हो कि लोग उद्योग लगाने, कर्ज लेने से डरने लगें। लेकिन, ऐसे उद्योगपति देश के लिए ज्यादा खतरनाक हैं, जिनसे बैंक, देश डरने लगे। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स की किंगफिशर बीयर दुनिया के 52 देशों में बिकती है। भारत के बीयर बाजार में इसकी आधी से ज्यादा हिस्सेदारी है। इसीलिए देवगौड़ा जी विजय माल्या मीडिया की सुर्खियों में है। और इसीलिए मोदी जी आपको विजय माल्या को सलाखों के पीछे भेजना ही होगा। ये सीधे-सीधे आपकी साख का सवाल है। और साख से ज्यादा देश की आर्थिक दशा का सवाल है। ऐसे कर्ज डुबाने वालों से कर्ज वसूली नहीं हुई, तो पचीस-पचास हजार करोड़ रुपये बैंकों को देकर भी बैंक की दशा सरकार क्या सुधार पाएगी। हां, ऐसे लोगों को कर्ज डुबाने के लिए इतनी रकम और मिल जाएगी। 

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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