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Saturday, February 18, 2017

दीनदयाल उपाध्यायऔर नाना जी देशमुख की जन्मशती पर बड़ा जमावड़ा

साभार- स्पन्दन फीचर्स
संघ प्रमुख डा. मोहनराव भागवत की उपस्थिति में ग्रामोदय और विकास की अवधारणा पर होगा मंथन
24 से 27 फरवरी तक चित्रकूट में ज़ुटेंगे संघ, सरकार और मीडिया के दिग्गज
गोवा की महामहिम राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, गुजरात और मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल श्री ओमप्रकाश कोहली के साथ ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर सहित अनेक नीति-निर्धारक और विचारक उपस्थित रहेंगे।
भोपाल। इस साल दो महान व्यक्तियों का जन्म शताब्दी वर्ष है। देश वर्ष 2016-17 में एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय और इस दर्शन के शिल्पकार नानाजी देशमुख की जन्म शताब्दी मना रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में 24 फरवरी से 27  फररवरी तक चित्रकूट में ग्रामोदय मेला -प्रदर्शनी और संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया है। यह आयोजन दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि दीनदयाल शोध संस्थान चित्रकूट में नाना जी की सप्तम पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम 24 से 27 फरवरी तक देश की विरासत, प्रगति एवं विकास को प्रदर्शित करने वाली विभिन्न, विशाल ग्रामोदय मेला एवं सभी प्रदेशों के ग्रामीण विकास मंत्रियों के ग्रामवासियों के साथ परिचर्चा, परिसंवाद, गोष्ठियां एवं प्रतियोगिताएं तथा सायंकाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन दीनदयाल खेल परिसर उद्यमिता विद्यापीठ, चित्रकूट में किया जा रहा है।
इस अवसर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र द्वारा कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इसी प्रकार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा विकास पत्रकारिता पर 7 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। स्पन्दन संस्था द्वारा संचारकों की तीन दिवसीय “ग्रामोदय मीडिया चौपाल” का आयोजन 25 से 27 फरवरी को किया जा रहा है। इन आयोजनों में वरिष्ठ पत्रकार श्री बलदेव भाई शर्मा, श्री जगदीश उपासने, प्रो. ब्रज किशोर कुठियाला, श्री राजकुमार भारद्वाज, डा. मनोज कुमार पटैरिया, श्री सोमदत्त शास्त्री, श्री आशीष जोशी, श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, सुश्री सीत मिश्र, सुश्री कायनात काजी, श्रीमती सरिता अरगरे, श्रीमती शैफाली पाण्डेय, श्री जयदीप कर्णिक, श्री प्रकाश हिन्दुस्तानी, श्री कृष्ण मोहन झा, सुश्री प्रियंका कौशल, श्री दिब्यांशु कुमार,  श्री शुभांशु चौधरी, श्री राकेश अग्निहोत्री, सुश्री ममता यादव, श्री उमाशंकर मिश्र,  सुश्री आशा अर्पित, श्री विजय जोशी, श्री पंकज शुक्ला सहित विभिन्न माध्यमों में कार्यरत संचारक हिस्सा लेंगे।

इस आयोजन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहनराव भागवत, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर सहित देश के विभिन्‍न राज्‍यों के ग्रामीण विकास मंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों एवं विषय विशेषज्ञ विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। दीनदयाल शोध संस्थान के प्रधान सचिव अतुल जैन और संगठन सचिव अभय महाजन ने इस आशय का आमंत्रण दिया है। श्री महाजन के अनुसार दीनदयाल शोध संस्थान समाज जीवन के सभी पहलुओं पर जनता की पहल एवं पुरुषार्थ के आधार पर चित्रकूट के साथ ही देश के कई स्थानों पर राष्ट्र  संरचना का कार्य कर रहा है। 27 फरवरी 2011 से राष्‍ट्र ऋषि नानाजी की पुण्‍यतिथि के कार्यक्रम में चित्रकूट के स्थानीय एवं देशभर से गणमान्यजन प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

Wednesday, October 19, 2016

वृहद, विविध, वैचारिक विवेचना का मंच तैयार है

पांचवां मीडिया चौपाल 22,23 अक्टूबर को हरिद्वार में हो रहा है। संयोगवश सभी मीडिया चौपाल में शामिल होने का अवसर मिला है। पिछले वर्ष ग्वालियर के मीडिया चौपाल में भेड़ियाधंसान ज्यादा होने से चौपालियों में थोड़ा उत्साह कम सा होता दिख रहा था। और ग्वालियर की चौपाल से लौटने के बाद कई लोगों ने मुझसे कहाकि अब अगली चौपाल में नहीं जाऊँगा। ग्वालियर के बाद मेरे मन में भी सवाल बड़ा था कि क्यों मुझे मीडिया चौपाल में जाना चाहिए। इसीलिए हरिद्वार में होने वाली ये पांचवीं मीडिया चौपाल बड़ी महत्वपूर्ण हो चली है। इस चौपाल के लिए पंजीकरण कराने वालों की सूची इस अवसर को और महत्वपूर्ण बना देती है। करीब 300 लोगों ने हरिद्वार में होने वाली इस चौपाल के लिए पंजीकरण किया है। मीडिया चौपाल कराने वाली स्पंदन संस्था के कर्ताधर्ता अनिल सौमित्र का ये व्यक्तित्व प्रभाव दिखाता है कि ग्वालियर के नकारात्मक मोड़ पर खत्म हुए मीडिया चौपाल को उन्होंने सफलतापूर्वक बेहद सकारात्मक मोड़ पर ला दिया है। शायद यही वजह है कि मुझे लग रहा है कि ये अब तक की सबसे अच्छी मीडिया चौपाल होने जा रही है। आयोजन समिति में अनिल सौमित्र ने मुझे शामिल कर लिया, तो पंजीकरण करने वालों के फोन आने से मुझे पहले समझ में आया, फिर जब मैंने पंजीकृत लोगों की सूची देखी, तो ये भरोसा पक्का हुआ। देश के हर हिस्से से इस बार मीडिया चौपाल में शामिल होने के लिए लोग आ रहे हैं। और जब मीडिया चौपाल शुरू हुआ था, तो ज्यादातर नए मीडिया पर काम करने वाले साथियों को मंच देने की मंशा से ही था। लेकिन, धीरे-धीरे इसका स्वरूप वृहद होता गया। और अभी पांचवीं मीडिया चौपाल में हर विधा के पत्रकार, हर धारा के सामाजिक कार्यकर्ता/नेता, ढेर सारे शोधार्थी, पत्रकारिता के छात्र/अध्यापक और संचार से संबंधित अधिकारी भी शामिल हो रहे हैं। पिछली कुछ चौपालों का विषय नदी-पानी होने की वजह से भी थोड़ी नीरसता सी आ गई थी। इस बार का विषय है –

विकास- अवधारणा, विचारधार एवं दृष्टि और मीडिया।  
22-23 अक्टूबर (शनिवार, रविवार) 2016
निष्काम सेवा ट्रस्ट, हरिद्वार, उत्तराखंड

उद्घाटन सत्र इसी मूल विषय पर ही है। दरअसल हरिद्वार में इस मीडिया चौपाल के होने की एक बड़ी वजह दिव्य प्रेम सेवा मिशन का सहयोग है। और इसके लिए संजय चतुर्वेदी का स्वयं आगे बढ़कर सहयोग की बड़ी भूमिका है। चौपाल में विचारक के एन गोविंदाचार्य, श्री हरीश रावत, श्री रमेश पोखरियाल निशंक, प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज, डॉ. राजाराम त्रिपाठी, श्री बलदेव भाई शर्मा, श्री जगदीश उपासने, श्री प्रेम शुक्ल, प्रो कुसुमलता केडिया, डा मनोज कुमार पटैरिया, श्री हरिश्चन्द्र सिंह, श्री अनूप नौडियाल, श्री आशीष गौतम, श्री जयदीप कर्णिक, श्री रवि चोपड़ा, भक्ति निष्काम शांत स्वामी, भक्ति विज्ञान मुनि, श्री मुनव्वर सलीम, प्रो हेमंत जोशी, श्री आर एस बेनीवाल, श्री शिवशंकर जायसवाल, प्रो सुखनंदन सिंह जैसे अनुभवी विषय विशेषज्ञ, कुशल संचारक और महानुभाव होंगे।

इसके अलावा संचारकों की भूमिका, सूचनाओं से बेहाल, संदेशों का अकाल-कैसे हो समाधान, भारत के भावी विकास की दिशा- समस्याएं, चुनौतियां और संभावनाएं और भावी भारत – मीडिया से अपेक्षा विषय पर सत्र होंगे। जिसमें विषय विशेषज्ञ और मीडिया के लोगों से बात करने का मौका मिलेगा।

इस पांचवीं चौपाल का महत्व इसलिए भी है कि इसी चौपाल में मीडिया चौपाल के स्थाई ठिकाने की भी चर्चा हो सकती है। साथ ही एक स्थाई खाका तैयार करने पर भी चर्चा होगी। खुला सत्र इसीलिए रखा गया है। कुल मिलाकर ये मीडिया चौपाल मीडिया में काम करने वालों के एक स्थाई, गंभीर मंच की बुनियाद बनता दिख रहा है। फिर हरिद्वार में ही मुलाकात होती है।

Saturday, October 10, 2015

पानी की कहानी बताना सीखें पत्रकार

एक बार फिर से चौपाली जुटे। इस बार जुटान की जगह रही ग्वालियर। जुटान की जगह भर बदली है। इस बार भी चौपालियों को जुटाने वाले अनिल सौमित्र ही रहे। उन्होंने बीड़ा उठा रखा है। और भोपाल से दिल्ली से ग्वालियर पहुंची चौपाल में इस बार भी दिल्ली की ही तरह चर्चा का मुख्य बिंदु है नदियां। 10 और 11 अक्टूबर को ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में ये कार्यक्रम हो रहा है। 10 अक्टूबर को उद्घाटन सत्र के बाद तीन समानांतर चर्चा सत्र हैं। भारत की नदियां- कल आज और कल। मध्य प्रदेश की नदियां- कल आज और कल। नदियों का विज्ञान और पारिस्थितिकी। दूसरे पहर में समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग के बाद फिर से तीन समानांतर सत्रों का होना तय रहा। जनमाध्यमों में नदियां- स्थिति, चुनौतियां और संभावनाएं। नदियों का पुनर्जीवन- संचारकों की भूमिका। नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष। इसके बाद दूसरे पहर के समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग तय है। मोट-मोटा देखा जाए, तो पहले पहर के समानांतर सत्र नदियों की स्थिति, परिस्थिति पर बात करने के रहे। जबकि, दूसरे पहर के समानांतर सत्र इस चर्चा के लिए रहे कि कैसे संचारक (ब्लॉगर, पत्रकार) नदियों का जीवन बनाए रखने में मददगार हो सकता है। मेरे लिए वैसे तो सभी सत्र बेहद रुचिकर हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष पर चर्चा करूं, तो बेहतर होगा।

नदियों की रिपोर्टिंग भी किसी चौपाल, संगोष्ठी में चर्चा का विषय है। ये बड़ी सुखद स्थिति बन रही है। वरना, तो नदी और नदियों की रिपोर्टिंग में चर्चा सिर्फ और सिर्फ तब होती है। जब किसी नदी से जुड़े किसी कार्यक्रम में मंत्री, मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का जुड़ना हो पाए। इसको थोड़ा सा और सही मैं करूं तो मुझे लगता है कि नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष की बजाए, इस चर्चा सत्र को कहना चाहिए, पानी की रिपोर्टिंग या पानी की कहानियां- विविध पक्ष। पानी की रिपोर्टिंग या पानी की कहानियों क्यों ब्लॉगरों, पत्रकारों, संचारकों को समझनी चाहिए। ये मैं 3-4 अपने निजी उदाहरण से समझाने की कोशिश करूंगा। वैसे तो भारत और भारत ही क्या दुनिया ही पानी के इर्द गिर्द बसी है। और पानी की रिपोर्टिंग का महत्व न समझने से ही दुनिया बहुत सी मुश्किलों से जूझ रही है। विडंबना देखिए कि शहरों में पानी की रिपोर्टिंग कब होती है। मोटे तौर पर तीन बार। एक बार जब गर्मियों में भयानक पानी की किल्लत होती है। यानी नगर पालिका, महानगर पालिका के पाइप से घरों तक पहुंचने वाले पानी की सप्लाई रुक जाती है या कम हो जाती है। दूसरी तब होती है जब घरों में बोरिंग करने और कंस्ट्रक्शन साइट पर लगातार जलादोहन से उस इलाके में पानी का स्तर तेजी से घटने लगता है। तीसरी बार पानी की बात तब होती है जब शहर की जीवनदायिनी नदी लोगों का जीवन लेने लगती है। यानी उसमें प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। मैं बात शहर की कर रहा हूं। लेकिन, अब पहले मैं अपने गांव चलूंगा। गांव इसलिए कि वहां तो पानी की समस्या होनी ही नहीं चाहिए। नदी की भी नहीं। क्योंकि, न कोई रास्ता रोक रहा है। न ही शहरी प्रदूषण नदियों को गंदा करके उनकी अविरल धारा में बाधा पहुंचा रहे हैं। फिर गांव में पानी की किल्लत क्यों होने लगी। दरअसल वो इसीलिए होने लगी कि पानी की बजाए नदियों की कहानी बताने की बात ज्यादा समझ में आती है। अब सोचिए अगर जमीन से पानी गायब होने लगा। तो, तालाब-नदी या ऐसे किसी भी पानी से जुड़े प्रवाह की कल्पना की जा सकती है क्या। बिल्कुल नहीं की जा सकती। 2008 में मैं अपने गांव गया था। मेरा गांव उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पड़ता है। ये सबसे लंबा अंतराल था मेरा गांव जाने का। उस समय मुंबई में नौकरी करने की वजह से इलाहाबाद तक जाना तो हो जाता था। लेकिन, वहां से सिर्फ 60 किलोमीटर की दूरी तय करके गांव जाना नहीं हो पाता था। खैर, पांच साल बाद गांव गया, तो समझ में आया कि गांव के किनारे के कई छोटे तालाब तालाबों से सबसे नजदीक के घर का दुआर बन गए थे। यानी अपने घर के आगे के तालाब को धीरे-धीरे मिट्टी से पाटकर तालाब के पानी को खत्म किया गया। और धीरे-धीरे तालाब ही गायब हो गए। इस पानी के कम होने की कहानी कोई कह नहीं रहा था। ये कोई मेरे गांव के तालाबों के पानी कम होने की कहानी नहीं है। ये पूरे देश के गांवों के तालाबों के पानी के कम होने और फिर गायब हो जाने की कहानी है। ये कम होते पानी का कहानी नहीं कही गई। इसलिए एकदम से गायब होते तालाब कि रिपोर्टिंग हुई। लेकिन, अब ये रिपोर्टिंग लकीर पीटने जैसी ही रही। क्योंकि, नया तालाब खुदवाने का प्रयास तो बड़ा कठिन है। मायावती की सरकार ने कुछ इस ओर प्रयास किए थे। लेकिन, वो खास सफल नहीं हो सके। दरवाजे के सामने के तालाब पटते गए, तो गांव के बगल से गुजरने वाली नदी का पानी खत्म होता गया। अब तो हाल ये है कि बारिश के दिनों में भी पुल से जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


दूसरी घटना 2007 गुजरात विधानसभा चुनावों की। गुजरात गया था मैं सीएनबीसी आवाज के लिए आर्थिक दृष्टिकोण से चुनाव की रिपोर्टिंग करने। वहां एक गांव की कहानी मिल गई। राजकोट से 22 किलोमीटर दूर राजसमढियाला गांव के प्रधान ने कई दशक पहले पानी का महत्व जान लिया था। पता नहीं उस पानी की कहानी कितनी कही गई। लेकिन, प्रधान के पानी के महत्व समझ लेने से गांव में आई समृद्धि की वजह से उस गांव की कहानी खूब कही गई। मैंने भी शायद उस गांव की समृद्धि की ही वजह से राजसमढियाला गांव की कहानी चैनल के लिए की। जबकि, उस गांव के प्रधान ने कैसे खेतों में पानी की कमी दूर करने के लिए सैटेलाइट से जमीन का नक्शा तैयार कराया। और कैसे-कैसे छोटे तालाब बनाए जिससे पूरे इलाके की जमीनों को खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल सके। कहानी यही होनी चाहिए। पानी की कहानी का एक और निजी अनुभव। मैं पिछले 6 सालों से नोएडा में रहता हूं। यहां आते ही जो सबसे पहली जरूरत समझ में आई। वो थी साफ पानी पीने के लए RO लगवाना। कमाल ये कि जो वॉटर प्योरीफायर मैंने मुंबई में लगवाया था। वो नोएडा में काम नहीं कर रहा था। अब RO लगवाना था। लगवाया। लेकिन, उससे तो सिर्फ पीने का पानी मिलता है। अब जरूरत इस बात की भी बन रही है कि घर में नहाने और कपड़े धोने के लिए पानी को ठीक करने के लिए भी मशीन लगनी चाहिए। इस पानी की कहानी कहने की कोशिश करनी होगी। बात इतनी सी नहीं है। बात ये भी है कि जब रिवर्श ऑस्मोसिस सिस्टम वाला वॉटर प्योरीफायर घर में लगाया, तो इससे पानी बर्बाद होने की गति कई गुना बढ़ जाती है। कुछ इस तरह से अपने सबसे नजदीक के अनुभव के आधार पर अगर पानी की कहानी पत्रकार, ब्लॉगर सीख सकें, तो ही शायद नदियों का जीवन बच सके। और, उनके साथ हमारा जीवन भी। संचार क्रांति ने सबको उस इंटरनेट तक पहुंच दे दी है। इससे हर कोई पत्रकार है। ब्लॉगर है। सोशल मीडिया पर दो लाइन तो लिख ही सकता है। अगर ये हो सके, तो पानी की कहानी से आर्थिक, सामाजिक पक्षों को दुरुस्त किया जा सकता है। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...