‘अधर्मी’ अखबार, टीवी चैनल

अखबार के सभी संस्करणों की ये पहली खबर है
इंडियन एक्सप्रेस की बड़ी औकात रही है। अरुण शौरी और बी जी वर्गीज वाले इंडियन एक्सप्रेस की। लेकिन, अकसर होता यही है कि बड़ी औकात पर बड़ी बड़ी गलितयां होती है। ऐसी ही एक बड़ी गलती इस समय जगजाहिर है। और अपनी औकात से बड़ी गलती इंडियन एक्सप्रेस ने कर दी है। अकसर इंडियन एक्सप्रेस अखबार लोग पढ़ते ही इसीलिए हैं कि कुछ हटकर, अलग पढ़ने को मिलेगा। उसमें ज्यादातर भाव यही रहता है कि जो खबर कहीं नहीं है वो, यहां पढ़ने को मिलेगी। लेकिन, इसका कतई ये मतलब नहीं है कि आप अखबार हैं तो खबर बनाने की कोशिश करने लगें। वो भी अलग दिखने के चक्कर में। सबको याद होगा कि कैसे इसी इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर दिल्ली की सत्ता पर सेना के कब्जे की कहानीसबको समझाने की कोशिश की थी। मेरी निजी राय थी कि उस समय सरकार को अखबार के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन, मुश्किल ये कि प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला न मान लिया जाए, इसलिए कई बार अखबारों, टीवी चैनलों की बड़ी से बड़ी गलतियां माफ कर दी जाती हैं। और फिर अगर ब्रांड बड़ा है इंडियन एक्सप्रेस जैसा तो फिर माफ करना तो बनता है। वजह साफ है कि इंडियन एक्सप्रेस है तो उसके पत्रकार, संपादक भी बड़े होंगे। उनके संबंध भी बड़े होंगे। और जब संबंध बड़े हों तो बड़ी गलतियां मायने नहीं रखती हैं। आज इंडियन एक्सप्रेस के सभी संस्करणों के पहले पन्ने पर खबर है कि Sena MP’s ‘force’ fasting Muslim stafferto eat chapatti, Maharashtra Sadan  says sorry.  दूसरे पन्ने पर बची खबर ये रही। हालांकि, इसमें पत्रकारिता के सारे स्थापित मानदंडों को पूरा करने की कोशिश की गई है। मतलब महाराष्ट्र सदन के उस रेजीडेंट मैनेजर से लेकर रेजीडेंट कमिश्नर, शिवसेना सांसद तक से बात करके उनका पक्ष भी पेश किया गया है। लेकिन, खबर जिस अंदाज में लिखी गई है और जिस तरह की सुर्खियां हैं। उससे साफ है कि इंडियन एक्सप्रेस क्या चाहता था। इंडियन एक्सप्रेस चाहता था कि उसके खाते में एक और खबर आए जिस पर संसद ठप हुई। और वो हो गया। इंडियन एक्सप्रेस की प्रतिष्ठा,  ब्रांड और बड़ा हो गया। उस खबर को टीवी चैनलों ने उठा लिया। क्योंकि, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और इकोनॉमिक टाइम्स अखबार में अगर कोई ऐसी बढ़िया खबर है तो जाहिर है टीवी चैनल उस पर मजे से खेल ही सकते हैं। सबने खेला। क्योंकि, सच बात है कि टीवी न्यूज चैनल तो खेलते ही हैं। खबरें तो दिखाते नहीं हैं। अब अच्छी बात ये भी होगी कि शानदार सरोकारी पत्रकारिता का काम अंग्रेजी इंडियन एक्सप्रेस अखबार के जिम्मे जाएगा। और Sensational News का ठीकरा हिंदी टीवी न्यूज चैनलों के जिम्मे चला जाएगा। चला गया भी है। 

इसी पर इंडियन एक्सप्रेस में भी संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार बी जी वर्गीज ने प्रभाष परंपरा न्यास के कार्यक्रम में व्याख्यान देते हुए कहा कि The media in India is currently in crisis and has suffered a severe loss of credibility. Managers have taken over from editors and gossip and sensation have supplanted news. If the print media is in trouble, sections of the electronic media have gone out of control.  आगे बी जी वर्गीज फिर कहते हैं कि In the media of today, the one who “breaks” the story, whatever its veracity, sets the stage. The rest follow as a pack creating a subjective reality that may be far removed from the objective truth. बी जी वर्गीज साहब को ये चिंता जताते समय शायद ही इंडियन एक्सप्रेस का ध्यान रहा हो। लेकिन, इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार नियमित तौर पर ये कर रहे हैं। अब बताइए किसी राज्य के दिल्ली में स्थित सदन में कैंटीन का अगर इस कदर बुरा हाल है कि सांसद, विधायक को ढंग का खाना नहीं मिल पा रहा है तो ये गंभीर सवाल है या नहीं। क्या इंडियन एक्सप्रेस अखबार या उसके बाद मुस्लिम का रोजा तोड़वाकर खेल रहे टीवी चैनल महाराष्ट्र सदन और दूसरे राज्य अतिथि गृहों के खाने पर पहले स्टोरी कर लेते। आखिर हर साल रेल बजट के समय तो यही काम करते ही है ना। उस घटना के साथ मैं खड़ा नहीं हूं। कोई भी नहीं खड़ा होगा। लेकिन, जरा बताइए ना खाना ही खराब मिले तो कितने लोग हैं जो संयम रख पाते हैं। जो वीडियो मैं देख सका और जितना देख सका। उसके आधार पर मुझे लगता है कि ये पूरी तरह से घटना को कट्टर हिंदूवादी पार्टी शिवसेना और मुस्लिम के बीच का मामला बनाने की गंदी कोशिश है। हिंदू, मुस्लिम या कोई भी हो उसके साथ कोई इस तरह की बद्तमीजी करे उस पर मामला बनाइए। खबर दिखाइए। इंडियन एक्सप्रेस अखबार का मैं खुद बड़ा प्रशंसक रहा हूं। या यूं कहें कि पत्रकारिता शुरु करते समय हर पत्रकार को अंग्रेजी में इंडियन एक्सप्रेस पढ़ना बेहतर लगता है। मुझे तो कई बार ये भी लगता है कि ये बड़े ब्रांड के जो रिपोर्टर होते हैं उनमें से ज्यादातर तक खबरें खुद चलकर पहुचती हैं। खासकर ऐसी खबरें जिसमें लोगों के हित जुड़े होते हैं। अब ज्यादा समय नहीं बचा है कि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने में। पहले से ही जिस तरह का माहौल है उसमें हिंदू-मुस्लिम करने की बहुत गुंजाइश दिख नहीं रही है। तो इसका फायदा किसको होगा। इसलिए हिंदू-मुस्लिम करो। कुछ मुस्लिम वोट शिवसेना-बीजेपी के खिलाफ एकजुट करो। वरना बताइए सत्रह जुलाई की घटना। वो भी बाकायदा इतने सांसद, पत्रकार, टीवी कैमरे और एक स्टाफ के साथ इस तरह की बदसलूकी। फिर भी इतने समय बाद ये खबर इतनी बनाकर क्यों चली। जाहिर है वर्गीज साहब जो कह रहे थे कि मैनेजरों ने खबर मैनेज कर ली। और जब पूरी तरह से मुसलमान का रोजा रोटी खिलाकर तोड़ने की पक्की बुनियाद तैयार कर ली गई तो, खबर सबको कर दी गई। ये खेल बंद करना होगा। उसके खिलाफ आवाज उठानी होगी।