दिलीप जी आपको टिप्पणी चाहिए या नहीं?

दिलीप मंडल ने एक बहस शुरू की और और अभय तिवारी उस बहस में खम ठोंककर खड़े हो गए हैं। वैसे अभय जी, दिलीपजी की तरह एक पक्ष को लेकर उसी पर चढ़ नहीं बैठे हैं। लेकिन, सलीके-सलीके में वो अपनी बात कहते जा रहे हैं। इन दोनों लेखों पर टिप्पणियां भी खूब आईं हैं। और, ज्यादातर टिप्पणियां दिलीप जी के निष्कर्षों के आधार पर ही हैं। पोस्ट और टिप्पणी मिलाकर इतना मसाला तैयार हो गया कि टिप्पणीकार ने भी एक पोस्ट ठेल दी।

मैंने जब दिलीप जी की ब्लॉग को लेकर नए साल की इच्छाएं देखीं थी। उसी समय मैं लिखना चाह रहा था लेकिन, समय न मिल पाने से ये हो नहीं सका। और, इस बीच अभय जी बहस आगे ले गए। दिलीपजी को सबसे ज्यादा एतराज ब्लॉगर मिलन पर है। लेकिन, सबसे ज्यादा टिप्पणियां इसी पक्ष में आई हैं कि ब्लॉगर मिलन होना चाहिए। मैं भी ब्लॉगर मिलन का पूरा जोर लगाकर पक्षधर हूं। समीर जी के मुंबई आने पर पहली बार किसी ब्लॉगर मिलन की वजह से ही मुंबई में तीन साल में पहली बार मुझे थोड़ा सामाजिक होने का भी अहसास हुआ।

अनिलजी और शशि सिंह को छोड़कर पहले मैं किसी से कभी नहीं मिला था। अभय जी से ब्लॉग के जरिए ही संपर्क हुआ और फोन पर एकाध बार बात हुई थी। अनीताजी से दो बार वादा करके भी मैं IIT पवई में हुए ब्लॉग मिलन में कुछ वजहों से शामिल नहीं हो पाया। मैं वहां ब्लॉगर्स के साथ सबसे कम समय रहा। लेकिन, प्रमोद जी, बोधिसत्व जी, यूनुस, विमल, विकास से इतनी पहचान तो हो गई कि आगे मिलने पर मुस्कुराकर मिलेंगे। प्रमोदजी और बोधि भाई के बारे में और नजदीक से जानने की इच्छी भी जागी है।

जहां तक चमचागिरी/ चाटुकारिता की दिलीपजी की बात है तो, बस इतना ही जानना चाहूंगा कि किस संदर्भ में कौन सी तारीफ चमचागिरी/चाटुकारिता हो जाती है। और, ज्यादातर ऐसा नहीं होता कि अपने लिए की गई साफ-साफ चमचागिरी भी अच्छी लगती है लेकिन, दूसरे की सही की भी तारीफ चाटुकारिता नजर आने लगती है।

और, दिलीपजी जहां तक तारीफ वाली टिप्पणियों से ब्लॉग को साहित्य वाला रोग लगने की बात है तो, लगने दीजिए ना। उस तरह के साहित्यकार आप ही के कहे मुताबिक, पांच सौ के प्रिंट ऑर्डर तक सिमटकर रह जाएंगे। वैसे आपके ब्लॉग पर भी ई मेल से सब्सक्राइब करने और फीड बर्नर से कितने लोगों ने सब्सक्राइब किया है, का बोर्ड लगा दिख रहा है।

हां, साधुवाद-साधुवाद का खेल नहीं होना चाहिए। लेकिन, अगर पूरी पोस्ट पढ़कर एक ही पाठक किसी के ब्लॉग की ज्यादातर पोस्ट पर टिप्पणी कर रहा है तो इसमें क्या हर्ज है। क्या किसी अखबार के नियमित पाठक और किसी टेलीविजन चैनल के नियमित दर्शक नहीं होने चाहिए। दिलीप जी ये बदल-बदलकर दर्शक खोजने के चक्कर में हम पड़े तो हम सब की रोजी-रोटी भी मारी जाएगी।

अप्रैल में मैंने ब्लॉग शुरू किया था। शुरू में तो मैंने अपने दोस्तों को ही बताया और सिर्फ उन्हीं की टिप्पणियां आती थीं। जाहिर है ज्यादातर लोग तारीफ ही करते थे। धीरे-धीरे लगातार लिखते-लिखते नई-नई टिप्पणियां आने लगीं। और, उन नई टिप्पणियों के जरिए नए लोग दोस्त भी बन गए। अभी मुंबई में मिले दस-बारह ब्लॉगर को छोड़ दें तो, ज्यादातर टिप्पणी करने वाले ब्लॉगर/पाठक से मैं मिला भी नहीं हूं। मुझे तो टिप्पणी चाहिए अब दिलीपजी की वो जानें। तो, सब लोग जरा जमकर टिप्पणी करना। बहुत अच्छा भी चलेगा।

हां, आपकी पोस्ट पर भुवन की एक टिप्पणी मेरी भी चिंता में शामिल है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि कुछ-कुछ लोगों का ब्लॉग कॉकस बन जा रहा हो। वैसे मेरा अनुभव ये भी बताता है कि बिना कॉकस बनाए सफल होना मुश्किल हो जाता है। आप तो, ज्यादा अनुभवी हैं।

जहां तक आपके नए साल के अरमानों की बात है तो, मेरी राय ये रही। आगे जनता की मर्जी

हिंदी ब्लॉग्स की संख्या कम से कम 10,000 हो -- क्या खूब
हिंदी ब्ल़ॉग के पाठकों की संख्या लाखों में हो -- बहुत खूब
विषय और मुद्दा आधारित ब्लॉगकारिता पैर जमाए -- आपकी सोच हकीकत में बदले
ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो -- लेकिन, इतना न हो जाए कि अमर्यादित रिश्ते बनाने तक बात पहुंचने लगे
ब्ल़ॉग के लोकतंत्र में माफिया राज की आशंका का अंत हो -- ये आशंका ही बेवजह है क्योंकि, ब्लॉगिंग के लिए कोई प्रिंटिंग प्रेस या टीवी चैनल खोलने की जरूरत नहीं होती
ब्लॉगर्स मीट का सिलसिला बंद हो -- माफ कीजिएगा, आपकी ये इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। पहला मौका मिलते ही हम फिर मिलेंगे और इस बार हम भी लिखेंगे, ब्लॉगर मिलन पर
नेट सर्फिंग सस्ती हो और 10,000 रु में मिले लैपटॉप और एलसीडी मॉनिटर की कीमत हो 3000 रु -- आप सचमुच बहुत अच्छा सोचते हैं लेकिन, थोड़ा और अच्छा सोच सकते थे