हिंदी दिवस पर हिंदी का हल्ला- रुदन जमकर हो रहा है। हर कोई बस इस एक 14 सितंबर के दिन में हिंदी को दुनिया की सबसे महत्वपर्ण भाषा बना देने को उतावला हो रहा है। मैंने भी सोचा हिंदी की कमाई खा रहा हूं तो, थोड़ा मैं भी चिंतित हो लेता हूं। लेकिन, लगा कि ये क्या बेवकूफी है। हिंदी ने जिस तरह से बाजार में अपनी ताकत बनाई है क्या उसके बावजूद एक दिन हिंदी के लिए रोकर हम ठीक कर रहे हैं। दरअसल सारी मुश्किल ये है कि जिन्हें हिंदी ने सबसे ज्यादा दिया है वो, इसको ठीक से संभाल नहीं पा रहे हैं पहला मौका पाते ही अंग्रेज बन जाना चाहते हैं।
और, हिंदी को खास परेशानी नहीं है। आज भी देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले 10 अखबारों में अंग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया छोड़ कोई अखबार नहीं है। विज्ञापन जगत से लेकर फिल्म और मीडिया तक हिंदी ही हावी है। व्यवहार में भी-बाजार में भी। इसलिए हिंदी दिवस मनाना छोड़िए- बस इस बाजार व्यवहार को हिंदी के लिहाज से ढालने में मदद करिए। बाकी तो अपने आप ही हो जाएगा।
दो साल से ज्यादा समय हो गया एक पोस्ट मैंने लिखी थी। 16 जून 2007 को। और, आज दो साल बाद भी वो पोस्ट पूरी की पूरी मौजूं लग रही है। क्योंकि, फिर से नया लिखूंगा भी तो, वो काफी कुछ यही होगा।
फिर हम क्यों बोलें हिंदी ...
बॉलीवुड कलाकारों को (आर्टिस्ट पढ़िए) अब अंग्रेजी या फिर रोमन में ही स्क्रिप्ट देनी पड़ती है। क्योंकि, उन्हें हिंदी में लिखी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आती। वैसे ये मुश्किल सिर्फ स्क्रिप्ट लिखने वालों की ही नहीं है। इन फिल्मी कलाकारों की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए जब पत्रकार (जर्नलिस्ट पढ़िए) साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने जाते हैं तो, उन्हें भी यही मुश्किल झेलनी पड़ती है। देश के हिंदी प्रदेशों में दीवानेपन की हद तक चाहे जाने वाले इन कलाकारों को इतनी भी हिंदी नहीं आती कि ये फिल्म के डायलॉग पढ़कर बोल सकें। फिर भी ये हिट हैं क्योंकि, ये बिकते हैं।
वैसे हिंदी की ये मुश्किल सिर्फ फिल्मी कलाकारों के मामले में नहीं है। बात यहीं से आगे बढ़ा रहा हूं जबकि, ये बात बहुत आगे बढ़कर ही यहां तक पहुंची है। देश में सभी चीजों को सुधारने का ठेका लेने वाला हिंदी मीडिया भी हिंदी से परेशान है। अब आप कहेंगे कि हिंदी चैनलों में हिंदी क्यों परेशान है। हिंदी का चैनल, देखने वाले हिंदी के लोग, बोलने-देखने-लिखने वाले हिंदी के लोग, फिर क्या मुश्किल है। दरअसल मुश्किल ये सीधे हिंदी बिक नहीं रही थी (अंग्रेजी में कहते हैं कि हेप नहीं दिख रही थी)। इसलिए हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगने लगा। शुरुआत में हिंदी में अंग्रेजी का मसाला लगना शुरू हुआ जब ज्यादा बिकने लगा तो, अंग्रेजी में हिंदी का मसाला भर बचा रह गया। हां, नाम हिंदी का ही था।
वैसे ये मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है कि फिल्मी कलाकार या कोई भी बड़ा होता आदमी या औरत (बिगीज) अब हिंदी बोलना नहीं चाहते। हिंदी वही बोल-पढ़ रहे हैं जो, और कुछ बोल-पढ़ नहीं सकते। लेकिन, दुखद तो ये है कि हिंदी वो भी बोल-पढ़ नहीं रहे हैं जो, हिंदी की ही खा रहे हैं। हिंदी खबरिया चैनलों का हाल तो ये है कि अगर बहुत अच्छी हिंदी आपको आती है तो, यहां नौकरी (जॉब) नहीं मिलने वाली। गलती से नौकरी मिल भी गई तो, कुछ ही दिन में ये बता-बताकर कि यहां खबर लिखो-साहित्य मत पेलो, कह-कहकर हिंदी का राम नाम सत्य करवा दिया जाएगा वो भी आपसे ही। जिस दिन पूरी तरह राम नाम सत्य हो गया और हिंदी के ही शब्दों-अक्षरों-वाक्यों पर आप गड़बड़ाने लगे तो, चार हिंदी में गड़बड़ हो चुके लोग मिलकर सही हिंदी तय करेंगे और ये तय हो जाएगा कि अब यही लिखा जाएगा भले ही गलत हो। और, जब मौका मिला थोड़ी बची-खुची सही हिंदी जानने वाले बड़े लोग आपको डांटने का मौका हाथ से जानने नहीं देंगे।
मैं फिर लौटता हूं कि हिंदी की मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है। हिंदी चैनलों में भर्ती (रिक्रूटमेंट) होती है तो, अगर उसने u know.... i hope ... so.. i think कहकर अपने को साबित (प्रूव) कर दिया तो, फिर नौकरी (जॉब) पक्की। समझाया ये जाएगा कि थोड़ी हिंदी कमजोर है लेकिन, लड़की या लड़के को समझ बहुत अच्छी है। हिंदी तो, पुराने लोग मिलकर ठीक कर देंगे। वैसे जिनके दम पर नई भर्ती को हिंदी सिखाने का दम भरा जा रहा होता है उनमें हिंदी का दम कितना बचा होता है ये समझ पाना भी मुश्किल है। वैसे हिंदी के इस दिशा में जाने के पीछे वजह जानने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जगह के रिसेप्शन को भी पार (क्रॉस) करने के लिए अंग्रेजी ही काम आती है।
सिर्फ हिंदी के भरोसे अगर आप घर से बाहर निकले हैं तो, मन में ही हिंदी को संजोए हुए चुपके से ही रिसेप्शन पार कर गए तब तो ठीक है नहीं तो, हिंदी के सवाल के जवाब में अंग्रेजी में may i help u आपको फिर से बाहर कर सकता है। मेरे जैसे हिंदी जानने-बोलने-पढ़ने-समझने-लिखने वालों की मंडली तो आपस में मजाक भी कर लेती है कि किसी मॉल या किसी बड़ी-छोटी जगह के रिसेप्शन पर या किसी सेल्स गर्ल से बात करने के लिए बीवी को आगे कर ही काम निकलता होगा। क्योंकि, बड़े मॉल्स, स्टोर्स में तो कुछ खऱीदने के लिए जेब में पैसे होने ही जितना जरूरी है कि आपमें अंग्रेजी में बात करने का साहस हो। शायद ये साहस लड़कियों में कुछ ज्यादा होता है।
खैर बॉलीवुड के कलाकार हिंदी की स्क्रिप्ट पढ़ने से मना कर रहे हैं। इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे ये लिखने की सूझी। इसी खबर में गुलजार ने कहा था कि ये तो बहुत पहले से होता आ रहा है। लेकिन, मुझे जो लगता है कि ये पहले से होता आ रहा है या इसमें कलाकारों का कितना दोष है इस पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या हम सचमुच ये मान चुके हैं कि हिंदी छोटे लोगों की, हल्का काम करने वालों की भाषा है। जो भी हिंदी बोले उसे छोटे दर्जे का मानना और फिर उस अपने से मान लिए छोटे दर्जे की जमात के लिए हिंदी समझना-बोलना कहां तक ठीक है। यहां तक कि अपने घर में पाले जानवरों से भी ये अंग्रेजीदां लोगों की जमात अंग्रेजी में ही बात करती है क्योंकि, इनके घर के बच्चे उन जानवरों से भी बात करते हैं उनके साथ खेलते हैं। इसलिए घर के पालतू कुत्ते से हिंदी में बातकर ये अंग्रेजीदां लोग अपने बच्चों को बिगाड़ना नहीं चाहते, डर ये कि कहीं बच्चा भी हिंदी न बोलने लगे।
हिंदी की मुश्किल शब्द का कई बार में इस्तेमाल कर चुका हूं। लेकिन, इसका कतई ये आशय नहीं है कि मैं हिंदी की सिर्फ दारुण कथा लेकर बैठ गया हूं। दरअसल मैं सिर्फ इस बात की तरफ इशारा करना चाह रहा हूं कि क्या हम अपनी भाषा को छोटे लोगों की भाषा समझकर अपनी खुद की इज्जत मिट्टी में नहीं मिला रहे हैं। अंग्रेजी आना और बहुत अच्छे से आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन, हिंदी के शब्दों में अंग्रेजी मिलाकर रोमन में लिखी हिंदी बोलने वाले हिंदी का अहसास कहां से लाएंगे क्योंकि, उसमें तो अंग्रेजी की feel आने लगती है।
ये सही है कि अंग्रेजी के विद्वान बन जाने से दुनिया में हमें बहुत इज्जत भी मिली और दुनिया से हमने बहुत पैसा भी बटोर लिया। लेकिन, अब हम इतने मजबूत हो गए हैं कि दुनिया हमारी भाषा, हमारे देश का भी सम्मान करने के लिए मजबूर हो। और, ये तभी हो पाएगा जब हम खुद अपनी भाषा अपने देश का सम्मान करें। चूंकि, मीडिया का ही सबसे ज्यादा असर लोगों पर होता है और मीडिया में भी खबर देने वाले चैनल और फिल्मी कलाकार लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए इस सम्मान को समझने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। वैसे मुझे भी कभी-कभी लगता है कि जब अंग्रेजी से ही तरक्की मिल रही हो तो, हम क्यों बोलें हिंदी।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
Monday, September 14, 2009
Sunday, September 13, 2009
भविष्य का मीडिया है वेब जर्नलिज्म
रवि रतलामी जी से पहली बार मुलाकात कुछ दिन पहले हुई। वर्चुअली यानी नेट के जरिए तो, बहुत पहले से भेंट है लेकिन, आमने-सामने की पहली मुलाकात मुंबई में संभव हुई। वो, भी तब जब मैंने मुंबई साढ़े चार साल के बाद छोड़कर दिल्ली का रुख कर लिया। मुलाकात में मैंने उनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की पत्रिका बरगद की एक प्रति दी। जिसमें वेब जर्नलिज्म पर मेरा भी एक लेख है। रविजी ने कहा- इसे अपने ब्लॉग पर क्यों नहीं डालते हैं। अभी चिट्ठा चर्चा पर गया तो, उनकी चिट्ठा चर्चा देखा तो, फिर याद आ गया। ये फरवरी में लिखा गया लेख है।
भविष्य का मीडिया है वेब जर्नलिज्म
भारत में इंटरनेट पत्रकारिता अभी अपने शैशवकाल में है। लेकिन, अगले 10 सालों में ये माध्यम मजबूत और विश्वसनीय माध्यम बनकर उभरने वाला है। इस माध्यम की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें टीवी मीडिया की तेजी और अखबार की ज्ञान बढ़ाने वाली पत्रकारिता दोनों का अच्छा गठजोड़ है। इंटरनेट की बढ़ती महत्ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शायद ही आज कोई ऐसा बड़ा अखबार या टीवी चैनल होगा- जिसकी अपनी वेबसाइट नहीं है। यहां तक कि राज्य और जिला स्तर का मीडिया भी तुरंत चाहता है कि इंटरनेट पर उसकी उपस्थिति हो। लेकिन, इंटरनेट पत्रकारिता- टीवी और अखबार दोनों से ही कई मायने में अलग है।
अखबार जहां सिर्फ पत्रकारिता यानी खबर लिखना और उसे छपने के लिए दे देना भर होता है। वहीं टीवी एक टीम वर्क होता है जहां किसी खबर के आने से लेकर उसके दर्शकों तक पहुंचने की एक लंबी प्रक्रिया होता है और उसे किसी की भी एक छोटी सी गलती बड़ी से बड़ी खबर का बंटाधार हो जाता है। लेकिन, नेट की पत्रकारिता इन दोनों ही माध्यमों से बिल्कुल अलग है। अभी चूंकि ये अपने शुरुआती दौर में है इसलिए ज्यादातर न्यूज वेबसाइट किसी अखबार या फिर टीवी चैनल की ही खबरों को इंटरनेट पर बेहतर तरीके से सजाकर पेश कर रहे हैं। लेकिन, जैसे-जैसे देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ेगी और बड़े-छोटे शहरों से निकलकर इंटरनेट गांव-कस्बों तक पहुंचेगा तो, न्यूज वेबसाइट को इसके लिए अलग से लोगों को रखने की जरूरत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, 2008 के आखिर तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5 करोड़ तक पहुंच गई है। अगर इसमें मोबाइल के जरिए नेट का इस्तेमाल करने वाले भी जोड़ दिए जाएं तो, ये संख्या 5 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए।
इंटरनेट पहले तो, पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के जाननने वालों की ही बपौती था। लेकिन, अब इसमें दूसरी भाषाओं के लिए भी संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसको इसी से समझा जा सकता है कि 1998 के बाद से अंग्रेजी वेबसाइट की तुलना में गैर अंग्रेजी वेबसाइट ज्यादा शुरू हो रही हैं। यूनिकोड के आने के बाद इंटरनेट पर हिंदी का विकास भी तेजी से हुआ है। अब तो ज्यादातर कंपनियां लैपटॉप और डेस्कटॉप को हिंदी भाषा के साथ आसानी से काम करने वाला बना रही हैं। क्योंकि, उन्हें पता है कि दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली हिंदी भाषा के बिना आने वाले में जमाने में उनका बाजार नहीं बन सकता।
दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। इसमें हिंदी जानने-समझने वालों को भी शामिल किया जाए तो, ये संख्या 80 करोड़ से ज्यादा हो जाती है। भारत से बाहर अमेरिका में हिंदी बोलने वाले एक लाख से ज्यादा हैं तो, मॉरीशस जैसे देश में करीब सात लाख लोग हिंदी ही बोलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में हिंदी बोलने वाले करीब 9 लाख लोग हैं। सिंगापुर, यमन, युगांडा, न्यूजीलैंड, जर्मनी में भी हिंदी जानने-समझने वाले कम नहीं हैं। जाहिर है ये सारे लोग हिंदी खबरें देने वाले अखबार या टीवी आसानी से इन तक पहुंच नहीं बना सकते। लेकिन, इंटरनेट से तो, दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने से अपने काम की खबर चुन सकता है। और, यही इंटरनेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।
हिंदी मीडिया में इंटरनेट इसलिए भी और उपयोगी हो जाता है क्योंकि, हिंदी न्यूज चैनलों की अंधी TRP (Television Rating Points) की रेस में जिस तरह से बिना सोचे समझे खबरें परोसीं जा रही हैं उसमें खबरों की विश्वसनीयता और उसका प्रभाव कम हो रहा है। ऐसे में तुरंत खबर और पूरी समझ के साथ विश्लेषण देने की क्षमता रखने वाली इंटरने पत्रकारिता बेहद प्रभावी हो सकती है।
वेब पत्रकारिता की एक और खूबी ये कि इसमें गंभीर लेख और गंभीर पाठक दोनों का गजब का मेल होता है। भारत में वेब जर्नलिज्म को अभी करीब दशक भर ही हुए हैं। लेकिन, देश में न्यूज वेबसाइट की खबरों पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। यहां तक कि खुद टीवी चैनल और अखबार भी इसीलिए अपना इंटरनेट एडिशन शुरू करते हैं जिससे एक अलग वर्ग में उनकी पहचान बने। नेट पर अंग्रेजी जानने वालों की पकड़ पहले से ही है। इसलिए शुरुआत में अंग्रेजी की ही न्यूज वेबसाइट शुरू हुईं। तरुण तेजपाल के tehelka.com ने इंटरनेट मीडियम को सुर्खियों में लाया लेकिन, उसके बहुत पहले 1995 में चेन्नई से निकलने वाले The Hindu ने अपना इंटरनेट एडिशन शुरू कर दिया।
अब देश के 50 से ज्यादा अखबार हैं जिनके इंटरनेट एडिशन हैं। क्योंकि, अखबार में जहां खबरों को संभालकर रखने की कवायद करनी होती है। वहीं टीवी में हर मिनट बदलने वाली खबर असर नहीं कर पाती। ऐसे में इंटरनेट पर लिखी गई खबर हमारी-आपकी – कहीं भी, कभी भी- वाली स्वतंत्रता और अपनी मर्जी की खबर पढ़ने की इच्छा पूरी करती है। अब तो ज्यादातर टीवी चैनल अपने वीडियो भी वेबसाइट पर डाल देते हैं और, इस बात का जमकर प्रमोशन भी करते हैं कि अमुक वीडियो आप कभी भी हमारी वेबसाइट पर देख सकते हैं। नेटवर्क 18 का हाल ही में शुरू हुआ पोर्टल in.com और cnn ibn की वेबसाइट ibnlive.com इसका बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। ये इटरनेट की ताकत है कि bbc.com 32 भाषा में पढ़ने को मिल सकता है।
लेकिन, इंटरनेट की ये पत्रकारिता वरदान है खासकर बिजनेस पत्रकारिता के लिए। ग्लोबलाइजेशन के बाद बिजनेस की खबरों को जानने समझने की इच्छा सबमें बढ़ी है। क्योंकि, जेब में पैसा बढ़ाने की जुगत हर कोई खोज रहा है। अब अगर ये समझ उसे कभी भी, कहीं भी- अपनी सहूलियत से मिले तो, उसकी पहुंच और असर बढ़ जाता है। और, आज जब देश के हर कोने से लोगों की बिजनेस-बाजार में रुचि बढ़ी है तो, हिंदी में बिजनेस की खबरों का बाजार भी बड़ा हुआ है।
देश के पहले बिजनेस चैनल cnbc tv18 ने इसीलिए 13 जनवरी 2005 में हिंदी में बिजनेस का चैनल cnbc आवाज़ शुरू किया जो, 2008 आते-आते अपने ही अंग्रेजी चैनल cnbc tv18 से भी बड़ा हो गया। और, देश का नंबर एक बिजनेस चैनल बन गया। अब चार साल पूरे होने पर आवाज़ ने हिंदी में बिजनेस की सारी खबरें देने के लिए www.awaazkarobar.com शुरू किया। इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि आवाज़ चैनल पर दिखने वाली हर खबर यहां विस्तार से दिखती है और, शायद ये अकेली वेबसाइट होगी जिस पर टीवी की तरह मार्केट और बिजनेस एनालिस्ट की राय वीडियो और टेक्स्ट दोनों ही तरीकों में मिल जाती है। ये एक अनोखा प्रयोग है। यही वजह है कि www.awaazkarobar.com अपनी शुरुआत के महीने भर में ही हिंदी की नंबर एक बिजनेस वेबसाइट बन गई है।
इंटरनेट मीडिया के बढ़ने की एक और बड़ी वजह है इसकी इंटरैक्टिविटी। इस माध्यम का जितना बेहतर इस्तेमाल लोगों का मीडियम बनने में किया जा सकता है उतना, किसी और मीडिया का नहीं। ज्यादातर वेबसाइट खुद को ज्यादा से ज्यादा इंटरैक्टिव बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसमें किसी खास वक्त पर किसी खास मेहमान से किसी खास विषय पर होने वाली ऑनलाइन चैट हो, हर रोज के ज्वलंत, समसामयिक मुद्दे पर चैट हो या इंटरनेट की हर खबर पर पाठकों की राय। ये ऐसी चीज है जिससे पढ़ने वाले को ये अहसास होता है कि हमारी कही गई बात की अहमियत है तो, वो उस खास वेबसाइट से ज्यादा जुड़ाव महसूस करता है।
इंटरनेट से परिचय किसी का भी सबसे पहले e-mail के जरिए होता है। और, इस ताकत को बखूबी पहचाना है rediff.com और yahoo.com जैसी वेबसाइट ने। दोनों ही जगहों पर असली मायने में इंटरनेट की पत्रकारिता और खबरों का अंदाज देखने को मिलता है। होमपेज पर ही login करने से पहले ही खबरों का भंडार इस रोचक अंदाज में परोसा होता है कि एक बार आप उसमें घुसे तो, खबरों के जाल से बाहर निकलने में फिर काफी समय लग जाता है। यही वजह है कि rediff.com भारत की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली न्यूज वेबसाइट में शामिल है। खासकर NRI (non resident indian) को तो ये बेहद पसंद है। यहां हर खबर को पड़ने की मारामारी भी नहीं होती है। बड़ी खबरों के अलावा इनके रिपोर्टर देश के अलग-अलग हिस्सों से रोचक खबरों को अलग अंदाज में पेश करते हैं। yahoo.com पर अंग्रेजी में खबरें मिलती हैं तो, हिंदी खबरों के लिए yahoo ने जागरण अखबार की वेबसाइट jagran.com से समझौता किया है।
लेकिन, अच्छी वेब पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि इंटरनेट और कंप्यूटर के बारे में भी अच्छी जानकारी हो। क्योंकि, खबर लिखने के अंदाज के साथ ये भी जरूरी है कि वो, अलग-अलग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वालों को बेहतर तरीके से दिखे भी। अगर वेबसाइट में वीडियो का इस्तेमाल है तो, ये भी जरूरी है कि उसकी साइज इतनी बड़ी न हो कि वो, कम स्पीड वाले नेट पर चल ही न पाए क्योंकि, अभी भारत में बहुत कम स्पीड वाली सर्विस ही उपलब्ध है। 3जी आने के बाद इस स्थिति में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इसके अलावा वेब जर्नलिस्ट के लिए ये बहुत जरूरी है कि वो, ये सुनिश्चित करेकि उसकी खबर सर्च इंजन में कैसे ऊपर के पन्नों पर आए। इसके लिए जरूरी है कि ऐसे की वर्ड डाले जाएं जिसका इस्तेमाल किसी जानकारी के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग करते हों।
इंटरनेट की पत्रकारिता का एक और खास पहलू है ब्लॉगिंग। अभी वैसे ब्लॉगरों को जर्नलिस्ट माना जाए या न माना जाए- इस पर बड़ी बहस चल रही है। लेकिन, जब मीडिया घरानों पर पक्षपात किसी खास औद्योगिक घराने, पक्ष, पार्टी के साथ खड़े होने से भरोसा डगमगाता हो तो, स्वतंत्र ब्लॉगर भरोसा जगाते हैं। अच्छी बात ये है कि आप बाध्य नहीं होते। आप चार ब्लॉगरों के विचार जान-पढ़कर उनसे निष्कर्ष निकाल सकते हैं। और, अब तो किसी भी बड़े-छोटे (अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय-स्थानीय) मुद्दे पर ब्लॉगरों की राय काफी अहम रोल निभाती है। इस समय देश में 10 हजार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं।
यही सब वजहें हैं कि वेब जर्नलिज्म आने वाले दिनों में सबसे मजबूत माध्यम बनकर उभरेगा। सस्ते होते लैपटॉप, डेस्कटॉप, सस्ता इंटरनेट और तेज स्पीड इंटरनेट कनेक्शन, ये सब मजबूत वेब जर्नलिज्म के मददगार बनेंगे। लेकिन, अभी इसे बहुत लंबा रास्ता तय करना है। क्योंकि, Internet and Mobile Association of India और IMRB के एक सर्वे के मुताबिक, भारत में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की कुल 1249 वेबसाइट ही हैं। सफर लंबा लेकिन, भविष्य उज्ज्वल है।
भविष्य का मीडिया है वेब जर्नलिज्म
भारत में इंटरनेट पत्रकारिता अभी अपने शैशवकाल में है। लेकिन, अगले 10 सालों में ये माध्यम मजबूत और विश्वसनीय माध्यम बनकर उभरने वाला है। इस माध्यम की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें टीवी मीडिया की तेजी और अखबार की ज्ञान बढ़ाने वाली पत्रकारिता दोनों का अच्छा गठजोड़ है। इंटरनेट की बढ़ती महत्ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शायद ही आज कोई ऐसा बड़ा अखबार या टीवी चैनल होगा- जिसकी अपनी वेबसाइट नहीं है। यहां तक कि राज्य और जिला स्तर का मीडिया भी तुरंत चाहता है कि इंटरनेट पर उसकी उपस्थिति हो। लेकिन, इंटरनेट पत्रकारिता- टीवी और अखबार दोनों से ही कई मायने में अलग है।
अखबार जहां सिर्फ पत्रकारिता यानी खबर लिखना और उसे छपने के लिए दे देना भर होता है। वहीं टीवी एक टीम वर्क होता है जहां किसी खबर के आने से लेकर उसके दर्शकों तक पहुंचने की एक लंबी प्रक्रिया होता है और उसे किसी की भी एक छोटी सी गलती बड़ी से बड़ी खबर का बंटाधार हो जाता है। लेकिन, नेट की पत्रकारिता इन दोनों ही माध्यमों से बिल्कुल अलग है। अभी चूंकि ये अपने शुरुआती दौर में है इसलिए ज्यादातर न्यूज वेबसाइट किसी अखबार या फिर टीवी चैनल की ही खबरों को इंटरनेट पर बेहतर तरीके से सजाकर पेश कर रहे हैं। लेकिन, जैसे-जैसे देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ेगी और बड़े-छोटे शहरों से निकलकर इंटरनेट गांव-कस्बों तक पहुंचेगा तो, न्यूज वेबसाइट को इसके लिए अलग से लोगों को रखने की जरूरत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, 2008 के आखिर तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5 करोड़ तक पहुंच गई है। अगर इसमें मोबाइल के जरिए नेट का इस्तेमाल करने वाले भी जोड़ दिए जाएं तो, ये संख्या 5 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए।
इंटरनेट पहले तो, पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के जाननने वालों की ही बपौती था। लेकिन, अब इसमें दूसरी भाषाओं के लिए भी संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसको इसी से समझा जा सकता है कि 1998 के बाद से अंग्रेजी वेबसाइट की तुलना में गैर अंग्रेजी वेबसाइट ज्यादा शुरू हो रही हैं। यूनिकोड के आने के बाद इंटरनेट पर हिंदी का विकास भी तेजी से हुआ है। अब तो ज्यादातर कंपनियां लैपटॉप और डेस्कटॉप को हिंदी भाषा के साथ आसानी से काम करने वाला बना रही हैं। क्योंकि, उन्हें पता है कि दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली हिंदी भाषा के बिना आने वाले में जमाने में उनका बाजार नहीं बन सकता।
दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। इसमें हिंदी जानने-समझने वालों को भी शामिल किया जाए तो, ये संख्या 80 करोड़ से ज्यादा हो जाती है। भारत से बाहर अमेरिका में हिंदी बोलने वाले एक लाख से ज्यादा हैं तो, मॉरीशस जैसे देश में करीब सात लाख लोग हिंदी ही बोलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में हिंदी बोलने वाले करीब 9 लाख लोग हैं। सिंगापुर, यमन, युगांडा, न्यूजीलैंड, जर्मनी में भी हिंदी जानने-समझने वाले कम नहीं हैं। जाहिर है ये सारे लोग हिंदी खबरें देने वाले अखबार या टीवी आसानी से इन तक पहुंच नहीं बना सकते। लेकिन, इंटरनेट से तो, दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने से अपने काम की खबर चुन सकता है। और, यही इंटरनेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।
हिंदी मीडिया में इंटरनेट इसलिए भी और उपयोगी हो जाता है क्योंकि, हिंदी न्यूज चैनलों की अंधी TRP (Television Rating Points) की रेस में जिस तरह से बिना सोचे समझे खबरें परोसीं जा रही हैं उसमें खबरों की विश्वसनीयता और उसका प्रभाव कम हो रहा है। ऐसे में तुरंत खबर और पूरी समझ के साथ विश्लेषण देने की क्षमता रखने वाली इंटरने पत्रकारिता बेहद प्रभावी हो सकती है।
वेब पत्रकारिता की एक और खूबी ये कि इसमें गंभीर लेख और गंभीर पाठक दोनों का गजब का मेल होता है। भारत में वेब जर्नलिज्म को अभी करीब दशक भर ही हुए हैं। लेकिन, देश में न्यूज वेबसाइट की खबरों पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। यहां तक कि खुद टीवी चैनल और अखबार भी इसीलिए अपना इंटरनेट एडिशन शुरू करते हैं जिससे एक अलग वर्ग में उनकी पहचान बने। नेट पर अंग्रेजी जानने वालों की पकड़ पहले से ही है। इसलिए शुरुआत में अंग्रेजी की ही न्यूज वेबसाइट शुरू हुईं। तरुण तेजपाल के tehelka.com ने इंटरनेट मीडियम को सुर्खियों में लाया लेकिन, उसके बहुत पहले 1995 में चेन्नई से निकलने वाले The Hindu ने अपना इंटरनेट एडिशन शुरू कर दिया।
अब देश के 50 से ज्यादा अखबार हैं जिनके इंटरनेट एडिशन हैं। क्योंकि, अखबार में जहां खबरों को संभालकर रखने की कवायद करनी होती है। वहीं टीवी में हर मिनट बदलने वाली खबर असर नहीं कर पाती। ऐसे में इंटरनेट पर लिखी गई खबर हमारी-आपकी – कहीं भी, कभी भी- वाली स्वतंत्रता और अपनी मर्जी की खबर पढ़ने की इच्छा पूरी करती है। अब तो ज्यादातर टीवी चैनल अपने वीडियो भी वेबसाइट पर डाल देते हैं और, इस बात का जमकर प्रमोशन भी करते हैं कि अमुक वीडियो आप कभी भी हमारी वेबसाइट पर देख सकते हैं। नेटवर्क 18 का हाल ही में शुरू हुआ पोर्टल in.com और cnn ibn की वेबसाइट ibnlive.com इसका बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। ये इटरनेट की ताकत है कि bbc.com 32 भाषा में पढ़ने को मिल सकता है।
लेकिन, इंटरनेट की ये पत्रकारिता वरदान है खासकर बिजनेस पत्रकारिता के लिए। ग्लोबलाइजेशन के बाद बिजनेस की खबरों को जानने समझने की इच्छा सबमें बढ़ी है। क्योंकि, जेब में पैसा बढ़ाने की जुगत हर कोई खोज रहा है। अब अगर ये समझ उसे कभी भी, कहीं भी- अपनी सहूलियत से मिले तो, उसकी पहुंच और असर बढ़ जाता है। और, आज जब देश के हर कोने से लोगों की बिजनेस-बाजार में रुचि बढ़ी है तो, हिंदी में बिजनेस की खबरों का बाजार भी बड़ा हुआ है।
देश के पहले बिजनेस चैनल cnbc tv18 ने इसीलिए 13 जनवरी 2005 में हिंदी में बिजनेस का चैनल cnbc आवाज़ शुरू किया जो, 2008 आते-आते अपने ही अंग्रेजी चैनल cnbc tv18 से भी बड़ा हो गया। और, देश का नंबर एक बिजनेस चैनल बन गया। अब चार साल पूरे होने पर आवाज़ ने हिंदी में बिजनेस की सारी खबरें देने के लिए www.awaazkarobar.com शुरू किया। इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि आवाज़ चैनल पर दिखने वाली हर खबर यहां विस्तार से दिखती है और, शायद ये अकेली वेबसाइट होगी जिस पर टीवी की तरह मार्केट और बिजनेस एनालिस्ट की राय वीडियो और टेक्स्ट दोनों ही तरीकों में मिल जाती है। ये एक अनोखा प्रयोग है। यही वजह है कि www.awaazkarobar.com अपनी शुरुआत के महीने भर में ही हिंदी की नंबर एक बिजनेस वेबसाइट बन गई है।
इंटरनेट मीडिया के बढ़ने की एक और बड़ी वजह है इसकी इंटरैक्टिविटी। इस माध्यम का जितना बेहतर इस्तेमाल लोगों का मीडियम बनने में किया जा सकता है उतना, किसी और मीडिया का नहीं। ज्यादातर वेबसाइट खुद को ज्यादा से ज्यादा इंटरैक्टिव बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसमें किसी खास वक्त पर किसी खास मेहमान से किसी खास विषय पर होने वाली ऑनलाइन चैट हो, हर रोज के ज्वलंत, समसामयिक मुद्दे पर चैट हो या इंटरनेट की हर खबर पर पाठकों की राय। ये ऐसी चीज है जिससे पढ़ने वाले को ये अहसास होता है कि हमारी कही गई बात की अहमियत है तो, वो उस खास वेबसाइट से ज्यादा जुड़ाव महसूस करता है।
इंटरनेट से परिचय किसी का भी सबसे पहले e-mail के जरिए होता है। और, इस ताकत को बखूबी पहचाना है rediff.com और yahoo.com जैसी वेबसाइट ने। दोनों ही जगहों पर असली मायने में इंटरनेट की पत्रकारिता और खबरों का अंदाज देखने को मिलता है। होमपेज पर ही login करने से पहले ही खबरों का भंडार इस रोचक अंदाज में परोसा होता है कि एक बार आप उसमें घुसे तो, खबरों के जाल से बाहर निकलने में फिर काफी समय लग जाता है। यही वजह है कि rediff.com भारत की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली न्यूज वेबसाइट में शामिल है। खासकर NRI (non resident indian) को तो ये बेहद पसंद है। यहां हर खबर को पड़ने की मारामारी भी नहीं होती है। बड़ी खबरों के अलावा इनके रिपोर्टर देश के अलग-अलग हिस्सों से रोचक खबरों को अलग अंदाज में पेश करते हैं। yahoo.com पर अंग्रेजी में खबरें मिलती हैं तो, हिंदी खबरों के लिए yahoo ने जागरण अखबार की वेबसाइट jagran.com से समझौता किया है।
लेकिन, अच्छी वेब पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि इंटरनेट और कंप्यूटर के बारे में भी अच्छी जानकारी हो। क्योंकि, खबर लिखने के अंदाज के साथ ये भी जरूरी है कि वो, अलग-अलग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वालों को बेहतर तरीके से दिखे भी। अगर वेबसाइट में वीडियो का इस्तेमाल है तो, ये भी जरूरी है कि उसकी साइज इतनी बड़ी न हो कि वो, कम स्पीड वाले नेट पर चल ही न पाए क्योंकि, अभी भारत में बहुत कम स्पीड वाली सर्विस ही उपलब्ध है। 3जी आने के बाद इस स्थिति में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इसके अलावा वेब जर्नलिस्ट के लिए ये बहुत जरूरी है कि वो, ये सुनिश्चित करेकि उसकी खबर सर्च इंजन में कैसे ऊपर के पन्नों पर आए। इसके लिए जरूरी है कि ऐसे की वर्ड डाले जाएं जिसका इस्तेमाल किसी जानकारी के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग करते हों।
इंटरनेट की पत्रकारिता का एक और खास पहलू है ब्लॉगिंग। अभी वैसे ब्लॉगरों को जर्नलिस्ट माना जाए या न माना जाए- इस पर बड़ी बहस चल रही है। लेकिन, जब मीडिया घरानों पर पक्षपात किसी खास औद्योगिक घराने, पक्ष, पार्टी के साथ खड़े होने से भरोसा डगमगाता हो तो, स्वतंत्र ब्लॉगर भरोसा जगाते हैं। अच्छी बात ये है कि आप बाध्य नहीं होते। आप चार ब्लॉगरों के विचार जान-पढ़कर उनसे निष्कर्ष निकाल सकते हैं। और, अब तो किसी भी बड़े-छोटे (अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय-स्थानीय) मुद्दे पर ब्लॉगरों की राय काफी अहम रोल निभाती है। इस समय देश में 10 हजार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं।
यही सब वजहें हैं कि वेब जर्नलिज्म आने वाले दिनों में सबसे मजबूत माध्यम बनकर उभरेगा। सस्ते होते लैपटॉप, डेस्कटॉप, सस्ता इंटरनेट और तेज स्पीड इंटरनेट कनेक्शन, ये सब मजबूत वेब जर्नलिज्म के मददगार बनेंगे। लेकिन, अभी इसे बहुत लंबा रास्ता तय करना है। क्योंकि, Internet and Mobile Association of India और IMRB के एक सर्वे के मुताबिक, भारत में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की कुल 1249 वेबसाइट ही हैं। सफर लंबा लेकिन, भविष्य उज्ज्वल है।
Saturday, September 12, 2009
बंबई, ब्लॉगर, बाजार, भाषण
कई महीनों बाद मुंबई जाने का अवसर हाथ आया था तो, ऐसा हो ही नहीं सकता था कि मैं इसे छोड़ देता। दरअसल, अनीताजी के मन में सेमिनार कराने की इच्छा ने मुझे ये अवसर प्रदान किया था। अनीताजी के ब्लॉग पर सेमिनार की चर्चा है। इसी सेमिनार के लिए दिल्ली से मुंबई की रेलयात्रा का विवरण बतंगड़ पर है। मैंने सोचा कि सेमिनार में दिया गया मेरा भाषण भी अब पोस्ट किया जा सकता है।
The Role of MEDIA in Financial Market Awareness
Money … Market .. mudra ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो, एक दूसरे के समानार्थी यानी synonymus हैं। और, इन सबको आम लोगों तक पहुंचाने में एक और M यानी Mumbai … का बड़ा रोल रहा है। दरअसल यहां विषय रखा गया है The Role of MEDIA in Financial Market Awareness। लेकिन, मुझे लगता है कि MEDIA से भी पहले अगर किसी ने फाइनेंशियल मार्केट के बारे में सबसे ज्यादा लोगों को Aware किया उन्हें जानकार बनाया तो, वो है ये शहर मुंबई।
मुंबई शहर की पहचान मायानगरी के तौर पर होती है और वैसे भले लोग इसे INDIA’S FINANCIAL CAPITAL बोलते हैं लेकिन, जब सपने पूरे करने की बात होती है तो, ज्यादातर माना यही जाता है कि यहां आने वालों के सपने सिर्फ रुपहले पर्दे के जरिए ही पूरे होते। लेकिन, सच्चाई ये है कि इस शहर के एक किनारे में दिखती गोल सी इमारत है जो, देश के बड़े हिस्से के सपने पूरे करने में मददगार बन रही है। बांबे स्टॉक एक्सचेंज- इस इमारत के बिना इस शहर की बात अधूरी रह जाएगी। बांबे स्टॉक एक्सचेंज की इमारत शेयर बाजार का प्रतीक बन गई है ये अलग बात है कि बांबे स्टॉक एक्सचेंज से ज्यादा शेयरों का खरीदना बेचने इसी शहर के .....
The Role of MEDIA in Financial Market Awareness
Money … Market .. mudra ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो, एक दूसरे के समानार्थी यानी synonymus हैं। और, इन सबको आम लोगों तक पहुंचाने में एक और M यानी Mumbai … का बड़ा रोल रहा है। दरअसल यहां विषय रखा गया है The Role of MEDIA in Financial Market Awareness। लेकिन, मुझे लगता है कि MEDIA से भी पहले अगर किसी ने फाइनेंशियल मार्केट के बारे में सबसे ज्यादा लोगों को Aware किया उन्हें जानकार बनाया तो, वो है ये शहर मुंबई।
मुंबई शहर की पहचान मायानगरी के तौर पर होती है और वैसे भले लोग इसे INDIA’S FINANCIAL CAPITAL बोलते हैं लेकिन, जब सपने पूरे करने की बात होती है तो, ज्यादातर माना यही जाता है कि यहां आने वालों के सपने सिर्फ रुपहले पर्दे के जरिए ही पूरे होते। लेकिन, सच्चाई ये है कि इस शहर के एक किनारे में दिखती गोल सी इमारत है जो, देश के बड़े हिस्से के सपने पूरे करने में मददगार बन रही है। बांबे स्टॉक एक्सचेंज- इस इमारत के बिना इस शहर की बात अधूरी रह जाएगी। बांबे स्टॉक एक्सचेंज की इमारत शेयर बाजार का प्रतीक बन गई है ये अलग बात है कि बांबे स्टॉक एक्सचेंज से ज्यादा शेयरों का खरीदना बेचने इसी शहर के .....
Friday, September 11, 2009
ये मानेगी नहीं जब करेगी नंगई ही करेगी
बहुत दिनों से आपके घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। बहुत दिनों से आपके परिवार के लोगों ने एक दूसरे के खिलाफ साजिश रचनी बंद कर दी है। बहुत दिनों से पड़ोसी के परिवार को देखकर आप बेवजह ईर्ष्या नहीं कर रहे हैं तो, परेशान मत होइए। भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे बड़ी अदाकारा फिर से अपनी सारी अदा के साथ वापसी कर रही है।
एकदम सही पहचाना आपने- ये हैं क . क . क किरन नहीं। क . क . क K फैक्टर वाली एकता कपूर। वही अपने चिरयुवा जीतेंदर बाबू की काबिल बिटिया। अब एकता कोई ऐसा सीरियल बनाने जा रही हैं जिसमें सिर्फ नंगई होगी। क्यों-क्योंकि, सास-बहू की लड़ाई, पति-पत्नी के ढेरो अवैध संबंधों की चाशनी में भी कपूर साहिबा के धारावाहिक कोई देख नहीं रहा है। सब रियलिटी शो देख लेते हैं या फिर बालिका वधू या लाडो को देख ले रहे हैं।
एकता कपूर दुखी हैं कि सारे टेलीविजन दर्शकों ....
एकदम सही पहचाना आपने- ये हैं क . क . क किरन नहीं। क . क . क K फैक्टर वाली एकता कपूर। वही अपने चिरयुवा जीतेंदर बाबू की काबिल बिटिया। अब एकता कोई ऐसा सीरियल बनाने जा रही हैं जिसमें सिर्फ नंगई होगी। क्यों-क्योंकि, सास-बहू की लड़ाई, पति-पत्नी के ढेरो अवैध संबंधों की चाशनी में भी कपूर साहिबा के धारावाहिक कोई देख नहीं रहा है। सब रियलिटी शो देख लेते हैं या फिर बालिका वधू या लाडो को देख ले रहे हैं।
एकता कपूर दुखी हैं कि सारे टेलीविजन दर्शकों ....
Wednesday, September 09, 2009
ये अभी और शर्मसार करेंगे
5 star embarrassment – ये शब्द ठीक से मेरे अनुभव में कल पहली बार आया। वैसे अंग्रेजी भाषा ही है कि कब कौन प्रेम में लड़िया रहा है और उसी शब्द पर कौन गुस्से से लतिया रहा है। खास फर्क मालूम नहीं पड़ता। खैर, कल ये 5 star embarrassment हुआ है यूपीए सरकार को।
वजह बने हैं उनके 2 मंत्री। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और उनके डिप्टी साहब शशि थरूर। थरूर साहब तो बरसों यूनाइटेड नेशंस में रहे हैं और उन्हें महंगे होटलों की-शानो शौकत की आदत रही है। इसलिए शायद उन्हें अंदाजा ही नहीं लगा कि होटलों में रहने से कौन सा वो देश की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। भारतीय जनता के जरिए उनका चुनाव भी पहली बार हुआ है। इससे पहले के चुनाव तो, वो इलीट स्टाइल के लड़ते थे, कभी जीतते थे-कभी हारते थे। लेकिन, कृष्णा साहब तो, भारतीय जनता की नुमाइंदगी करते आ रहे हैं- क्या उन्हें भी समझ में नहीं आया कि वो, क्या कर रहे हैं। ...
वजह बने हैं उनके 2 मंत्री। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और उनके डिप्टी साहब शशि थरूर। थरूर साहब तो बरसों यूनाइटेड नेशंस में रहे हैं और उन्हें महंगे होटलों की-शानो शौकत की आदत रही है। इसलिए शायद उन्हें अंदाजा ही नहीं लगा कि होटलों में रहने से कौन सा वो देश की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। भारतीय जनता के जरिए उनका चुनाव भी पहली बार हुआ है। इससे पहले के चुनाव तो, वो इलीट स्टाइल के लड़ते थे, कभी जीतते थे-कभी हारते थे। लेकिन, कृष्णा साहब तो, भारतीय जनता की नुमाइंदगी करते आ रहे हैं- क्या उन्हें भी समझ में नहीं आया कि वो, क्या कर रहे हैं। ...
Tuesday, September 08, 2009
भारतीयों में गुलामी का इनबिल्ट सॉफ्टवेयर
YSR रेड्डी की दुखद मौत के बाद आंध्र प्रदेश से करीब 150 लोगों की जान जाने की खबर आई है। कुछ लोगों ने अपने प्रिय नेता की मौत के बाद आत्महत्या कर ली। कुछ इस अंदाज में कि अब मेरे भगवान न रहे तो, हम रहकर क्या करेंगे। और, कुछ बेचारों ने आत्महत्या तो, नहीं की लेकिन, रेड्डी की मौत की खबर सुनने के बाद वो, ये सदमा झेल नहीं पाए। इससे जुड़ी-जुड़ी दूसरी खबर ये कि आंध्र प्रदेश से संदेश साफ है कि YSR रेड्डी का बेटा जगनमोहन रेड्डी की राज्य की बागडोर संभालेगा तो, राज्य का भला हो पाएगा। पिता के अंतिम संस्कार के समय टेलीविजन पर दिखती जगनमोहन की हाथ जोड़े तस्वीरें किसी शोक में डूबे बेटे से ज्यादा राज्य की विरासत संभालने के लिए तैयार खडे, दृढ़ चेहरे वाले प्रशासक की ज्यादा दिख रही है।
हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।
हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।
Monday, September 07, 2009
100 रुपए खुल्ला होता है
करीब 9 महीने बाद मुंबई जाने का मौका मिला। मुंबई राजधानी में दिल्ली से मुंबई के लिए सफर शुरू हुआ। मुंबई का रोमांच- मुंबई की भीड़, गणपति, मुंबई की नई पहचान ताजा बना बांद्रा-वर्ली सी लिंक- अपनी ओर खींच रहा था।
यात्रा शुरू हुई। मेरे सामने की चार सीटों पर सिर्फ एक महिला यात्री थीं। लेकिन, माशाअल्ला पर्सनालिटी क्या पूरा पर्सनालटा था। लंबाई-चौड़ाई सब ऐसी थी कि शायद उन्हें हमारी तरह साइड की बर्थ मिली होती तो, उनके लिए उसमें समाना मुश्किल होता। किसी संभ्रांत मुस्लिम परिवार की बुजुर्ग भद्र महिला थीं। उनको छोड़ने संभवत: उनकी भतीजी और दामाद आए थे। माशाअल्ला भतीजी भी आपा पर ही गई थी। भतीजी के पति ने ऊपर वाली बर्थ एकदम से ऊपर उठा दी जिससे आपा का सर शान से उठा रहे कोई तकलीफ न हो। और, चूंकि चारो सीटों पर वो अकेली ही थीं तो, इस इत्तफाक के बहाने दामाद ने पूरी आत्मीयता उड़ेल दी और आपा के ना-ना करने के बावजूद सीट ऊपर कर दी। एसी द्वितीय श्रेणी के कूपे की ऊपर वाली सीटें फोल्डिंग हैं और, अगर आपको भी संयोग मिले कि नीचे आप हों और ऊपर की सीट खाली हो तो, इसका मजा ले सकते हैं।
कुली आपा का सामान रख चुका था। उसे पैसे देने के लिए भतीजी ने पैसे निकाले तो, आपा ने मीठी आवाज में I have lot of change … कहकर पर्स में से एक साथ निकल आई ढेर सारी नोटों में से एक 100 की नोट कुली को थमा दी। कुली बेचारा इतनी अंग्रेजी अगर समझ गया होगा तो, सोचता कि काश ऐसे ही रोज 5-10 लोग चेंज देने वाले मिल जाते तो, जीवन सुधर जाता। खैर, 100 रुपया चेंज होता है ये जानकर थोड़ा तो मैं भी हदस गया था।
यात्रा शुरू हुई। मेरे सामने की चार सीटों पर सिर्फ एक महिला यात्री थीं। लेकिन, माशाअल्ला पर्सनालिटी क्या पूरा पर्सनालटा था। लंबाई-चौड़ाई सब ऐसी थी कि शायद उन्हें हमारी तरह साइड की बर्थ मिली होती तो, उनके लिए उसमें समाना मुश्किल होता। किसी संभ्रांत मुस्लिम परिवार की बुजुर्ग भद्र महिला थीं। उनको छोड़ने संभवत: उनकी भतीजी और दामाद आए थे। माशाअल्ला भतीजी भी आपा पर ही गई थी। भतीजी के पति ने ऊपर वाली बर्थ एकदम से ऊपर उठा दी जिससे आपा का सर शान से उठा रहे कोई तकलीफ न हो। और, चूंकि चारो सीटों पर वो अकेली ही थीं तो, इस इत्तफाक के बहाने दामाद ने पूरी आत्मीयता उड़ेल दी और आपा के ना-ना करने के बावजूद सीट ऊपर कर दी। एसी द्वितीय श्रेणी के कूपे की ऊपर वाली सीटें फोल्डिंग हैं और, अगर आपको भी संयोग मिले कि नीचे आप हों और ऊपर की सीट खाली हो तो, इसका मजा ले सकते हैं।
कुली आपा का सामान रख चुका था। उसे पैसे देने के लिए भतीजी ने पैसे निकाले तो, आपा ने मीठी आवाज में I have lot of change … कहकर पर्स में से एक साथ निकल आई ढेर सारी नोटों में से एक 100 की नोट कुली को थमा दी। कुली बेचारा इतनी अंग्रेजी अगर समझ गया होगा तो, सोचता कि काश ऐसे ही रोज 5-10 लोग चेंज देने वाले मिल जाते तो, जीवन सुधर जाता। खैर, 100 रुपया चेंज होता है ये जानकर थोड़ा तो मैं भी हदस गया था।
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हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से ह...
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आप लोगों में से कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है। यानी, मां-बाप अपनी बेटी से पैर छुआते नहीं हैं। बल्कि, खुद उनका पैर छूते हैं...
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पुरानी कहावतें यूं ही नहीं बनी होतीं। और, समय-समय पर इन कहावतों-मिथकों की प्रासंगिकता गजब साबित होती रहती है। कांग्रेस-यूपीए ने सबको साफ कर ...




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