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Wednesday, February 15, 2017

खिसकती दिख रही समाजवादी पार्टी की “बुनियादी ईंट”

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के राज में इटावा अति महत्वपूर्ण जिले में गिना जाता रहा है। अखिलेश यादव के राज में भी इटावा का ये रुतबा कायम रहा। ऐसा सुख शायद ही देश में किसी जिले को हासिल हो। मुलायम राज में इटावा के लोग खुद को सबसे ऊपर समझते रहे हैं। और इसी वीआईपी होने की चाहत में इटावा के लोगों ने आंख मूंदकर मुलायम सिंह यादव का समर्थन किया है। इसी जिले की जसवंतनगर सीट से मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और उसके बाद ये शिवपाल की सीट हो गई। मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर में भाई शिवपाल यादव के समर्थन में कहाकि अखिलेश जिद्दी है। कई बार वो बात सुन लेता है, कई बार नहीं सुनता। ऐसा कहते मुलायम भावुक हो गए। उन्होंने कहाकि शिवपाल को वही सम्मान दीजिए, जो आप मुझे देते रहे हैं। दरअसल जसवंतनगर एक ऐसी सीट है जिस पर पिछले 4 दशक से ज्यादा में 2 बार छोड़कर मुलायम सिंह यादव का कब्जा पक्का होता रहा है। 1967 में पहली बार मुलायम यहां से चुनकर विधानसभा में पहुंचे। उसके तुरंत बाद 1969 में हुए चुनाव में उन्हें बिशंभर सिंह यादव ने हरा दिया और एक बार 1980 में बलराम सिंह यादव ने हराया। इसके अलावा 67 से 93 तक ये सीट मुलायम सिंह को विधायक बनाती रही। 1996 से अभी तक यहां से शिवपाल सिंह यादव विधायक चुने जा रहे हैं। इस बार के चुनाव में भाजपा ने बसपा से पिछला चुनाव लड़े मनीष यादव पर भरोसा जताया है। बसपा से दरवेश कुमार शाक्य, और राष्ट्रीय लोकदल से जगपाल सिंह यादव लड़ रहे हैं। सीधे तौर पर शिवपाल को यहां खास चुनौती नहीं दिखती है। लेकिन, अंदरखाने अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल को चुनाव हराने की कोशिश में लगे हैं। ये बात जसवंतनगर की सड़कों पर कोई आम आदमी भी बता देगा।
जसवंतनगर सीट पर भले ही चाचा का टिकट काटने का साहस जसवंतनगर में अखिलेश भले न कर पाए। क्योंकि, चाचा शिवपाल को यहां हराना असम्भव न सही लेकिन, बहुत मुश्किल जरूर है। लेकिन, बगल की इटावा की सीट पर अखिलेश वाली समजावादी पार्टी ने मुलायम के खासमखास मौजूदा विधायक रघुराज शाक्य का टिकट काट दिया है। 2012 में रघुराज सिंह शाक्य ने बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत को हराया था। हालांकि, राजपूत भी पुराने सपाई रहे। 2002 और 2007 के चुनाव में साइकिल की सवारी करके ही विधानसभा पहुंचे थे। शाक्य का टिकट काटकर रामगोपाल के नजदीकी कुलदीप गुप्ता को लड़ाया जा रहा है। कुलदीप गुप्ता इटावा नगर पालिका चेयरमैन हैं। भाजपा ने यहां से सरिता भदौरिया और बसपा ने नरेंद्र चतुर्वेदी को प्रत्याशी बनाया है। यादव, मुसलमान और शाक्य के मजबूत आधार मतों पर यहां समजावादी पार्टी का किला बहुत मजबूत रहा है। इस सीट पर 40 हजार मुसलमान मत हैं। और नगरपालिका के चुनाव में कुलदीप गुप्ता ने नफीसुल आलम को हराया था। कमाल की बात ये कि कुलदीप ने हिन्दू ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में करके पालिका चेयरमैन की कुर्सी हथियाई। मुसलमानों का मानना है कि नफीसुल आलम को हराने में रामगोपाल यादव की बड़ी भूमिका रही है। नफीसुल को मुलायम-शिवपाल का नजदीकी माना जाता है। सवाल ये है कि क्या नगर पालिका की हार का बदला लेने के लिए इटावा के मुसलमान समाजवादी पार्टी के खिलाफ मत डाल सकते हैं। वैसे भी ये सीट तय करेगी कि इटावा में शिवपाल का अधिकार कुछ बचा हुआ है या रामगोपाल ने उसे लगभग खत्म कर दिया है। हालांकि, रामगोपाल यादव ने नफीसुल अंसारी को नगर पालिका चेयरमैन फिर से बनाने का वादा करके उन्हें कुलदीप के साथ लगा दिया है। साथ ही मुसलमान इलाकों में अवैध बिजली बड़ा मुद्दा है। मुसलमानों को लगता है कि बसपा की सरकार आई तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

इटावा और जसवंतनगर के अलावा समाजवादी पार्टी की तीसरी बुनियादी आधार सीट है भरथना। 1989 में जनता दल और उसके बाद 1991 में जनता पार्टी। फिर जब मुलायम सिंह यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी 1992 में बना ली तो उसके बाद से ये सीट समाजवादी पार्टी की परम्परागत सीट हो गई। 2007 मे मुलायम सिंह यादव खुद इस सीट से चुने गए। और, जब 2009 में मुलायम लोकसभा के लिए चुन लिए गए तो, बीएसपी के शिव प्रसाद यादव ने उपचुनाव में इस सीट पर कब्जा जमाया। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में फिर से ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में आ गई। यहां से समाजवादी पार्टी ने कमलेश कुमार कठेरिया को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी से सावित्री कठेरिया और बीएसपी से राघवेंद्र गौतम प्रत्याशी हैं। राघवेंद्र गौतम के लिए प्रचार करने आई मायावती ने भरथना की रैली में कहाकि- ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे। इसलिए सपा-कांग्रेस गठबंधन भी गया काम से। मायावती के ये दोनों दरअसल अखिलेश-शिवपाल हैं। इटावा जिले की हर विधानसभा सीट पर अखिलेश-रामगोपाल के समर्थक मुलायम-शिवपाल के समर्थकों को चिढ़ाते नजर आ रहे हैं। इसीलिए मायावती का ये कहना कि ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे, अगर मुसलमानों को समझ में आ गया तो समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत बुनियादी ईंट इटावा में दरार पड़ सकती है। हो सकता है कि इस चुनाव में तीनों ही सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में आ जाएं लेकिन, लम्बे समय के लिए समाजवादी राजनीति का तगड़ा होता साफ दिख रहा है। क्योंकि, परिवार की लड़ाई की धुरी यही जिला है और इसी के चुनाव तय करेंगे कि लड़ाई 11 मार्च के बाद कैसे आगे बढ़ेगी। 

Friday, August 02, 2013

गड्ढा !

अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में बेहतर हुई सड़कों ने देश में सड़क के रास्ते कितना यातायात बढ़ाया इसका कोई ठीक ठाक आंकड़ा मुझे नहीं मिल सका। लेकिन, नेशनल हाईवेज के सफर पर लोगों का बढ़ा भरोसा साफ दिखता है। पहले हाईवेज पर ट्रकों बसों के बीच में इक्का दुक्का ही कारें नजर आतीं थीं। दिखतीं भी थीं तो वो टैक्सी वाली कारें होती थीं। लेकिन, अब ये दृश्य उलट हो चुका हैं। सड़क के रास्ते अपनी कार से रफ्तार वाला सफर सहूलियत के लिहाज से करने का मोह मैं भी छोड़ नहीं पाता हूं। वैसे भी दिल्ली से इलाहाबाद का सफर यमुना एक्सप्रेस वे बनने के बाद और बेहतर हुआ है। इसीलिए इस बार भी मैं इलाहाबाद अपनी कार से ही गया। दिल्ली से इलाहाबाद जाने का सफर बेहद शानदार रहा और सुबह 8.30 पर नोएडा छोड़ा तो शाम 5 बजते-बजते इलाहाबाद पकड़ में आ गया। यही उम्मीद वापसी की भी थी। लेकिन, इस बार धोखा हो गया। और उस पर भी बुरा ये कि मैं सपरिवार था। अच्छा ये था कि छोटे भाई जैसा छोटे भाई का दोस्त साथ था वरना तो हाईवे का सफर बेहद मुश्किल हो जाता।

NH 2 राष्ट्रीय राजमार्ग 2 जो दिल्ली से कोलकाता जाता है। मथुरा, आगरा, इटावा, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस होते हुए। उस राजमार्ग का हाल ये है कि सारे रास्ते में आपको सफर में अहसास ये होता रहता है कि ये स्थानीय मार्ग है या राष्ट्रीय राजमार्ग। कमाल ये है कि करीब एक दशक से ज्यादा तो मुझे ही इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते हुए और ये समस्याएं जस की तस हैं।
तो, क्या राष्ट्रीय राजमार्ग के रखरखाव की जिम्मेदारी वाले अधिकारी इन चुनौतियों से कभी नहीं गुजरे होंगे जिससे मुझे गुजरना पड़ता है। मैंने ये तस्वीरें राष्ट्रीय राजमार्ग पर कहां ली हैं ये ध्यान नहीं है लेकिन, लगभग पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग का यही हाल है। कहीं से भी उल्टे आते वाहन के बावजूद आप दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुए तो सौभाग्यशाली। उल्टी आती गाड़ी बचा ली तो, जानवर बड़ी चुनौती देने के लिए आ जाएंगे। और, राष्ट्रीय राजमार्ग की हर बाजार में सड़क पार करके जाते ये बिजली के तार तो होंगे ही।

लेकिन, इन चुनौतियों से भी बड़ी एक चुनौती है जिसका अहसास इस बार मुझे इलाहाबाद से दिल्ली आते समय हुआ। इटावा बाजार के ठीक पहले करीब 3 किलोमीटर लंबा जाम लगा था। गाड़ी बंद करके अंदाजा लगाना चाहा कि माजरा क्या है तो पता चला कि कोई दुर्घटना हुई जिसके बाद स्थानीय लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम कर दिया है। करीब एक घंटे तक फंसे रहने के बाद पीएसी आई तो राष्ट्रीय राजमार्ग अपनी बची खुची प्रतिष्ठा वापस पा सका और हमारी स्थिर कार चालायमान हो सकी।  ऐसा नहीं है कि पुलिस नहीं थी। लेकिन, पुलिस स्थानीय लोगों से निपट नहीं पा रही थी। जैसे ही पुलिस की बजाए पीएसी बाजार में पहुंची जाम में फंसे हम लोगों की जान में जान आई। और राष्ट्रीय राजमार्ग को स्थानीय बना देने वाले स्थानीय लोगों का गुस्सा जाने क्यों गायब हो गया और वो भी गायब हो गए।


लेकिन, अभी भी ये देश के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2 की सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। बार-बार चिंता जताने वाले चिंतित होते रहते हैं कि देश गड्ढे में जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर सलीके से हुए इन गड्ढों को देखकर मैं उसे संशोधित करके कहता हूं कि देश बड़ी रफ्तार में गड्ढे में जा रहा है। और, गड्ढे में देश की गाड़ी जाकर PUNCTURE नहीं BURST हो रही है। यही मेरी कार के साथ भी हुआ। इटावा बाजार के जाम से निकलने के बाद इटावा डीपीएस के ठीक सामने करीब 90 की रफ्तार में चल रही कार से दोनों पहिये निकलकर कार के आगे जाते दिखे तो मेरी जान सूख गई। कार मैं रोक चुका था। बुद्धि स्थिर हुई तो समझ में आया कि दोनों पहिये नहीं पहिये के कवर थे। देखा तो आगे वाला टायर BURST हो चुका था। जिस रिम पर ट्यूबलेस टायर चढ़ा था चार में से 2 रिम उस गड्ढे के प्रकोप से सिकुड़ गए थे।

(9 अगस्त को हिंदुस्तान दिल्ली के संपादकीय पृष्ठ पर साइबर संसार कॉलम में जिक्र)




जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...