भारत के शहर, भारत के गांवों के खिलाफ साजिश हैं?

ये बड़ी बहस का विषय हो गया है कि आखिर इस देश का विकास मॉडल क्या होना चाहिए। शहरी विकास मॉडल या गांवों का विकास मॉडल। इस बात की बहस में आमतौर पर शहरों में रहने वाले या कुछ गांवों में कुछ करके शहरी सुविधाओं का भरपूर उपयोग, उपभोग करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी होते हैं जो कहते हैं कि शहरीकरण इस देश की सारी समस्याओं की जड़ है। वो तर्क देते-देते ऐसे तर्क साबित करने तक पहुंच जाते हैं जहां के बाद लगता है कि अगर भारत में सिर्फ गांव होते तो ये क्या देश होता। अगर भारत में शहर न होते तो कोई समस्या ही न होती। ढेर सारे बहस, तर्क हैं जिन पर बात की जा सकती है लेकिन, अभी उन सारी बातों पर इसी एक ब्लॉग में बहस करने, तर्क देने का मेरा इरादा है नहीं। आज बात करूंगा सिर्फ उस लड़के की जो मुझे ऑफिस के बाहर चाय पीते मिल गया। कंधे पर लटका पिट्ठू बैग। जिसमें लैपटॉप नहीं था लेकिन, उसे लैपटॉप बैग के ही नाम से जाना जाता है। हाथ में ढेर सारे परचे। उसने देखा कि हम दो-चार लोग चाय की चुस्की ले रहे हैं तो मतलब खाली हैं। उसने वो परचे पकड़ा दिए। परचे में प्लॉट ही प्लॉट था। उसकी तस्वीर चिपका रहा हूं। जानबूझकर प्लॉट बेचने वाले का नाम, पता काट दिया है। चूंकि उसका कोई महत्व नहीं था। उस लड़के ने बचाया इस काम के बदले उसे कंपनी दस हजार रुपये महीने देती है। हालांकि, इस दस हजार में वो दूसरे भी कई काम कराती है। जैसे, चेक लगाना, किसी से ले आना, देने जाना, पैसा ले आना, लेने जाना। इसके अलावा कंपनी के प्लॉट बेचने के लिए इस परचे को ज्यादा से ज्यादा लोगों को बांटना। मुझे लगा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार से आया कोई लड़का होगा। पता चला यहीं गाजियाबाद का ही है। मैंने पूछा तो उसने कहा प्लॉट कितने बिके इससे मुझे मतलब नहीं। और नौकरी की गारंटी कितनी है तो उसने कहा इतनी जमीनें हैं। बिक ही रही हैं तो नौकरी की कोई दिक्कत नहीं है। इसने निकाला तो दूसरा देगा। ये गाजियाबाद का लड़का नोएडा, गाजियाबाद की उन्हीं जमीनों की वजह से दस हजार रुपये महीने कमा रहा है जो शहरी अर्थव्यवस्था या भारत के गांवों को शहर बनाने की साजिश वाली अर्थव्यवस्था है। नोएडा की जमीनों पर अकसर रियल एस्टेट कारोबारियों (बिल्डर, डेवलपर) के औने-पौने दामों में कब्जे वाली खबरें भारत के गांवों को शहर बनाने की साजिश वाली अर्थव्यवस्था के सिद्धांत को और बल दे देती हैं। लेकिन, अगर इस शहरी अर्थव्यवस्था से यहां के गांवों के दस हजार रुपये महीने कमाने वाले लड़कों को थोड़ा अपनी सुख-सुविधा आसानी से जुटाने का जुगाड़ मिल रहा है तो ये साजिश तो बेहतर हुई। दरअसल जरूरत इस बात की है कि गांवों में भी शहरों जैसी सुविधा जुटे। इसका कतई मतलब नहीं कि वहां मॉल, मल्टीप्लेक्स खुल जाए। और अगर 25-50 गांवों के बीच में खुल जाए तो बुराई भी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि गांव के लोग शहरों के लोगों जैसा खाएं-पिएं-जिएं। और शहरों के लोग गांवों के लोगों जैसा अहसास पा सकें। जरूरत इस बात की है कि ऐसे नियामक हों, प्रशासन हो जो, तय करे कि बनते शहर या बने शहर में कोई लोगों का हक न छीन पाए। लेकिन, अक्सर बहस शहर ठीक से बनाने और उससे लोगों का जीवनस्तर कैसे बदले इसकी बहस के बजाए सीधे गांव चाहिए या शहर वाली बहस में बदल जाती है। इसमें होता क्या है। होता ये है कि गांव बचाने की पुरजोर बहस करने वाले शहरों में पूरी सुख, सुविधा का मजा लेते हैं। लेकिन, ये बुरा गांव का कर रहे होते हैं। क्योंकि, शहर, गांव के दुश्मन हो जाते हैं। शहर बनना भारत के खिलाफ साजिश नहीं है ये समझना होगा। हां, गांव बचाइए। गांवों को स्वपोषित करने की योजनाएं लाइए। गांवों में शहरों जैसे मौके दीजिए और शहरों में विकास के हर पैमाने को विकसित कीजिए। लेकिन, शहर-गांव को लड़ाकर शहर-गांव दोनों बर्बाद मत कीजिए।