Tuesday, August 21, 2012

बेशर्म होता संसदीय लोकतंत्र

संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। हुआ भी तो, सामने कभी नहीं आया। संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर राजीव शुक्ला ने उपसभापति के कान में जाकर बोला। शोर बहुत होगा। पूरे दिन के लिए कार्यवाही adjourn (स्थगित) कर देना।

लेकिन, एक बात जो, इससे भी ज्यादा चुभ रही है कि मीडिया में ये खबरें आईं। एकाध चैनलों को छोड़कर किसी ने इसे बड़ा सवाल नहीं बनाया। इस तरह से मीडिया से जरूरी खबरें गायब होने पर सवाल तो, मन में उठता ही है कि क्या ये सरकार के दबाव में खबर गायब हुई।
अब कल सुबह के अखबारों का इंतजार है। साथ ही कल विपक्ष के एतराज के तरीके का भी।

Monday, August 20, 2012

भोपाल चौपाल

विस्फोटक संजय तिवारी से बात हो रही थी तो, उन्होंने कहाकि भोपाल चलेंगे क्या। हमने कहा बताइए, कुछ खास हो तो, जरूर चलेंगे। उन्होंने कहा- नए मीडिया पर कुछ चर्चा होनी है। मैंने कहा अच्छा है, जरूर चलेंगे। भोपाल शहर इतना पसंद आता है कि वहां से आया निमंत्रण लपकने में देर क्या करना। उसके अनिल सौमित्र का फोन आया। आभासी दुनिया में पहले से परिचित थे। सोचा चलो अच्छा है भौतिक परिचय/मिलन भी हो जाएगा। अनिल जी ने मेल पर सारा विवरण भेजा। शानदार चर्चा की चुनौती वाली मेल आई थी।
चर्चा के मुख्य विषय
न्यू मीडिया : समस्याएं, अवसर और चुनौतियांविज्ञान के लोकव्यापीकरण में न्यू मीडिया की भूमिकाइसके अंतर्गत निम्न बिन्दु हो सकते हैं, इसे एक मित्र ने सुझाया है- 1. क्या अब नया मीडिया ही मुख्यधारा है? मीडिया बनाम न्यू मीडिया, 2. न्यू मीडिया पहुच और प्रभाव, 3. राजीनति के झरोखे से वेब मीडिया. 4. जय किसान जय विज्ञान. 5. जय किसान, जय विज्ञान. 6. भाषाई शिष्टता बनाम वेब, 6. अंतर्राष्ट्रीय वेब जगत में हिन्दी., 7. ब्लॉग बनाम माइक्रो ब्लोगिंग साईट, 8. जनांदोलन और वेब, 9. मिस्र, लीबिया और भारत?, 10. वेब जगत का आर्थिक मॉडल., 11. सरकारी अंकुश : ज़रूरत या सनक, 12. स्व नियमन की ज़रूरत, 13. अभिव्यक्ति की आज़ादी, नेट के साथ, 14. कैसी हो वेब की आचार संहिता. 15. वेब : भूगोल अब इतिहास की वस्तु, 16. फॉण्ट की समस्या और यूनिकोड समाधान, 17. सर्न, गौड पार्टिकल और WWW, 18. वैज्ञानिक संचार ज़रूरतें, 19.संस्कृति और संवाद वाया वेब, 20. कोपीराईट का सवाल और न्यू मीडिया 21. इन्टरनेट गांव तक : खयाली पुलाव या सच्चाई, 22. राष्ट्रीय चुनौतियों में नेट की भूमिका, 23 आतंक के विरुद्ध लड़ाई में चुनौती या सहायक वेब? 24. क्या नेट दुधारी तलवार है? 25. राष्ट्रीय अखंडता और वेब सम्प्रेषण. 26. राज कि रहहि वेब बिनु जाने  27. साम्प्रदायिक सद्भाव में वेब : साधक या बाधक.
इस मेल के बाद उत्साह और बढ़ गया। लेकिन, उसी समय ये अंदेशा था कि एक दिन की चौपाल में इतने विषयों पर चर्चा कैसे हो पाएगी। फिर भी नए मीडिया पर चर्चा, भोपाल, अनिल सौमित्र और नए लोगों से मिलने की इच्छा ने ऐसा जोर मारा कि जाना तय कर लिया। शनिवार रात 9 बजे की भोपाल एक्सप्रेस से पक्का टिकट था। उसी ट्रेन से पुराने साथी भुवन भाष्कर (डीएनई, इकोनॉमिक टाइम्स) भी जाने वाले थे।
ये आगरा से लौटते समय की तस्वीर है
रात 9 की ट्रेन थी तो, मैंने सोचा चलो यमुना एक्सप्रेस वे पर सपरिवार आनंद ले लेते हैं। और, ताजमहल भी देख लेते हैं। सुबह साढ़े दस बजे दिल्ली में गाजीपुर वाले पेट्रोल पंप से टैंक फुल करा लिया। और, निकल पड़े। 11 बजे यमुना एक्सप्रेस वे पर प्रवेश और 12.30 पर आगरा नेशनल हाइवे पर। लगा ये शानदार है। 2 बजे तक भी ताज देखकर वापसी कर लेंगे तो, 5 बजे तक घर पहुंच जाएंगे।





आगरा नेशनल हाईवे से ताजमहल तक का जाम
लेकिन, यहीं गणित गड़बड़ा गया। तूफानी चाल वाले एक्सप्रेस वे से आती हजारों गाड़ियां आगरा नेशनल हाईवे पर पहुंचते ही कछुए की चाल में चलने लगीं। और, सिर्फ 14 किलोमीटर की ताज की दूरी तय करने में तीन घंटे से ज्यादा का समय लग गया। पीछे-पीछे भुवन भी आ रहे थे। आखिरकार भोपाल जाने की बलवती इच्छा लिए पत्नी को अगली बार ताज के अंदर ले जाने का वादा करके बाहर से कुछ तस्वीरें लीं और वापस गाड़ी मोड़ दी। फिर से ताज से यमुना एक्सप्रेस वे के मुहाने तक पहुंचने में वही पीड़ा झेली। शाम 6.20 पर यमुना एक्सप्रेस वे पर प्रवेश हुआ और बहुत कम संभावना रह गई थी कि भोपाल जाना हो पाएगा।



लेकिन, इच्छा बलवती थी तो, अपने जीवन की अधिकतम रफ्तार पर एक्सप्रेस वे पर अपनी कार चलाई। साथ ही ये भी तय किया कि दोबारा इतनी तेज गाड़ी कभी नहीं चलाउंगा। खैर, 8.25 पर वसुंधरा अपने घर पहुंचा। रास्ते में ही टैक्सी के लिए फोन कर दिया था। जल्दी से दो जोड़े कपड़े डाले और निकल लिया। टैक्सी वाले ने भी एक्सप्रेस वे वाली तूफानी चाल न सही लेकिन, 7 मिनट पहले निजामुद्दीन पहुंचा दिया और 8.57 पर मैं अपनी सीट पर था। अनिल जी को आगरा में आशंकित करने के बाद ट्रेन में बैठने के बाद पक्का कर दिया कि सुबह मुलाकात होती है।



भोपाल चौपाल में यहीं रहना हुआ
दिल्ली के सड़ियल मौसम से भोपाल की खुशनुमा सुबह में पहुंचकर मजा आ गया। अनिल जी स्टेशन पर हल्की फुहारों के साथ स्वागत के लिए तैयार थे। शहर से थोड़ा हटकर कार्यक्रम स्थल बेहद शानदार था। संजय बेंगाणी, सुरेश चिपलूणकर, रवि शंकर रतलामी, बीएस पाबला, संजीत त्रिपाठी (कुछ नाम छूट रहे हैं) जैसे पुराने ब्लॉगरों के साथ मिलकर लगा कि चौपाल बढ़िया ही रहेगी। अनिल पांडेय से भी लंबे अर्से के बाद मुलाकात हुई। अनुराग अन्वेषी दिल्ली से साथ आए थे लेकिन, उनका साथ मिला भोपाल पहुंचकर। बढ़िया व्यक्ति से संपर्क हुआ। और, 4 साल से ज्यादा समय मुंबई रहने के बाद भी दैनिक सामना के संपादक प्रेम शुक्ला का सिर्फ नाम ही सुनता रहा और विस्फोट पर उनका लिखना पढ़ता रहा। भोपाल चौपाल ने प्रेम जी के व्यक्तित्व से परिचय कराया, मस्त रहा।
सबसे बड़ी बात इस चौपाल की ये थी कि नए मीडिया के मूल तत्व तकनीक से वास्ता रखने वाले मध्य प्रदेश सरकार के विज्ञान और प्रोद्योगिक विभाग ने इसे प्रायोजित किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता रहे राम माधव ने शानदार शुरुआत की। एक बात जो, नए मीडिया के साथ जुड़े ज्यादातर लोग मानते हैं उसे उन्होंने भी पुष्ट किया। राम माधव जी ने कहा कि नया मीडिया, मीडिया का लोकतंत्रीकरण है और इसे किसी भी नियमावली में बांधना गलत होगा। चौपाल का पहला निष्कर्ष निकल चुका था। लेकिन, इसके बाद चौपाल की गाड़ी पटरी से उतर गई। अनिल जी की मेल में आए सारे विषय धरे के धरे रह गए। के जी सुरेश के लंबे भाषण के बाद सिर्फ हल्ला-गुल्ला रह गया। और, उसके बाद के सत्र में भी विषय पर सलीके से बात नहीं ही हो पाई। वेब जगत के आर्थिक मॉडल का कोई ठोस तरीका सूझे इस पर भी कोई मॉडल सामने नहीं आ पाया। जो, बातें चर्चा में आने से छूटीं उस पर अनिल सौमित्र जी से बात हुई है कि वो, उसे आगे बढ़ाएंगे। और, मुझे पूरा भरोसा है कि वो, निश्चित तौर पर एक बार फिर से चौपाल कराकर इस कमी को जरूर पूरा करेंगे। कम से कम विषय, सत्र और सत्र में कौन-कौन विषय रखेगा ये पहले से तय रहेगा। एक सत्र मंचासीन विद्वान अतिथियों के लिए रख सकते हैं। और, एक बात कि अनिल सौमित्र को वादा करना होगा कि इस चौपाल जैसा ही शानदार आतिथ्य होगा और, जगह भोपाल ही होगी।

Friday, July 27, 2012

नौजवानी सत्ता सुधारने में लगे तो, बेहतर

" राजनीति की समस्या यही है वोट बटोरने के लिए मायावती की मूर्तियां तोड़वाने और पार्क में अस्पताल खुलवाने का बयान जरूरी था। अब यही चुनाव के समय वोट बैंक की जरूरत सत्ता में आने के बाद अखिलेश की मुसीबत बन रही है। चलिए बनवाइए मूर्ति। देखिए कितने दिन संभाल पाते हैं। "

Friday, July 13, 2012

लड़की के कपड़े फाड़ने वाले ये मर्द !

गुवाहाटी में एक लड़की को अपमानित करते ये मर्द!
गुवाहाटी में एक महिला के साथ तथाकथित पुरुषों ने जो किया वो, शर्मनाक है और किसी भी संवेदनशील समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों को बदतर करने वाला है। ये खबर जब मैंने प्राइम टाइम में एनडीटीवी इंडिया पर देखा तो, ---- "गुस्से में मैं भी था लेकिन, जैसे ही कुछ कहने के लिए मुंह खोला। पत्नी उबल पड़ी इन आदमियों को तो, औरत जैसे भी हो ये यही करेंगे। "  हर लड़की-औरत को ये गुस्सा आना जरूरी है। पुरुषों को हिकारत मिलनी जरूरी है। ऐसी ही एक घटना जब नए साल पर मुंबई के एक होटल के बाहर घटी थी। तो, मैं मुंबई में ही था। लेकिन, उनके "पौरुषी पुरुषों" के घर की महिलाओं ने तो, कुछ अलग ही दृष्य पेश किया था। यही मानसिकता असल जड़ है। इसी में मट्ठा डालने की जरूरत है।

Saturday, July 07, 2012

का भई अखिलेश, पिताजी के आगे नहीं बढ़ोगे ?

‎5 साल अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के साथ उत्तर प्रदेश के समाजवादी मायावती की कुर्सी के पीछे पड़े रहे। आखिरकार मायावती वाली कुर्सी मुलायम ने अखिलेश को सौंप दी। सबने सोचा यूपी में नए जमाने का मुख्यमंत्री कुछ नया लाएगा। लेकिन, अभी जो, फैसले होते दिख रहे हैं उससे लग रहा है कि अगले 5 साल अखिलेश, उनकी सरकार और उनके समाजवादी मायावती सरकार के पिछले 5 साल के फैसले के पीछे पड़े रहेंगे। नतीजा- उत्तर प्रदेश तो, पीछे ही जाएगा। इससे बेहतर तो, बहन जी ही थीं। कम से कम आगे वाला काम तो, करती थीं। शाने अवध अब उनके लखनऊ के पार्क में बढ़िया अहसास कराती है। F 1 ट्रैक पर यूपी भी रफ्तार भरने का अहसास दिलाता है। बंद ही सही लेकिन, शानदार नोएडा का पार्क भी विकसित देशों के शहरों से टक्कर लेता दिखता है। यहां तो, बस सारी मेहनत अखिलेश की पलटने में ही जाती दिख रही है।

Monday, July 02, 2012

अनुराग की पिक्चर 'अनुराग' के लायक नहीं

फिल्म में बंगालन के चक्कर में बचपना करते मनोज
देख ली। चरित्र भी सॉलिड टाइप के हैं। हर चरित्र का दादागीरी अच्छी दिखी। लेकिन, बड़ी ही असफल कोशिश दिखी- गुंडई और आतंक का अतिरेक दिखाने की। गैंग्स ऑफ वॉसेपुर में फर्जी गैंगबाजी। फर्जी गोली-बम, कसाईबाड़ा। मांस के लोथड़े और, मोहल्ले स्तर की गालियां- उसमें भी कोई कलाकारी नहीं। इसीलिए A प्रमाणुपत्र भी मिल गया। अब बताइए विक्रम भट्ट-महेश भट्ट सेक्स, आतंक बेचें तो, बाजारू (कमर्शियल) फिल्म कहकर आलोचना हो। और, जब अनुराग कश्यप टाइप कोई थियेटर वाले अंदाज में वही सेक्स, आतंक बेचें तो, कला (आर्ट) फिल्म। पूरी फिल्म में ताना बाना, बुनावट काफी कमजोर दिखी। माफ कीजिए बेवजह तारीफ कर पाना आदत में ही नहीं है। #GOW #Anuragkashyap #hindicinema

Thursday, April 12, 2012

नइकी दुलहिनिया!

नइकी, पहिले दिन ही आई तो, उसे पता था कि वो, सिर्फ दुबेजी का वंश चलाने के लिए लाई गई है। उस पर हर समय बड़कई के गुस्साने का भी डर था। देखने में बड़कई भी ठीक थी। लेकिन, बड़कई बड़ी थी तो, उमर का भी असर और सबसे बड़ी बात कि बड़कई बच्चा नहीं दे पा रही थी। नइकई, एकदम नई थी। दुबेजी से उमर में लगभग आधी। नई थी, एकदम्मै नई। दुबेजी की जमींदारी थी। पैतृक जमीन इतनी थी कि उसमें काम करने वाली परजा ही दुबेजी के बड़के कच्चे घर और पक्के डाक बंगले के चारो तरफ बस गई थी। लेकिन, चिंता बस वही थी कि आखिर तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चल रहा दुबेजी का वंश और उनकी जमींदारी का क्या होगा। सबसे ज्यादा चिंतित बूढ़ी फुइया थीं। खैर, इसी सब चिंता में नइकई आई। घोर दहेजी समाज में भी नइकी अपने बाबू के लिए गजब खुशकिस्मती निकली कि बिना दहेज शादी हुई। अउर त अउर दुबेजी का हाथ बंटाने के लिए नइकी का भाई भी साथ ही आया। यही दहेज देना पड़ा नइकी के बाबूजी को। नइकी के बाबूजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता था कि बिना खर्च किए जमींदार के यहां बेटी जा रही थी और साथ में बेटा भी जमींदार भले न हो लेकिन, जमींदारी संभालने के लिए तो, जा ही रहा था।

नइकी समझदार थी। नइकी काम सबसे संभालकर कर रही थी। बड़की की सेवा। और, दुबेजी के वंश में बढ़ोतरी। बड़की का हाथ-गोड़ मींजने से लेकर, सारी सेवा नइकी कर रही थी। और, इसके बदले उसे बड़की से अभयदान मिला था। क्योंकि, हिंदू संस्कार और कानून त बड़की, नइकी की इजाजत नहीं देते ना। इसीलिए बच्चा न पैदा कर पाने के बाद भी बड़की की इज्जत बनी हुई थी। बड़की भी बड़ी बन गई। अपनी नियति को ही मजबूती बना ली। दुबेजी की सेवा नइकी करेगी और, बाहर का सारा जिम्मा बड़की संभालेगी। वैसे, भी बड़की को पता था कि दुबेजी के पास जाने के लिए उसके पास कोई बहाना भी तो नहीं था। दुबेजी की नजदीकी के लिए ही तो, नइकी आई थी। नजदीकी रंग लाई औ तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चलने वाला दुबेजी का वंश तीन गुना बढ़ गया। अब बड़की ज्यादातर बाहर का ही काम संभालती है। नइकी अभी भी घर के भीतर ही ज्यादा रहती है। बड़की की सेवा भी वैसे ही करती है। हां, अब नइकी के बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़की के साथ घर के बाहर के काम में बंटाते हैं। नइकी-बड़की दोनों एक दूसरे की पूरक हो गईं हैं। और, दुबेजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...