Monday, September 21, 2015

योग्य चपरासी और अयोग्य अध्यापक

सोशल मीडिया पर घूमता एक तुलनात्मक तथ्य
उत्तर प्रदेश से दो खबरें इस समय जबर्दस्त चर्चा में हैं। इन दोनों खबरों की वजह से एक बहस, भावनाओं का उबाल देखने को मिल रहा है। दोनों खबरों में दुख है, संवेदना है, योग्य-अयोग्य की बहस है। पहली खबर ये कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पलट दिया है। वो खबर है शिक्षा मित्रों की सहायक अध्यापक के तौर पर नियुक्ति के फैसले की और उसे उच्च न्यायालय द्वारा पलट देने के फैसले की। दूसरी खबर है कि उत्तर प्रदेश में चपरासी का पद हासिल करने के लिए करीब तेईस लाख उम्मीदवारों ने आवेदन डाला है। और इसमें से ढाई सौ से ज्यादा पीएचडी की उपाधि वाले यानी डॉक्टरेट हैं। ये दोनों खबरें सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही नहीं देश की शिक्षा व्यवस्था से लेकर देश में नौजवानों की क्या कद्र है। इसे साफ करती है। इसलिए बड़ा जरूरी है कि इन दोनों खबरों पर बहस वहां तक पहुंचे जहां से इन खबरों के दोबारा बनने की गुंजाइश न बचे।

पहले बात शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बनाने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले की। और इस फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पलटने के फैसले की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शिक्षा मित्रों के सहायक अध्यापक बनाने पर रोक लगाने का फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश दिलीप गुप्ता और न्यायधीश यशवंत वर्मा ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकार के पास यह अधिकार नहीं है कि वो सहायक अध्यापकों की नियुक्ति तय मानकों में ढील देकर कर सके। इसलिए राज्य सरकार का शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बनाने का फैसला असंवैधानिक है। इन सभी शिक्षा मित्रों को बिना तय प्रक्रिया या परीक्षा के सिर्फ मार्कशीट के आधार पर ग्राम पंचायतों की संस्तुति पर किया गया था। यानी ग्राम प्रधान ने तय किया और उन लोगों को शिक्षा मित्र बना दिया। मामूली तनख्वाह मिलती थी। शिक्षा मित्र को तीन हजार रुपये के आसपास मिलते हैं। इन्हीं शिक्षा मित्रों को अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने सीधे सहायक अध्यापक बना दिया। अब अगर देखें, तो इसमें ज्यादा कुछ गलत नहीं दिखता। आखिर वो शिक्षा मित्र होते हुए भी तो बच्चों को पढ़ा ही रहे थे। फिर दो चरणों में हुई एक लाख बहत्तर हजार शिक्षा मित्रों की सहायक अध्यापक के पद पर हुई नियुक्ति क्यों उच्च न्यायालय को गलत लगी। इसके तथ्य देख लें, तो साफ समझ आ जाता है कि गलती क्या हुई है। और राज्य सरकार ने क्यों ये गलती जानबूझकर की है। सहायक अध्यापक के लिए नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन की जो तय अर्हताएं हैं, वो शिक्षा मित्र पूरी नहीं करते हैं। साथ ही राइट टू एजुकेशन कानून 2010 के तहत ये साफ है कि सहायक अध्यापक बनने के लिए टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी टीईटी पास करना जरूरी है। शिक्षा मित्र इस पर खरे नहीं उतरते हैं। तो क्या उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापक बनने के लिए जरूरी इतनी सी योग्यता रखने वाले लोग भी नहीं हैं। अगर नहीं हैं, तो निश्चित तौर पर राज्य सरकार का ये दायित्व बनता है कि शिक्षा मित्रों को ही सहायक अध्यापक के तौर पर रखे। लेकिन, ऐसा है नहीं। राज्य सरकार ने एक लाख बहत्तर हजार शिक्षा मित्रों को दो चरणों में सहायक अध्यापक बनाने से पहले टीईटी पास अभ्यर्थियों से सहायक अध्यापक के बहत्तर पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। अभी की स्थिति ये है कि करीब चौवन हजार टीईटी पास नौजवानों को सहायक अध्यापक बनाया गया है। लेकिन, मेरिट कटऑफ की वजह से पूरी बहत्तर हजार सीटों पर अभी तक नियुक्ति नहीं हो सकी है। अब जिलों में अलग-अलग मेरिट निकल रही है। उसी के आधार पर आवेदन करने वालों को नियुक्ति दी जा रही है। इससे आगे का एक तथ्य और है, जो स्थिति ज्यादा साफ करता है। करीब ढाई लाख ऐसे छात्र-छात्राएं हैं, जो टीईटी पास कर चुके हैं और सहायक अध्यापक बनने के लिए कतार में हैं। एनसीटीई द्वारा तय अर्हता भी पूरी करते हैं। तो, फिर राज्य सरकार ऐसा क्यों कर रही है कि तय मानकों पर योग्य लोगों को छोड़कर तय मानक न पूरा करने वालों को सहायक अध्यापक बनाना चाह रही है। इसको समझने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बयान ध्यान से सुनने होगा। अखिलेश यादव कह रहे हैं कि सरकार ने पहले भी शिक्षामित्रों की मदद की है और आगे भी करेगी। दरअसल समाजवादी पार्टी की सरकार करीब पौने दो लाख शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बनाकर 2017 के लिए इन्हें अपने वोटबैंक के तौर पर तैयार करना चाहती है। इसीलिए तय अर्हता पूरी करने वाले छात्रों से पहले उस अर्हता को पूरी न करने वालों छात्रों को सहायक अध्यापक बनाना चाहती है। समाजवादी सरकार ने ये काम बहुत शातिर तरीके से किया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद करीब साढ़े तीन हजार शिक्षा मित्रों ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की है। ये मामला अब सिर्फ भावनात्मक नहीं रह गया है। अब तीन हजार पाने वाले शिक्षा मित्रों को तीस हजार पाने वाला सहायक अध्यापक बनने के बाद फिर से तीन हजार वाला शिक्षा मित्र बनना कैसे बर्दाश्त हो सकता है। और ये भी जरूरी नहीं है कि सभी शिक्षा मित्र टीईटी पास सहायक अध्यापक की योग्यता रखने वाले छात्रों से कम योग्य हों। लेकिन, इस सरकार ने वोटबैंक के चक्कर में ये बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया है।


ये तो बिल्कुल ही नहीं है कि योग्य लोग सहायक अध्यापक के लिए नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि, इसी उत्तर प्रदेश में चपरासी बनने के लिए भी डॉक्टरेट की उपाधि लिए लोग मारे-मारे फिर रहे हैं। राज्य सरकार ने हाल ही में चपरासी के 368 पद निकाले हैं। इसके लिए तेईस लाख से ज्यादा लोगों ने आवेदन किया है। इसमें से ढाई सौ से ज्यादा तो पीएचडी डिग्री धारक हैं। यानी कम से कम डिग्री के आधार पर तो उत्तर प्रदेश में योग्य लोगों की कमी नहीं है। लेकिन, बड़ा सवाल ये भी है कि पीएचडी की डिग्री हासिल कर लेने वाले नौजवानों की डिग्री गड़बड़ है, तो सरकारें और उनकी शिक्षा नीति पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। और अगर नौजवानों की डिग्री ठीक है, तो सरकारें कितनी अक्षम हैं कि उनके लिए रोजगार का इंतजाम तक नहीं कर पा रही हैं। इस तरह योग्यता-अयोग्यता के फेर में फंसा नौजवान इतना हताश हो जाए कि इच्छा मृत्यु की मांग करने लगे, तो सवाल सरकार पर खड़ा होता ही है। और इसका जवाब सरकार को भी खोजना होगा, समाज को भी। 

No comments:

Post a Comment

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...