कहिए कि इसी वजह से गरीब रथ इतनी बची हुई है

गरीब रथ की दुर्दशा पर मेरी कल की पोस्ट पर विनीत ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि हमारे जैसे लोग गरीबों का हक मार रहे हैं। विनीत की टिप्पणी मैं यहां जस का तस चिपका रहा हूं।

"इस ट्रेन के बारे में आपको इस बात पर भी लिखना चाहिए था कि किस दर्जे के लोगों के लिए ये ट्रेन लायी गयी थी औऱ किस दर्जे के लोग इसमें बैठते हैं। वैसे तो दुकान-बाजार-हाटों में किसी को कुछ कह दे तो तुरंत अपनी औकात बताने में लग जाता हैं लेकिन गरीब रथ में बैठने के लिए अपनी औकात तुरंत गिरा देते हैं। मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूं जो कि पेशे से लेक्चरर हैं,वकील हैं,सम्पन्न घरों से आते हैं लेकिन गरीब रथ में यात्रा करते हैं और वो भी शान से। असुविधा होने पर आपकी तरह गरियाते हैं। एक मिनट के लिए भी नहीं सोचते कि हम ऐसा करते हुए किसी की हक मार रहे हैं।"


अब हमने जिस दिन गरीब रथ से यात्रा की। उसी दिन की बात करते हैं। बहुत संपन्न तो लोग मुझे गरीब रथ में यात्रा करते नहीं दिखे। हम जैसे बहुत संपन्न तो नहीं लेकिन, जरूरत भर के पैसे वाले लोगों के गरीबों का हक मारकर गरीब रथ में सफर के बावजूद कई सीटें खाली थीं। कोई गरीब कम से कम इलाहाबाद के रास्ते तक तो अपना हक यानी गरीब रथ की सीट मांगने नहीं आया। राजेंद्रनगर तक में कोई मिला हो तो, पता नहीं। विनीत बाबू ये भी बता दीजिए कि दिल्ली से इलाहाबाद के लिए कौन सा गरीब 469 रुपए दे पाएगा जिसकी आप बात कर रहे हैं। क्योंकि, वो गरीब तो भइया किसी भी ट्रेन से जनरल डिब्बे में 160 रुपए में सवारी करने के लिए पुलिस के डंडे खाकर घंटों लाइन में लगा रहता है। और, ये कहिए कि हम-आप जैसे लोग गरीब रथ में सफर कर लेते हैं इसलिए गरीब रथ में कम से कम अंदर कुछ सुविधाएं बची हैं वरना पूरी ट्रेन पर जब काम भर की बुकिंग न होती और रेवेन्यू न मिलता तो, इसके हाल का अंदाजा लगा सकते हैं आप।


खैर, विनीत ने टिप्पणी की थी इसलिए ये थोड़ी सी बात मुझे लिखनी पड़ी। दरअसल तो, हमारा इरादा गरीब रथ के हमारे इलाहाबाद तक के यात्रियों के बारे में लिखने का था। बहुत अरसे बाद ये हुआ कि यात्रा के दौरान ऐसे सहयात्री मिले कि हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर खरीदी नई इंडिया टुडे निकालने की फुर्सत ही नहीं मिली।



गरीब रथ की सवारी शुरू हुई तो, लगा कि ट्रेन के बाहर से जो चिरकुट खयाल ट्रेन की हालत देखकर दिमाग में जमा है वो, सफर बुरा बना देगा। अंदर घुसे तो, एक भाईसाहब लैपटॉप खोले उस पर जुटे थे तभी एक भाईसाहब कुली के साथ घुसे। और, सीट नंबर चेक करते कुली को बोला डिब्बा सीट के नीचे डाल दो। लेकिन, माइक्रोवेव ओवन का हृष्ट-पुष्ट डिब्बा भला सीट के नीचे कैसे जाता। बस उन्होंने खट से सीटों के बीच में खाने का सामान रखने के लिए बनी छोटी टेबल के नीचे उसे घुसेड़ दिया। अब हाल ये हो गया कि सीट पर किनारे बैठे लैपटॉप युक्त सज्जन को पैर बाहर लटकाकर बैठना पड़ा।


ब्लॉगर मन चंचल हुआ तो, मैंने माइक्रोवेव ओवन की तस्वीर उतार ली। माइक्रोवेव ओवन के रखने से त्रस्त पैर बाहर लटकाए बैठे बालक ने तुरंत कहाकि ऐसे लीजिए ना कि मेरा पैर भी आए। जिससे लगे कि ट्रेन में इस तरह के सामान लेकर चलने से दूसरे यात्रियों को कितनी परेशानी होती है। मैंने वो भी तस्वीर मोबाइल कैमरे से ले ली। बाद में पता चला कि कष्ट में बैठे बालक का नाम सौरभ था जो, सहजयोग कराने वाली किन्हीं निर्मला माता का भक्त था। सफर खत्म होते-होते ये भी साफ हो गया कि वो, भक्त क्या दूसरों को भी निर्मला माता के जरिए भक्त बनाने की कोशिश करने वाला सहजयोगी गुरु था।


माइक्रोवेव ओवन घर ले जा रहे सज्जन थे विशाल। एचआर कंसल्टेंसी फर्म चलाते हैं। नोएडा, इलाहाबाद में ऑफिस खोल रखा है। और, शुरू में तो, सहजयोगी भाईसाहब और हमें दोनों को ही विशाल का पैर रखने की जगह में माइक्रोवेव ओवन ठूंस देना जमा नहीं। लेकिन, बाद की यात्रा में थोड़ा परिचय हुआ तो, विशाल का माइक्रोवेव उतनी मुश्किल करता नहीं लगा। समझ में आया कि सब मन:स्थिति का मसला है। चार मित्र एक सीट पर बैठकर पूरी रात गुजार देते हैं और एक अजनबी का दो मिनट के लिए भी सीट पर बैठना बुरा लग जाता है। खैर, विशाल बाबू थोड़ा बहुत छोड़ ज्यादातर अपने फोन पर ही व्यस्त थे।


सफर को यादगार बनाया एक और सहयात्री रजनीश और सहजयोगी सौरभ के वार्तालाप ने। रजनीश घोर स्वयंसेवक हैं। ऐसे कि हर बात पर वो संघ के जरिए राष्ट्रनिर्माण की बात बताने से नहीं चूकते हैं। और, अच्छी बात ये थी कि खुद अमल भी करते हैं। स्वदेशी व्यवहार में अपना रखा है। सहजयोगी ये भी दावा कर रहा था कि एक जमाने में वो भी संघी था लेकिन, अब उसे सारी मुश्किलों से निकालने का सिर्फ एक रास्ता दिख रहा है वो, है कुंडलिनी जागरण यानी निर्मला माता का आशीर्वाद। लगे हाथ सहयोगी ने ये भी बताया कि दुनिया भर में निर्मला माता के कुंडलिनी जागरण से लाखो लोग फायदा उठा चुके हैं। वो, तो ये भी दावा कर रहा था कि पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के असाध्य रोग का इलाज निर्मला माता के कुंडलिनी जागरण के जरिए ही हुआ था। और, इसी के बदले रेड्डी साहब ने निर्मला माता को दिल्ली में महंगी जमीन उपहार स्वरूप दे दी थी।



हम सभी में सबसे कम उम्र के सहजयोगी ने सफर खत्म होते-होते स्वयंसेवक को भी सहजयोग का एक डोज दे ही दिया। खुद को ऑस्ट्रेलिया में काम करने वाला और बड़े-बड़े संपर्कों के बारे में बताकर सहजयोगी ने थोड़ा बहुत प्रभाव पहले ही जमा लिया था। ये अलग बात है कि सहजयोग की उस शॉर्ट ट्रेनिंग के बाद सहजयोगी को तो, स्वयंसेवक के हाथ से ऊष्मा निकलती महसूस हो रही थी लेकिन, खुद स्वयंसेवक ऐसी कोई ऊष्मा महसूस नहीं कर पा रहा था। दोनों में इस बात पर भी बहस हो गई कि कलियुग है या घोर कलियुग। इस बहस में स्वयंसेवक बेचारे ऐसे फंसे कि झोले से निकालकर रखी किताब WHO WILL CRY WHEN WE DIE भी धरी की धरी रह गई।


इस सब बहस में हमसे भी थोड़ा कम सक्रिय एक डॉक्टर साहब हमारे पांचवें सहयात्री थे। डॉक्टर सिद्दिकी साहब इलाहाबाद के करेली मोहल्ले के थे और बनारस में मेडिकल अफसर हैं। सिद्दिकी साहब के रहने से ये मदद जरूर मिली कि चारों पैगंबरों के बारे में थोड़ा ज्ञान और बढ़ा। वैसे बहस हिंदु, मुस्लिम के अलावा इसाइयों तक भी गई थी। और, उनकी दोनों धाराओं पर भी ज्ञानगंगा बही। काफी कुछ बातें ऐसी थी जो, एकदम से मेरे सिर के ऊपर से गुजर जा रही थी। लगा कि इसीलिए ज्ञानीजन कहते हैं कि घुमक्कड़ी से बढ़िया अनुभव कुछ नहीं। अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा।