कश्मीर से सेना हटाने से किसका भला होगा

जम्मू-कश्मीर की सरकार में सहयोगी पीडीपी किसी भी कीमत पर सेना को कश्मीर से हटाना चाहती है। इसके लिए पीडीपी लगातार कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद औऱ केंद्र की यूपीए सरकार के ऊपर दबाव बना रही है। पीडीपी का तर्क ये है कि बेवजह कश्मीर घाटी में सेना लगाकर दहशत का माहौल बनाया जा रहा है। जबकि, पिछले एक दशक से घाटी में आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है। और, अब सेना की जगह कश्मीर की कानून-व्यवस्था देखने का जिम्मा कश्मीर की पुलिस को ही दे देना चाहिए। लेकिन, पीडीपी की ये मांग ठीक वही मांग है जो, घाटी में काम कर रही अलगाववादी ताकतें भी लगातार चाह रही हैं। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पीडीपी सेना को हटाकर किसका भला करना चाहती है।

वैसे इसे केंद्र के ऊपर दबाव कहें या फिर एक बार सेना हटा देने पर कश्मीर के हाथ से निकल जाने का भय कहें, अभी तक केंद्र और राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने सेना को सीमा पर ही तैनात करने की पीडीपी की मांग नहीं मानी है। लेकिन, राज्य सरकार में सहयोगी पीडीपी की इस मांग ने राज्य में फिर से कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करना शुरू कर दिया है। सेना हटाने की पीडीपी की मांग तो पूरी नहीं हुई लेकिन, कट्टरपंथी ताकतों के दबाव में आकर सेना को मस्जिदों और मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों से बाहर निकालने का फरमान सुना दिया गया। ऐसा नहीं है कि सेना को मस्जिदों या मुस्लिम धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के काम से बाहर कर दिया गया है। सरकार ने सेना को मस्जिदों और मुस्लिम धार्मिक स्थलों के रीकंस्ट्रक्शन के काम से बाहर कर दिया है। यहां तक कि वो काम भी रोक दिए गए जो, सेना अपने फंड से मस्जिदों को ठीक करने के लिए कर रही थी। दरअसल, आतंकवादी मुठभेड़ों में कभी-कभी सेना की ओर से निर्दोष कश्मीरियों के एनकाउंटर के बाद कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए सेना सद्भावना के तहत ये काम कर रही थी।
इसके तहत स्थानीय लोगों की मदद से सेना ऐसी मस्जिदों को ठीक करवाने का काम खुद ही कर रही थी जो, आतंकवाद के दौर में टूट गई थीं या जिनको किसी तरह का नुकसान पहुंचा था। सेना ने पिछले तीन सालों में इस काम पर 52 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए। कई मस्जिदें सुधारीं और आगे भी उसकी योजना कई मस्जिदों और मुस्लिम धर्मस्थलों को सुधारने की थी। सिर्फ सुरक्षा की जिम्मेदारी से आगे बढ़कर मस्जिदों को सुधारने के लिए सेना की तारीफ होनी थी लेकिन, इसकी तारीफ के बजाए कट्टरपंथी मौलवियों ने सेना को बाहर भगाने का अभियान शुरू कर दिया। ये सेना को कश्मीर घाटी से हटाकर सीमा पर तैनात करने की मांग को ही दूसरी तरह से रखा गया और सरकार इसमें फंस गई।

सरकार ऐसे समय में इसमें फंस रही है जब डेढ़ दशक के बाद फिर से एक बार कट्टर अलगाववादी ताकतें कश्मीर घाटी में सिर उठाने की कोशिश कर रही हैं। हुर्ऱियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की अप्रैल में श्रीनगर में हुई एक रैली में लश्कर-ए-तैबा के लोग शामिल हुए थे। लश्कर-ए-तैबा के आतंकवादी न सिर्फ गिलानी की रैली में शामिल हुए थे बल्कि, चिल्ला-चिल्लाकर भारत विरोधी नारे लगा रहे थे। उन सबके हाथ में लश्कर के झंडे भी थे। लेकिन, इसके बाद भी सरकार गिलानी के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकी। अगर सरकार ये डर रही है कि गिलानी पर कार्रवाई से घाटी में अमन पर असर पड़ सकता है तो, मुझे नहीं लगता कि ये ठीक है क्योंकि, अगर गिलानी जैसी मानसिकता के लोगों से डरकर काम किया जाएगा तो, फिर से डेढ़ दशक पहले वाली डरावनी घाटी बनने में कश्मीर में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं खुद इसी साल फरवरी में कश्मीर, गुलमर्ग होकर आया हूं। और, इसमें कोई शक नहीं है कि सेना की मौजूदगी की वजह से धरती की इस जन्नत का मजा लेने के लिए लोग बेखौफ होकर जा रहे हैं। यहां व्यापार बढ़ रहा है, खुशहाली बढ़ रही है। इसलिए राजनीति करने वालों से सिर्फ इतनी गुजारिश है कि एक बार फिर से धरती पर जन्नत को दोजख बनाने की किसी भी कोशिश में शामिल न हों। हां, सेना अगर कहीं आतंकवाद पर काबू के बहाने ज्यादती कर रही है तो, जिम्मेदार लोगों को कड़ी से क़ड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन, सेना को घाटी से हटाकर कश्मीर को आतंकवादियों के हवाले करना कहीं से भी समझदारी का फैसला नहीं होगा।