Thursday, October 10, 2019

बतंगड़ जिन्दाबाद

लोगों की देखादेखी और खुद को लगा कि जाने कब गूगल ब्लॉगर बंद कर दे, इसलिए अपने नाम से URL बुक करा लिया और उसी पर लिखने-पढ़ने लगा, लेकिन 2 साल से ज्यादा समय के अनुभव से यह बात समझ में आई कि ब्लॉगिंग तो ब्लॉग पर ही होती है और इस अनुभव के बाद मैं फिर से अपने इस वाले ठिकाने को जागृत कर रहा हूं। कोशिश करूंगा कि शुरुआती दौर जैसी ही ब्लॉगपोस्ट ठेल सकूं। अच्छी बात यह रही है कि यहां ब्लॉगिंग घटी तो वीडियो ब्लॉगिंग यूट्यूब पर बढ़ गई है, आप वहां भी मुझे देख, सुुन सकते हैं। बात का बतंगड़ बनता रहेगा और अब फिर से पुराने वाले जोर और जोश के साथ। ब्लॉग केे अलावा दूसरे ठिकानों पर भी सक्रियता बनी रहेगी, वहां भी आइए।
 

Saturday, July 22, 2017

मेरे ब्लॉग का नया पता

‘कृष्णा’ के दौर में भी ‘कृष्ण’ बने रहना मामूली बात नहीं

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति हो गए। आज ‘राम’नाथ की ही चर्चा का समय है। लेकिन, इस समय मैं ‘कृष्ण’ की बात कर रहा हूं। हालांकि, मैं कृष्ण भगवान की चर्चा मैं कतई नहीं करने जा रहा हूं कि कैसे कृष्ण इस्कॉन और अग्रेजों की संगत में पहुंचकर कृष्णा हो गए हैं। भारत में अभी हाल तक बहुतायत नाम में राम और कृष्ण जरूर लगता था। हालांकि, अब शायद ही कोई बच्चों का नाम राम, कृष्ण के नाम पर रखता हो। लेकिन, बीजेपी के दिग्गज नेता, बुनियाद की सबसे मजबूत ईंटों में से एक लालकृष्ण आडवाणी की पैदाइश उसी दौर की है, जब राम, कृष्ण लगभग हर हिन्दुस्तानी के नाम में लगा रहता था। संयोगवश हमारे पिताजी का नाम भी कृष्ण चन्द्र है। खैर, इस संयोग का अभी मेरे लिखने से कोई वास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि उस दौर की पैदाइश वाले तो लगभग सारे ही लोगों के नाम राम, कृष्ण के नाम पर ही होते थे। आज लालकृष्ण आडवाणी की कुछ तस्वीरें भेजी, देखी जा रही हैं, जिसे लेकर सोशल मीडिया में खूब मजाक चल रहा है।
ताजा तस्वीर है राष्ट्रपति चुनाव में मत डालते लालकृष्ण आडवाणी की। इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया में चुटकुला चल रहा है कि अपनी गर्लफ्रेन्ड की शादी में 101 रुपए का लिफाफा देते लालकृष्ण आडवाणी। एक और तस्वीर है, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी और फारुख अब्दुल्ला का हाथ पकड़े सुषमा स्वराज संसद के गलियारे में दिख रही हैं। ज्यादातर अखबारों ने भी इन दोनों तस्वीरों को छापा है। चूंकि, लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज दोनों ही राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के दावेदार दिख रहे थे। और फारुख अब्दुल्ला भी विपक्ष के उम्मीदवार हो सकते थे। इसलिए संसद गलियारे में तीनों की एक साथ मिली तस्वीर सोशल मीडिया में चुटकी लेने की पक्की वजह देती है। 2009 के आसपास से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं को तो लालकृष्ण आडवाणी वैसे ही एक सत्तालोलुप नेता की तरह दिखते हैं। और, उन कार्यकर्ताओं के पास एक पक्का तर्क भी मौजूद है कि आखिर 2009 में तो पार्टी ने आडवाणी को ही चेहरा बनाया था। और, वो मनमोहन सिंह से हार गए। मनमोहन सिंह जैसी गैरराजनीतिक शख्सियत के सामने सीधी लड़ाई में हारने से लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक कद का कितना क्षरण हुआ, इस पर एक स्वतंत्र शोध होने की जरूरत है। लेकिन, इस क्षरण का खतरा खुद आडवाणी का तैयार किया हुआ था। उन्होंने मनमोहन को आमने सामने बहस की चुनौती दे दी थी। लालकृष्ण आडवाणी उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति शैली में भारतीय प्रधानमंत्री का चुनाव कराने के पक्षधर हो चले थे। 
2004 का चुनाव हारने से बीजेपी कार्यकर्ताओं के मनोबल में कोई कमी नहीं आई थी। लेकिन, 2009 में अपने सबसे मजबूत नेता का ऐसे गैरराजनीतिक और कमजोर माने जाने वाले मनमोहन सिंह के सामन हारने से बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा। वो मनोबल इस कदर टूटा कि फिर आडवाणी से लेकर देश के किसी भाजपा नेता में उनका भरोसा नहीं बन पा रहा था। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अकेले नरेंद्र मोदी ही थे जो, बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद की आखिरी किरण थे। इसलिए जब 2013 की सितम्बर में नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार बने, तो कार्यकर्ताओं को लगा कि संजीवनी मिल गई। हालांकि, उस समय आडवाणी ने उसका जमकर विरोध किया। इतना कि लगा पार्टी दोफाड़ हो जाएगी। लेकिन, अब ये बात अच्छे से समझी जा सकती है कि आडवाणी कभी बीजेपी को दो हिस्से में करने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
भारतीय राजनीति में सफलता के चरण पर स्थापित हो चुकी आज की मोदी-शाह वाली बीजेपी में आडवाणी का चित्र एक सत्तालोलुप नेता या फिर सहानुभूति वाले नेता के तौर पर ही बनता है। लेकिन, बस 2009 से पहले की भारतीय राजनीति, उस समय की भारतीय जनता पार्टी और उसमें लालकृष्ण आडवाणी के बारे में पता करने पर चित्र बदल जाता है। तब आडवाणी का चित्र भारतीय राजनीति के उस महान नेता के तौर पर बनता है, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की कांग्रेस के विकल्प पर रखी गई बुनियाद पर शानदार इमारत तैयार की। वो नेता जिसने इस देश में राष्ट्रीयता, धर्म को परदे के पीछे की राजनीति से पारदर्शी तरीके से करना शुरू किया। लालकृष्ण आडवाणी को उस नेता के तौर पर याद किया जाना चाहिए, जिसने आगे बढ़कर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी। अगर आडवाणी को सत्ता का ऐसा मोह रहा होता, तो उस समय आडवाणी बीजेपी के सबसे ताकतवर नेता था। दिल्ली से लेकर हर राज्य तक उन्हीं की तैयार की पौध, पेड़ बन चुकी थी। उसी समय आडवाणी ने पार्टी तोड़ दी होती। लेकिन, आडवाणी अपने राजनीतिक विचार, मूल्य और आदर्शों की राजनीति करने वाले नेता हैं। इसीलिए हर लड़ाई के बाद आडवाणी ने कभी अपने विचार, मूल्य, आदर्श को धूल धूसरित नहीं किया। जाने कितनों को सांसद, विधायक बनाने वाले आडवाणी ने अपने परिवार, बच्चों के लिए कभी कुछ नहीं किया। ये वो लालकृष्ण आडवाणी हैं, जिन्होंने 1996 में जैन डायरी में नाम आने के बाद हवाला का आरोप लगने भर की वजह से इस्तीफा दे दिया था। वो लालकृष्ण आडवाणी आज के दौर में भी ‘कृष्ण’ बने हुए हैं। ये कहा जा सकता है कि इस उम्र में अब जाएंगे भी कहां। और पार्टी ने उन्हें सबकुछ तो दिया है। इस तरह से सोचने वालों के लिए लालकृष्ण आडवाणी की 89 साल की उम्र सबसे बड़ा आधार बनती है। उनके लिए एक तथ्य ये है कि कांग्रेस के शासन में लगभग सबकुछ हासिल कर चुके एस एम कृष्णा 85 साल के होने के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। एस एम कृष्णा विदेश मंत्री, राज्यपाल, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सब रह चुके हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जिनका जिक्र किया जा सकता है। लेकिन, उसकी शायद जरूरत नहीं है। 2009 के बाद से भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राजनीति देखने वालों से विनम्र निवेदन है कि विचार, मूल्य, आदर्श के लिए समर्पित भारतीय राजनीति के इस महानतम नेता का चित्र मजाकिया मत बनाइए। राजनीति के ‘कृष्णा’ दौर में ‘कृष्ण’ बने रहना आसान काम नहीं है।

Wednesday, July 19, 2017

मायावती को इस्तीफा देने की याद क्यों आई ?

बहुजन समाज पार्टी के ट्विटर खाते से
ये बात मायावती को लोकसभा चुनाव परिणाम के तुरन्त बाद अच्छे से ध्यान में आना चाहिए था। क्योंकि, उत्तर प्रदेश ने हाथी निशान पर एक भी व्यक्ति को संसद में पहुंचने लायक नहीं माना। चलिए उस समय ध्यान में नहीं आया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे के तुरन्त बाद ये बात पक्के तौर पर ध्यान में आ जाना चाहिए था। लेकिन, उस समय भी मायावती को ये समझ नहीं आया कि वो दलितों की बात नहीं कह पा रही हैं। अब जाकर मायावती को समझ में आया, जब वो लोकसभा चुनाव में साफ हो गईं और विधानसभा में भी बहुजन समाज पार्टी के सिर्फ 19 विधायक चुनकर पहुंचे। 1984 में बीएसपी के अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी का इतना बुरा हाल कभी नहीं रहा। 1989 में भी बीएसपी के 2 सांसद चुनकर लोकसभा में पहुंचे थे और 13 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में थे। वो उठान पर जाती बीएसपी थी। अब 2014 में बीएसपी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं है और 2017 में सिर्फ 19 विधायक उत्तर प्रदेश में बीएसपी के हैं। बीएसपी के इस हाल पर ‘पुनर्मूषको भव’ एकदम सटीक बैठता है।
‘पुनर्मूषको भव’ होने के बाद भी मायावती को कतई याद नहीं आया कि मायावती दलितों की बात कह नहीं पा रही हैं या फिर दलित सुन नहीं पा रहा है कि वो उनकी बात कह रही हैं। मायावती को ये भ्रम बने रहने की 2 वजहें थीं। पहली बड़ी वजह कि सबके बाद वो देश की सबसे बड़ी दलित नेता थीं। और दूसरी वजह ये कि, उत्तर प्रदेश में भले मायावती की पार्टी के सिर्फ 19 विधायक चुने गए। मायावती की बहुजन समाज पार्टी को 2017 विधानसभा चुनावों में मत प्रतिशत के लिहाज से खास नुकसान नहीं हुआ। बीएसपी को 22.2 प्रतिशत मत मिले। लेकिन, मायावती को डर तब लगना शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली बीजेपी ने सबको चौंकाते हुए रामनाथ कोविंद को रायसीना पहाड़ी पर पहुंचाने का फैसला किया। मायावती के लिए ये उबले आलू के गले में अंटक जाने जैसी स्थिति थी। न उगलते बन रहा था, न निगलते बन रहा था। मायावती की प्रतिक्रिया थी- कोविंद जी से बेहतर दलित उम्मीदवार विपक्ष उतारेगा, तो हम उसको समर्थन देंगे। विपक्ष ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर मायावती को ‘दलित धर्मसंकट’ से उबार लिया। लेकिन, अन्दर ही अन्दर मायावती को डर लगने लगा था। रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर से होने और सक्रिय राजनीति में होते भी मायावती को उतना नहीं डरा रहे थे, जितना वो रायसीना पहाड़ी पर बैठने के बाद डराते दिख रहे थे। देश की सबसे बड़ी दलित नेता की पदवी छिनने का डर मायावती को बुरी तरह से परेशान कर रहा था।
इस डर का अन्दाजा राष्ट्रपति चुनाव के दिन भी मिला। 17 जुलाई को मायावती ने कहा- चुनाव कोई भी जीते, राष्ट्रपति एक दलित ही होगा। ये देन किसकी है? ये देन परमपूज्यनीय बाबा साहब अम्बेडकर की है, मान्यवर कांशीराम जी की है। ये देन बहुजन समाज पार्टी की है। मायावती ने राष्ट्रपति चुनाव वाले दिन कहाकि ये सब बहुजन आन्दोलन, पार्टी की जीत है। लेकिन, देश की सबसे बड़ी दलित नेता को देश के सबसे ऊंचे पद पर एक दलित के, वो भी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करते शीर्ष तक पहुंचे, रायसीना पहाड़ी पर विराजने से अपना कद छोटा होने का डर बढ़ने लगा था। ये डर इतना बढ़ा कि दलित के राष्ट्रपति बनने का सारा श्रेय बहुजन आन्दोलन को देने वाली मायावती को राज्यसभा में अहसास हुआ कि दलित की बात सुनी नहीं जा रही है। और अगर अपने समाज की बात ही नहीं रख पा रही हैं, तो उन्हें राज्यसभा में रहने का कोई हक नहीं है। 18 जुलाई 2017 बीएसपी प्रमुख मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देने के तुरन्त बाद पत्रकारों से कहा- दलितों के हितों में सहारनपुर जिले में शब्बीरपुर गांव में जो दलित उत्पीड़न हुआ है। और आप लोगों को मालूम है कि मैं दलित समाज से ताल्लुक रखती हूं। जब मैं अपने समाज की बात उधर नहीं रख सकती हूं। सत्ता पक्ष के द्वारा मुझे बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। मंत्री लोग खड़े हो गए। सभी वहां के जो सदस्य है, सत्ता पक्ष के सब खड़े हो गए। मैं समझती हूं कि ये ठीक नहीं हुआ है। तो जब मुझे अपनी बात रखने का सत्तापक्ष मौका नहीं दे रहा है। मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है, तो मैंने आज राज्यसभा से इस्तीफा देने का फैसला किया है। हाउस में भी कहा और अभी मैं माननीय सभापति जी इस्तीफा देकर आ रही हूं। दलितों की बात राज्यसभा में न कह पाने की टीस के साथ मायावती ने उस राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है, जिस पर अप्रैल 2018 के बाद उनका रह पाना वैसे भी सम्भव नहीं दिखता है। क्योंकि, अब उन्हें राज्यसभा में पहुंचाने के लिए जरूरी विधायक ही उनके पास नहीं हैं। हालांकि, मायावती को ये बात बहुत देर से समझ आई कि वो दलितों की बात ही नहीं रख पा रही हैं। लेकिन, अच्छी बात ये है कि विपक्ष को इससे एक जुड़ाव बिन्दु मिल गया है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी की बढ़ती शक्ति से परेशान विपक्ष एकजुट हो सकता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय जनता दल के कोटे से लालू प्रसाद यादव उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजने की बात कह रहे हैं। नरेंद्र मोदी के एकछत्र राज के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक नई गोलबन्दी की बुनियाद मायावती बनती दिख रही हैं। हां, विपक्ष का ये बड़ा संकट जरूर हो सकता है कि जरा सा सन्जीवनी मिलते ही मायावती किस तरह से व्यवहार करेंगी। क्योंकि, कांशीराम की विरासत को आगे बढ़ाने वाली मायावती का भी इतिहास किसी के साथ मिलकर 4 कदम चलने का नहीं रहा है। लेकिन, अभी के हालात में मायावती के पास लालू प्रसाद यादव के महागठबन्धन फॉर्मूले को स्वीकारने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। लेकिन, राजनीतिक मजबूरी में बन रहे इस विपक्षी गठजोड़ की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि पार्टियों और नेताओं के मिलन से आगे ये जनता से मिलने का कोई कार्यक्रम ये बनाएंगे या सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के दलित के घर जाने के कार्यक्रम में मीनमेख निकालकर ही अपना काम चलाएंगे। 
(ये लेख QuintHindi पर छपा है)

Tuesday, July 18, 2017

मोदी के पीएम बनने के बाद अडानी के भाव गिरे!

हिन्दुस्तान में हर आदमी एक बात पक्के तौर पर जानता है। वो बात ये है कि अडानी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोस्त हैं। इसी आधार पर वो हिन्दुस्तान का हर आदमी ये भी जानता है कि देश के प्रधानमंत्री से दोस्ती का फायदा अडानी की कम्पनियों को जमकर मिलता रहता है। कई लोग तो चौक-चौराहे पर खड़े ऐसे बात करते हैं, जैसे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी की कम्पनियों के भाव लगातार बढ़ते जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से अडानी को फायदा मिलने की ये जो धारणा देश के लोगों में बनी है, उसके पीछे बहुत मजबूत आधार हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते अडानी समूह ने गुजरात में कई बड़ी परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया। और जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने की यात्रा शुरू कर रहे थे, तो शेयर बाजार में गौतम अडानी के अडानी समूह को तो जैसे पंख लग गए थे। नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का असर था कि 13 सितम्बर 2013 को जिस अडानी एंटरप्राइजेज का बाजार भाव 141 रुपये था, वही अडानी एंटरप्राइजेज 2014 में लोकसभा चुनाव होने के ठीक पहले के महीने यानी अप्रैल 2014 में 471 रुपये पर बिक रहा था। अडानी समूह की मुख्य कम्पनी अडानी एंटरप्राइजेज के साथ अडानी समूह की दूसरी कम्पनियों को भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ने का जबरदस्त फायदा मिला था। मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मदवारी के दिन यानी 13 सितम्बर 2013 को अडानी पावर की भाव 36 रुपये था और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी के नजदीक पहुंचते तक अडानी पावर 53 रुपये से ज्यादा का हो गया। अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी पावर की ही तरह अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड को भी इसका अच्छा खासा फायदा मिला था। 13 सितम्बर को 136 रुपये वाला अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड अप्रैल 2014 में ही 196 रुपये का बिकने लगा था।
अब इस मजबूत आधार पर कोई भी अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाकर बता सकता है कि इस समय अडानी की कम्पनियों का भाव आसमान पर होना चाहिए। लेकिन, जरा अपनी कल्पना के घोड़े को लगाम लगाइए। दरअसल, बाजार सब धीरे-धीरे बराबर कर देता है। ऐसा ही कुछ अडानी समूह की कम्पनियों के साथ भी हुआ। गौतम अडानी के दोस्त नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे, तो अडानी को फायदा होगा। इस भावना को बाजार ने हाथोंहाथ लिया। लेकिन, एक बार जब मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो बाजार ने अडानी की कम्पनियों का कम्पनी के आधार पर मूल्यांकन करना शुरू कर दिया। बाजार की भाषा में कहें, तो कम्पनी ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस आधार को अडानी के सन्दर्भ में डिस्काउंट कर दिया।
अब अडानी समूह की कम्पनियों की शेयर बाजार में आंकी जा रही हैसियत की बात कर लेते हैं। अडानी एंटरप्राइजेज की कीमत जुलाई 2013 में 216.15 जुलाई 2014 में 492.70 और 26 मई 2014 को अडानी एंटरप्राइजेज सबसे ऊंचे भाव पर पहुंचा। 22 मई 2015 को अडानी एंटरप्राइजेज का भाव 794.75 के भाव पर बिका। लेकिन, जून 2015 से अडानी एंटरप्राइजेज का भाव जो तेजी से गिरना शुरू हुआ, तो अभी तक संभल नहीं सका है। आज जुलाई 2017 में अडानी एंटरप्राइजेज 140 रुपये के नीचे बिक रहा है। यानी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद करीब 500 रुपये का बिक रहा अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर आज 140 रुपये के आसपास बिक रहा है।
अडानी समूह की दूसरी महत्वपूर्ण कम्पनी है अडानी पावर। अडानी पावर के एक शेयर की कीमत जुलाई 2013 में 42.60 रुपये थी। जुलाई 2014 में इसमें अच्छी तेजी देखने को मिली और इसका  भाव 65.35 रुपये हो गया। इसके बाद तो अडानी पावर से जैसे सारा पावर ही खत्म हो गया।  जुलाई 2015 में अडानी पावर के शेयरों का भाव भी तेजी से गिरता दिखा। जुलाई 2015 में अडानी पावर का एक शेयर 29 रुपये से कम में मिल रहा था। आज की तारीख में यानी जुलाई 2017 में भी अडानी पावर के शेयर 30 रुपये से कम में ही मिल जा रहा है। यानी मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी पावर के जिन शेयरों का भाव 65 रुपये के ऊपर पहुंच गया था, आज वही शेयर 30 रुपये से भी कम में मिल रहा है, मतलब आडानी पावर का भाव आधे से भी कम हो गया। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि अडानी का भाव एकदम ही गिर गया हो। अडानी समूह की कम्पनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन का भाव बढ़ा है। अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन के शेयर की कीमत जुलाई 2013 में 151.55 रुपये थी। 2014 जुलाई की शुरुआत में इन शेयरों की कीमत 270 रुपये के पार चली गई। जुलाई 2016 में शेयरों के भाव गिरकर 200 रुपये के आसपास पहुंच गए। आज की तारीख में अडानी पोर्ट का शेयर 340 रुपये के आसपास बिक रहा है। कुल मिलाकर अगर हम विश्लेषण करें, तो मोदी के पीएम बनने का अडानी को फायदा कम है, नुकसान ज्यादा।

Monday, July 17, 2017

क्रूर मशीनी देश चीन मानवता के लिए खतरा है



चीन मानवता के लिए ख़तरा है। वहाँ के नागरिक मानव नहीं, मशीन हो चुके हैं। किसी भी विचार के लिए वहाँ जगह ही नहीं है। कल प्रभाष प्रसंग में शामिल होने सत्याग्रह मण्डप में था। सामने हरी घास पर पीले कपड़ों में कुछ लोग योग जैसा कुछ कर रहे थे, चाइनीज़ जैसी भाषा में लिखा था। मैंने एक से पूछा- ये चीनी योग है क्या? जवाब मिला- शाक्य मुनि की परम्परा को चाइनीज़ मास्टर ने आगे बढ़ाया है। चीन ने इस प्रतिबन्धित कर दिया है। 1999 में चीन ने करोड़ों चीनियों को गिरफ़्तार कर लिया, नौकरी से निकाल दिया गया। स्कूल, घर सबसे बाहर कर दिए गए, सिर्फ इस वजह से कि वो लोग फालुन दफ़ा के साधक थे। क़रीब 10 लाख लोग अभी भी चीन में इस वजह बन्धक हैं। क्रूर यातना के शिकार हुए। वामपन्थी बुनियाद पर तैयार हुआ चीन ऐसा ही हो चुका है। वहाँ सुधार की उम्मीद कितनी ख़त्म है, इसका इसी से लगाइए कि वहाँ वामपन्थ की ही गुन्जाइश सबसे पहले ख़त्म हुई। मानव से मशीन में तब्दील हो चुका इतनी बड़ी आबादी वाला देश पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है। मशीनें हमेशा पहली नज़र में मानव से ताक़तवर दिखती हैं लेकिन, मानव मस्तिष्क ही हर मशीन का जनक (बाप) होता है। इसलिए मशीन डरा सकती है लेकिन, मनुष्य से जीत नहीं सकती है। फालुन दफ़ा एक उदाहरण है, ऐसे उदाहरणों को लिपिबद्ध करने पर ग्रन्थ तैयार हो जाएगा। जरूरी है चीनी मशीनों को दुनिया के मानव उनकी औकात बताएँ। भारत को क़तई भूटान की तरफ़ आने वाली चीनी मशीनों के रास्ते से हटना नहीं चाहिए।

Thursday, July 13, 2017

जीएसटी से जरूरी सामान सस्ते होंगे

जीएसटी को लेकर सबसे बड़ा खतरा यही बताया जा रहा था कि इससे महंगाई बढ़ेगी। इस महंगाई के बढ़ने की डर दिखाकर उन कारोबारियों ने भी जमकर प्री जीएसटी सेल लगा रखी थी, जो जीएसटी को कारोबारियों के लिए मुश्किल बताकर इसके विरोध में सांकेतिक दुकान भी बन्द कर चुके थे। कार कम्पनियों ने भी ग्राहकों को डराकर प्री जीएसटी सेल में काफी गाड़ियां बेच लीं। लेकिन, अब समझ में आ रहा है कि प्री जीएसटी सेल में खरीद करने वाले ज्यादातर लोग घाटे में रहे होंगे। क्योंकि, ज्यादातर जरूरी सामान जीएसटी के बाद सस्ते हो गए हैं। फोन और कार भी आज के मध्यवर्ग के लिए जरूरी सामानों में ही आता है। इसके अलावा भी जरूरी सामान कैसे सस्ते हुए हैं, इसका अन्दाजा 30 जून की रात 12 बजे से शुरू हुई बिग बाजार जीएसटी सेल से ही पता चल गया। इलाहाबाद जैसे देर शाम उनींदे हो जाने वाले शहर से सारी रात जागने वाली मुम्बई तक में लोग बिग बाजार की जीएसटी सेल में कतार में लगे थे। 1 जुलाई की सुबह वही कार कम्पनियां जो एक दिन पहले तक जीएसटी का डर दिखाकर कारें बेच लेना चाह रही थीं, अब बता रही थीं कि जीएसटी के बाद उनकी कम्पनी की कार कितनी सस्ती हुई है। आईफोन भी सस्ता हो गया।
एक भ्रम ये भी था कि ज्यादा महंगी कारों को जीएसटी सस्ता करेगा लेकिन, छोटी और मध्यवर्ग की पहुंच वाली कारें सस्ती नहीं होंगी। ये भ्रम भी टूटा है। हाइब्रिड कारों को छोड़कर सभी कारें सस्ती हुई हैं। हाइब्रिड कार खरीदने वाले जीएसटी के बाद घाटे में हैं। उदाहरण के लिए टोयोटा की हाइब्रिड कैमरी की जीएसटी के पहले दिल्ली में कीमत 31.98 लाख थी जो, जीएसटी के बाद करीब 17 प्रतिशत ज्यादा हो गई है। अब ये कार दिल्ली में 37.23 लाख की मिलेगी। लेकिन, हाइब्रिड कार खरीदने वाले देश में बहुत कम लोग हैं। टोयोटटा कम्पनी की ही एसयूवी फॉर्च्यूनर करीब 9 प्रतिशत सस्ती हो गई है। दिल्ली में जो टोयोटा फॉर्च्यूनर 31.86 लाख की थी, अब वही गाड़ी 29.18 लाख में ही मिल जाएगी। इस उदाहरण से ये भ्रम भी हो सकता है कि सिर्फ बड़ी गाड़ियां ही सस्ती हुई हैं। लेकिन, ऐसा नहीं है। मारुति की डिजायर कार करीब 2000 रुपये सस्ती हुई है और मारुति की छोटी कार ऑल्टो भी 1000 रुपये सस्ती हुई है। मारुति की कारें अधिकतम 3 प्रतिशत तक सस्ती हुई हैं। ह्युंदई और निसान ने भी अपना कारों की कीमत घटा दी है। फोर्ड ने करीब 4.5 प्रतिशत दाम घटाए हैं और रेनो ने तो 7 प्रतिशत तक अपनी गाड़ियां सस्ती कर दी है। होन्डा की भी कारें सस्ती हो गई है। कुल मिलाकर पूरे ऑटो सेक्टर के लिए और कार खरीदने वाले ग्राहकों के लिए जीएसटी खुशखबरी लेकर आया है।
फोन खरीदने वालों के लिए भी जीएसटी अच्छी खबर लेकर आया है। आईफोन खरीदने वालों के लिए बेहद अच्छी खबर है। क्योंकि, एप्पल ने आईफोन के साथ अपने लैपटॉप और टैब की कीमत भी काफी कम कर दी है। दूसरी मोबाइल कम्पनियों ने भी 5-10 प्रतिशत तक की कटौती की है।
रियल एस्टेट को अभी इससे बाहर रखा गया है। हालांकि, बहुत से बिल्डर जीएसटी के नाम पर ग्राहकों से ज्यादा वसूलने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि, इस मामले में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों से ज्यादा रकम वसूलने वाले बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। अभी जो घर बन रहे हैं, उसमें ज्यादा टैक्स लगेगा। क्योंकि, जीएसटी लागू होने के बाद करीब 1 प्रतिशत टैक्स बढ़ गया है। लेकिन, बिल्डर इसका इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल कर सकते हैं। कुल मिलाकर जीएसटी लागू होने के बाद बिल्डर के घर बनाने की लागत कम होगी। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या बिल्डर इनपुट टैक्स क्रेडिट से मिला फायदा ग्राहक को देते हैं या नहीं।
घर, गाड़ी फोन की कीमतों पर जीएसटी के बाद क्या असर पड़ रहा है, ये समझ में आया। लेकिन, सबसे जरूरी ये समझना है कि रोजाना की जरूरतों का सामान सस्ता हो रहा है या महंगा। इसका जवाब खोजने के लिए 2 जरूरी तथ्य हैं। पहला राजस्व सचिव हंसमुख अधिया के मुताबिक, 81 प्रतिशत सामान पर 18 प्रतिशत या उससे कम टैक्स लगेगा। अभी तक ऐसे ज्यादातर सामानों पर 19 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगता था। दूसरा सब्जी, दूध, अंडा, आटा और ऐसे 149 श्रेणी के सामानों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। 149 श्रेणी में आने वाले सारे सामानों को जीएसटी में शून्य कर के दायरे में रखा गया है। फल, सब्जी, अनाज सब इसी श्रेणी में आते हैं। इससे किचन के बजट पर बुरा असर पड़ने वाली आशंका लगभग खत्म हो गई है। चाय की पत्ती, खाने का तेल, कपड़ा और बच्चों के उपयोग के सामान पर 5 प्रतिशत टैक्स रखा गया है। घी, मक्खन, बादाम और फ्रूट जूस पर जीएसटी में 12 प्रतिशत कर लगेगा। जबकि, हेयर ऑयल, टूथपेस्ट, साबुन, आइसक्रीम और प्रिन्टर पर 18 प्रतिशत कर लग रहा है।

जीएसटी को लेकर व्यापारियों की तरफ से विरोध की खबरें आ रही हैं। लेकिन, जीएसटी को लेकर सरकार जिस तरह से तैयार दिख रही है और जितनी पारदर्शिता से सभी सामानों पर लगने वाले जीएसटी के बारे में हर किसी को बता दिया जा रहा है, ऐसा भारत में पहले कभी नहीं हुआ। हां, इतना जरूर है कि भारत में व्यापारियों को अब हर खरीद-बिक्री को पारदर्शी रखना होगा। उस पर कर चुकाना होगा। लम्बे समय से भारत के व्यापारियों को इस तरह से पारदर्शी तरीके से काम करने की आदत नहीं रही है और इसीलिए व्यापारी पहली नजर में इसका विरोध करते दिखते हैं। कुछ जानकार इसे भारतीय जनता पार्टी के सबसे मजबूत आधार मतदाता वर्ग यानी व्यापारी के नाराज होने के तौर पर भी देख रहे हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जितने भी फैसले लिए हैं, वो पहली नजर में लोगों के खिलाफ दिखते हैं। लेकिन, ज्यादातर मामलों में अन्त में लोगों की बेहतरी ही हुई है। और मैं निजी तौर पर मानता हूं कि जीएसटी के मामले में भी ऐसा ही होगा। क्योंकि, जब व्यापारी पर कर चुराकर मुनाफा बढ़ाने के बजाय कर चुकाकर मुनाफा बढ़ाने का आसान रास्ता होगा, तो वो भला कठिन और अपमानजनक रास्ता क्यों चुनेगा। कुल मिलाकर जीएसटी आजाद भारत का सबसे बड़ा सुधार साबित होने जा रहा है। और इसके परिणाम भी सभी के लिए बेहतर होंगे। ग्राहक, व्यापारी, टैक्स विभाग से लेकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी अच्छे दिन लाने वाला दिख रहा है। हर बार प्रधानमंत्री के फैसलों को लेकर विपक्षी इस भरोसे में रहते हैं कि इससे जनता मोदी के खिलाफ होगी लेकिन, हर बार मोदी अपने फैसलों से जनता का भरोसा और ज्यादा जीत लेते हैं। जीएसटी भी ऐसा ही एक फैसला साबित होता दिख रहा है। 
(ये लेख SPMRF के eJournal में छपा है। )

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