Saturday, October 05, 2013

देवालय में आस्था बनी रहे इसके लिए ढेर सारे शौचालय जरूरी


नरेंद्र मोदी इस देश के ऐसे नेता साबित हो रहे हैं जो अपनी मूल अवधारणा के खिलाफ हर रोज धारणा बनाते हैं। और खुद को इस तरह से स्वीकार्य बना चुके हैं कि दूसरे किसी के मुंह से वही बात सुनने पर उनका समर्थक वर्ग जो बवाल मचा देता, उनके मुंह से वैसी ही बात सुनकर पक्ष में बवाल मचा रहा होता है। ताजा मामला है जयराम के Temple पर Toilet की प्राथमिकता और नरेंद्र मोदी के शौचालय से पहले देवालय वाले बयान का। अभी साल भर ही बीता है कि जब जयराम रमेश ने एक कार्यक्रम में ये कहा था कि इस देश को मंदिरों की नहीं टॉयलेट्स की जरूरत है। संदर्भ महिलाओं के स्वास्थ्य सुरक्षा का था। सही बयान था। संदर्भ भी सही था। लेकिन, बड़ा बवाल हो गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने तो जमकर लानत भेजी थी जयराम रमेश को। बीजेपी भी पीछे नहीं थी। बड़े गंभीर स्वर में बीजेपी की ओर से कहा गया कि धार्मिक भावना के साथ इसे जोड़ना गलत है। इससे भावनाएं आहत हुई हैं। इस बार ऐसा ही मिलता जुलता बयान भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तरफ से आया है। जाहिर है भारतीय जनता पार्टी तो ये साहस कर नहीं सकती कि अपने घोषित प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बयान पर उलट बयानबाजी करे। लेकिन, संघ परिवार के दूसरे अहम सदस्य विश्व हिंदू परिषद को भला कौन रोक सकता है। विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने मोदी के बयान को गलत बताया है। तोगड़िया ने कहा कि नरेंद्र मोदी का बयान भौचक्का कर देनेवाला और झटका देने वाला है। अब प्रवीण तोगड़िया नरेंद्र मोदी के घर के बाहर प्रदर्शन करने का साहस तो नहीं जुटा सकते हैं। जो विश्व हिंदू परिषद ने तब जुटाया था जब जयराम रमेश ने कहा था कि महिलाओं के लिए मंदिर की जगह टॉयलेट जरूरी है।

डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया वाली विश्व हिंदू परिषद का नरेंद्र मोदी से विरोध जगजाहिर है। और बड़ी मुश्किल से अशोक सिंघल के तगड़े हस्तक्षेप के बाद प्रवीण तोगड़िया ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोध का स्वर बंद किया था। दरअसल तोगड़िया और मोदी का संघर्ष गुजरात से ही चल रहा है। जहां नरेंद्र मोदी ने गवर्नेंस पर विश्व हिंदू परिषद की तय मान्यताओं की परवाह नहीं की। नरेंद्र मोदी अब इसका उदाहरण भी देते हैं। नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में इस बात को सीना ठोंककर बताया था कि अहमदाबाद नगर निगम चुनाव के ठीक पहले उनके सामने कितना बड़ा धर्म संकट खड़ा हो गया था। वो धर्मसंकट था अहमदाबाद की सड़कों पर जहां तहां रास्ता अवरुद्ध करते देवालयों का। इसमें सभी धर्मस्थान शामिल थे। जाहिर सबसे ज्यादा हिंदू और मुस्लिम धर्म स्थान यानी मंदिर और मस्जिद। मोदी ने बताया कि निगम के चुनाव स्थानीय मुद्दों, भावनाओं पर होते हैं इसलिए पूरी पार्टी और संघ परिवार किसी भी कीमत पर धर्म स्थानों का अतिक्रमण हटाने के पक्ष में नहीं था। नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने फैसला लिया और सारे अवैध रूप से बने धर्म स्थानों को भी दूसरे मकानों, दुकानों की तरह तोड़वाया और जनता ने उनके फैसले को समझा और अप्रत्याशित रूप से भारतीय जनता पार्टी को अहमदाबाद नगर निगम में शानदार सफलता मिली। डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया वाली विश्व हिंदू परिषद ने तब भी मोदी का जमकर विरोध किया था। पार्टी के अंदर भी विरोध के स्वर उठे थे लेकिन, परिणाम आने के बाद विरोध के स्वर गायब हो गए। यही मोदी की असल ताकत है। और ये ताकत इतनी बड़ी हो चुकी है कि घोर हिंदुत्ववादी छवि के कारण मोदी के समर्थन में खड़ा रहने वाला मोदी समर्थक देवालय से पहले शौचालय के मोदी के बयान पर भी मोदी का साथ नहीं छोड़ता और न ही अहमदाबाद में अतिक्रमण कर रहे मंदिरों के ध्वस्त होने पर। नरेंद्र मोदी की यही क्षमता उन्हें अपनी पार्टी में लालकृष्ण आडवाणी से बहुत बड़ा नेता बनाती है और भारतीय राजनीति में भी दूसरे सभी नेताओं से बड़ा बना देती है।।

ऐसी क्षमता कुछ हद तक इंदिरा गांधी में थी। जो कांग्रेस के तब के फैसलों को पलट देतीं थी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ देश की जनता भी उनके समर्थन में रहती थी। शौचालय से पहले देवालय के नरेंद्र मोदी के बयान पर जयराम रमेश सामने आए और उन्होंने कहाकि काश मोदी को बीस साल पहले ये बात समझ में आती जब कांशीराम ने यही कहा था। जयराम रमेश यहीं मात खा जाते हैं। अयोध्या में राम मंदिर बनाने का बयान न देकर मोदी भले ही कट्टर हिंदूवादी छवि से खुद को बचाएं लेकिन, वो धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए अयोध्या में शौचालय बनाने जैसा कांशीराम का बयान भी नहीं दे सकते। गोधरा की प्रतिक्रिया में हुए गुजरात के दंगे हुए और उस वक्त नरेंद्र मोदी की सरकार पर उसे सही से न संभालने के आरोप लगे। इसके अलावा नरेंद्र मोदी ने कोई भी ऐसा कृत्य नहीं किया जिससे उन्हें विश्व हिंदू परिषद के डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया या फिर बीजेपी के ही दूसरे हिंदुत्व फायर ब्रांड छवि वाले नेता के आसपास ले जाकर खड़ा करे। लेकिन, मोदी इस मामले में स्पष्ट हैं कि देश में वो हिंदुओं के मंदिर अगर अतिक्रमण की वजह से तोड़वा सकते हैं तो संविधान का अतिक्रमण करने पर अल्पसंख्यकों (खासकर मुस्लिम पढ़ें) का भी तुष्टीकरण नहीं करेंगे। यही स्पष्टता उनके समर्थकों को और मजबूत करती है। सिर्फ बीजेपी का कैडर वोट नहीं। खांटी संघी वोटर जो बीजेपी से दूरी बनाकर सो रहा था वो भी और जो बस देश की तरक्की होते देखना चाहता है वो भी- ये दोनों तरह के वोटर इस समय नरेंद्र मोदी के प्रबल समर्थक बने हुए हैं। अच्छी-बुरी जैसी भी है सोशल मीडिया देश की असल तस्वीर पेश करता है। पारंपरिक मीडिया की तरह संपादक की कैंची से काटी छांटी नहीं। सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी के शौचालय से पहले देवालय बयान पर एक समर्थक की सफाई पढ़ी। नरेंद्र मोदी ने आखिर क्या गलत कहा है – मंदिर जाने से पहले साफ-सफाई तो जरूरी है। मंदिर क्या बिना शौच-स्नान के जा सकते हैं। ये नरेंद्र मोदी का समर्थक वर्ग है जो खांटी हिंदूवादी दिखता है, जो खांटी गवर्नेंस पसंद है, जो खांटी नौजवान है जिसे अपने जेब में सलीक से रकम आने की चिंता है, जो खांटी कांग्रेस विरोधी है, जो खांटी नेता चाहता है। ऐसा नेता जो कहता है वो करता है। ऐसा नेता जो करता है वो दिखता है। ऐसा नेता जो दिखता है वही होता है। और देश को ऐसे नेता की सख्त जरूरत है क्योंकि, लचर नेतृत्व से देश का नौजवान बुरी तरह नाराज है। इसीलिए वो नरेंद्र मोदी से किसी ड्रामे, नौटंकी की भी उम्मीद नहीं करता। और इसीलिए ये आशंका भी नरेंद्र मोदी के समर्थकों को डराती नहीं है कि मोदी आएगा तो तानाशाही आ जाएगी। वो जानता है कि तानाशाही भी आएगी तो देश हित के लिए आएगी। देश के लोगों के हित के लिए आएगी।

Tuesday, October 01, 2013

अमेरिका पर लगा ताला! लेकिन, दुकानदारी चालू


रिपब्लिकन वेबसाइट पर ओबामा की हेल्थकेयर योजना का विरोध
अमेरिका बंद है। चौंकाने वाली बात है कि ये कैसे हो सकता है। दुनिया जिस एक देश के इशारे पर चलती है। जिस एक देश के बारे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ये सोचते हैं कि उसके मुखिया से शिकायत लगाकर भारतीय प्रधानमंत्री अपने पक्ष की बात मजबूत कर लेंगे। जिस एक देश की अपनी समस्याएं भले खत्म न हों लेकिन, कश्मीर सुलझाने के लिए वो आगे आ जाता है। जिस देश के बैंकिंग सिस्टम के दिवालियेपन से दुनिया एक बार बर्बाद हो चुकी है बड़ी मुश्किल से पटरी पर आ रही है। जिस अमेरिका के सुधरने से भारत जैसा देश भी अपनी अर्थव्यवस्था सुधरने का अनुमान लगाए बैठा है। उस अमेरिका में ताला कैसे लग सकता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि वहां ताला लग गया है। अमेरिका को ताला कैसे लग सकता है। दरअसल अमेरिका के 8 लाख फेडरल कर्मचारी (भारतीय संदर्भ में समझें तो केंद्रीय सरकार के कर्मचारी) छुट्टी पर भेज दिए गए हैं। और कम से कम एक अक्टूबर यानी आज की तनख्वाह तो नहीं पाने वाले। अब आज रात किसी तरह अमेरिका की इज्जत बचाने के लिए कोई समझौता रिपब्लिकन और डेमोक्रैट के बीच हो जाए तो बात अलग।

वैसे तो अमेरिका जिस राह पर था उसका इस हाल में पहुंचना तय था। अमेरिकी भी काफी समय से ये मानने लगे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है। लेकिन, अभी जो अमेरिकी बंदी की वजह बनी है वो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की निजी इच्छा है। निजी इच्छा मतलब ओबामा ने 2010 में एक हेल्थकेयर कार्यक्रम लागू किया था जिसे एक अक्टूबर यानी आज के दिन से लागू होना था। सारी लड़ाई उसी की है। इसके लिए फंड का भी प्रावधान कर दिया है वहां की सीनेट (संसद) ने। ये उसी तरह से समझिए कि जैसे सोनिया गांधी के निजी सुरक्षा बिल को आनन फानन में पहले अध्यादेश और फिर कानून बनाकर संसद से पास कर दिया गया। चालू खाते का घाटा पहले तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान 4.9% का पार कर गया है। लेकिन, सोनिया गांधी की निजी इच्छा वाली खाद्य सुरक्षा योजना लागू हो गई है। हालांकि, वो धीरे-धीरे लागू होगी। चुनावी राज्यों यानी दिल्ली से इसकी शुरुआत हुई है और 2014 के चुनाव जीतने भर की वोट सुरक्षा योजना बन गई है। ठीक इसी तरह बराक ओबामा ने अमेरिकियों के लिए हेल्थकेयर योजना शुरू की है। अब अमेरिका पहले ही कर्ज के बोझ में बुरी तरह डूबा हुआ है। उस पर ये हेल्थकेयर योजना का खर्च मुसीबत बन गया है। इससे पहले भी कर्ज की सीमा बढ़ाने को लेकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था खतरनाक संकट से जूझ चुकी है। अमेरिकी कांग्रेस ने अभी कर्ज लेने की अधिकतम सीमा $16.7 ट्रिलियन तय कर रखी है। अब अगर ये सीमा नहीं बढ़ाई जाती है तो सरकार खर्च चलाने के लिए भी रकम का जुगाड़ मुश्किल से कर पाएगी। लेकिन, मुसलमानों से लड़ता अमेरिका दुनिया का नेता बना हुआ है। और मुसलमान हैं कि ये समझने को तैयार नहीं। पता नहीं किससे हर रोज हर जगह लड़ रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गड़बड़ी को मौके के तौर पर सिर्फ चीन देख रहा है। उसी तरह से कर भी रहा है। जब अमेरिकी एक अक्टूबर से फेडरल कर्मचारियों की बिना वेतन की छुट्टी से डरे हैं तो उसी एक अक्टूबर से चीन में हफ्ते भर की राष्ट्रीय छुट्टी जैसी शुरू हो रही है। जिसमें चीनी जमकर मस्ती करेंगे, खरीदारी करेंगे और अर्थव्यवस्था छुट्टी में भी बेहतर करेंगे।

इस हालात में भी अमेरिकी दादागीरी चालू है। दुकानदारी चालू है। अमेरिकी राष्ट्रपति का फोन कर लेना ईरान में खलबली मचा देता है। अमेरिका अभी भी संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए सब तय करता है। अभी भी अमेरिका का वीजा भारत के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करने वाले नरेंद्र मोदी के लिए महत्व रखता है। और अभी भी अमरिका परस्त होना मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्थिर रखने लायक बनाता है। और रघुराम राजन अमेरिकी होकर दिखकर अच्छे से रुपये को गिरने से रोक लेते हैं। अमेरिका धड़धड़ाकर गिर रहा है। भारत समझ नहीं पा रहा है कि हम कैसा देश बनें। लेकिन, जिनके जिम्मे समझने का काम यानी सरकार है उसकी चले तो भारत अमेरिका के रास्ते पर चलना चाहता है। अमेरिका बनना चाहता है।

आखिर में रिपब्लिकन को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का ये ट्वीट 
“The Affordable Care Act is moving forward. You can’t shut it down.” —President Obama #Obamacare

Monday, September 30, 2013

हे राजन ये तुमने क्या किया !



स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन प्रतीप चौधरी की मानें तो १५ जुलाई को जो फैसला उन्हें लेना था वो उन्होंने १५ सितंबर के बाद किया। यानी पूरे दो महीने इंतजार करने के बाद देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रतीप चौधरी किस बात का इंतजार कर रहे थे। हमारी समझ ये कहती है कि प्रतीप चौधरी को इंतजार था कि डी सुब्बाराव के जाने के बाद नया गवर्नर जो आएगा वो शायद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के फोकस का एजेंडा बदलेगा। क्योंकि, जो बातें नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में चर्चा में थीं वो ये कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ग्रोथ पर फोकस करना चाहते हैं जबकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव सरकार के इशारे के बाद भी ब्याज दरों में कटौती करने या कटौती करने के संकेत देने तक को तैयार नहीं हैं। ये लगभग तय था कि जब चार सितंबर को डी सुब्बाराव की गवर्नर पद से विदाई होगी तो, कोई ऐसा व्यक्ति ही पद संभालेगा जो वित्त मंत्रालय के सुर के साथ ताल मिला सके। यानी ब्याज दरें कम करके तरक्की की रफ्तार बढ़ाने पर फोकस कर सके। क्योंकि, चुनावी साल में महंगाई को फोकस बताने वाला रिजर्व बैंक अभी की सरकार की संभावनाओं को धूमिल करेगा। इसीलिए अनुमानों के मुताबिक पहले से ही सरकार के सुर के साथ ताल मिलाने का अभ्यास कर चुके रघुराम राजन को रिजर्व बैंक का काम सौंपा गया।

प्रभावशाली, सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी रघुराम राजन ने डी सुब्बाराव की जगह ली तो सबको लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। काफी हद तक ठीक भी हुआ। चार सितंबर को रघुराम राजन ने दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक के वित्त मंत्रालय के सलाहकार वाला पद छोड़कर मुंबई के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर का पद क्या संभाला कमजोर हुआ रुपया भी ताल ठोंकने लगा। दे दनादन बाजार में भी तेजी के सारे संकेत मिलने लगे। अठारह हजार के आसपास लहरा रहा सेंसेक्स तेजी से बीस हजार के पार चला गया। लग रहा था कि रुपया सत्तर के पार अब गया कि तब गया लेकिन रघुराम राजन के साथ से रुपये ने तेजी से मजबूती हासिल की और डॉलर के मुकाबले करीब दस रुपये तक चढ़ गया। रुपये की लीकेज यानी जहां जहां डॉलर लेने के लिए रुपया देने वाली स्थितियां थीं उनको कम करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे। लगे हाथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भी अच्छी खबरें आने लगीं। रुपया मजबूत हो रहा था और कच्चा तेल भी धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा था। रघुराम राजन के गवर्नर का पद संभालने के ठीक एक दिन पहले जो कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल के ऊपर था वो एक सौ सात डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। लेकिन, दबे छिपे एक गड़बड़ हो रही थी। वो गड़बड़ ये थी कि बैंकों के कर्ज धीरे से महंगे हो रहे थे। एक सुबह मुझे भी झटका लगा जब मेरे बीस साल यानी दो सौ चालीस महीने के कर्ज की सीमा मेरे निजी बैंक ने बढ़ाकर दो सौ पचपन महीने यानी इक्कीस साल से ज्यादा कर दी। असल खतरा यही था। और सरकार की सामाजिक वोट बैंक की जरूरत पूरी करने के लिए निजी बैंक भला क्यों इंतजार करते। लेकिन, सरकारी बैंक के नाम में ही सरकार है तो वो इंतजार कर रहे थे। यही वो इंतजार था जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रमुख प्रतीप चौधरी कर रहे थे। उनको लग रहा था कि बीस सितंबर की रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी में कम से कम चौथाई प्रतिशत की कमी तो होगी ही। लेकिन, रघुराम राजन की नीति से शॉर्ट टर्म में रुपया बाजार भले खुश हुआ। राजन का इरादा लंबे समय के लिए कर्ज लेने वाले भारतीयों को खुश करने का कतई नहीं थी। इसीलिए राजन ने जब ये संकेत दिए कि कड़वी दवा भी पीनी पड़ेगी तो मिडटर्म रिव्यू के ठीक एक दिन पहले ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। निजी बैंक तो पहले ही ये काम कर चुके थे। यानी महंगे कर्ज का दौर अभी लंबा चलेगा इसके लिए भारतीयों को तैयार रहना होगा।

महंगाई का दौर जारी रहेगा। इसके लिए सिर्फ बैंकों का कर्ज जिम्मेदार नहीं है। हमारी-आपकी हर तरह की महंगाई बढ़ रही है। खाना सबसे महंगा हो रहा है। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं ये खबरें मीडिया में आने के तुरंत बाद ही बिचौलयों ने मोर्चा संभाल लिया। नासिक से लेकर दिल्ली तक हर जगह प्याज की कमी थी। और कमी की खबरों के साथ तेजी से बढ़ रही प्याज की कीमतों की भी खबर थी। इसने साहसी रघुराम राजन के सारे साहस की हवा निकाल दी। महंगाई से तरक्की पर फोकस ले जाने की बात करने वाले रघुराम राजन भी महंगाई को बैंक की प्राथमिकता में ले आए। प्याज की हॉरर स्टोरी ने उनके अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर दिया। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ गए। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आने से हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।  क्योंकि, अगस्त के भाव सितंबर में भी भाव बढ़ा चुके हैं। सितंबर की भी महंगाई दर अब घटेगी नहीं। फिर त्यौहारों के सीजन में तो हम भारतीय कर्ज लेकर भी मस्त रहते हैं। रघुराम राजन के पास अच्छा मौका था। रुपया काबू में था। बाजार भरोसे में दिख रहा था। जिनकी छींक से हमारे बाजार को निमोनिया हो जाता है वो, अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अच्छी बातें कर गया था। सेंसेक्स इक्कीस हजार की दिशा में जा रहा था। लेकिन, रघुराम राजन ने इस अच्छे मौके को बेकार कर दिया। दो हजार अंकों से ज्यादा चढ़े सेंसेक्स ने फिर उल्टी दिशा पकड़ ली है। रघुराम राजन का पहला दिन जितना एतिहासिक इस मामले में रहा कि तेजी से सब सुधरता दिख रहा है। रघुराम राजन की पहली मौद्रिक नीति का एलानठीक इसके उलट दिशा में जा रहा है कि अभी सब बिगड़ा ही रहेगा। वैसे भी पॉलिसी ही कह रही है कि महंगाई अनुमान से ज्यादा ही रहेगा। अब सारा कुछ दारोमदार इस साल की दूसरी छमाही में बुनियादी परियोजनाओं को कितनी तेजी मिली इस पर निर्भर होगा। लेकिन रघुराम राजन के रेपो रेट बढ़ाने के फैसले पर देश यही कह रहा है कि हे राजन ये तुमने क्या किया।


Friday, September 27, 2013

आमदार, खासदार, मंत्री तो मरेगा नहीं?

अभी ताजा रिपोर्ट आई है डॉक्टर रघुराम राजन की। नए तरीके से इस रिपोर्ट में राज्यो के आर्थिक हालात को समझा गया है। जब रघुराम राजन वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे तब सरकार ने इनको ये महत्वपूर्ण काम सौंपा था। 26 सितंबर को ये रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को सौंप दी गई है। इसमें प्रति व्यक्ति उपभोग, अमीरी-गरीबी अनुपात और दूसरे सामाजिक-आर्थिक मानकों पर राज्यों की दशा दिशा कैसी है ये बताया गया है। चौंकाने वाली बात ये है कि इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र तो Relatively Developed श्रेणी में है। लेकिन, गुजरात Less Developed श्रेणी में है। इसके राजनीतिक मायने भी देखे जा रहे हैं। क्योंकि, Least Developed राज्यों में उड़ीसा, बिहार के बाद सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की है। सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। कमाल ये है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी गुजरात को Less Developed और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ को Least Developed रखने से दुखी होंगे। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अतिप्रसन्न हैं कि उनका राज्य अतिपिछड़ा है। अब वहां की जनता सोचे जो इसीलिए नीतीश का गुणगान करने लगी थी कि लालू राज से अतिपिछड़े के ठप्पे को नीतीश राज में बदलाव का मौका मिला। लेकिन, नीतीश तो अतिपिछड़े कहे जाने से खुश हैं कि अब केंद्र से ज्यादा रकम मिलेगी।

दरअसल डॉक्टर रघुराम राजन की ये रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को प्रस्ताव है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना में राज्यों को धन इसी आधार पर मिले। हालांकि, अभी इस रिपोर्ट को पूरी तरह से माना जाएगा या टुकड़ों में ये तय होना बाकी है। सरकार इस पर फैसला करेगी। लेकिन, इस रिपोर्ट के आधार पर Relatively Developed श्रेणी वाले महाराष्ट्र के सबसे चमकते शहर मुंबई में चार साल रहा हूं। और मुंबई की मस्त मिजाजी है कि बुनियादी सुविधाओं की बात कम ही होती है। जबकि, सच्चाई यही है कि अभी भी बुनियादी सुविधाओं के मामले में मुंबई बहुत पीछे है। हां, यहां बड़ा पैसा है। माया है। इसलिए सब मस्त रहते हैं। लेकिन, मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे से पुणे तक जाकर आप भले ही महाराष्ट्र को Relatively Developed श्रेणी में रखने का साहस कर पाएं। लेकिन, अगर गलती से विदर्भ की ओर जाएं तो हकीकत समझ में आ जाती है। अभी फिर से महाराष्ट्र के इस आत्महत्या वाले इलाके की तरफ जाने का मौका मिला। नागपुर मस्त शहर है। यहां तक तो हवाई जहाज भी जाते हैं और राजधानी भी। लेकिन, हमें थोड़ा और आगे जाना था। वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय तक। बैंगलोर राजधानी से नागपुर तक पहुंचने के बाद यात्रा कार से होनी थी। डॉकटर रघुराम राजन के Relatively Developed श्रेणी वाले राज्य महाराष्ट्र के Least Developed क्षेत्र से गुजरा। नागपुर से वर्धा करीब सत्तर किलोमीटर है। इसी रास्ते पर आगे यवतमाल, नांदेड़ के भी तीर दिख रहे थे। मतलब आगे यही रास्ता उन जगहों पर भी जाता है। सत्तर किलोमीटर की दूरी हमने अनुमान लगाया अधिकतम डेढ़ घंटे। ड्राइवर ने कहा- सर दो घंटे लग जाएगा। नागपुर से दस पंद्रह किलोमीटर बाहर निकलते ही ड्राइवर की बात सही लगने लगी।

थोड़ा ही चलने पर एक वैगन आर दुर्घटनाग्रस्त मिली। ड्राइवर ने स्थानीय लहजे में पूछा। बताया कि 5 मिनट पहले ही दुर्घटना हुई है। फिर बड़े कड़वे बोला। पता नहीं क्यूं आमदार, खासदार, मंत्री कभी नहीं मरता। ये सुनने में बुरा लगा कि ड्राइवर विधायक, सांसद औऱ मंत्रियों के मरने की कामना कर रहा है। लेकिन, यही जनभावना है। क्यों वो ऐसा चाह रहा था इसकी वजह भी अगली लाइन में मिल गई। आगे पीछे पुलिस वाला गाड़ी रहता है तो वो क्यों मरेगा। लेकिन, हम लोगों के तो रोज मरने का खतरा रहता है। ये समाज के तंत्र से समाज के आम आदमी की चिढ़ थी। वही आम आदमी या महात्मा गांधी वाला लाइन में खड़ा आखिरी आदमी टाइप। महात्मा गांधी इसलिए भी ज्यादा याद आ रहे हैं कि मैं वर्धा ही जा रहा था। उनके नाम पर बने विश्वविद्यालय और वर्धा में ही वो सेवाग्राम आश्रम है जहां गांधी जी ने काफी समय बिताया था।

नागपुर से वर्धा और फिर आगे नांदेड़, यवतमाल जाने वाले इस रास्ते पर जबरदस्त यातायात है। लेकिन, सड़क दोहरी भी नहीं है। बस एक रास्ता जाने के लिए, एक आने के लिए। और, तेज रफ्तार में जब ये बड़े-बड़े ट्रक बगल से गुजरते हैं तो अहसास बस यही कि यमराज बस इस बार छोड़ गए। इसके अलावा सड़क पर इतने बढ़िया से बने गड्ढे मिलेंगे कि सड़क खोजने में गाड़ी कभी भी बगल के खेत में चली जाए। इन विशालकाय ट्रकों के अलावा वही हर राज्य में पाई जाने वाली राज्य परिवहन की बसें सूखी उल्टी के निशान के साथ तेजी से निकलती जा रहीं थीं। अब मेरी समझ में ये नहीं आता कि ये डॉक्टर रघुराम राजन की रिपोर्ट में महाराष्ट्र Relatively Developed कैसे हो गया। क्या सिर्फ मुंबई, नागपुर और पुणे पर ये रिपोर्ट बनी है।

नागपुर से वर्धा के कष्टप्रद रास्ते पर टोल बूथ
और ये आगे भी ऐसे ही Relatively Developed रहेगा क्योंकि, डॉक्टर रघुराम राजन की रिपोर्ट अगर पूरी तरह मान ली गई तो आगे यानी 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस इलाके के लिए धन नहीं आएगा। क्योंकि, डॉक्टर राजन यही कह रहे हैं कि इसी आधार पर सबको फंड दो। आर्थिक मोर्चे पर सरकार के लिए संकटमोचक बने राजन की ये रिपोर्ट यूपीए-2 को राजनीतिक राहत भी दे रही है। भले राज्यों के विकास का गणित इससे पूरी तरह गड़बड़ा जाए। समझ में ही नहीं आता कि योजनाओं की प्राथमिकता कैसे तय होती है। जितना ट्रैफिक बड़ी-छोटी गाड़ियों का इस रास्ते पर है वो साफ दिखाता है कि यहां रकम लगाने की जरूरत है। और कोढ़ में खाज ये कि इस बेहद कष्टप्रद रास्ते पर चमकीले हाईवेज पर दिखने वाले टोलबूथ भी है। 27 रुपया एक तरफ का। दोनों तरफ का एक साथ 40 रुपये में। ये है भारत निर्माण।

Thursday, September 26, 2013

वर्धा में जेएनयू !

महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा दूसरी बार जाना हुआ। करीब दो साल पहले पहली बार वर्धा जाना हुआ था। नागपुर से वर्धा पिछली बार रेलमार्ग से ही गए थे। इस बार सड़क के रास्ते गए। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। लेकिन, इस पोस्ट में बात सिर्फ वर्धा की। वर्धा वैसे तो महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इसकी प्रसिद्धि में एक और वजह जुड़ गई है महात्मा गांधी गांधी के नाम पर बना अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। दुनिया में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ये केंद्रीय विश्वविद्यालय बना है। जैसा मुझे पता है कि करीब चालीस करोड़ रुपए का बजट है। जब दो साल पहले हम यहां सोशल मीडिया पर बात करने के लिए गए थे तो विषय था- हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता। जाहिर है जब ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया है तो किसी तरह की आचार संहिता की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। सिवाय स्वनियंत्रण के। लेकिन, कुछ बातें तय हुईं। उस समय हम लोगों को फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में रुकने का अवसर मिला था। क्योंकि, तब विश्वविद्यालय के पास और कोई बेहतर जगह नहीं थी। ये छात्रावास विदेशी छात्रों के लिए है जो यहां रहकर हिंदी पर परास्नातक या शोध की पढ़ाई करना चाहते हैं।

2 साल पहले की तस्वीर पीछे छात्रावास बनने के क्रम में
विश्वविद्यालय तब बनने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ रहा था। पहाड़ियों पर बसे इस विश्वविद्यालय में जिस तरह से प्रशासनिक भवन, छात्रावास, सभागार बना था। वो काफी खींचने वाला था। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास से मुख्य द्वार की तरह जाएं तो दाहिने मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बना रास्ता गांधी हिल्स की तरफ ले जाता है। गांधी हिल्स चढ़ने से पहले बाएं नजर डालेंगे तो नजीर हाट नजर आएगी। दो साल पहले  नजीर अकबराबादी के नाम पर बनी नजीर हाट नहीं थी। रही भी होगी तो, बस शुरुआत हुई थी। इस बार वो काफी व्यवस्थित बनी थी। उसमें हर जरूरत के सामान की दुकान थी। और, हिंदी में लिखे नाम आकर्षित करते हैं। एक दुकान पर कुंतल लिखा देखकर मैं भी सोच में पड़ गया कि ये किस काम की दुकान है। बाद में पूछकर समझा कि ये नाई की दुकान है। वहीं पर भरे पूरे दूध वाली कॉफी स्टील के बड़े मग जैसे कप में निपटाई गई।

मुंशी प्रेमचंद मार्ग घुमाव लेते हुए ऊपर चढ़ता है तो गांधी हिल्स पर पहुंचता है। अच्छा पार्क है। यहां गांधी जी की प्रतीक वस्तुओं से सजा पार्क बना हुआ है। ये सब दो साल पहले भी था। पार्क के द्वार पर ही लिखा है कि कृपया जूते-चप्पल उतारकर अंदर जाएं। हालांकि, सीमेंटेड खुरदुरी जमीन होने से ज्यादातर लोग (खासकर नियमित आने वाले छात्र) तो जूते चप्पल पहने ही अंदर आते हैं। हमने लिखे को पढ़ा, पढ़कर पालन किया। जूते-चप्पल उतार दिए।
हम ऐसे समय पहुंचे थे कि शाम धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। दोनों तस्वीरें गांधी हिल की खूबसूरती बयां करती हैं। गांधी जी की प्रतीक झोपड़ी, गांधी जी का चश्मा, तीनों बंदर और दूसरी प्रतीक वस्तुएं भी बड़े सलीके से सजाई गई हैं। शाम गहराने लगी तो पार्क में लगे लैंप भी जल गए। हालांकि, तब तक शाम से रात नहीं हुई थी। लेकिन, इस गहरी शाम में जो चित्र आया वो भी अच्छा दृष्य पैदा कर रहा है ।


इस बार भी वर्धा में मिले हिंदयुग्म वाले शैलेष भारतवासी ने कहा कि कोई हिमांशु हैं यहीं शोध कर रहे हैं। उनसे मिलने का प्रयास काफी देर बाद सफल हुआ। क्योंकि, शैलेष उनके लखनऊ के नंबर पर प्रयासरत थे। काफी प्रयास के बाद हम मिले तो पता चला कि वहां का एक स्थानीय मोबाइल नंबर भी है। लेकिन, लखनऊ वाला नंबर जिंदा रखे हुए हैं। हम लोग नजीर हाट में मिले। उसके बाद मुख्य द्वार के बाहर की चाय की दुकान पर चर्चा चकल्लस का क्रम बढ़ा। टीन के डिब्बे चाय की दुकान पर बेंच कुर्सी की शक्ल में मिले। बैठे तो उन्होंने ये अहसास नहीं होने दिया कि वो असल में क्या हैं। हिमांशु नवल किशोर प्रेस के राष्ट्रीय चेतना में योगदान पर शोध कर रहे हैं। उर्दू भी सीख रहे हैं जो शोध के लिए जरूरी है। हिमांशु तहलका के लिए लिखते रहे हैं। इस चाय की दुकान से और हबीब तनवीर सभागार तक एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती रही कि यहां के बच्चे जाग रहे हैं। चेतना जागृत है। और इतनी कि जो ब्लॉगर साथी गए थे उनकी चेतना भी जगा रहे थे। इसीलिए किसी भी विश्वविद्यालय केंद्र पर जाना मुझे बहुत खींचता है। पता चला कि अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अलग-अलग विषयों पर पढ़ने शोध के काम में एक हजार से ज्यादा छात्र हो गए हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय छात्रों की उपस्थिति अभी कम है। इस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुलपति विभूति नारायण राय को काम करने की जरूरत है।

वैसे विभूति नारायण राय इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि 2 साल में ही उन्होंने विश्वविद्यालय का कायाकल्प कर दिया है। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में इस बार हम लोगों को छात्रों के कमरे घेरने की जरूरत नहीं पड़ी। हमें नई बनी नागार्जुन सराय में रुकाया गया। किसी होटल के कमरे जैसे अतिथि कक्ष थे। बाहर से एक तस्वीर ली थी वही यहां लगा रहा हूं। वहां विनोद कुमार शुक्ल जी से भी मुलाकात हुई। हम लोग जब सोशल मीडिया पर बात करने पहुंचे थे उसके ठीक पहले दुनिया भर के कवियों का जमावड़ा हुआ था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही ढेर सारे मेरी पहचान में न आ पाने वाले कवियों की तस्वीरें चिपकी थीं। हालांकि, न पहचान का दोष मेरा है। क्योंकि, कविता और कवियों से मेरा वास्ता कम ही है।

तस्वीर में वो बात नहीं काफी बेहतर प्रस्तुति
हम लोगों की संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। और ये भी समझ में आया कि विश्वविद्यालय के छात्रों की रचनात्मकता जिंदा है। आकार प्रकार भी इस विश्वविद्यालय का पहाड़ियों पर बसे होने की वजह से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तरह है। और, काफी कुछ गतिविधियां भी। हालांकि, JNU दिल्ली में है। और लंबे समय से विशुद्ध वामपंथ का जमावड़ा रहा है। वैसे अच्छा ये होगा कि सिर्फ वामपंथ का जमावड़ा बनकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय न रह जाए। जवानी में जितना वामपंथ हर किसी में होता है उतना तो जरूरी है। लेकिन इसे छोड़ भी दें तो और मामलों में भी वर्धा जेएनयू बनने की पूरी संभावना रखता है। इसका बड़ा श्रेय कुलपति विभूति नारायण राय को जाता है जो गालियां खाकर भी सोशल मीडिया वालों को बुलाने से बाज नहीं आते।  दो साहसी कदम कुलपति विभूति नारायण राय को और उठाने चाहिए। पहला रात दस बजे की छात्राओं पर पाबंदी हटाने की और दूसरा विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की शुरुआत करने की। उम्मीद करें कि एक और बेहतर विश्वविद्यालय तैयार होगा। 

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  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...