Wednesday, October 14, 2015

प्रीमियम- संसद मार्ग या नई दिल्ली रेलवे स्टेशन?

प्रीमियम पार्किंग के नाम पर मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लूटा गया। कल्पना कीजिए कि आप कार पार्क करके सिर्फ दो दिनों के लिए कहीं बाहर जाएं। लौटने पर पता चले कि पार्किंग भुगतान 4200 रुपये करना है। अब इससे ज्यादा बड़ी लूट क्या होगी। पता नहीं किस रेलवे के अधिकारी ने ये प्रीमियम पार्किंग का सुझाव सरकार को दिया। और सरकारें इसे जस का तस लागू किए हैं। मैंने दिल्ली की दूसरी प्रीमियम जगहों की पार्किंग का पता लगाया। संसद मार्ग से ज्यादा प्रीमियम इलाका दिल्ली में कोई क्या होगा। वहां NDMC की पार्किंग है। पार्किंग का बोर्ड साफ-साफ बता रहा है कि 20 रुपया प्रति घंटे का पार्किंग चार्ज है। और सुबह 6 बजे से रात 12 बजे तक के लिए कोई कार खड़ी करता है, तो उसे 100 रुपये अधिकतम ही देने होंगे। पूरे महीने कोई इस पार्किंग में कार खड़ी करना चाहता है, तो भी उसको 2000 रुपये का ही भुगतान करना होगा।
और, सोचिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर प्रीमियम के नाम पर 100 रुपये प्रति घंटा लिया जा रहा है। जबकि, संसद मार्ग पर 100 रुपया पूरे दिन का है। इससे बड़ी लूट क्या होगी। पूरीघटना यहां पढ़ें 

Monday, October 12, 2015

पार्किंग के नाम पर भारतीय रेल की खुली लूट

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पार्किंग का बिल
मुझे नहीं पता कि इस पर रेल मंत्री सुरेश प्रभु @sureshpprabhu और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा  @manojsinhabjp कुछ करेंगे या नहीं करेंगे। कोशिश करूंगा इन लोगों से मिलकर भी ये बताने की। फिलहाल अभी आप लोगों से साझा कर रहा हूं। एक तो सबको ये पता हो इसके लिए। और दूसरा जितने ज्यादा लोग इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर सकें, उसके लिए। मीडिया चौपाल में शामिल होने 10 अक्टूबर की सुबह भोपाल शताब्दी से ग्वालियर जाना था। और 11 की रात भोपाल शताब्दी से ही वापसी थी। मैंने सोचा टैक्सी से स्टेशन जाने से बेहतर है कि खुद की कार से चला जाए और स्टेशन पर ही कार खड़ी कर दी जाए। सुबह 5 बजे मेट्रो भी नहीं मिलती। सो अपनी कार से ही चला गया और स्टेशन पर एक प्रीमियम पार्किंग है। उसी में खड़ी कर दी। 100 रुपये उसका चार्ज है। सोचा अधिकतम कितना लगेगा। खैर, मेरी गलती ये कि न मैंने पर्ची देखी और न ही पूछा। गाड़ी लगाई। सीधे ट्रेन की ओर। दो दिन तो ग्वालियर की मीडिया चौपाल में इसका ख्याल भी नहीं रहा। जब वापस की, तो एक बार ध्यान में आया कि पर्ची देख लें। पर्ची देखी, तो होश उड़ गए। पहले दो घंटे के 100 रुपये, उसके बाद के हर घंटे के लिए 100 रुपये। अपना पर्स देखा, तो कुल जमा करीब ढाई हजार रुपया।

नोएडा में कई लोगों से कार्ड छीनकर जबर्दस्ती एटीएम से पैसे निककलाने की घटनाओं के बाद मैंने कार्ड रखना बंद कर दिया है। भली बात ये थी कि ग्वालियर से हम ढेर सारे लोग लौट रहे थे। इसलिए पैसे दूसरे से ले लिए। लेकिन, फिर भी लगा कि ये तो सीधी लूट है। खैर, पार्किंग में आए। पूछने पर पता चला कि 4200 रुपये पार्किंग के देने होंगे। शताब्दी समय पर आ जाती, तो 100 रुपये कम हो जाते। लेकिन, शताब्दी की करीब 25 मिनट की देरी ने मेरे पार्किंग बिल में 100 रुपये और जोड़ दिए। पार्किंग वसूल रहे लोगों से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने हाथ जोड़ लिया। साहब हम तो खुद ही 400 रुपये में 12 घंटे काम करते हैं। एक रुपया भी छोड़ा, तो वो हमारी जेब से जाएगा। मैंने कहा- किसी जिम्मेदार से बात कराओ। उसने कहा इतनी रात में किससे बात होगी। खैर, अपने पत्रकार होने का हवाला देते हुए जब मैंने कहाकि किसी से तो बात करानी ही होगी। तो, उसने पार्किंग मैनेजर पप्पू सिंह से फोन पर बात कराई। उसको बताया, तो उसने कहाकि सर मेरे हाथ में जो है वो मैं कर देता हूं। आप पत्रकार हैं। 4200 रुपये की जगह 3700 रुपये दे दीजिए। मैंने कहा पार्किंग जिसकी है। उससे बात हो सकती है। उसने भी हाथ खड़ा कर दिया।


पत्रकार मित्र अनिल पांडे और ऋषभ भी हमारे साथ थे। मैंने कहा इस पर तो रेलवे मंत्री से बात करनी होगी। ये तो विशुद्ध लूट है। ये सुनकर वहां पार्किंग वसूलने वाले तीनों ने कहा- आपकी बहुत कृपा होगी। यहां तो सर एक लड़के को 69000 रुपये भरना पड़ा। बेचारे के पिताजी की तबियत खराब थी। गाड़ी खड़ी करके चला गया। लौटकर आया तो, 69000 रुपये का बिल हो चुका था। बहुत से लोग इसमें फंसते हैं। हजारों रुपये पार्किंग फीस भरकर जाते हैं। अनिल पांडे ने कहा- ये तो रेलवे लोगों पर दबाव बना रही है कि वो टैक्सी से ही आएं। स्टेशन पर पार्किंग करके कहीं न जाएं। उसके बाद जब मैंने पूछा सामान्य पार्किंग का क्या चार्ज है। उसने जो बताया। वो ज्यादा खतरनाक है। उसने कहा- पहले 20 रुपये घंटा थी। अब पचास रुपया घंटा हो गई है। अब रेलवे मंत्री जी आप ही बताइए, ये लूट नहीं तो क्या है। और ये कोई निजी कंपनी नहीं कर रही है। आपके विभाग के ठेके पर निजी व्यक्ति वसूली कर रहा है। change.org पर मैंने ये याचिका डाली है। इसे आप समर्थन देंगे, तो बात आगे बढ़ेगी।

Saturday, October 10, 2015

पानी की कहानी बताना सीखें पत्रकार

एक बार फिर से चौपाली जुटे। इस बार जुटान की जगह रही ग्वालियर। जुटान की जगह भर बदली है। इस बार भी चौपालियों को जुटाने वाले अनिल सौमित्र ही रहे। उन्होंने बीड़ा उठा रखा है। और भोपाल से दिल्ली से ग्वालियर पहुंची चौपाल में इस बार भी दिल्ली की ही तरह चर्चा का मुख्य बिंदु है नदियां। 10 और 11 अक्टूबर को ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में ये कार्यक्रम हो रहा है। 10 अक्टूबर को उद्घाटन सत्र के बाद तीन समानांतर चर्चा सत्र हैं। भारत की नदियां- कल आज और कल। मध्य प्रदेश की नदियां- कल आज और कल। नदियों का विज्ञान और पारिस्थितिकी। दूसरे पहर में समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग के बाद फिर से तीन समानांतर सत्रों का होना तय रहा। जनमाध्यमों में नदियां- स्थिति, चुनौतियां और संभावनाएं। नदियों का पुनर्जीवन- संचारकों की भूमिका। नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष। इसके बाद दूसरे पहर के समानांतर सत्रों की रिपोर्टिंग तय है। मोट-मोटा देखा जाए, तो पहले पहर के समानांतर सत्र नदियों की स्थिति, परिस्थिति पर बात करने के रहे। जबकि, दूसरे पहर के समानांतर सत्र इस चर्चा के लिए रहे कि कैसे संचारक (ब्लॉगर, पत्रकार) नदियों का जीवन बनाए रखने में मददगार हो सकता है। मेरे लिए वैसे तो सभी सत्र बेहद रुचिकर हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष पर चर्चा करूं, तो बेहतर होगा।

नदियों की रिपोर्टिंग भी किसी चौपाल, संगोष्ठी में चर्चा का विषय है। ये बड़ी सुखद स्थिति बन रही है। वरना, तो नदी और नदियों की रिपोर्टिंग में चर्चा सिर्फ और सिर्फ तब होती है। जब किसी नदी से जुड़े किसी कार्यक्रम में मंत्री, मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का जुड़ना हो पाए। इसको थोड़ा सा और सही मैं करूं तो मुझे लगता है कि नदियों की रिपोर्टिंग- विविध पक्ष की बजाए, इस चर्चा सत्र को कहना चाहिए, पानी की रिपोर्टिंग या पानी की कहानियां- विविध पक्ष। पानी की रिपोर्टिंग या पानी की कहानियों क्यों ब्लॉगरों, पत्रकारों, संचारकों को समझनी चाहिए। ये मैं 3-4 अपने निजी उदाहरण से समझाने की कोशिश करूंगा। वैसे तो भारत और भारत ही क्या दुनिया ही पानी के इर्द गिर्द बसी है। और पानी की रिपोर्टिंग का महत्व न समझने से ही दुनिया बहुत सी मुश्किलों से जूझ रही है। विडंबना देखिए कि शहरों में पानी की रिपोर्टिंग कब होती है। मोटे तौर पर तीन बार। एक बार जब गर्मियों में भयानक पानी की किल्लत होती है। यानी नगर पालिका, महानगर पालिका के पाइप से घरों तक पहुंचने वाले पानी की सप्लाई रुक जाती है या कम हो जाती है। दूसरी तब होती है जब घरों में बोरिंग करने और कंस्ट्रक्शन साइट पर लगातार जलादोहन से उस इलाके में पानी का स्तर तेजी से घटने लगता है। तीसरी बार पानी की बात तब होती है जब शहर की जीवनदायिनी नदी लोगों का जीवन लेने लगती है। यानी उसमें प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। मैं बात शहर की कर रहा हूं। लेकिन, अब पहले मैं अपने गांव चलूंगा। गांव इसलिए कि वहां तो पानी की समस्या होनी ही नहीं चाहिए। नदी की भी नहीं। क्योंकि, न कोई रास्ता रोक रहा है। न ही शहरी प्रदूषण नदियों को गंदा करके उनकी अविरल धारा में बाधा पहुंचा रहे हैं। फिर गांव में पानी की किल्लत क्यों होने लगी। दरअसल वो इसीलिए होने लगी कि पानी की बजाए नदियों की कहानी बताने की बात ज्यादा समझ में आती है। अब सोचिए अगर जमीन से पानी गायब होने लगा। तो, तालाब-नदी या ऐसे किसी भी पानी से जुड़े प्रवाह की कल्पना की जा सकती है क्या। बिल्कुल नहीं की जा सकती। 2008 में मैं अपने गांव गया था। मेरा गांव उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पड़ता है। ये सबसे लंबा अंतराल था मेरा गांव जाने का। उस समय मुंबई में नौकरी करने की वजह से इलाहाबाद तक जाना तो हो जाता था। लेकिन, वहां से सिर्फ 60 किलोमीटर की दूरी तय करके गांव जाना नहीं हो पाता था। खैर, पांच साल बाद गांव गया, तो समझ में आया कि गांव के किनारे के कई छोटे तालाब तालाबों से सबसे नजदीक के घर का दुआर बन गए थे। यानी अपने घर के आगे के तालाब को धीरे-धीरे मिट्टी से पाटकर तालाब के पानी को खत्म किया गया। और धीरे-धीरे तालाब ही गायब हो गए। इस पानी के कम होने की कहानी कोई कह नहीं रहा था। ये कोई मेरे गांव के तालाबों के पानी कम होने की कहानी नहीं है। ये पूरे देश के गांवों के तालाबों के पानी के कम होने और फिर गायब हो जाने की कहानी है। ये कम होते पानी का कहानी नहीं कही गई। इसलिए एकदम से गायब होते तालाब कि रिपोर्टिंग हुई। लेकिन, अब ये रिपोर्टिंग लकीर पीटने जैसी ही रही। क्योंकि, नया तालाब खुदवाने का प्रयास तो बड़ा कठिन है। मायावती की सरकार ने कुछ इस ओर प्रयास किए थे। लेकिन, वो खास सफल नहीं हो सके। दरवाजे के सामने के तालाब पटते गए, तो गांव के बगल से गुजरने वाली नदी का पानी खत्म होता गया। अब तो हाल ये है कि बारिश के दिनों में भी पुल से जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


दूसरी घटना 2007 गुजरात विधानसभा चुनावों की। गुजरात गया था मैं सीएनबीसी आवाज के लिए आर्थिक दृष्टिकोण से चुनाव की रिपोर्टिंग करने। वहां एक गांव की कहानी मिल गई। राजकोट से 22 किलोमीटर दूर राजसमढियाला गांव के प्रधान ने कई दशक पहले पानी का महत्व जान लिया था। पता नहीं उस पानी की कहानी कितनी कही गई। लेकिन, प्रधान के पानी के महत्व समझ लेने से गांव में आई समृद्धि की वजह से उस गांव की कहानी खूब कही गई। मैंने भी शायद उस गांव की समृद्धि की ही वजह से राजसमढियाला गांव की कहानी चैनल के लिए की। जबकि, उस गांव के प्रधान ने कैसे खेतों में पानी की कमी दूर करने के लिए सैटेलाइट से जमीन का नक्शा तैयार कराया। और कैसे-कैसे छोटे तालाब बनाए जिससे पूरे इलाके की जमीनों को खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल सके। कहानी यही होनी चाहिए। पानी की कहानी का एक और निजी अनुभव। मैं पिछले 6 सालों से नोएडा में रहता हूं। यहां आते ही जो सबसे पहली जरूरत समझ में आई। वो थी साफ पानी पीने के लए RO लगवाना। कमाल ये कि जो वॉटर प्योरीफायर मैंने मुंबई में लगवाया था। वो नोएडा में काम नहीं कर रहा था। अब RO लगवाना था। लगवाया। लेकिन, उससे तो सिर्फ पीने का पानी मिलता है। अब जरूरत इस बात की भी बन रही है कि घर में नहाने और कपड़े धोने के लिए पानी को ठीक करने के लिए भी मशीन लगनी चाहिए। इस पानी की कहानी कहने की कोशिश करनी होगी। बात इतनी सी नहीं है। बात ये भी है कि जब रिवर्श ऑस्मोसिस सिस्टम वाला वॉटर प्योरीफायर घर में लगाया, तो इससे पानी बर्बाद होने की गति कई गुना बढ़ जाती है। कुछ इस तरह से अपने सबसे नजदीक के अनुभव के आधार पर अगर पानी की कहानी पत्रकार, ब्लॉगर सीख सकें, तो ही शायद नदियों का जीवन बच सके। और, उनके साथ हमारा जीवन भी। संचार क्रांति ने सबको उस इंटरनेट तक पहुंच दे दी है। इससे हर कोई पत्रकार है। ब्लॉगर है। सोशल मीडिया पर दो लाइन तो लिख ही सकता है। अगर ये हो सके, तो पानी की कहानी से आर्थिक, सामाजिक पक्षों को दुरुस्त किया जा सकता है। 

Friday, October 09, 2015

संघ जिम्मेदार है

कमाल है
इस देश में हर बात के लिए
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि जिनकी सरकार है
वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि जिनकी नहीं सरकार है
वो भी कहते हैं कि संघ जिम्मेदार है

कमाल है
हिंदुस्तान की पिछली सरकारों के घोषित काबिल
पुरस्कार लौटा रहे हैं

कमाल है
पुरस्कार लौटाकर वो
खुद को और काबिल बताना चाहते हैं

कमाल है
पुरस्कारों की इस घर वापसी के लिए भी
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
कि हिंदुत्व की सरकार है
इसलिए ये सारा बवाल है

कमाल है
कि हिंदुत्व की सरकार है
इसलिए पुरस्कार का हो रहा तिरस्कार है


कमाल है
कि वो बता रहे हैं
हर बात चुनाव के फायदे से जुड़ी है

कमाल है
बिना चुनाव लड़े भी
हर चुनावी चकल्लस के लिए संघ ही जिम्मेदार है

कमाल है
जम्मू-कश्मीर में बन गई
पीडीपी-बीजेपी की साझा सरकार है

कमाल है
फिर भी हर अलगाव के लिए
संघ जिम्मेदार है

कमाल है
बिहार में हो रहा चुनाव है
यूपी में हुआ बवाल है

कमाल है
इसके लिए भी
संघ ही जिम्मेदार है

कमाल है
लंबे समय बाद आई
पूर्ण बहुमत की सरकार है

कमाल है
जनता को वो बताते
भ्रमित बार-बार हैं

कमाल है
फिर भी वो सरोकारों के
झंडाबरदार हैं

कमाल है
अब क्या इसके लिए भी
संघ ही जिम्मेदार है
कमाल है


Thursday, October 08, 2015

Oxytocin पर प्रतिबंध में क्या मुश्किल?

ABVP की छात्रा संसद में मेनका गांधी
देश के सबसे बड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद @ABVPVoice की छात्रा संसद में महिला, बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से अजब बात पता चली। उन्होंने एक छात्रा के बच्चियों को इंजेक्शन देकर बड़ा करने और Women trafficking के सवाल पर ये बात बताई। Oxytocin नाम का इंजेक्शन है, जिसकी वजह से ढेर सारी बुराइयां हैं। गाय को लगाकर उससे ज्यादा दूध निकालने की कोशश होती है। दूध जहरीला हो जाता है। सब्जियों में लगाकर उसे जल्दी तैयार करते हैं। ज्यादा सब्जी हो जाती है। जहरीली सब्जी खाना होता है। जो, मांस खाते हैं। उन्हें जहरीला मांस खाना होता है। अब Oxytocin का बेहद अमानवीय इस्तेमाल आगे बढ़ा है। अब बच्चियों को ये इंजेक्शन लगाकर उऩ्हें बड़ा किया जा रहा है। अरब देशों में ये बच्चियां बेची जा रही हैं। मुंबई से सटे ठाणे में एक कंपनी है जो इसे आयात करके लाती है। दूसरे कुछ नामों से भी अब ये बिकने लगी है। लेकिन, ये प्रतिबंधित नहीं है। स्वास्थ्य मंत्री @JPNadda से भी उन्होंने इसे प्रतिबंधित करने की मांग की है। इसका आंदोलन होना चाहिए। लेकिन, इसकी चर्चा कहां हो रही है।

Sunday, October 04, 2015

सांप्रदायिकता खत्म करना है या बरकरार रखना है?

लड़ाई सांप्रदायिकता से लड़ने की तय होनी थी। लड़ाई अतिवाद से लड़नी थी। लड़ाई इंसान को बचाने की थी। लेकिन, देखिए क्या हो रहा है। विरोध उन्हें सांप्रदायिकता के नाम पर एक पार्टी बीजेपी का करना है। अतिवाद के नाम पर हिंदू का करना है। आगे बढ़कर हर ऐसे किसी काम के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गरियाना है। लीजिए। अपनी प्रगतिशीलता के चक्कर में उन्होंने हिंदू अतिवादियों को पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर दे दिया है। बहुतायत हिंदू बेचारा सिर्फ इसलिए गरियाया जा रहा है कि उसने भारतीय जनता पार्टी को मत क्यों दे दिया। @narendramodi की सरकार क्यों बना दी। जबकि, बहुतायत हिंदू और बहुतायत मुसलमान बात ही दूसरी करने लगा है। वो तरक्की चाह रहा है। वो अपने जीवन में थोड़ी बेहतरी चाह रहा है। लेकिन, इससे तो उन लोगों की पूरी "Constituency"ही खत्म होती दिख रही है। अब तक वो इंसानियत की बात करते थे। इस देश की तहजीब उन्हें लगती थी कि कभी किसी सांप्रदायिक ताकत का कब्जा नहीं होगा। वो ये रटे हुए थे। समय, सिद्धांत, समाज सब बदल गया। लेकिन, वो तो रटे थे। उन्होंने ठेका भी ले रखा था। सारे सारोकारों का। अभी भी वही पुरानी रटी बात बोल रहे हैं। कोई कह रहा है कि मैं भी गौमांस खाता/खाती हूं। बड़का संपादक से लेकर बड़की मैडम तक नाराज हैं। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के भाई और इकोनॉमिक टाइम्स के संपादक स्वामीनाथन अय्यर ने तो बाकायदा संपादकीय पृष्ठ पर गोमांस खाने वालों की तरफ से पूरी चिट्ठी लिख मारी है। कोई कह रहा है मुझे मार दो। कोई कह रहा है कि ये देश ही अभागा है। कई तो हो सकता है कि चिकन, मटन बनाकर उसकी तस्वीर लेकर सोशल मीडिया में डाल दें कि देखो मैंने भी गौमांस खाया है। दरअसल ये न सांप्रदायिकता खत्म करना चाहते हैं, न अतिवाद और न ही इंसान बने रहने, इंसानियत बचाने में इनकी कोई दिलचस्पी है। आसान राह से देश के नौजवान को बरगलाकर ये लंबे समय से सरोकारी होते हुए भी सत्ता के मजे ले रहे थे। अब चिरमिटी लग रही है। सब हाथ से निकल गया। सरोकारी तो रहे ही नहीं थे। अब सत्ता का साथ भी नहीं रहा। अब ये विक्षिप्त जैसा व्यवहार कर रहे हैं। लेकिन, किस ईश्वर, खुदा, गॉड से कहूं कि माफ करना इन्हें। सद्बुद्धि देना इन्हें। ये तो सबको सिगरेट के धुएं में कबका उड़ा चुके हैं। ये अनास्था के वाहक हैं। फिर भी हे ईश्वर माफ कर, सदबुद्धि देना इन्हें। क्योंकि, मेरी तो आस्था है ही।

Saturday, October 03, 2015

सोशल मीडिया से समाज समझता स्वयंसेवक प्रधानमंत्री

कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार के 180 दिन पूरे होने पर यू टर्न सरकार का खिताब दे दिया था। ये दरअसल कांग्रेस की आरोप पुस्तिका थी। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 25 उन मुद्दों से पलटने की जिक्र किया था। जिसे खुद मोदी ने चुनाव के समय करने का आश्वासन दिया था। उसके बाद हर उस मुद्दे पर जहां भी मोदी सरकार अपने बनाए-बोले किसी नियम में संशोधन की तलाश करने लगती। कांग्रेस वहां यू टर्न सरकार का आरोप उछाल देती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने, काला धन वापस लाने, भूमि अधिग्रहण बिल और नेट न्यूट्रलिटी उसमें सबसे अहम मुद्दे थे। जिस पर नरेंद्र मोदी पर यू टर्न लेने का आरोप लगाया गया था। वैसे यू टर्न आधार कार्ड पर भी इस सरकार ने लिया है। कुछ इसी तरह नीतियों के लिहाज से पाकिस्तान पर भी सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। सवाल ये है कि आखिर एक ताकतवर राजनेता से मुख्यमंत्री और फिर प्रचंड बहुमत वाले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे यू टर्न क्यों ले रहे हैं जिससे उनकी और सरकार की छवि कमजोर हो रही है। इसका जवाब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में हुए सवाल-जवाब में दे दिया है।

फेसबुक मुख्यालय में नरेंद्र मोदी के अपने ही फैसले से पलटने की पीछे की वजह की चर्चा करने से पहले कुछ ऐसे बड़े यू टर्न फैसलों पर नजर डालते हैं। जिससे मामला समझने में आसानी हो। पाकिस्तान के साथ विदेश नीति के यू टर्न फैसले की बात करते हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से उत्साही हिंदुत्व कार्यकर्ताओं को कुछ ऐसी उम्मीद बन गई थी कि वो पाकिस्तान से कम से कम पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर तो छीन ही लेंगे। इसीलिए एक ये धारणा बड़ी तेजी से लोगों के दिमाग में घर कर गई कि इस सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत का फैसला करके इस मामले पर यू टर्न ले लिया है। हालांकि, इस सरकार ने पहली बार कूटनीतिक तरीके से पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। दूसरा बड़ा फैसला था भूमि अधिग्रहण कानून को अध्यादेश के तौर पर लागू करने का। इसमें किसानों की मर्जी पूरी तरह से सरकार की मर्जी या कहें कि दया पर आधारित थी। बाद में विपक्ष के जोरदार विरोध और किसी भी सूरत में इसके संसद से पास न हो पाने की स्थिति देखकर सरकार ने यहां भी यू टर्न लिया और अध्यादेश वापस ले लिया। नेट न्यूट्रलिटी पर भी सरकार ने यू टर्न लिया। लेकिन, बाद में सरकार ने नेट न्यूट्रलिटी को ही अपना सिद्धांत बताया और जोरशोर से उसके पक्ष में ही नीतियां बनाने का भरोसा दिया। फिर संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद के मंत्रालय ने नेशनल इनक्रिप्शन पॉलिसी में जबरदस्त गड़बड़ की। ड्राफ्ट पॉलिसी में सरकार ने सभी प्रकार के सोशल मीडिया संदेशों को नब्बे दिनों तक संभालकर रखने और उसे मांगने पर सरकार को देने का कानून बनाने की बात की थी। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका से प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी सरकार की खाट खड़ी होती दिखी। आखिरकार संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद को प्रेस कांफ्रेंस करके इस बेतुके ड्राफ्ट को वापस लेना पड़ा। इस यू टर्न से समझ में आता है कि ढेर सारे मुद्दों पर नरेंद्र मोदी की सरकार ने यू टर्न लेना क्यों ठीक समझा। और इससे ये भी समझ में आता है कि कम से कम ये सरकार अपने ही किसी फैसले को पलटने में देर नहीं लगाती। अगर उसे ये समझ में आ जाए कि इस फैसले से जनता उसके खिलाफ हो रही है। नेशनल इनक्रिप्शन पॉलिसी का ड्राफ्ट आया, तो इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया लोगों की हुई कि चौबीस घंटे के भीतर मंत्री को सामने आना पड़ा। गलती माननी पड़ी। ड्राफ्ट वापस लेना पड़ा। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का फीडबैक सिस्टम ठीक काम कर रहा है। वैसे तो साफ तौर पर दिखता यही है कि भूमि अधिग्रहण कानून इसलिए नहीं बना कि सरकार के पास उसे पास कराने के लिए पर्याप्त संख्याबल नहीं है। इसीलिए उसे वापस लेना पड़ा। लेकिन, एक दूसरा पहलू ये भी है कि सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया भूमि अधिग्रहण कानून के बहुत पक्ष में नहीं थी। धीरे-धीरे सरकार की छवि किसान विरोधी होती जा रही थी। इसलिए सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून से पूरी तरह से पीछे हटना पड़ा। दरअसल नरेंद्र मोदी को ये बहुत अच्छे से पता है कि 2019 में उनको जवाब देना होगा। और उस समय अगर कुछ बदलाव नहीं दिखा, तो कोई तर्क काम नहीं आएगा। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने चीन की तर्ज पर औद्योगिक तेजी के लिए इस भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की योजना बनाई थी। जिससे 2019 के पहले बड़े बदलाव करके जनता के मन में बन रही किसान विरोधी छवि को बेहतर उद्योग, विकास, रोजगार से भरा जा सके। लेकिन, जब लगा कि घर के रहे न घाट के वाली स्थिति सरकार की होने जा रही है, तो सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून पर पीछे हटना पड़ा।

आधार पर भी इस सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि लोगों में इस योजना को लेकर बहुत उत्साह बना हुआ है। और दूसरे विरोध भले हों लेकिन, ये तो सच्चाई है कि तकनीक के इस दौर में अगर देश को लोगों का एक डाटा बैंक नहीं तैयार होता है, तो इससे सरकार आगे जाने के बजाए पीछे चली जाएगी। फिर प्रधानमंत्री की जनधन योजना और सीधे खाते में रकम देने की योजना लागू करने का ये बेहतर तरीका साबित हो रहा था। इसलिए मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की उस किसी योजना को रोका नहीं। भले उस पर यू टर्न सरकार होने का ठप्पा लगातार लगा हो। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार ये साफ करते हैं कि उन्हें लोगों की भलाई के लिए किसी भी अपने फैसले के संशोधन में जरा सा भी एतराज नहीं है। और यही शायद उनकी सफलता का मंत्र भी है कि वो जनता में गुस्से को समझ जाते हैं। नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में बातचीत में कहाकि पहले सरकार को पांच साल बाद जनता के गुस्से का पता चलता था और तब तक देर हो जाती थी। अब लोगों की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में हर रोज, हर मिनट आ रही है। उन्होंने कहाकि मैं यहां जो बोल रहा हूं। उस पर भी वोटिंग हो रही होगी कि मोदी अच्छा बोला या खराब। नरेंद्र मोदी मानते हैं कि वो इस प्रतिक्रिया से खुद को दुरुस्त करते हैं। गवर्नेंस बेहतर करने की कोशिश करते हैं। इसीलिए वो मुख्य धारा की मीडिया से ज्यादा इस नई मीडिया की प्रतिक्रिया के आधार पर सरकार चलाने की कोशिश करते हैं। और इस आधार पर फिलहाल सफल भी होते दिख रहे हैं। ट्विटर, फेसबुक का रिपोर्टर प्रधानमंत्री को जनता की प्रतिक्रिया बता रहा है। सोशल मीडिया से समाज को समझने वाला स्वयंसेवक प्रधानमंत्री मिला हुआ है। इसीलिए यू टर्न का ठप्पा इस प्रधानमंत्री को डराता नहीं है। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...