आडवाणी को बढ़ती मायावती का सहारा

राष्ट्रीय राजनीति में मायावती की बड़ा बनने की इच्छा बीजेपी के खूब काम आ रही है। ये नजर नहीं आता क्योंकि, देश की सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में उन्होंने कमाल के फॉर्मूले से बीजेपी का ही कचूमर निकाल दिया है। और, सांप्रदायिक बीजेपी को गाली देने का वो कोई मौका छोड़ती नहीं हैं। लेकिन, दरअसल ये मायावती देश भर में हाथी दौड़ाने की जो कोशिश कर रही हैं उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल रहा है और उसके साइड इफेक्ट कांग्रेस पर पड़ते दिख रहे हैं।


मायावती किस तरह से बीजेपी के काम आ रही हैं- इसकी बानगी देखिए। इलाहाबाद में अभी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी की रैली हुई। केपी कॉलेज मैदान में हुई इस रैली में अच्छी भीड़ उमड़ी। इलाहाबाद में हुई आडवाणी की सफल रैली के कई राष्ट्रीय संकेत साफ दिखते हैं। ये वो इलाहाबाद है जहां से एक जमाने में बीजेपी की तीन धरोहरों –अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर- में से एक मुरली मनोहर जोशी तीन बार लगातार चुनाव जीते लेकिन, पिछला चुनाव हारे तो, गंगा के किनारे-किनारे इलाहाबाद से बनारस पहुंच गए।


जोशी के सीट छोड़ने के बाद इलाहाबाद से बीजेपी को उस कद से काफी नीचे के कद का उम्मीदवार भी नहीं मिल पा रहा था। इलाहाबाद और फूलपूर सीट के परिसीमन ने बीजेपी का गणित और बिगाड़ दिया। शहर उत्तरी जैसी बीजेपी के कैडर वोटरों वाली विधानसभा फूलपुर में जुड़ गई है। बीजेपी ने फूलपुर और
इलाहाबाद दोनों ही सीटों से अपरिचित से चेहरे करन सिंह पटेल और योगेश शुक्ला को टिकट दे दिया। प्रत्याशियों में खास दमखम न होने के बावजूद इलाहाबाद में आडवाणी की शानदार रैली ये संकेत देती है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में थोड़ा बहुत ही सही लेकिन, फिर जिंदा हो रही है।


ऐसा नहीं है कि इसके लिए बीजेपी नेतृत्व ने बहुत मेहनत की हो या फिर कार्यकर्ता अचानक फिर से बीजेपी का झंडा-बैनर लेकर खड़े हो गए हैं। दरअसल, ये सब हुआ है मायावती के एक फैसले – वरुण गांधी पर NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने – से। समाजवादी पार्टी का ये आरोप भले ही राजनीतिक लगता हो लेकिन, काफी हद तक सही है कि मायावती सरकार की ये सिफारिश मुस्लिम वोटों को बीएसपी के पक्ष में और हिंदु वोटों को बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए काफी है।


जाने-अनजाने ही सही मायावती ने बीजेपी को थोड़ी ऑक्सीजन दे ही दी है। लेकिन, इतना भर ही नहीं है। ज्यादातर सर्वे और ओपीनियन पोल भले ही अभी यूपीए को एनडीए पर बढ़त दिखा रहे हैं। लेकिन, ज्यादातर में मायावती को बड़ी ताकत तो बनते दिखाया जा रहा है। इस बात पर कम ही ध्यान जा रहा है कि बड़ी होती मायावती किसको छोटा कर रही हैं। मायावती सिर्फ उत्तर प्रदेश में सत्ता में हैं लेकिन, देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों – कांग्रेस और भाजपा – से कहीं ज्यादा करीब 500 सीटों पर हाथी चुनाव चिन्ह पर
प्रत्याशी खड़े कर रही हैं।


दरअसल बड़ी होती मायावती ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बुरी तरह से भले ही पटखनी दी हो लेकिन, देश के दूसरे राज्यों में वो बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता आसान कर रही हैं। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में बहनजी की बहुजन समाज पार्टी ने कई राज्यों में कांग्रेस के वोट बैंक की चुपके से सफाई कर दी।


गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ सीधे-सीधे सत्ता मिल गई। गुजरात में सत्ता में रहे मोदी ने विकास कार्यों के साथ हिंदुत्व के एजेंडे की अच्छी पैकेजिंग करके चुनाव जीत लिया। और, हिमाचल प्रदेश में कांग्रेसी सत्ता के कुशासन की वजह से देवभूमि की जनता ने दुबारा वीरभद्र पर भरोसा करना ठीक नहीं समझा। और, उन्हें पहाड़ की चोटी से उठाकर नीचे पटक दिया।


दोनों राज्यों में चुनाव परिणामों की ये तो सीधी और बड़ी वजहें थीं। लेकिन, एक दूसरी वजह भी थी जो, दायें-बायें से भाजपा के पक्ष में और कांग्रेस के खिलाफ काम कर गई। वो, वजह थी मायावती का राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा। उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई मायावती को लगा कि जब वो राष्ट्रीय पार्टियों के आजमाए गणित से देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में आ सकती हैं। तो, दूसरे राज्यों में इसका कुछ असर तो होगा ही। मायावती की सोच सही भी थी।


मायावती की बसपा ने पहली बार हिमाचल प्रदेश में अपना खाता खोला है। बसपा को सीट भले ही एक ही मिली हो। लेकिन, राज्य में उसे 7.3 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि, 2003 में उसे सिर्फ 0.7 प्रतिशत ही वोट मिले थे। यानी पिछले चुनाव से दस गुना से भी ज्यादा मतदाता बसपा के पक्ष में चले गए हैं। और,
बसपा के वोटों में दस गुना से भी ज्यादा वोटों की बढ़त की वजह से भी भाजपा 41 सीटों और 43.8 प्रतिशत वोटों के साथ कांग्रेस से बहुत आगे निकल गई है। कांग्रेस को 38.9 प्रतिशत वोटों के साथ सिर्फ 23 सीटें ही मिली हैं। बसपा को मिले ज्यादातर वोट अब तक कांग्रेसी नेताओं के ही थैले में थे।


गुजरात में भाजपा की जीत इतनी बड़ी थी कि उसमें मायावती की पार्टी को मिले वोट बहुत मायने नहीं रखते। लेकिन, मायावती को जो वोट मिले हैं वो, आगे की राजनीति की राह दिखा रहे हैं। गुजरात की अठारह विधानसभा ऐसी थीं जिसमें भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर चार हजार से कम था। इसमें से पांच
विधानसभा ऐसी हैं जिसमें बसपा को मिले वोट अगर कांग्रेस के पास होते तो,वो जीत सकती थी। जबकि, चार और सीटों पर उसने कांग्रेस के वोटबैंक में अच्छी सेंध लगाई।


मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। मायावती की महाराष्ट्र पर भी कड़ी नजर है। वो, सबसे पहले मुंबई में पैठ जमाना चाहती हैं। क्योंकि, उन्हें पता है कि यहां से पूरे राज्य में संदेश जाता है। मायावती जानती हैं कि उत्तर प्रदेश के लोगों को उनके जादू का सबसे ज्यादा अंदाजा है। इसलिए वो उत्तर प्रदेश से आए करीब 25 लाख लोगों को सबसे पहले पकड़ना चाहती हैं। यही वो वोटबैंक है जिसने पिछले चुनाव में शिवसेना-भाजपा से किनारा करके कांग्रेस-एनसीपी को सत्ता में ला दिया। मुंबई में हिंदी भाषी जनता करीब 20 विधानसभा सीटों पर किसी को भी जितान-हराने की स्थिति में है। जाति के लिहाज से ब्राह्मण-दलित-मल्लाह-पासी-वाल्मीकि और मुस्लिम मायावती को आसानी से पकड़ में आते दिख रहे हैं।


अब अगर मायावती का ये फॉर्मूला काम करता है तो, रामदास अठावले की RPI गायब हो जाएगी। और, सबसे बड़ी मुश्किल में फंसेगा कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन। कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में कांग्रेस के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी हैं साथ ही दलित-मुसलमानों का भी एक बड़ा तबका कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। दलितों की 11 प्रतिशत आबादी मायावती की राह आसान कर रही है।


किसी भी सर्वे या ओपीनियन पोल में देखें तो, पिछले लोकसभा चुनाव में 11 सीटें पाने वाली बीजेपी को 15-20 के बीच में सीटें मिल रही हैं। और, बहनजी की बसपा को 29-39 सीटों के बीच में। अब अगर बीजेपी और बीएसपी उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर 50-55 सीटों तक पहुंच जाते हैं तो, यही समीकरण
केंद्र में बीजेपी-बीएसपी गठजोड़ को भी मजबूत आधार देगा। क्योंकि, जाने-अनजाने बीजेपी के कैडर का बड़ा हिस्सा इस समय जाति-कमजोर बीजेपी-मुलायम विरोध या फिर किसी और आधार पर बीएसपी का झंडा उठाए घूम रहा है।


इसमें मुश्किल सिर्फ इतनी ही है कि लालकृष्ण आडवाणी को ये चुनाव अपनी राजनीतिक पारी का अंत दिख रहा है। और, प्रधानमंत्री बनने का ये मौका वो किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहेंगे। अब अगर देश भर में बीजेपी, पुराने सहयोगियों (NDA) के साथ मजबूती से रही और, जयललिता जैसे कुछ डांवाडोल पुराने सहयोगियों को पटाती दिखी तो, बहनजी भी उप प्रधानमंत्री की कुर्सी लेकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने में मदद कर सकती हैं। लेकिन, अगर बीजेपी और एनडीए थोड़ा कमजोर रहा तो, कांग्रेस को सत्ता से रोकने के लिए बीजेपी और संघ परिवार देश को पहली दलित प्रधानमंत्री देने में अपने योगदान को दर्ज कराने में नहीं चूकेगा।