इलाहाबाद
विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला
छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से
निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं
के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी
को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा
में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3
महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष,
छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में
एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता
था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद
अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में
जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता
के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान ली जाती थी। 2003 तक मशाल जुलूस की
परम्परा कायम रही, लेकिन उसके बाद तत्कालीन प्रशासन ने इसे बंद करा दिया। हालांकि,
ध्यान देने वाली बात यह है कि छात्र राजनीति और छात्रसंघों की छवि खराब होने के
बावजूद कभी महिला छात्रावास में मशाल जुलूस के दौरान किसी तरह की अभद्रता की खबर
नहीं आई और, जाहिर है कि मशाल जुलूस था तो रात के वक्त ही यह जुलूस महिला
छात्रावास पहुंचता था। एक बार वृक्षारोपण कराने के दौरान मुझे अपने साथियों के साथ
महिला छात्रावास के अंदर तक जाने का अवसर मिला था। जाहिर है तीनों महिला
छात्रावासों के सम्मिलित मुख्य द्वार के सामने लल्ला चुंगी से गुजरते हुए होने
वाले रोमांच से कई गुना ज्यादा रोमांच महिला छात्रावास के भीतर पहुंचने से हुआ,
लेकिन मुझे ध्यान में नहीं आता कि कभी मैंने यह सुना हो कि महिला छात्रावास की
लड़कियों ने इस बात पर हंगामा कर दिया हो कि उन्हें या उनसे मिलने आने वालों को
बेरोकटोक आने-जाने नहीं दिया जा रहा है और इसकी वजह से महिला छात्रावास उन्हें
पिंजरे की तरह लगते हैं, लेकिन 2015 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राएं भी
अचानक प्रदर्शनकारी हो गईं और पिंजरातोड़ संगठन के आह्वान पर छात्राओं के अधिकारों
के लिए लड़ाई में शामिल हो गईं और, अब इसी पिंजरा तोड़ संगठन की दो प्रमुख महिलाओं
नताशा नरवाल और देवांगना कलीता को दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दिल्ली
पुलिस ने गिरफ्तार किया है और इन दोनों के ऊपर बेहद गम्भीर आरोप हैं। दोनों पर
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि इन्होंने लोगों को भड़काकर
जाफराबाद में भीड़ इकट्ठा की। दिल्ली दंगों की चार्जशीट में जामिया कोऑर्डिनेश
समिति की सदस्य सफूरा जरगर की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाकर इसे दिल्ली पुलिस का
मुसलमानों के प्रति दमनकारी रवैये के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है,
लेकिन सच यह है कि नताशा नरवाल और देवांगना कलीता मुसलमान नहीं हैं और ऐसे ही
दिल्ली दंगों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल होने के आरोप में दिल्ली
पुलिस ने जितने लोगों को गिरफ्तार किया है, उसमें हिन्दू और मुसलमान की संख्या
लगभग बराबर है।
नागरिकता
कानून विरोधी प्रदर्शन की आड़ में दिल्ली दंगों में शामिल लोगों की गिरफ्तारी के
बाद एक देशव्यापी साजिश स्पष्ट तौर पर नजर आ रही है, इसीलिए मैंने इलाहाबाद
विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास की स्थिति का जिक्र किया। सच यही है कि देश के
लगभग सभी विश्वविद्यालयों में छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए
विश्वविद्यालय और छात्रावास प्रशासन एक समय के बाद किसी भी छात्रा को छात्रावास से
बाहर रहने की स्वीकृति नहीं देता है। खासकर स्नातक छात्राओं के लिए इस तरह के नियम
देशभर में हैं और छात्राओं के साथ अभिभावकों को भी इससे सुरक्षा का अहसास होता है,
लेकिन पिंजरातोड़ संगठन ने इसी व्यवस्था का शीर्षासन करा दिया और दिल्ली के
मिरांडा और सेंट स्टीफन से शुरू हुआ छात्रा अधिकारों का यह संगठन देश भर के
विश्वविद्यालयों में छात्राओं को प्रशासन के खिलाफ उनके अधिकारों की बात करके खड़ा
करने की कोशिश करता दिखा। पहली नजर में इसमें कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन जब
पिंजरा तोड़ संगठन की पिछले 3-4 वर्षों की गतिविधियों पर नजर डाली डाए तो समझ आता
है कि पिंजरा तोड़ छात्राओं को बंधन से मुक्ति दिलाने से बहुत आगे निकल गया था।
जेएनयू में पिंजरातोड़ 2016 में कश्मीर की आजादी के लिए आन्दोलन करने लगता है और
जम्मू कश्मीर लद्दाख से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद दिल्ली में वामपंथी छात्र
संगठनों के साथ जम्मू कश्मीर लद्दाख से अनुच्छेद 370 खत्म करने का विरोध करता है। नारावादी
से मानवाधिकारवादी और धीरे-धीरे पिंजरातोड़ संगठन, भारतीय समाज और भारत को तोड़ने
वाले संगठन में कब बदल गया, इसका अनुमान शायद पिंजरातोड़ के ज्यादातर
आन्दोलनकारियों को भी नहीं होगा और नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के समय
पिंजरा तोड़ का देशविरोधी चरित्र सामने दिखने लगा।
नागरिकता
कानून विरोधी प्रदर्शनों में पिंजरातोड़, जेएनयू छात्रसंघ, जामि. कोऑर्डिनेशन
कमेटी और वामपंथी छात्र संगठनों के साथ बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा था। छात्रा हित
कहां पीछे छूट गये, पता ही नहीं चल रहा था। नताशा नरवाल और देवांगना कलीता दोनों
ही हिन्दू हैं, लेकिन नागरिकता कानून को मुस्लिम विरोधी बताते जामिया, जाफराबाद,
सीलमपुर और शाहीनबाग के प्रदर्शनों में भीड़ जुटाने के साथ हिन्दू विरोधी
प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा बन गईं थीं। पिंजरातोड़ के प्रदर्शनों में महिला हित
एकदम से गायब हो चुका था। हिन्दू विरोधी नारे, चित्र इनकी पहचान बन चुके थे। वूमेन
विल डिस्ट्रॉय हिन्दू राष्ट्र, मैं भारत की माता नहीं बनूंगी से आगे बढ़कर हिन्दू
भावनाओं को भड़काने वाले नारे इनके प्रदर्शनों का चेहरा था। देश के 500 शहरों में
उत्पात मचाने और असम को भारत से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम की गिरफ्तारी
के बाद उसकी रिहाई के लिए भी पिंजरातोड़ आन्दोलन चला रहा था और सबसे खतरनाक कि
जाफरबाद में भीड़ जुटाकर उस समय कानून व्यवस्था खराब करने की कोशिश की, जब अमेरिकी
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली में थे।
छात्राओं
के अधिकार मुक्ति के लिए शुरू हुआ संगठन पूरी तरह से देश विरोधी एजेण्डे पर काम
करता दिख रहा था और यहां तक कि इसमें वामपंथी विचारों के अलावा दूसरे किनारे लगने
लगे। 20 फरवरी 2019 को पिंजरा तोड़ से दलित छात्राओं के एक समूह ने यह कहते हुए
किनारा कर लिया कि पिंजरातोड़ में दलित छात्राओं के अधिकार की कोई बात नहीं होती
है और यह विशेष विचारधारा के प्रचार प्रसार के लिए काम करने वाला संगठन है। दिल्ली
के प्रतिष्ठित कॉलेजों, मिरांडा हाउस, लेडी श्रीराम कॉलेज, सेंट स्टीफेंस से
महिलाओं के लिए समान अधिकारों के नाम पर शुरू हुए इस संगठन ने बड़ी तेजी से देश भर
में जगह बना ली, लेकिन अब दिल्ली दंगों में पिंजरा तोड़ की साजिशी भूमिका सामने
आने से सिर्फ दलित छात्राओं के मन में ही नहीं, देश भर की छात्राओं के मन में यह
सवाल जरूर उठ रहा होगा कि पिंजरा तोड़ उनके अधिकारों के लिए ताकत इकट्ठी कर रहा था
या फिर विश्वसनीयता खो चुके वामपंथी संगठनों ने पिंजरा तोड़ का इस्तेमाल भारत
तोड़ने वाले प्रदर्शनों के लिए कर लिया है। लैंगिक समानता और सुरक्षित
विश्वविद्यालय परिसर के नाम पर शुरू हुआ पिंजरातोड़ आंदोलन अब अतिवादी वामपंथी और
कट्टर इस्लामिक ताकतों के हाथ में खेल रहा है और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के
मुताबिक देश विरोधी हरकतों में शामिल हो चुका है। जातीय और सांप्रदायिक विभाजन
इनकी गतिविधियों का नियमित हिस्सा बन चुका है। पिंजरा तोड़ संगठन की भूमिका को
पूरी तरह से उजागर करने की जरूरत है क्योंकि देश के छोटे बड़े शहरों के परिसरों
में पिंजरा तोड़ महिला समानता के नाम पर घुस चुका है और अगर दिल्ली पुलिस की
चार्जशीट में लगे आरोपों में सच्चाई है तो परिसरों में पिंजरा तोड़ का असली चेहरा
भी छात्राओं के सामने आना जरूरी है। दिल्ली दंगों में इनकी भूमिका के बाद संगठन को
पिंजरा तोड़ की बजाय भारत तोड़ संगठन कहना उचित रहेगा।
(यह लेख 13 जून 2020 को इंदौर से निकलने वाले अखबार प्रजातंत्र में छपा है)


