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Saturday, June 13, 2020

पिंजरा या भारत तोड़ने की कोशिश ?


इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मुख्य परिसर से सटा हुआ या यूं कह लें कि मुख्य परिसर में ही महिला छात्रावास है। और, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं, महिला छात्रावास से निकलकर सीधे परिसर में आ जातीं थीं, लेकिन यह रास्ता पूरी तरह से उन्हीं छात्राओं के लिए था जो महिला छात्रावास में रहती थीं। महिला छात्रावास में छात्रों या किसी को भी जाने के लिए मुख्य द्वार से ही जाना होता था और इसके लिए बाकायदा सुरक्षा में लगे जवानों के पास नाम वगैरह दर्ज कराकर ही जाया जा सकता था। 90 के दशक तक 3 महिला छात्रावास हुआ करते थे और उन तीनों के पहले छात्रावास अधीक्षिका का कक्ष, छात्रावास कार्यालय होता था, वहीं तक जाकर छात्राओं से मुलाकात होती थी। वर्ष में एक बार विश्वविद्यालय के छात्रों को महिला छात्रावास के अंदर जाने का अवसर मिलता था और वह अवसर होता था छात्रसंघ चुनाव के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बेहद अनोखे मशाल जुलूस वाले दिन। हर प्रत्याशी अपने जुलूस के साथ महिला छात्रावास में जाता था, जहां छात्राएं, छात्रसंघ प्रत्याशियों के ऊपर फूल फेंकती थीं और जिस नेता के ऊपर ज्यादा गुलाब गिरे, उसकी जीत पक्की मान ली जाती थी। 2003 तक मशाल जुलूस की परम्परा कायम रही, लेकिन उसके बाद तत्कालीन प्रशासन ने इसे बंद करा दिया। हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि छात्र राजनीति और छात्रसंघों की छवि खराब होने के बावजूद कभी महिला छात्रावास में मशाल जुलूस के दौरान किसी तरह की अभद्रता की खबर नहीं आई और, जाहिर है कि मशाल जुलूस था तो रात के वक्त ही यह जुलूस महिला छात्रावास पहुंचता था। एक बार वृक्षारोपण कराने के दौरान मुझे अपने साथियों के साथ महिला छात्रावास के अंदर तक जाने का अवसर मिला था। जाहिर है तीनों महिला छात्रावासों के सम्मिलित मुख्य द्वार के सामने लल्ला चुंगी से गुजरते हुए होने वाले रोमांच से कई गुना ज्यादा रोमांच महिला छात्रावास के भीतर पहुंचने से हुआ, लेकिन मुझे ध्यान में नहीं आता कि कभी मैंने यह सुना हो कि महिला छात्रावास की लड़कियों ने इस बात पर हंगामा कर दिया हो कि उन्हें या उनसे मिलने आने वालों को बेरोकटोक आने-जाने नहीं दिया जा रहा है और इसकी वजह से महिला छात्रावास उन्हें पिंजरे की तरह लगते हैं, लेकिन 2015 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राएं भी अचानक प्रदर्शनकारी हो गईं और पिंजरातोड़ संगठन के आह्वान पर छात्राओं के अधिकारों के लिए लड़ाई में शामिल हो गईं और, अब इसी पिंजरा तोड़ संगठन की दो प्रमुख महिलाओं नताशा नरवाल और देवांगना कलीता को दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है और इन दोनों के ऊपर बेहद गम्भीर आरोप हैं। दोनों पर दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि इन्होंने लोगों को भड़काकर जाफराबाद में भीड़ इकट्ठा की। दिल्ली दंगों की चार्जशीट में जामिया कोऑर्डिनेश समिति की सदस्य सफूरा जरगर की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाकर इसे दिल्ली पुलिस का मुसलमानों के प्रति दमनकारी रवैये के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है, लेकिन सच यह है कि नताशा नरवाल और देवांगना कलीता मुसलमान नहीं हैं और ऐसे ही दिल्ली दंगों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल होने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने जितने लोगों को गिरफ्तार किया है, उसमें हिन्दू और मुसलमान की संख्या लगभग बराबर है।   
नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन की आड़ में दिल्ली दंगों में शामिल लोगों की गिरफ्तारी के बाद एक देशव्यापी साजिश स्पष्ट तौर पर नजर आ रही है, इसीलिए मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास की स्थिति का जिक्र किया। सच यही है कि देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय और छात्रावास प्रशासन एक समय के बाद किसी भी छात्रा को छात्रावास से बाहर रहने की स्वीकृति नहीं देता है। खासकर स्नातक छात्राओं के लिए इस तरह के नियम देशभर में हैं और छात्राओं के साथ अभिभावकों को भी इससे सुरक्षा का अहसास होता है, लेकिन पिंजरातोड़ संगठन ने इसी व्यवस्था का शीर्षासन करा दिया और दिल्ली के मिरांडा और सेंट स्टीफन से शुरू हुआ छात्रा अधिकारों का यह संगठन देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्राओं को प्रशासन के खिलाफ उनके अधिकारों की बात करके खड़ा करने की कोशिश करता दिखा। पहली नजर में इसमें कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन जब पिंजरा तोड़ संगठन की पिछले 3-4 वर्षों की गतिविधियों पर नजर डाली डाए तो समझ आता है कि पिंजरा तोड़ छात्राओं को बंधन से मुक्ति दिलाने से बहुत आगे निकल गया था। जेएनयू में पिंजरातोड़ 2016 में कश्मीर की आजादी के लिए आन्दोलन करने लगता है और जम्मू कश्मीर लद्दाख से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद दिल्ली में वामपंथी छात्र संगठनों के साथ जम्मू कश्मीर लद्दाख से अनुच्छेद 370 खत्म करने का विरोध करता है। नारावादी से मानवाधिकारवादी और धीरे-धीरे पिंजरातोड़ संगठन, भारतीय समाज और भारत को तोड़ने वाले संगठन में कब बदल गया, इसका अनुमान शायद पिंजरातोड़ के ज्यादातर आन्दोलनकारियों को भी नहीं होगा और नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के समय पिंजरा तोड़ का देशविरोधी चरित्र सामने दिखने लगा।
नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों में पिंजरातोड़, जेएनयू छात्रसंघ, जामि. कोऑर्डिनेशन कमेटी और वामपंथी छात्र संगठनों के साथ बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा था। छात्रा हित कहां पीछे छूट गये, पता ही नहीं चल रहा था। नताशा नरवाल और देवांगना कलीता दोनों ही हिन्दू हैं, लेकिन नागरिकता कानून को मुस्लिम विरोधी बताते जामिया, जाफराबाद, सीलमपुर और शाहीनबाग के प्रदर्शनों में भीड़ जुटाने के साथ हिन्दू विरोधी प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा बन गईं थीं। पिंजरातोड़ के प्रदर्शनों में महिला हित एकदम से गायब हो चुका था। हिन्दू विरोधी नारे, चित्र इनकी पहचान बन चुके थे। वूमेन विल डिस्ट्रॉय हिन्दू राष्ट्र, मैं भारत की माता नहीं बनूंगी से आगे बढ़कर हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाले नारे इनके प्रदर्शनों का चेहरा था। देश के 500 शहरों में उत्पात मचाने और असम को भारत से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम की गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई के लिए भी पिंजरातोड़ आन्दोलन चला रहा था और सबसे खतरनाक कि जाफरबाद में भीड़ जुटाकर उस समय कानून व्यवस्था खराब करने की कोशिश की, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली में थे।
छात्राओं के अधिकार मुक्ति के लिए शुरू हुआ संगठन पूरी तरह से देश विरोधी एजेण्डे पर काम करता दिख रहा था और यहां तक कि इसमें वामपंथी विचारों के अलावा दूसरे किनारे लगने लगे। 20 फरवरी 2019 को पिंजरा तोड़ से दलित छात्राओं के एक समूह ने यह कहते हुए किनारा कर लिया कि पिंजरातोड़ में दलित छात्राओं के अधिकार की कोई बात नहीं होती है और यह विशेष विचारधारा के प्रचार प्रसार के लिए काम करने वाला संगठन है। दिल्ली के प्रतिष्ठित कॉलेजों, मिरांडा हाउस, लेडी श्रीराम कॉलेज, सेंट स्टीफेंस से महिलाओं के लिए समान अधिकारों के नाम पर शुरू हुए इस संगठन ने बड़ी तेजी से देश भर में जगह बना ली, लेकिन अब दिल्ली दंगों में पिंजरा तोड़ की साजिशी भूमिका सामने आने से सिर्फ दलित छात्राओं के मन में ही नहीं, देश भर की छात्राओं के मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि पिंजरा तोड़ उनके अधिकारों के लिए ताकत इकट्ठी कर रहा था या फिर विश्वसनीयता खो चुके वामपंथी संगठनों ने पिंजरा तोड़ का इस्तेमाल भारत तोड़ने वाले प्रदर्शनों के लिए कर लिया है। लैंगिक समानता और सुरक्षित विश्वविद्यालय परिसर के नाम पर शुरू हुआ पिंजरातोड़ आंदोलन अब अतिवादी वामपंथी और कट्टर इस्लामिक ताकतों के हाथ में खेल रहा है और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक देश विरोधी हरकतों में शामिल हो चुका है। जातीय और सांप्रदायिक विभाजन इनकी गतिविधियों का नियमित हिस्सा बन चुका है। पिंजरा तोड़ संगठन की भूमिका को पूरी तरह से उजागर करने की जरूरत है क्योंकि देश के छोटे बड़े शहरों के परिसरों में पिंजरा तोड़ महिला समानता के नाम पर घुस चुका है और अगर दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में लगे आरोपों में सच्चाई है तो परिसरों में पिंजरा तोड़ का असली चेहरा भी छात्राओं के सामने आना जरूरी है। दिल्ली दंगों में इनकी भूमिका के बाद संगठन को पिंजरा तोड़ की बजाय भारत तोड़ संगठन कहना उचित रहेगा।  
(यह लेख 13 जून 2020 को इंदौर से निकलने वाले अखबार प्रजातंत्र में छपा है)

Monday, May 25, 2020

हिन्दुओं का विरोध करके बुद्धिजीवी बनने की बीमारी



हिन्दू महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं। इस पूजा का मूल उद्देश्य अपने पति की दीर्घायु की कामना होता है और इसमें पूजा भी उसी सावित्री की होती है, जिसने अपने पतिव्रत धर्म के पालन से उच्च आदर्शों वाले पति सत्यवान को यमराज से भी वापस ले लिया था। सावित्री के साथ उस बरगद वृक्ष की भी पूजा इस व्रत में हिन्दू महिलाएं करती हैं, जिसके नीचे सावित्री की गोद में बैठकर सत्यवान के प्राण निकल गये थे, लेकिन पतिव्रता सावित्री ने यमराज को भी विवश कर दिया की पति सत्यवान को उन्हें फिर से जीवन देना पड़ा। संयोग से इस वर्ष का यह व्रत कोरोना वायरस के बीच में हुआ जब चौथे चरण की देशबंदी के बीच देश गुजर रहा है। सामान्य गतिविधियां बंद हैं, ज्यादातर मंदिरों पर ताले पड़े हुए हैं। गांवों में तो महिलाओं को मंदिरों पर ताले पड़े होने या फिर सामान्य गतिविधि चलने न चलने से खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि लगभग हर गांव के अगल-बगल 2-4 बरगद के विशाल वृक्ष होते ही हैं, जहां हिन्दू महिलाओं ने जाकर अपने पति की दीर्घ आयु के साथ बरगद की परिक्रमा करते हुए अपना व्रत किया, लेकिन शहरों में संकट खड़ा हो गया। जहां ज्यादातर मंदिरों के दरवाजों पर ताले लगे हुए थे। देश के करोड़ों मंदिरों के पुजारियों के लिए जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है क्योंकि, मंदिरों पर ताला लगा हुआ है और इस ताले में मंदिरों के भीतर लगे बरगद वृक्ष पर भी ताला लग गया। वट सावित्री की पूजा करने वाली शहरी महिलाओं के लिए सबसे बड़ा संकट बरगद कगा वृक्ष खोजना हो गया। शहरों में बरगद के पेड़ ना के बराबर हो गये हैं। शहरों में बहुत से लोगों के लिए बरगद का वृक्ष पहचानना भी असहजता की वजह बन जाता है। वट सावित्री पूजा में आस्था रखने वाली महिलाओं ने सड़क किनारे कहीं भी मिल गये बरगद के चक्कर लगाकर या फिर गमले में बरगद की टहनी लगाकर और बच्चों में पूड़ी हलवा और चना बांटकर अपना व्रत पूरा किया। कहीं-कहीं इस आस्था के चक्कर में एक ही बरगद के इर्द गिर्द चक्कर लगाती कई महिलाओं की तस्वीर एक साथ दिखी और तुरन्त तथाकथित निष्पक्ष वामपंथी बुद्धिजीवियों ने सवाल पूछा कि आखिर सोशल डिस्टेंसिंग कहां चली गयी और वट सावित्री का व्रत रखने वाली हिन्दू महिलाओं का मजाक बनाया गया।
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश सरकार को 1000 बसों का प्रस्ताव पेश किया और कहाकि 1000 बसों का प्रयोग उत्तर प्रदेश की सीमा पर जुटे मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए किया जाए। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1000 बसों की सूची मांगी और फिर बसों की सूची में ऑटो, दुपहिया और ट्रक भी शामिल होने की जानकारी सार्वजनिक की गयी। इसके बाद कांग्रेस और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप हुए और आखिरकार कांग्रेसी बसों को स्वीकृति नहीं दी गयी। कांग्रेस और देश के तमाम निष्पक्ष बुद्धिजीवियों ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर निकृष्ट राजनीति करने का आरोप लगाया, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने इसके जवाब में कोटा से उत्तर प्रदेश के छात्रों को लाने के लिए राजस्थान सरकार को भरा गया बिल सार्वजनिक कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को मजदूरों की या छात्रों को भेजने की चिंता से ज्यादा विशुद्ध राजनीति करके योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि खराब करने की ज्यादा चिंता हो रही थी और कांग्रेस की इस राजनीति को कांग्रेस की रायबरेली की विधायक अदिति सिंह ने सार्वजनिक आलोचना करके कांग्रेस को निरुत्तर किया तो उनको नोटिस भेज दिया गया, लेकिन उसी समय कांग्रेस पंकज पुनिया ने ट्विटर पर लिखा कि कांग्रेस सिर्फ मजदूरों को अपने खर्च पर उनके घर भेजना चाहती थी। बिष्ट सरकार ने राजनीति शुरू की। भगवा लपेटकर यह नीच काम संघी ही कर सकते हैं और इसके बाद जो कांग्रेसी नेता पंकज पुनिया ने लिखा उसे मैं यहां नहीं लिख सकता। पंकज पुनिया ने हिन्दू, भगवा और हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम तक को अपने ट्वीट में लपेट लिया। बाद में पंकज पुनिया की गिरफ्तारी की मांग तेज हुई तो ट्विटर पर माफी मांगकर मामले को रफा दफा करने की कोशिश की, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ और करनाल में पंकज पुनिया की गिरफ्तारी हुई। अदिति सिंह को नोटिस देने वाली कांग्रेस ने पंकज पुनिया पर दिखावे के लिए भी कुछ नहीं किया और तथाकथित निष्पक्ष बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उस समय पंकज पुनिया का लानत भेजने के बजाय कुम्भ के समय प्रयागराज में खड़ी बसों की कतार दिखाकर बता रहे थे कि कांग्रेस की भेजी बसों को योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंजूरी दी और निष्पक्ष बुद्धिजीवियों में बचे योगी सरकार पर आरोप लगाते कह रहे थे कि अगर कुम्भ में इतनी बसें लग सकती हैं तो मजदूरों को भेजने के लिए क्यों नहीं। इस देश के तथाकथित निष्पक्ष बुद्धिजीवी धरातल की वास्तविकता से कितने कटे हुए हैं, इसका अनुमान कुम्भ पर की गयी टिप्पणी से ही लग जाता है। इन्हें अनुमान नहीं है कि आज जो मजदूर सड़कों पर है या फिर ट्रेनों-बसों के जरिये अपने घरों तक पहुंचाया जा चुका है, उसी के लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार ने बसों का भव्य इंतजाम किया था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और एक योगी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है, इतना तो देश के निष्पक्ष बुद्धिजीवियों के विरोध के लिए मजबूत आधार बन जाता है। इस विरोध में यह जरूरी आंकड़ा भी उन्हें नहीं दिखता कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अब तक 20 लाख से ज्यादा मजदूरों को वापस प्रदेश में लाने का कार्य पूरा किया है। इसके लिए बसों और विशेष ट्रेनों का उपयोग किया गया। देश में ट्रेनों से कुल 21 लाख के करीब प्रवासी मजदूर आए, इसमें सबसे ज्यादा 1154 ट्रेनों का उपयोग करके उत्तर प्रदेश ने अपने 15 लाख 27 हजार श्रमिकों को राज्य में वापस बुलाया।
उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित फिल्मसिटी में ज्यादातर टीवी चैनल हैं। एक टीवी चैनल के कई कर्मचारियों को कोरोना हो गया और जब इसकी खबरें बाहर आईं तो देश के तथाकथित निष्पक्ष बुद्धिजीवी अद्भुत तरीके से प्रसन्न हो गये। तुरन्त उन्होंने उस मीडिया चैनल के कार्यालय को निजामुद्दीन के तबलीगी जमात के मुख्यालय, मरकज जैसा बता दिया। पत्रकार, बुद्धिजीवी अगर इस बात पर प्रसन्न हो रहे हों कि उस मीडिया हाउस के कर्मचारियों को कोरोना हो गया है, जिसने मरकज के खिलाफ जमकर कहानियां लोगों को दिखाईं तो इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि देश का निष्पक्ष बुद्धिजीवी दरअसल तब्लीगियों की बेहूदगी पर चुप्पी साधे बैठा तो इसकी वजह कोई मुसलमानों से उनका प्रेम नहीं था, दरअसल यह उनका हिन्दू विरोध था जो अलग-अलग घटनाओं पर निकलकर सामने आ जाता है। हिन्दू विरोध में किसी भी हद तक जाने वाले तथाकथित निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को हिन्दू अब पहचान गया है, लेकिन दुर्भाग्य से मुसलमान इन्हें अपना हितैषी मान लेता है और उसका नुकसान हिन्दू-मुसलमान दोनों को बराबर हो रहा है। सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि देश में महामारी से लड़ने में जब देश को एकसाथ होना चाहिए तो देश के तथाकथित बुद्धिजीवी हिन्दू मुस्लिम विभाजन कराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
(यह लेख इंदौर से निकलने वाले अखबार प्रजातंत्र में 25 मई को छपा है)

Monday, May 04, 2020

खोदा पहाड़, निकली चुहिया

राहुल-रघुराम की बातचीत से निकला क्या ?

दुनिया के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने चाइनीज वायरस के संकट के दौर में शिकागो से दिल्ली में केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से बातचीत की। बाकायदा कांग्रेस ने बड़ी तैयारी के साथ इस बातचीत को पहले से प्रचारित किया था। सबको इसकी प्रतीक्षा थी क्योंकि रघुराम राजन जैसे दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री इस तरह से सार्वजनिक तौर पर प्रचारित बातचीत में शामिल हो रहे थे तो सबको भरोसा था कि भारत और विश्व के लिए कुछ बेहतर आर्थिक सूत्र निकलकर आएंगे। केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी औपचारिक अभिवादन के बाद कुछ इसी अंदाज में बातचीत शुरू की थी कि उन्हें और उस चर्चा को देखने वालों को भारत अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने और उससे बाहर निकलने का मंत्र दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री रघुराम राजन देंगे। इतनी उम्मीद इसलिए नहीं थी कि राहुल गांधी, रघुराम राजन से बात कर रहे थे। उम्मीद की वजह थी उन रघुराम राजन की वजह से जो अभी शिकागो विश्वविद्यालय के शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में केथरीन डुसाक मिलर विशिष्ट सेवा प्रोफेसर के तौर पर अर्थशास्त्र के छात्रों को अर्थशास्त्र के गुर सिखा रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से रघुराम राजन ने अपना सारा ज्ञान अपने विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ही बचाकर रख लिया और राहुल गांधी के साथ हुई उनकी 28 मिनट से थोड़ा ज्यादा हुई बातचीत में सिर्फ एक बात निकलकर आई कि देश के गरीबों, मजदूरों, जरूरतमंदों को सरकार की तरफ से तुरन्त मदद की जरूरत है और राहुल गांधी के पूछने पर 65 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा भी रघुराम राजन ने बताया। क्या सिर्फ यह 65 हजार करोड़ रुपये का आकड़ा सुनाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपने एक सांसद की बातचीत को इतना प्रचारित किया था और अगर हां, तो खोदा पहाड़, निकली चुहिया कहावत को इससे अधिक चरितार्थ करने वाली घटना हाल में हुई हो, ध्यान में नहीं आता। रघुराम राजन को अर्थशास्त्री के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए था क्योंकि इस बार खुला खतरा था। इससे पहले रघुराम राजन यूपीए के शासनकाल में आर्थिक नीतियों को तय करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर रहकर वापस शिकागो विश्वविद्यालय पढ़ाने लौट गए, लेकिन उस दौरान हुई आर्थिक गड़बड़ियों के लिए उन पर ऊंगली कम ही उठाई जाती है। इसकी बड़ी वजह यही रही कि दुनिया के एक और आर्थिक विद्वान डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज थे तो रघुराम राजन से भला सवाल क्यों पूछा जाता, लेकिन आज यह प्रश्न पूछना जरूरी है कि किस मोह में रघुराम राजन ने राहुल गांधी को दुनिया की स्थिति और उसके मुकाबले भारत की स्थिति, भारत की सरकार फैसले और उसके अच्छे-बुरे होने बात नहीं की।
रघुराम राजन अभी अमेरिका के तीसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर शिकागो से बात कर रहे थे। अमेरिका में चाइनीज वायरस से प्रभावित मरीजों का आंकड़ा 10 लाख के पार चला गया है और करीब 64 हजार अमेरिकियों की जान नहीं बचाई जा सकी है। राजन जिस शिकागो शहर से बोल रहे थे, उस राज्य इलनॉइस में करीब 53 हजार मामले सामने आए हैं और तेईस सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस दिल्ली शहर में बैठकर बात कर रहे थे, वहां कुल 3515 मामले सामने आए हैं और 59 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। पूरे भारत में अब 35 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और ग्यारह सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। भारत के सर्वाधिक प्रभावित महाराष्ट्र में दस हजार से ज्यादा मामले सामने आए और साढ़े चार सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस केरल के वायनाड से सांसद हैं, उस केरल राज्य में ही चाइनीज वायरस के शुरुआती मरीज आए थे, लेकिन केरल में अभी भी इस बीमारी से पीड़ित कुल मामले 500 के नीचे ही हैं और उसमें से 383 बचा लिए गए, 4 की जान नहीं बचाई जा सकी। देश की सबसे बड़ी आबादी, करीब 22 करोड़ जनसंख्या, वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बाइस सौ से कुछ ज्यादा मामले सामने आए हैं और साढ़े पांच सौ लोगों को बीमारी से बचाने में सफलता मिल चुकी है और 40 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी और रघुराम राजन की बहुप्रचारित चर्चा में अगर इस नजरिये से बात होती तो दुनिया में भारत की छवि और बेहतर होती। इन आंकड़ों के साथ आलोचना भी होती और उसे ठीक करने की चर्चा होती तो भारत की सरकार पर और देश की राज्य सरकारों पर ज्यादा बेहतर करने का दबाव भी बनता, लेकिन रघुराम राजन ने राहुल गांधी के साथ बातचीत में वह नहीं किया, जिससे भारत की सरकार पर, देश की राज्य सरकारों पर बेहतर करने का दबाव बनता और दुनिया यह भी देखती कि भारत की स्थिति दुनिया के मुकाबले कितनी अच्छी है। इससे चीन से निकलने वाली दुनिया की कंपनियों को स्पष्ट संदेश भी जाता कि भारत एक बेहतर जगह हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से यूपीए शासनकाल में और कार्यकाल पूरा होने तक मोदी के पहले शासनकाल में भी आर्थिक नीतिनियंता की कुर्सी पर बैठने वाले रघुराम राजन ने भारत की छवि सुधारने की कोई कोशिश नहीं की।
राहुल-रघुराम की बातचीत दार्शनिक प्रश्नों, अथॉरिटेरियन मॉडल लिबरल मॉडल पर भारी पड़ने की कोशिश कर रहा है, समाज में विभाजन हो रहा है, सत्ता का विकेंद्रीकरण जरूरी, राज्य सरकारों-पंचायतों को अधिकार कम है, राजीव गांधी जिस पंचायत राज को लेकर आए, उसे कमजोर किया जा रहा है, हम पंचायत राज में आगे बढ़े थे, अब उस पर लालफीताशाही हावी हो गई है, दक्षिणी राज्य अच्छा कर रहे हैं, विकेंद्रीकरण कर रहे हैं, उत्तरी राज्यों में लालफीताशाही हावी है। कुल मिलाकर कैसे खुले अर्थव्यवस्था से शुरू हुई राहुल-रघुराम की बातचीत इस कठिन चुनौतियों और अवसरों वाले समय में भारत की छवि खराब करने की मजबूत कोशिशों के साथ खत्म हो गई। एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के शुरुआती पैकेज में ही भारत सरकार ने कमजोर लोगों की जरूरत भर के राशन और नकदी का इंतजाम कर दिया था। छत्तीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी, केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग योजनाओं में जरूरतमंदों के खाते में सीधे डाले जा चुके हैं। महिला, किसान, दिहाड़ी मजदूर, मनरेगा मजदूर, सब सीधे खाते में रकम पा चुके हैं। नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बैनर्जी के अस्थाई राशन कार्ड की चर्चा करके छोड़ दिया गया, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरी सरकारों के बयान पर कोई बात न हुई कि इस समय जिसको जरूरत है, राशन मिलेगा, राशन कार्ड की जरूरत नहीं है। ऐसे कठिन समय में राशनकार्ड बनवाने का प्रस्ताव ही लालफीताशाही को जमकर बढ़ाने वाला है, लेकिन दुनिया के महान अर्थशास्त्री रघुराम राजन यह सब जानबूझकर नहीं देख रहे थे और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को यह समझा भी नहीं रहे थे। राहुल गांधी के एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी रघुराम राजन ने ठीक से नहीं दिया। राहुल गांधी ने पूछा कि अभी देश संकट में है, क्या इसके बाद भारत को कोई फायदा होगा, किस प्रकास दुनिया बदलेगी। राजन का जवाब आया कि किसी देश के लिए पॉजिटिव इफेक्ट नहीं, लेकिन देश इसका फायदा उठा सकते हैं और इसके लिए ज्यादा से ज्यादा देशों से संवाद की जरूरत है। होना यह चाहिए था कि रघुराम राजन चाइनीज वायरस के प्रकोप की वजह से बदल रही दुनिया में भारत की महत्वपूर्ण स्थिति को ज्यादा महत्वपूर्ण करने के तरीके बताते, लेकिन राजन यहां भी चुप साध गये। ठीक उसी तरह से जैसे यूपीए के शासनकाल में 2007 से 2014 तक आर्थिक नीतियां तय करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद बैंकिंग तंत्र की गड़बड़ियों पर आंखें मूंदें रखीं। क्या रघुराम राजन खुद को 1991 वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह की तरह अगली यूपीए सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं और इसीलिए आर्थिक नजरिया बताने के बजाय राजनीतिक नजरिये से वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। डॉक्टर रघुराम राजन 2007-08 में आर्थिक मामलों के सुधार पर बनी समिति के अध्यक्ष थे। 2008-12 तक वो प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार थे। 2012 से रिजर्व बैंक गवर्नर बनने तक रघुराम राजन देश के वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। 2007 से लेकर 2013 तक देश में आर्थिक अराजकता चरम पर थी। आज जिन डूबते कर्जों की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी, उन्हें 2006-08 के दौरान ही बांटा गया था और यह बात खुद डॉक्टर रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर से हटने के बाद बताया था। राहुल गांधी को इस बात का ख्याल भले न हो कि उनकी छवि का क्या होगा, लेकिन डॉक्टर रघुराम राजन को इस छवि का ख्याल रखना था और जिस देश में राजन को इतने शीर्ष पदों पर बैठने का अवसर मिला, इस अवसर का प्रयोग उन्हें उसकी छवि दुरुस्त करने के लिए करना था, जो राजन नहीं कर सके। कुल मिलाकर यह सवाल हमेशा पूछा जाता रहेगा कि महामारी के दौर में देश को जब आर्थिक मंत्र की जरूरत थी तो रघुराम राजन जैसे विद्वान अर्थशास्त्री सिर्फ राजनीतिक एजेण्डा पेश करके क्यों चले गये। 
(यह लेख आज इंदौर से छपने वाले प्रजातंत्र अखबार में छपा है)

Thursday, April 30, 2020

ऐतिहासिक अवसर है, चूकिए मत मोदी जी !


चीन का डर, भारत का अवसर बनेगा ?

चाइनीज वायरस को पूरी तरह से खत्म होने में वक्त लगेगा, लेकिन इस वायरस का प्रकोप खत्म होते पूरी विश्व संरचना बदल जाएगी। इसमें भारत की भूमिका भी बदल सकती है, बेहतर हो सकती है, लेकिन प्रश्न है कि क्या हमारी नीतियां और उन्हें लागू करने में तेजी भारत को पुन: विश्व गुरु का दर्जा दिला पाएंगी। 3 मई को जब देशबंदी का दूसरा चरण समाप्त होगा, उसके बाद भारत सरकार और राज्य सरकारें विश्व निवेशकों को क्या सकेंते देंगे, उसी से तय होगा कि भारत इस ऐतिहासिक अवसर का कितना लाभ उठा पाएगा। हालांकि, इस बात का अन्दाजा भारत सरकार को भी बहुत अच्छे से है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री नितिन गडकरी कह रहे हैं कि वायरस के बाद चीन के प्रति दुनिया भर के अविश्वास का लाभ भारत को उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी भरोसा जताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत सरकार इस अवसर का लाभ उठाने में कामयाब होगी। भारत सरकार में मंत्री होने के नाते नितिन गडकरी की यह सदिच्छा स्वाभाविक दिखती है और देश भी इसी तरह से देख रहा है कि चीन से कंपनियां जब बाहर निकलेंगी तो उनका स्वाभाविक ठिकाना भारत होगा। ताजा यूबीएस मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक चीन से बाहर जाने वाली कंपनियों के लिए भारत सर्वाधिक उपयुक्त स्थान हो सकता है। यूबीएस ने 500 बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट जारी की थी। इसका सीधा सा मतलब समझा जा सकती है कि सिर्फ भारत सरकार या उनके मंत्री ही नहीं, दुनिया भर की एजेंसियां यह मान रही हैं कि चीन से बाहर निकलने की इच्छा रखने वाली कंपनियों के लिए भारत सर्वोत्तम स्थान हो सकता है, लेकिन सिर्फ इस तरह की सद्भावना रिपोर्ट से निवेश नहीं आता है। चीन जैसे देश से कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाई भारत लेकर आएं, इसके लिए सबसे जरूरी है कि भारत की सरकार चीन में निर्माण इकाई लगाने वाली कंपनियों की एक रिपोर्ट तैयार करते कि आखिर किन वजहों से यह कंपनियां चीन में जमी हुई हैं। सस्ता श्रम और नीतियों में एकरूपता के मुकाबले में भारत चीन से प्रतिस्पर्धी हो चुका है, लेकिन क्या दूसरे मानकों पर भारत सरकार के विदेश और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार की है, इसका जवाब फिलहाल नहीं में ही दिख रहा है और यहीं पर आकर यह समस्या बड़ी होती दिखती है कि भावनात्मक सद्भावना रिपोर्ट से चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां भारत में कैसे आएंगी।
अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी युद्ध के दौरान ही अमेरिकी, जापानी और दक्षिण कोरियाई कंपनियां चीन से बाहर निकलने की तैयारी करने लगीं थीं। उसी समय भारत सरकार को यह तैयारी युद्धस्तर पर करना चाहिए था, लेकिन भारत सरकार इस काम में फिलहाल सफल नहीं हो सकी है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राजनयिक स्तर पर अमेरिकी, जापान, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों के साथ संबंध इतने बेहतर किए हैं कि सद्भावना के तहत इन देशों की कंपनियों की पहली प्राथमिकता भारत हो सकता है, लेकिन जैसा मैंने पहले कहाकि बड़ी कंपनियां सद्भावना रिपोर्ट के आधार पर अपना निवेश एक देश से दूसरे देश में नहीं ले जाती हैं। खासकर, चीन से कंपनियों को अपनी निर्माण इकाई दूसरे देश में ले जाना ज्यादा मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि चीन में कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा है। इस उहापोह के बीच ज्यादातर कंपनियां अमेरिका और चीन के कारोबारी युद्ध के दौरान योजना ही बनाती रहीं, लेकिन विश्वव्यापी चाइनीज वायरस के फैलाव के बाद सभी बड़ी कंपनियों ने अपनी निर्माण इकाइयां चीन से बाहर ले जाने के बारे में सोच रही हैं। सच्चाई यह भी है कि चीन में स्थापित कई विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों से बात कर रही हैं। दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका की कंपनियां दूसरे देशों पर भारत को प्राथमिकता दे रही हैं, लेकिन भारत सरकार को इसके लिए आक्रामक नीति तुरन्त लागू करने की जरूरत है। टेलीडाइन, एम्फीनॉल और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियां अपना कारोबार चीन से समेटना चाह रही हैं। अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी युद्ध की चपेट में आने से बचने के लिए जापानी कंपनियां रीको, सोनी और एसिक्स पहले ही चीन से बाहर अपनी उत्पादन इकाई ले जाने की योजना बना रही थीं और चाइनीज वायरस के संक्रमण के बाद जापान सरकार की 2.2 बिलियन डॉलर के प्रस्ताव ने दूसरी जापानी कंपनियों को भी चीन से बाहर निकलने के लिए तैयार कर लिया है, लेकिन मुश्किल वही है कि क्या इस अवसर का लाभ भारत पूरी तरह से उठा पाएगा या फिर नोमुरा की रिपोर्ट में दिख रहा संकट भारत की हानि बढ़ने वाला है। अब जरा कुछ तथ्य देखिए, चाइनीज वायरस के प्रकोप से पहले ही बीते जुलाई रीको ने प्रिंटर उत्पादन इकाई को चीन शेनझेन से थाईलैंड में ही शिफ्ट कर दिया था। नाइके वियतनाम और थाईलैंड के साथ भारत भी आने की संभावना तलाश रही है। तिमाही नतीजों का एलान करते पैनासोनिक के CFO हीरकाजू उमेडा ने स्पष्ट किया था कि उनकी कंपनी चीन से बाहर जाने की संभावना तलाश रही है। भारी खर्च के बावजूद जापानी कार कंपनी माजदा ने चीन के जियांगसू से अपना उत्पादन मेक्सिको के गुआनजुआटो इसी महामारी के बीच ही शिफ्ट कर लिया है। और, यह सब इसके बावजूद हो रहा है कि भारत सरकार ने मेक इन इंडिया के तहत विदेशी कंपनियों को भारत में लाने के लिए कॉर्पोरेट टैक्स 35 प्रतिशत से घटाकर 25.17 प्रतिशत कर दिया है। कई मामलों में तो यह 22 प्रतिशत तक और नई कंपनियों के मामले में 15 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है।
भारत को एक और बड़ा लाभ सभी देशों के मुकाबले यह भी है कि भारत ऐसा मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है, जहां उत्पादन की खपत भी पूरी हो सकती है, दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी यहीं मौजूद है। चीन के बाद भारत के पास ही इस तरह का बाजार है, लेकिन इस सबके बावजूद वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और थाईलैंड भारत से बाजी मार ले जा रहे हैं तो इसका सीधा दोष सरकारी नीतियों को लागू करने में शिथिलता पर ही जाएगा। चीन से ढेर सारी कपनियां बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं। कंपनियों ने चीन में इतना भारी निवेश कर रखा है कि एक साथ वहां से निकलना संभव नहीं, इसलिए कंपनियां दूसरे देशों में अपना छोटी-बड़ी आधार इकाई लगा रही हैंस जिससे उन्हें चीन से अपना कारोबार पूरी तरह समेटने में आसानी हो। फिलहाल शुरुआती इकाई लगाने के लए चीन से निकलने वाली कंपनियां भारत पर वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर को चुन रही हैं। भारत की प्राथमिकता थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों से बस थोड़ा ही ऊपर है। नोमुरा ने चीन से बाहर जाने वाली कंपनियों पर एक अनुमान लगाया है। नोमुरा प्रोडक्शन रीलोकेशन इंडेक्स 3 पैमाने पर बना है। पहला- चीन की ही तरह जिस देश से दुनिया भर में निर्यात किया जा सके, दूसरा- बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुणवत्ता सर्वेक्षण और तीसरा विदेशी निवेश FDI आकर्षित करने में नोमुरा के सूचकांक में स्थिति। इन तीनों पैमानों पर अगर कंपनियों को चीन से निकलना पड़ा तो उनकी पहली पसंद वियतनाम है, उसके बाद मलेशिया, सिंगापुर और भारत का स्थान आता है।
भारत सरकार उम्मीद कर रही थी कि चीन से आने वाली ज्यादातर कंपनियों के लिए पहली पसंद भारत बनेगा, लेकिन नोमुरा की रिपोर्ट इसके ठीक उलट बता रही है। नोमुरा ने चीन से बाहर जा रही 56 कंपनियों पर रिपोर्ट बनाई है और इसके मुताबिक 26 कंपनियां वियतनाम जा रही हैं, इसके बाद 11 कंपनियां ताईवान और 8 कंपनियां थाईलैंड संभावनाएं तलाश रही हैं, 56 में से सिर्फ 3 कंपनियां भारत आ रही हैं। वियतनाम को चीन के जैसे वातावरण का भी लाभ मिल रहा है। लेकिन यह प्रश्न बड़ा हो रहा है कि क्या कम्युनिस्ट शासन वाले चीन से कंपनियां कम्युनिस्ट शासन वाले वियतनाम, इस्लामिक देश या फिर राजशाही वाले थाईलैंड में जाना पसंद कर रही हैं जबकि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था में ढेर सारे आर्थिक सुधार हुए हैं। वियतनाम भी कम्युनिस्ट देश है और घोषित तौर पर समाजवादी नीतियों वाला देश होने के बावजूद तेजी से पूंजीवादी नीतियों को आगे बढ़ा रहा है। CCP यानि चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की तरह वियतनाम में CPV कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ वियतनाम का शासन है। ताइवान को वन चाइना पॉलिसी के तहत अपना हिस्सा मानता है हालांकि ताइवान चीन से संघर्ष कर रहा है और अमेरिका के साथ है। मलेशिया इस्लामिक देश है। इतनी विसंगतियों वाले देश अगर पूर्ण बहुमत की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के शासन वाले भारत पर भारी पड़ रहे हैं तो यह चाइनीज वायरस के खात्मे के बाद बदली विश्व परिस्थितियों में अच्छा संकेत नहीं होगा। आरसीईपी से भारत के बाहर निकलने की घरेलू उद्योगों की चिंता के अलावा एक बड़ी वजह यह भी थी कि चीन, वियतनाम और दूसरे देशों के जरिये अपना औद्योगिक उपनिवेश स्थापित कर सकता है। चीन से बाहर निकलने वाली करीब आधी कंपनियां अगर वियतनाम के रास्ते जा रही हैं तो यह लगभग वही स्थिति हो जाएगी।  नोमुरा की रिपोर्ट स्पष्ट बता रही है कि भारत सरकार को अपनी नीति बनाने और उसे लागू करने में देर नहीं करनी चाहिए वरना उसे बड़ी हानि हो सकती है।
अभी चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां अगर भारत नहीं आ रही हैं तो उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि चीन से निकलने वाली कंपनियां भारतीय कंपनियों से बात करती हैं तो पता चल रहा है कि फिलहाल यहां कारोबार कब शुरू होगा, इसके बारे में कोई स्पष्टता ही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, चीन से बाहर निकल रही कंपनियों को भारत लाने के लिए बात करते हुए, देश में कारोबार को चरणबद्ध तरीके से शुरू करे। चाइनीज वायरस के बाद बदलते विश्व में भारत को ऐतिहासिक अवसर मिल रहा है, यह अवसर चूके तो हम कभी विश्व गुरू थे, यह बताएंगे और यह अवसर चुनौती की तरह लेकर अपने पक्ष में कर लिया तो विश्व गुरू भारत को दुनिया मान लेगी। इस ऐतिहासिक अवसर को भारत के पक्ष में कैसे बदलना है, इसकी योजना बनाकर लागू करने के लिए ही जनता ने प्रचण्ड बहुमत से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर चुना है। 

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  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...