Wednesday, October 14, 2020

चीन के साथ भारत की विदेश नीति बदलने का यही सही वक्त है

 चीन के साथ भारत की समारिक नीति किस तरह से बदली है और प्रभावी है, इसका अहसास भारतीयों के साथ पूरे विश्व को हो रहा है, लेकिन सातवें दौर की कोर कमांडर स्तर की वार्ता के बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान ने एक बार फिर से इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है कि कब तक भारत का विदेश मंत्रालय चीन के मामले में कड़ा रुख अपनाने से बचता रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन के सामने भारत का इतना कड़ा रुख कभी देखने को नहीं मिला, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे 20 सैनिक भारत की सीमाओं की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। हमारे सैनिकों ने इस बार धोखेबाज चीन की हरकत का इंतजार किए बिना कम से कम 6 रणनीतिक चोटियों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिससे सर्दियों में बर्फ बढ़ने पर भी चीन की सेना की अवैध घुसपैठ-कब्जे की कोशिश को नाकाम किया जा सके। पहली बार हुआ है कि रक्षा मंत्री सीधे तौर पर कह रहे हैं कि चीन और पाकिस्तान सैन्य रणनीति के तहत एक साथ भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने भी चीन से युद्ध की स्थिति में भारत की मजबूत स्थिति के बारे में स्पष्ट तरीके से बात की है। इतने स्पष्ट तरीके से युद्ध की स्थिति में चीन से निपट लेने की ताकत भारत के पास है, यह बात पहले कभी नहीं कही गई। कुल मिलाकर भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने तानाशाह चीन के खिलाफ सैन्य और आर्थिक रणनीति के तौर पर सीधे मोर्चा खोल दिया है और भारतीयों को इसका अहसास भी है। आर्थिक मोर्चे पर चीन के एप पर प्रतिबंध और चीन की कंपनियों के ठेके रद्द करने से लेकर चीनी उत्पादों के आयात पर अप्रत्याक्ष तरीके से प्रतिबंध लगाकर भारत सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर भी चीन से सीधा मोर्चा खोलने की कड़ी नीति अपना ली है, लेकिन सामारिक और आर्थिक मोर्चे के साथ अतिमहत्वपूर्ण विदेश नीति के मोर्चे पर अभी भारत बच बचाकर चल रहा है और यह रणनीति भारत के लिए अच्छी नहीं है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संसद में बता चुके हैं कि चीन ने भारत की करीब 45 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। अप्रैल के बाद से चीन ने भारतीय सीमा में कई स्थानों पर घुसपैठ की कोशिश की। गलवान घाटी में हमारे 20 सैनिक वीरगति प्राप्त हुए और चीन की पीएलए के कम से कम 60 सैनिकों की गर्दनें तोड़ दीं। इससे अपनी ताकत से भारत को पीछे धकेल देने के चीन के अहंकार को झटका जरूर लगा, लेकिन बौखलाया चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और उसने गलवान का मोर्चा बुरी तरह से हारने के बाद पैंगोंग सो झील के क्षेत्र में अवैध कब्जा कर लिया। भारतीय सैनिकों ने भी अस्थाई चौकी को स्थाई चौकी में बदलकर चीनी सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया है और भारतीय और तिब्बती सैनिकों ने काली पहाड़ी पर कब्जा करके चीन को उसकी सैन्य कमजोरी का भी अहसास करा दिया। ब्लैक टॉप पर चीनी सेना के साथ हुए संघर्ष में कई चीनी सैनिक मारे गए और एक भारतीय सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुआ। भारतीय सेना के स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के तिब्बती जवान नीमा तेनजिन को पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ विदाई दी गई और भारत माता की जय, तिब्बत देश की जय के नारे एक साथ लगे, लेकिन चिढ़े हुए तानाशाह चीन की सेनाओं ने अभी भी लद्दाख के कुछ क्षेत्रों में घुसपैठ कर रखी है। इसी पर भारत और चीन के बीच कमांडर स्तर की सातवें दौर की वार्ता 12 अक्टूबर को हुई। इस वार्ता में विशेष प्रगति की खबरें नहीं हैं और इसी बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को चीन भारत का हिस्सा नहीं मानता है। भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर कड़ी प्रतिक्रिया आनी चाहिए थी, लेकिन अभी तक विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। सामरिक और आर्थिक नीति में चीन के प्रति भारत ने बड़ा बदलाव किया है और कड़ाई से चीन की विस्तारवादी नीति पर चोट पहुंचाने में सफलता भी प्राप्त की है, लेकिन तीसरे महत्वपूर्ण मोर्चे विदेश नीति में बच बचाकर चलने की नीति पहले दोनों मोर्चे पर कड़े रुख का प्रभाव कम कर सकती है। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर को इस बात का अहसास नहीं है। विदेश नीति के मोर्चे पर चीन की तगड़ी घेरेबंदी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर कामयाब भी रहे हैं। विदेश मंत्रालय के बदले रुख का प्रमाण ताइवान के मसले पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान भी दे रहा है, लेकिन इसे बिना किसी देरी के ज्यादा धार देने की जरूरत है।   

भारत और चीन की सेनाओं के बीच कमांडर स्तर की सातवें दौर की वार्ता से ठीक दो दिन पहले ताइवान का राष्ट्रीय दिवस था। भारतीय अखबारों में ताइवान के राष्ट्रीय दिवस का विज्ञापन छपने पर दिल्ली में चीनी दूतावास ने भारतीय मीडिया को सलाह के अंदाज में धमकी दी कि आपको भारत सरकार की अधिकारिक वन चाइना नीति पर ही चलना चाहिए और ताइवान को एक देश और वहां की राष्ट्रपति साई इंग वेन को राष्ट्रपति नहीं लिखना चाहिए, लेकिन यह धमकी चीन पर उल्टी पड़ गई। दरअसल, तानाशाही चीन को चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के बंधक मीडिया की आदत थी और भारतीय मीडिया ने तानाशाह चीन को लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता और ताकत का अहसास करा दिया। साथ ही भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय मीडिया पर सरकार नियंत्रण नहीं है और भारतीय मीडिया उन सभी मुद्दों पर बात करता है जो उसे महत्व के लगते हैं। यह पहला कदम है। अब इससे कई कदम और आगे बढ़ने की जरूरत है और शुरुआत ताइवान के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल करने से हो सकती है। 3 दशकों में तानाशाह चीन के चंगुल से निकलकर एक बेहत लोकतंत्र बनने की ताइवान की कोशिश को समर्थन देकर भारत की सरकार चीन के लद्दाख और अरुणाचल पर अनर्गल बयानों पर आइना दिखा सकती है। साथ ही आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर कड़ी नीति से मिली बढ़त को बरकरार भी रख सकती है। दशकों बाद अमेरिका ने ताइवान के साथ अधिकारिक तौर पर संबंध बहाल कर दिए। चीन की धमकी और सबमरीन की तैनाती के बावजूद अंडर सेक्रेटरी कीथ क्रेच सितम्बर में ताइवान के दौर पर पहुंचे थे। चीन की तानाशाही कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ भारतीय जनमानस है और ताइवान की लोकतांत्रिक सरकार के साथ भारतीय खुद को जोड़कर देख रहा है। भारतीयों ने ताइवान का राष्ट्रीय दिवस जमकर मनाया और ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने ताजमहल भ्रमण की तस्वीरें डालकर लिखा कि भारत से उन्हें बहुत प्यार है। लद्दाख में चीनी सेनाओं की घुसपैठ को खत्म करने के लिए हो रही वार्ता के बीच चीन ने लद्दाख और अरुणाचल पर दावा करके स्पष्ट कर दिया है कि चीन संबंधों में बेहतरी की कोई कोशिश नहीं कर रहा, बस मौके का इंतजार कर रहा है। भारत ने चीन के साथ इस समय बढ़त हासिल की है तो उसकी बड़ी वजह यही रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर चीन की सीधी चुनौती स्वीकार करने में देरी नहीं की। अब यही सही वक्त है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के खिलाफ विदेश नीति के मोर्चे पर भी सीधे और कड़े मुकाबले का ऐलान कर दें। तिब्बत और हांगकांग में लोकतंत्र का दमन कर रहे चीन के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में कभी-कभी धीमी आवाज उठती रही है, उसे भारत का साथ मिला तो पूरी दुनिया को यह आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। 

(यह लेख मनी कंट्रोल डॉट कॉम पर छपा है)

5 comments:

  1. 🌹जय श्री राम 🌹🙏🙏🙏🙏

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  2. NA JHUKE HAIN NA JHUKENGE. CONGRESS KI JHUKNE KI NITI AB NAHI CHALEGI.

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  3. बढ़िया लिखा है आपने, लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अंदर जो साँप और ग़द्दार देख रहा हूँ उससे तो लोकतंत्र और संविधान से भरोसा उठ गया है । अभी भी लगता है गाँधी गिरी का कीड़ा देश के लोगों के दिमाग़ से गया नहीं है।

    शक्तिशाली देश बनने के लिए भारत को अंदर के दुश्मनों का भी वैसे ही ख़ात्मा करना होगा जैसा बाहर का किया जाता है। देश के लोगों को भी साथ देना होगा। भारत के लोग, ख़ासकर हिंदू जल्दी जल्दी में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते आए है, इनको शायद मोदी तो क्या स्वयं भगवान भी आ जाए तो शायद ना बचा पाए

    मेरा काम लोगों को समझना है और वो मैं सदैव करता रहूँगा, लेकिन देश के लोगों को देखकर कभी कभी सोचता हूँ की मोदीजी भी कैसे निक्कमो पर अपना जीवन बर्बाद कर रहे है।

    देश के लोगो, जितना मोदी काम करते है उतना ही तुम्हें भी हाथ बटाना होगा.. लड़ना होगा देश के अंदर के ग़द्दारों के ख़िलाफ़, गाँधी के पागलपन के ख़िलाफ़ और इस टूटी फूटी ज़बरदस्ती देश पर लादी गए संविधान के ख़िलाफ़

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  4. ऐसा लगता है जैसे भारत कभी अपने आस पास वाले छोटे देशों को अपने क़ब्ज़े में कर नहीं पाया, भारत पैसा और विकास तो देता है आस पास के देशों को लेकिन बदले में कुछ नहीं लेता, ये काफ़ी बेवक़ूफ़ी वाला काम लगता है। दो देशों के बीच का रिश्ता और दो लोगों या परिवारों का रिश्ता अलग होता है। लोगों या परिवारों पर शगुन में या प्यार से पैसे लूटाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन किसी देश पर लुटाने से पहले शायद सौ पर सोचने की ज़रूरत है इससे हमारे देश को क्या मिलेगा, केवल कुछ समय के लिए कुछ अच्छें शब्दों के अलावा।

    नेपाल, मालदीव, श्री लंका जैसे देशों को ही देख लीजिए, इतना पैसा और ट्रेनें, सड़के, खाना पानी दिया है भारत ने इनको सालों से लेकिन इन तीनो ने ज़रूरत के वक्त भारत के पीठ में छूरा घोपा है। नेपाल की तो कहानी ही अजीब है, भिकमँगा देश जिसका कुछ है नहीं और जो भारत के टुकड़ों पर पलता आया है वो आज भारत को आँख दिखा रहा है।

    भारत जितना बड़ा देश है उस हिसाब से भारत का उतना वर्चस्व या ठाठ नहीं है विश्व में। दुनिया उन्ही से डरती है जो ताकतवर होता है, जो ग़द्दारी की सजा देता है, जो एक रुपया देता है तो १० रुपया वसूल भी करता है, जैसे अमरीका या चीन। भारत तो ये मानसिकता ही नहीं दिखती, भारत तो छोटे मोटे देशों से भी डरता हुआ दिखता है अक्सर.. मानसिकता बदलने की ज़रूरत है, हर जगह भारत ने अपने आपको धर्मशाला बना के रखा है, फोकट में आओ, फोकट में खाओ और फिर जिन्होंने खिलाया उन्ही को लात मारों

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