Friday, October 09, 2020

सामाजिक मुद्दों को संभाल क्यों नहीं पाती भाजपा

 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी


हाथरस विधानसभा सीट पर पिछले चार विधानसभा चुनावों से बहुजन समाज पार्टी का कब्जा था। 13वीं, 14वीं और 15वीं विधानसभा में एक समय में मायावती के बेहद खास रहे ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय चुनकर पहुंचे थे और 2012 में सीट सुरक्षित होने के बाद 16वीं विधानसभा में भी बसपा प्रत्याशी के तौर पर गेंदा लाल चौधरी को ही हाथरस की जनता ने चुना था, लेकिन 17वीं विधानसभा के लिए वर्ष 2017 में हुए चुनाव में स्थिति बदल गई और यह स्थिति सिर्फ हाथरस नहीं पूरे प्रदेश की बदली थी, जब उत्तर प्रदेश में जातीय आधार पर लड़ने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को जनता ने बुरी तरह नकार दिया था। अभी भी यह दोनों पार्टियां यादवों और और दलितों के मतों की ठेकेदारी की बात भले करें, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो गया कि अब जातीय मतों की उस ठेकेदारी से एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल चुका है। हाथरस विधानसभा 2017 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हरिशंकर महार ने बसपा के गेंदालाल चौधरी को हरा दिया। और, सिर्फ हाथरस विधानसभा ही नहीं, हाथरस लोकसभा की पांचों विधानसभा पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक ही चुने गए हैं। हाथरस की लोकसभा सीट से लगातार भारतीय जनता पार्टी का सांसद चुना जाता रहा है। अभी हाथरस सुरक्षित लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के राजवीर सिंह दिलेर सांसद हैं और 2009 में राष्ट्रीय लोकदल की सारिका बघेल एक बार भले सांसद चुनी गईं, लेकिन 1991 से 2019 तक 8 में से 7 चुनावों में भाजपा का ही सांसद बनता रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 में से 306 भाजपा विधायक हैं और सहयोगियों के साथ यह संख्या 318 पहुंच जाती है। अभी 8 विधानसभा सीटें खाली हैं, जिनमें से 7 पर उपचुनाव होने जा रहा है। राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 62 सीटों से भाजपा और 2 पर उसके सहयोगी, कुल मिलाकर 80 में से 64 सीटों पर भाजपा का ही परचम लहरा रहा है।

मार्च 2017 में आए विधानसभा चुनाव परिणामों और मई 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी को खूब जनसमर्थन प्राप्त है। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनने की वजह भी जनता से मिल रहा अपार जनसमर्थन है। अब हाथरस की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी को देखें तो इसके मूल में एक बात नजर आती है। इस मूल बात को अगर भारतीय जनता पार्टी समझ सके तो शायद इस तरह के संवेदनशील, सामाजिक मुद्दों पर जनता के आक्रोश से भविष्य में बच सकती है। हाथरस मामले की अब सीबीआई जांच घोषित हो चुकी है। हाथरस की बेटी इस दुनिया में नहीं रही और उसकी हत्या सहित बाद में जोड़ी गई दुष्कर्म की धाराओं में चार आरोपी जेल में भी हैं। अब गांव के दूसरे लोगों की बातें सामने आने से इस पूरे घटनाक्रम का शीर्षासन होता दिख रहा है, लेकिन यह विषयांतर हो जाएगा। असली बात यही है कि घटना में आरोपियों और घोषित अपराधियों के खिलाफ समय से कार्रवाई के बावजूद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ऐसे सामाजिक, संवेदनशील मुद्दों पर गलत तरीके से काम करती क्यों दिखी। विपक्ष की तरफ से इस घटना पर राजनीति हो रही है, इसे कहकर भारतीय जनता पार्टी पल्ला झाड़ लेना चाह रही है तो लंबे समय में यह भाजपा के खिलाफ जनमत बनने का आधार बन सकता है।

विपक्ष के पास प्रशासन या पुलिस नहीं होता तो जाहिर है कि विपक्ष की तरफ से उनके नेता ही ऐसे मुद्दों पर आगे होते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक दल के सत्ता में आने के बाद पुलिस-प्रशासन के जरिये ही जनता से जुड़े मुद्दों के समाधान की कोशिश लोकतंत्र में खतरनाक परिणाम तक पहुंचा सकती है जो हाथरस के मामले में भी स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। राज्य में जनमत से आए प्रचंड बहुमत और हाथरस की लोकसभा और सभी विधानसभा सीटों से भाजपा के ही प्रतिनिधि चुने जाने के बावजूद क्या पूरी घटना में भाजपा के किसी नेता, जनप्रतिनिधि की भूमिका आपने देखी या सुनी। जनप्रतिनिधि के तौर पर एम्स ऋषिकेश से उमा भारती का दर्द ट्विटर के जरिये लोगों ने सुना या फिर बलिया से एक भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह का लड़कियों को संस्कारी बनाने से ऐसी घटनाएं रुक सकती हैं, बताने वाला बेहूदा बयान सुना। इसे ऐसे देखें कि जिस जनता ने नरेंद्र मोदी के नाम पर मार्च 2017 और मई 2019 में भाजपा के सांसद, विधायक चुनकर भेजे, उन जनप्रतिनिधियों ने उन्हें मत देकर भेजने वाली जनता के बीच जाने की कोशिश ही नहीं की। इसको एक तरह से और देखा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की छवि इतनी बड़ी हो गई है कि किसी भी जनप्रतिनिधि या भाजपा नेता की छवि शून्य सी हो गई है। इसका फायदा भाजपा को इस तरह मिलता है कि विपक्ष के सभी नेताओं की छवि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने बहुत छोटी नजर आती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि योगीराज में विधायक, सांसद का कोई महत्व ही नहीं रह गया है। भाजपा वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की पार्टी है और इस तरह से जनप्रतिनिधियों का महत्वहीन होना उनके बीच चर्चा का विषय बनता है। विकास कार्यों और अपराध के मामलों की समीक्षा वाली लगभग हर बैठक से मीडिया में यह खबर जरूर आती है कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को बिना डरे, सीधे उन्हें रिपोर्ट करने को कहा है और किसी भी मामले में किसी भी नेता का दबाव बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे वह नेता भारतीय जनता पार्टी का ही क्यों न हो। मीडिया में तो यह खबर योगी आदित्यनाथ की अपराध, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस वाली छवि के तौर पर पेश की जाती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह होता है कि स्थानीय मीडिया से लेकर राज्य के मीडिया तक योगी आदित्यनाथ के अलावा किसी भी मंत्री, सांसद, विधायक का महत्व खत्म होता दिखता है। स्थानीय सांसद, विधायक अधिकारियों की कृपा पर आश्रित होने लगते हैं और धीरे-धीरे जनता के बीच निष्क्रिय होने लगते हैं।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के इर्द गिर्द रहने वाले अधिकारी किसी भी मंत्री से बहुत बड़े नजर आने लगे हैं। यहां तक कि पुलिस थाने में भाजपा के जनप्रतिनिधियों के साथ भी आए दिन बदसलूकी की खबर आती रहती है। जिस हाथरस से इतनी बड़ी गड़बड़ी की खबरें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंच गईं, वहीं बगल में ही अलीगढ़ के एक थाने में भाजपा के एक विधायक के साथ पुलिसवालों की बदसलूकी की खबरें अभी हाल में ही चर्चा में रहीं थीं। मुख्यमंत्री के सामने अधिकारी अकसर वही चित्र पेश करता है जो मुख्यमंत्री को अच्छा लगे। और, मुख्यमंत्री किसी मठ का मठाधीश हो तो यह शर्त अनिवार्य सी हो जाती है। इसमें थोड़ी बहुत सकारात्मक आलोचना की गुंजाइश जनप्रतिनिधियों के जरिये ही हो सकती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार में यह स्थान खत्म होता दिख रहा है। यही वजह है कि हाथरस मामले में एसडीएम, एडीएम, एसपी, डीएम से लेकर पीड़ित के परिवार से मिलकर आए डीजीपी हितेश अवस्थी और अतिरिक्त प्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी के मिलने खबरें सबके सामने आईं और मुख्यमंत्री कार्यालय से वीडियो कांफ्रेंसिंग करते मुख्यमंत्री की तस्वीरें भी, लेकिन हाथरस के स्थानीय विधायक, सांसद किसी चित्र में सहायक भूमिका में भी नहीं दिखे। ऐसे संवेदनशील, सामाजिक मामलों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों का एकदम गायब रहना लोकतंत्र में एक खालीपन पैदा करता है और उसी खालीपन को भरने की कोशिश विपक्ष कर रहा है। हर घटना में साजिश और फंडिंग की बात करके उत्तर प्रदेश सरकार जनप्रतिनिधियों की भूमिका के साथ ही मार्च 2017 और मई 2019 में भारतीय जनता पार्टी को मिले प्रचंड जनसमर्थन को भी कमतर साबित करने की कोशिश करती दिख रही है। जनमत से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं और उसके बहुमत से सत्ता मिलती है। मिली हुई सत्ता से जनता के हित के काम हों और जनप्रतिनिधि का महत्व बना रहे तो जनमत लंबे समय तक बनाए रखने में आसानी होती है। लोकतंत्र का यह सबसे आसान सूत्र है, लेकिन अकसर लोकतंत्र में छवि गढ़ने में इस सबसे आसान सूत्र को नेताओं की नजदीकी सलाहकार मंडली गायब कर देती है। उत्तर प्रदेश में भी यही हो रहा है।

(यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (11-10-2020) को     "बिन आँखों के जग सूना है"   (चर्चा अंक-3851)     पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. सर आप बहुत अच्छा लिखते हैं 🙏🙏
    और आप का यूं ट्यूब का भी बिबेचना भी बहुत अच्छा होता है हम रोज देखते है अब तो हम टीवी देखना ही बंद कर दिए
    🙏🙏💐

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  3. इस लेख के लिए आपका आभार 🙏
    काफ़ी कुछ समझने को मिला

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