नानाजी देशमुख की कर्मभूमि में नए पत्रकारों के साथ 2 दिन

नानाजी देशमुख की आज पुण्यतिथि है। पहली बार हमें भी चित्रकूट में उनका खड़ा किया काम देखने को मिला। 2 दिन रहते समझ आया कि नानाजी को संघ अगर राष्ट्रऋषि कहता है तो वो सर्वथा उपयुक्त है। नानाजी ने जो किया वो देश के किसी सर्वोच्च राजनेता ने भी शायद नहीं किया है। विधायक, सांसद, प्रधानमंत्री होकर आप अधिकतम यही कर सकते हैं कि अच्छी नीतियाँ बनाकर उनके क्रियान्वयन में तेज़ी ला दें। लेकिन एक पूरे समाज के उत्थान की अवधारणा तैयार करना, चित्रकूट के ग्रामीण इलाक़े में खुद रहकर उसे स्वावलम्बन का मज़बूत आधार देने का काम कोई ऋषि ही कर सकता है। नानाजी ने दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से ये कर दिखाया। लम्बे समय तक लगातार विरोधी विचार की सरकार होने से इतने बड़े काम की चर्चा भी संघ या उससे दुराग्रह न रखने वाले संगठनों के ज़रिये ही होती रही है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ग्रामोदय मेले के समापन के मुख्य अतिथि हैं। ये काम हिन्दुस्तान की असली विरासत को आगे बढ़ाने वाला है। नानाजी को शत शत नमन। नानाजी से कुछ हम भी प्रेरित हो सकें, इतनी ही उम्मीद।

ग्रामोदय मीडिया चौपाल में मीडिया के छात्रों से बातचीत
और उम्मीद की वजहें भी हैं। उम्मीद की वजह ये भी है कि आज पत्रकारिता के क्षेत्र में या दूसरे किसी भी क्षेत्र में जो बच्चे आ रहे हैं, उन्हें अच्छा-बुरा दोनों बहुत ज्यादा पता है। चित्रकूट के दीनदयाल शोध संस्थान परिसर में लगे अपने तरह के अनूठे मेले में बहुत कुछ देखने समझने को मिला। नानाजी ने किस साहस के साथ चित्रकूट जाकर एकदम से दंपतियों को तैयार किया होगा, ये भी अपने आपमें शोध का विषय है। दक्षिणपंथ की प्रयोगशाला के तौर पर मीडिया को इन जगहों की बात करनी चाहिए। किस तरह से दंपतियों को राष्ट्रनिर्माण मतलब ग्राम निर्माण है, ये नानाजी ने समझाया होगा। ये सब बाते हम जैसे लोगों को खींचती हैं। पहले से ही मैंने ये सोच रखा है कि साल में कम से कम 6 दिन अपने गांव जाकर रहूंगा। मैं अपना शहर इलाहाबाद भी अपने साथ लेकर ही चलता हूं। कई बार ये लोगों परेशान करता है कि मेरे अंदर इतना इलाहाबाद रहता है। कई बार अति जैसा लगता है। लेकिन, अब मैं अपने गांव को भी अपने साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा हूं। उस कोशिश को और पक्का करने का काम चित्रकूट ग्रामोदय मेले में जाकर हुआ है। खेती, गांव से जुड़ी कोशिशों पर मध्य प्रदेश सरकार का ये मेला आयोजन शानदार पहल है। दीनदयाल शोध संस्थान के साथ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी इसमें साझा आयोजक रहा।

इसी आयोजन के बीच में स्पंदन संस्था के अनिल सौमित्र ने हम सबकी सामूहिक धरोहर मीडिया चौपाल का भी आयोजन कर दिया। हालांकि, न कोई खास एजेंडा था और न ही हमें समझ आ रहा था कि दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों से चित्रकूट में जुट रहे मीडिया चौपाली क्यों करने आए हैं। लेकिन, 2 दिनों में अलग-अलग हुई बातचीत में माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार और ग्रामोदय विश्वविद्यालय के बच्चों ने उम्मीद बढ़ाई है। नए बनने वाले पत्रकार चौकन्ने हैं। वो बड़का टाइप दिखते और अभिनेता, अभिनेत्री टाइप चमकते पत्रकारों पर सवाल खूब उठा रहे हैं। वो ये भी पूछ लेते हैं कि बड़े पत्रकार दलाली ही करते हैं क्या? वो ये भी पूछ लेते हैं कि गांव की खबर सरोकारी पत्रकार भी क्यों नहीं उठाते? मैंने उन लोगों को यही कहाकि इसके लिए हमें अपने गांव को बचाना होगा, बढ़ाना होगा। गर्व के साथ वैसे ही अपने गांव का जिक्र करना होगा, उसकी फिक्र करनी होगी, जैसे लोग दिल्ली-मुंबई या दुनिया के बड़े शहरों की करते हैं। तभी जाकर कुछ हो पाएगा। शहर में 10 साल रह गए पत्रकार से ये उम्मीद कि वो गांव की सोचेगा और हम गांव से निकलकर जल्दी से शहरातू हो जाने की कोशिश में हैं, तो कैसे हो पाएगा। हम नए पत्रकारों को भी अपने अंदर का दोगलापन छोड़ना होगा। अच्छी बात ये रही कि ग्रामोदय मीडिया चौपाल में जुटे पत्रकारिता के छात्र खुले मन से खुद को तैयार कर रहे हैं। नानाजी देशमुख के स्वावलंबी गांव की तरह स्वावलंबी पत्रकार जितने ज्यादा तैयार हो सकेंगे, समाज का उतना भला होगा। 

Comments

Popular posts from this blog

क्या आपके यहां बेटी का पैर छुआ जाता है

संगत से गुण होत हैं संगत से गुण जात ...

काश! सरकार तानाशाह हो जाए