सार्क देशों का विवाद सुलझाने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में 
मीडिया की सार्क देशों के बीच विवाद सुलझाने में कोई भूमिका नहीं है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है। कुछ इस तरह की स्थितियां तैयार की जा चुकी हैं जिसमें लगता है कि गलती से भी मीडिया ये करने की स्थिति में नहीं है। मीडिया के पुराने लोग ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि मीडिया की विवाद सुलझाने में कोई भूमिका ही नहीं है। दरअसल हमारी मुश्किल ही यही है कि हम सार्क देशों के सारे विवाद को सुलझाने में मीडिया की भूमिका को हम सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी मीडिया की नजर से देखते हैं। सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश के भी अंग्रेजी मीडिया की ही नजर से। श्रीलंका, भूटान, मालदीव के पत्रकारों की नजर से सार्क देशों के बीच के संबंधों पर कभी बात भी हुई हो। ऐसा मुझे मुश्किल से ही याद आता है। दरअसल जब हम सार्क देश यानी दक्षिण एशिया के सात देशों के बीच के क्षेत्रीय संगठन की बात करते हैं। तो पहले हमारे लिए ये समझना बेहद जरूरी है कि आखिर क्षेत्रीय संगठन बनते क्यों हैं। इनकी जरूरत क्या होती है। इसका सीधा सा जवाब ये है कि एक तरह की सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक विरासत वाले देश आपस में एक दूसरे के बीच बेहतर संबंध के लिए इस तरह के क्षेत्रीय संगठन बनाए जाते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यूरोपीय यूनियन है। उनके बीच में आपसी कारोबार 62 प्रतिशत है। सार्क देशों के बीच में होने वाला कारोबार सिर्फ पांच प्रतिशत है।

हम दरअसल आपस में कारोबार के अलावा सारी बातचीत होती है। इसी से तय होती है कि सार्क देशों में क्या होने वाला है। एक उदाहरण देखिए अगर हम दिल्ली से पाकिस्तान कुछ भेजना चाहते हैं, तो ग्यारह गुना ज्यादा लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। क्योंकि, भारत और पाकिस्तान के बीच रास्ते खुले ही नहीं हैं। बंद हैं। इस कदर बंद हैं कि दिल्ली से इस्लामाबाद कोई सामान जाना है तो पहले मुंबई-दुबई के बाद ही पाकिस्तान की धरती पर पहुंचेगा। दरअसल भारत-पाकिस्तान के इलीट क्लास ने ये जानबूझकर तैयार किया है। जिससे दोनों देशों के बीच लोगों का संबंध न हो सके। फिर वो राजनीतिक इलीट हों या फिर मीडिया इलीट। खासकर अंग्रेजी मीडिया और अंग्रेजी भाषा के आधार पर राजनीति करने वाले राजनीतिक घरानों ने दोनों देशों के संबंधों को कभी बहुत ठीक नहीं रहने दिया। हां, ये जरूर है कि यही इलीट, अंग्रेजी मीडिया है, जो सार्क देशों के बीच संबंध सुधारने के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी दुकान चला पाता है। यही इलीट मीडिया ये बहस चलाता है कि सार्क देश अमेरिका के पिट्ठू हैं क्या। या फिर रूस का प्रभाव सार्क देशों पर कितना है। इस इलीट मीडिया ने कुल मिलाकर पूरे सार्क देशों को खिलौना बना दिया है। इस पर कितनी बहस भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान या सार्क देशों के मीडिया में हुई कि अफगानिस्तान की संसद को यूपीए के समय में तेजी से बनाया गया। एनडीए की सरकार आई, तो भी काम धीमा नहीं हुआ। भारतीय एजेंसियों ने वहां की संसद सलीके से तैयार की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसका उद्घाटन करके आए। दरअसल मीडिया सार्क देशों के बीच विवाद सुलझाने की भूमिका में आना ही नहीं चाहता। वो विवाद बढ़ाने में इस कदर लगा रहता है कि भारत-पाकिस्तान के न्यूज चैनलों पर एक दूसरे देश के अतिवादी विचार के लोग बहस में सिर्फ भावनाएं भड़काने का काम करते हैं। कितनी बार होता है कि जब भारतीय चैनल भारत-पाकिस्तान के बीच या फिर भारत और दूसरे सार्क देशों के बीच के कारोबार पर बहस करते हों। वो भी बहस तब होती है जब दो देशों के बीच रिश्ते किसी भड़काऊ वजह से खराब हो रहे होते हैं। पाकिस्तान की प्याज की बात होती है। जब भारत में प्याज के दाम आसमान पर होते हैं, तो पाकिस्तानी प्याज की बात भी होती है। लेकिन, उसमें ऐसा भाव मीडिया दिखाता है कि जैसे कितने बुरे दिन आए गए कि अब भारतीयों को पाकिस्तानी प्याज खानी पड़ रही है। शर्म का भाव होता है। मीडिया, पत्रकार कब सार्क की इन मुश्किलों की बात करता है। नहीं करता है। इसके पीछे एक बड़ी मुश्किल ये है कि कम से कम हिंदुस्तान के संदर्भ में मीडिया पर वामपंथ का कब्जा सा रहा है। सिर्फ मीडिया में नहीं ज्यादातर शैक्षिक, बौद्धिक संस्थानों में। लेकिन, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच लोगों के बीच बात कितनी हो पाई। करीब 70 साल से तो ये मौका था। लेकिन, वामपंथी पत्रकारों ने इस मौके का इस्तेमाल विवाद को सुलझाने या कम करने में तो कतई नहीं किया। उन्होंने इसका इस्तेमाल दक्षिणपंथ को गलत सिद्ध करने में किया। कमाल देखिए कि भारतीय दक्षिणपंथी पार्टियों को पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के बराबर ले जाकर खड़ा करने की कोशिश भी की। कैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरेंगे। भारतीय वामपंथ देश को मानने को तैयार ही नहीं रहा। जाहिर है देश को मानने वालों के लिए वामपंथ के मन में घृणा की भावना रही। इससे वो पाकिस्तान के अतिवादियों को कहीं न कहीं पल्लवित करता रहा। और इससे विवाद सुलझने की गुंजाइश भी खत्म होती रही। इस चक्कर में अभी हिंदुस्तान की दक्षिणपंथी सरकार की हर कोशिश को धूमिल किया जा रहा है। एक घटना देखिए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रत्याशित घटनाक्रम में नवाज शरीफ की भतीजी की शादी में लाहौर पहुंच गए। कोई तय दौरा नहीं था। मोदी अफगानिस्तान की संसद का उद्घाटन करके लौट रहे थे। अब इस पर देश की मीडिया को चर्चा ये करनी चाहिए थी कि देश की दक्षिणपंथी पार्टी की प्रधानमंत्री इस तरह से पाकिस्तान से रिश्ते ठीक करना चाहता है कि सारे प्रोटोकॉल तोड़ दे रहा है। दबे मन से मीडिया ने इसकी चर्चा तब तक की। जब तक मीडिया को ये मसाला नहीं मिल गया कि सज्जन जिंदल ने नवाज शरीफ से मुलाकात तय कराई। हालांकि, मैं निजी तौर पर मानता हूं नरेंद्र मोदी जैसे नेता को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिलने के लिए किसी उद्योगपति की जरूरत है। कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा ने ये आरोप लगाया। बस इसी पर समीक्षा होने लगी। मैं इसको दूसरी तरह से देखता हूं। अगर भारत के किसी उद्योगपति की ये स्थिति है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री उसके साथ रिश्ते रखने के लिए भारत के प्रधानमंत्री से मिल रहा है, तो इससे बेहतर क्या होगा। ये तो अच्छी बात होगी कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतने कारोबारी रिश्ते हो जाएं कि उन हितों को बचाने के चक्कर में सेना का काम कम हो। सीमा पर कम गोलीबारी हो। और सबसे महत्वपूर्ण कि दोनों सरकारों के बीच कतई संवाद बंद न हो। लेकिन, जैसे ही कारोबार की बात आएगी देश का तथाकथित सरोकारी मीडिया इस पर मोदी सरकार को पूंजीवादियों के पक्ष में खड़ी सरकार बता देता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जुमला ही चला दिया है कि ये सूट बूट की सरकार है। मीडिया इस पर बहस करता है।

कारोबार में बुराई क्या है। आखिर इसी कारोबार के लिए ही तो चीन भारत से लाख खराब संबंध के बावजूद संबंध सुधारे रखना चाहता है। दुनिया का बाजार तो कमजोर हो चुका है। अब तो सिर्फ भारतीय बाजार ही चीन की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। पाकिस्तान और नेपाल में भी चीन कारोबार की ही तलाश तो कर रहा है। लेकिन, इस नजरिये से भारतीय मीडिया बात ही नहीं कर रहा। जब चीन पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे को तैयार करे, तो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा दिखने लगता है। फिर ये कैसे गलत हो सकता है कि भारतीय उद्योगपति पाकिस्तान की परियोजनाएं पूरी करें। नेपाल में वामपंथी सरकार आते ही मीडिया ने लगभग ये कर दिया कि भारत की दक्षिणपंथी सरकार और नेपाल की वामपंथी सरकार के बीच संबंध ठीक हो ही नहीं सकते। इसका असर ये रहा कि नेपाल में आई आपदा के समय भारतीय मीडिया के खिलाफ बहुत खराब माहौल नेपाल में बना। दरअसल यूरोपीय यूनियन के देशों ने आपस में कारोबार करना सीखा है। और वहां का मीडिया भी इसी तरह से बात करता है। हमारा मीडिया और हमारी सरकारें भी इसी तरह से व्यवहार कर रही हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को देश मानने वाली सरकारों और उनके नागरिकों के बीच संबंध नहीं सुधरेंगे। तो दोनों देशों के बीच जो देश मानते नहीं, उनकी राय देश के बीच संबंध सुधारने में भला कैसे कारगर हो सकती है।

भारत के मीडिया में सबसे ज्यादा पाकिस्तान की खबर इसीलिए होती है कि सबसे ज्यादा विवाद, झगड़ा इन्हीं दोनों के बीच है। लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं है। भारत-नेपाल की भी चर्चा सिर्फ विवादों की ही वजह से मीडिया में होती है। भारत के लोग श्रीलंका के बारे में भी सबसे ज्यादा तब सुनते, जानते रहे। जब विवाद हुआ। जब वहां प्रभाकरन था, लिट्टे था। जब तमिल भावनाओं के नाम पर तमिलनाडु में लिट्टे के लोगों को समर्थन मिलने की बात थी। जब समुद्री सीमा विवाद हो। या फिर किसी समय भगवान राम पर किसी याचिका की सुनवाई होनी हो, तो टीवी चैनल रावण की लंका से लेकर सीता की रसोई तक दिखा देते हैं। मीडिया ने तय कर लिया है कि भारत के दूसरे सार्क देशों के साथ ऐसे ही संबंध हैं। ये मान्यता पक्की कर दी गई है। बांग्लादेश के संदर्भ में भी हम ऐसे ही जानते-समझते हैं। मालदीव के बारे में हम भारतीय मीडिया के जरिए तब जानते हैं। जब वहां एक नेता दूसरे की सत्ता पलट देता है। दरअसल एक और जो बुनियादी गड़बड़ है, जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया है। दरअसल अंग्रेजी मानसिकता से सोचने से मीडिया सार्क देशों का बड़ा नुकसान कर रहा है। जरूरत इस बात की है कि सार्क देशों की भाषा में सार्क देश एक दूसरे से बात करें। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है और इस तरह से इसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन, सार्क देशों के बीच संपर्क की भाषा अंग्रेजी कैसे हो सकती है। सार्क देशों के बीच की संपर्क की भाषा हिंदी है, उर्दू है, पंजाबी है, नेपाली है, मधेशी है, तमिल है, मालदीव की है, भूटान की है, बंगाली है। इसीलिए अंग्रेजी में बातचीत होती है, तो वो सार्क देशों के इर्द गिर्द कम सार्क देशों पर अमेरिकी और दूसरे पश्चिमी देशों के असर से ज्यादा प्रभावित हो जाती है। इसीलिए जरूरी है कि मीडिया सार्क देशों के संदर्भ में अपनी बातचीत का तरीका और भाषा बदले।

सिर्फ पांच प्रतिशत का कारोबार अगर सार्क देशों के बीच है, तो उसकी साफ वजहें हैं। अभी का उदाहरण है। फिक्की की एक प्रदर्शनी कराची में लगनी थी। लेकिन, ये रद्द हो गई। इसकी चर्चा कितनी हो पाई। दरअसल जरूरत इसी बात की है कि सार्क देशों के लोगों के बीच जो, सांस्कृति, सामाजिक साझा है। उसकी बात की जाए। अगर सार्क देशों के बीच में कारोबार से बहुत सी चीजें एक दूसरे की सुधर सकती हैं, तो उसकी बात होनी चाहिए। ढेर सारी ऐसी जरूरतें हैं, जो सार्क के देश पूरी करने के लिए अमेरिका, चीन, यूरोप के सहारे हैं। जबकि, ये जरूरतें वो आपस में ही पूरी कर सकते हैं। सस्ते में जरूरतें पूरी होंगी। भरोसा बेहतर होगा, तो बेहतरी सार्क देशों की ही होगी। हिंदुस्तान सबसे बड़ा साझेदार होने की वजह से सबसे ज्यादा जिम्मेदार भी है। लेकिन, दूसरे सार्क देशों को भी ये समझना होगा कि आपस में भरोसे का माहौल न होने से नुकसान सबका हो रहा है। मीडिया को ये बताना चाहिए कि सार्क देशों के बीच दुनिया के किसी दूसरे क्षेत्रीय संगठन से ज्यादा सामंजस्य बन सकता है। इसीलिए मेरा ये भरोसा बनता है कि सार्क देशों के बीच के विवाद को सुलझाने में मीडिया की बड़ी भूमिका है। बस मीडिया को जनता और देशों के बीच के कारोबार की बात करनी होगी। जरूरत की बात करनी होगी। विवाद से ज्यादा जगह जरूरत को देनी होगी। सार्क देशों के बीच जरूरत, विवाद से बहुत ज्यादा है।