फर्जी सरोकारी, हत्यारा वामपन्थ

हिंदुस्तान में वामपन्थ की बात होते ही, लाख बुराइयों के बाद भी इसे सरोकारी घोषित कर देने वालों की लंबी कतार है। दरअसल, ज्यादातर विकास के किसी भी काम का विरोध करके वामपन्थियों ने अपनी छवि ऐसी दुरुस्त की है। लेकिन, अगर थोड़ा ध्यान से देखा जाए, तो शायद की सरोकार और वामपन्थ का कोई सीधा रिश्ता साबित हो सके। हां, उल्टा रिश्ता जरूर साबित होता दिखता है। वामपंथियों का सरोकार मतलब सीधे तौर पर सत्ता हासिल करने के लिए संस्थागत तरीके से राजनीतिक हत्याएं कराना। और, इस तरह की हत्याओं के देश के सामने आने से रोकने के लिए वामपन्थी पत्रकारों का इस्तेमाल करना। सोचिये वामपंथ भारत में सरोकारी स्थापित है। उसके पीछे असली वजह वामपन्थी घुट्टी वाले पत्रकारों का ये लगातार साबित करने की कोशिश रहा है। वामपंथी पत्रकारों ने अपनी भूमिका सलीक़े से नहीं निभाई। वामपन्थ पत्रकार जितना पक्षपाती रहता है। उतना तो कई बार राजनीतिक कार्यकर्ता भी नहीं होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो भारत में जिन दो राज्यों में सबसे ज़्यादा समय सत्ता में रहते वामपन्थ ने संगठित तौर पर राजनीतिक हत्या की वो भी देश के लोग जानते। ‪#FarziSarokar

सबसे कमाल की बात ये है कि सरोकार, शोषित के पक्ष में अपनी छवि बनाने वाले वामपन्थियों का शासन जहां भी आया, वहां बेचारा शोषित रह ही नहीं गया। क्यों नहीं रह गया। बंगाल में उद्योग निपट गए। ये उद्योग विरोधी रहे। अपनी सत्ता चलाते रहे। और सोचिए कि इनकी सबसे बड़ी सरोकारी इमारत बंगाल में क्या हुआ। सरोकार और सरोकारियों के लिए ये जरूरी जानकारी याद कराना बेहद जरूरी है। ज्यादा साल नहीं बीते हैं। दस साल से भी कम समय हुआ है। 2007 की बात है। पश्चिम बंगाल में देश की सबसे सरोकारी सरकार थी। अरे वही वामपन्थी सरकार। ज्योति बसु मुख्यमंत्री और जितने तरह का वामपंथ जानते हों, सबको जोड़ लीजिए। मतलब उन्हीं लोगों का राज था बंगाल में। उसी बंगाल में एक नंदीग्राम है। इसे धार्मिक जगह न समझ लीजिएगा। नहीं तो मामला सांप्रदायिक हो जाएगा। क्योंकि, जगह के नाम में नंदी भी है ग्राम भी। तो, उस नंदीग्राम में 10000 एकड़ जमीन पर सरोकारी सरकार कब्जा कर रही थी। जमीन बचाने के लिए बेचारे गैर सरोकारी किसान भिड़े। अरे होना क्या था। बंगाल में तब उनकी सरकार थी। सीधे पुलिस ने गोली चलाई। दर्जनों किसान मरे और सैकड़ों घायल हुए। और ये जमीन किसी किसान, गरीब, कमजोर की किसी योजना या सरकारी योजना के लिए भी नहीं ली जा रही थी। ये कब्जाई जा रही थी। उद्योगपति रतन टाटा के टाटा ग्रुप की नैनो को बनाने के लिए।


और ये वामपंथी लगातार ये प्रचारित करते रहते हैं कि नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों का प्रधानमंत्री है। अब तो हाल ये है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कॉमरेड देश भर में सरकार के खिलाफ खुद को थप्पड़ मारकर मुंह लाल कर रहे हो। सत्ता हासिल करने के लिए गैर लोकतांत्रिक तरीका अपनाने का इतिहास वामपंथियों का ही रहा है। बंदूक उठाकर सैनिको, जवानों के खून से लाल कर देते हैं। जहां सत्ता में रहे या सरकार में In&Out हुआ, तो राजनीतिक हत्याएं करके खून से जमीन लाल कर देते हैं। दरअसल यही है वामपंथ का लाल सलाम। और ये लाल सलाम मतलब क्रांति को सलाम नहीं होतो। वामपंथियों का कर्म बताता है कि लाल का मतलब खून से ला करना होता है। अच्छी बात ये है कि बहुतायत देश अब समझ चुका है। केरल में संघियों के खून से लाल धरती तो इन्हें महान क्रांतिकारी बना देती है। और ऐसे में वामपंथी पत्रकार क्या करेंगे। किसी लाल धरती की असली कहानी नहीं बताएंगे। नहीं बताएंगे कि लाल सलाम का मतलब संगठि हत्या, संगठित हत्यारों को सलाम है। नहीं बताएंगे। वामपंथ पूरी तरह से हत्यारा और फर्जी सरोकारी विचार है। इसीलिए मनुस्मृति को जलाकर और सेना के जवानों पर बलात्कार का आरोप लगाकर खुद को खबरों में रख रहे हैं। और वामपंथी विचार से प्रेरित पत्रकार अपनी जिम्मेदारियों की हत्या कर दे रहे हैं। मतलब उसका भी लाल सलाम हो जा रहा है।