खेत खत्म, बाजार बमबम

रेडियो पर विज्ञापन सुनते दफ्तर आया जिसमें पत्नी चिंतित है कि खाने का पूरा ध्यान रखने के बाद भी पति चैतन्य नहीं रहता। सलाह मिलती है कि रोज के खाने से शरीर की सारी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। प्रोटीन के लिए ये उत्पाद खाओ। और अगर ध्यान से दूसरे विज्ञापनों को देखें तो वो बताता है कि शुद्ध गेहूं या दूसरी रोज की खाने की चीजें इसमें मिली हैं, इसलिए खाओ। ये बाजार चाहता क्या है। खेत से पैदा अनाज छोड़, अनाज को इधर-उधर करके कारखाने में बने, पैक डिब्बाबंद उत्पादन को खाया जाए। कमाल है ना। लेकिन, बाजार ऐसे ही काम करता है। वो चाहता है कि खेत बने रहें लेकिन, सिर्फ उसकी जरूरत भर के। सिर्फ उसके कारखानों में नए उत्पाद बनाने भर के। किसान भी बचे रहें उतने ही।